एमिल दुर्खीम का सामाजिक सिद्धांत , एमिल दर्खाइम की विचार पद्धति सिद्धांत emile durkheim in hindi

By   November 21, 2020

emile durkheim in hindi theory in sociology एमिल दुर्खीम का सामाजिक सिद्धांत , एमिल दर्खाइम की विचार पद्धति सिद्धांत जीवन परिचय क्या है ?

एमिल दर्खाइम की विचार पद्धति
समाजशास्त्र के लिए एक विशिष्ट पद्धति विकसित करने में एमिल दर्खाइम का महत्वपूर्ण योगदान है। अपनी कृतियों में विभिन्न प्रश्नों के सामाजिक पहलुओं पर उसने जोर दिया। वैयक्तिक या मनोवैज्ञानिक व्याख्या की जगह उसने सामाजिक और समाजशास्त्रीय व्याख्या का प्रयोग किया। निश्चित रूप से दर्खाइम ने समाजशास्त्र को अपनी अलग-सी पहचान दी। इस भाग में आइए हम देखें कि किस प्रकार दर्खाइम ने व्यक्ति और समाज के अंतर्सबंध को दर्शाया है। दर्खाइम के अनुसार “सामाजिक तथ्य‘‘ (social facts) समाजशास्त्र की विषयवस्तु है, इस पर भी हमने चर्चा की है। अंत में हमने दर्खाइम द्वारा प्रस्तुत “प्रकार्यात्मक विश्लेषण‘‘ (functional analysis) की व्याख्या की है।

 व्यक्ति और समाज
दर्खाइम के अनुसार मानव-जाति शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति से तृप्त नहीं होती। मनुष्य की इच्छाएँ और अभिलाषाएँ अपार हैं। इन्हें नियंत्रित करने के लिए सामाजिक नियम आवश्यक हैं। सामाजिक नियंत्रण के द्वारा ही व्यक्तिगत इच्छाओं को काबू में रखा जा सकता है। जब सामाजिक नियम टूट जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं तब व्यक्ति को नियंत्रित करने वाली शक्ति भी नष्ट हो जाती है।

वे तमाम नीतियां और नियम जिनके सहारे जनसमूह अपना जीवन व्यतीत करते हैं, यदि निरर्थक हो जाते हैं तो इस स्थिति को दर्खाइम प्रतिमानहीनता (anomie) कहता है। लुविस कोजर (1971ः 133) मानता है कि दर्खाइम के समाजशास्त्र का प्रमुख सूत्र है – सामाजिक संतुलन और असंतुलन। दर्खाइम उन प्रक्रियाओं की व्याख्या करना चाहता है जो सामाजिक संतुलन या असंतुलन को प्रभावित करती हैं। व्यक्तिगत इच्छाओं और सामाजिक एकता की प्रवृत्ति के बीच तनाव पर चर्चा कर वह इसका समाधान खोजता है।

तनाव का विश्लेषण करने पर ध्यान केंद्रित करने की झलक उसकी सारी कृतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर डिविजन ऑफ लेबर (1893) में दर्खाइम दो प्रकार के समाजों (यांत्रिक एकात्मकता और सावयवी एकात्मकता पर आधारित) का वर्णन करता है।

जिस समाज में यांत्रिक एकात्मकता (उमबींदपबंस ेवसपकंतपजल) पायी जाती है उसमें सामूहिक चेतना (collective consciousness) व्यक्ति पर हावी होती है। जिस समाज में सावयवी एकात्मकता (organic solidarity) पायी जाती है उसमें मनुष्य के व्यक्तित्व को फलने-फूलने का अवसर मिलता है। दर्खाइम का झुकाव सावयवी एकात्मकता वाले समाज की ओर है। उसके अनुसार व्यक्तिवाद से सामाजिक बंधन ज्यादा मजबूत बन सकते हैं। व्यक्ति और समाज के बीच अंतर्संबंध के प्रति दर्खाइम का दृष्टिकोण काफी जटिल है। व्यक्ति को महत्व देकर वह समाज की भूमिका को नकारता नहीं है। दूसरी ओर, दर्खाइम यह भी नहीं कहता कि समाज की शक्ति के सामने व्यक्ति निरर्थक या तुच्छ है।

वह मानता है कि समाज का अपना एक अस्तित्व (sui generis) है। समाज हमारे से पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा। उसके सदस्य आएंगे और चले जाएंगे परन्तु समाज बना रहेगा। व्यक्ति समाज का निर्माण करने वाले व्यक्तियों के परे भी समाज बना रह सकता है, परन्तु व्यक्ति समाज के बिना रह नहीं सकते। व्यक्ति और समाज के बीच अंतर्सबंध के बारे में आपने ध्यान से पढ़ने के बाद अब हमें देखना है कि दर्खाइम ने समाजशास्त्र की विषयवस्तु के बारे में क्या कहा।

समाजशास्त्र की विषय वस्तुः सामाजिक तथ्य
अपनी प्रमुख कृतियों में (द डिविजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी, सुइसाइड, एलिमेंटरी फार्स ऑफ रिलिजस लाइफ) दर्खाइम मनोवैज्ञानिक व्याख्या को नकार कर समाजशास्त्रीय व्याख्या का प्रयोग करता है। उदाहरण के तौर पर सुइसाइड में आत्महत्या के सामाजिक कारण खोजे गये हैं। पागलपन, शराब की लत इत्यादि वैयक्तिक या मनोवैज्ञानिक कारणों पर दर्खाइम जोर नहीं देता है। उसके अनुसार आत्महत्या का सामाजिक पहलू है और यह सामाजिक एकीकरण के अभाव को दर्शाता है। दर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र मूलतः सामाजिक तथ्यों के अध्ययन से और इन तथ्यों की समाजशास्त्रीय व्याख्या से संबंधित है। रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मेथड (1895) में दर्खाइम ने इस बात को स्पष्ट रूप से समझाया है। वह इस बात को स्थापित करना चाहता है कि समाजशास्त्र भी एक विज्ञान बन सकता है, जो कि अन्य विज्ञानों के स्वरूप पर आधारित है। समाजशास्त्र की एक विशिष्ट विषय वस्तु होना आवश्यक है, किन्तु तथ्यों का प्रेक्षण और उनकी व्याख्या अन्य विज्ञानों की तरह ही होनी चाहिए।

समाज के वैज्ञानिक अध्ययन को संभव बनाने के लिए दर्खाइम दो नियम प्रस्तुत करता हैः
(प) सामाजिक तथ्य वस्तुओं के समान हैं, (पप) सामाजिक तथ्य व्यक्तियों पर बाधक होते हैं।

आइए, पहले नियम पर चर्चा करें । दर्खाइम का कहना है कि सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करने से पहले हमें अपनी पूर्वकल्पनाओं और पूर्वाग्रहों को हटाकर सामाजिक तथ्य को बाहर से देखना चाहिये। भौतिक या प्राकृतिक तथ्यों की तरह ही सामाजिक तथ्यों को हमें खोजना और देखना होगा। एक उदाहरण से इस बात को स्पष्ट किया जा सकता है। आपको भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली का अध्ययन करना है । दर्खाइम के अनुसार आपको सबसे पहले अपनी पूर्व कल्पनाओं को अलग करना होगा, उदाहरण के तौर पर भारत में “लोकतांत्रिक प्रणाली असफल है‘‘ या ‘‘लोकतंत्र जनता का राज है‘‘ इत्यादि। आपको लोकतांत्रिक प्रणाली का परीक्षण तटस्थ, निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से करना होगा। सामाजिक तथ्यों को हम कैसे पहचानें? इस प्रश्न का उत्तर दूसरे नियम में मिलता है। दर्खाइम का कहना है कि सामाजिक तथ्य व्यक्ति पर बाधक होते हैं। चुनाव के दौरान लोकतांत्रिक प्रणाली स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। राजनैतिक उम्मीदवार लोगों से वोट मांगते हैं। लोग चुनाव करने या कोई निर्णय लेने पर विवश हो जाते हैं। इस प्रकार, सामाजिक तथ्य व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

आइए, अब दूसरा उदाहरण देखें। क्रिकेट मैच के दौरान जब सचिन तेंदुलकर शानदार छक्का मारता है तब सारे दर्शक तालियों से इसका स्वागत करते हैं। कुछ दर्शक न चाहने पर भी दूसरों की तरह उत्तेजित हो जाते हैं। दर्शक-गण में शामिल होने के फलस्वरूप ऐसे दर्शक एक विशेष प्रकार का बर्ताव करने पर विवश हो जाते हैं। सामाजिक तथ्यों को वस्तु के रूप में देखना और उनका बाधक स्वरूप पहचानना दर्खाइम की समाजशास्त्रीय पद्धति का मूल-तंत्र है (आरों 1970ः 72)। सामाजिक तथ्यों का बाहर से और निरपेक्ष रूप से परीक्षण करने की यह धारणा समाजशास्त्र पर विज्ञान का प्रभाव स्पष्ट रूप से दर्शाती है। आपको याद होगा कि दर्खाइम के जीवन-काल में समाजशास्त्र एक नया विषय था जो अपना विशिष्ट स्थान बनाने का प्रयास कर रहा था। समाजशास्त्रीय पद्धति में दर्खाइम के योगदान को हमें इसी संदर्भ में देखना चाहिए। आइए, अब हम दर्खाइम द्वारा प्रस्तुत प्रकार्यात्मक विश्लेषण (निदबजपवदंस ंदंसलेपे) के बारे में संक्षेप में पढ़ें।

समाज का प्रकार्यात्मक विश्लेषण
समाजशास्त्रीय पद्धति के क्षेत्र में दर्खाइम का एक महत्वपूर्ण योगदान प्रकार्यात्मक व्याख्या का विश्लेषण है। सामाजिक प्रक्रियाओं को अध्ययन का केन्द्र बनाने की प्रवृत्ति जीव-विज्ञान से ली गई है। जीव का हर अंग या अवयव एक विशेष कार्य करता है, जिससे वह जीवित और स्वस्थ रहता है। यदि हम मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंगों को प्रकार्यात्मक दृष्टि से देखें तो यह पाया जाता है कि प्रत्येक अंग पूरे शरीर को बनाए रखने में सहायक है। हृदय शरीर में रक्त संचरित करता है, फेफड़े हवा को शुद्ध करते हैं, अमाशय खाना पचाने का काम करता है, मस्तिक दूसरे अंगों को नियंत्रण में रखता है। इन विभिन्न अंगों के संपूर्ण प्रकार्य ही हमें जीवित और स्वस्थ रखते हैं।

समाज के प्रकार्यात्मक अध्ययन के दौरान समाज को पूर्ण और स्वस्थ बनाए रखने में विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं और संस्थाओं की भूमिका को अध्ययन का केन्द्र बनाया जाता है। सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के लिए दर्खाइम ने स्पष्ट रूप से प्रकार्यात्मक प्रक्रिया की स्थापना की। दर्खाइम (1966ः 97) के अनुसार, “तथ्यों की व्याख्या के लिए प्रकार्यों का निर्धारण आवश्यक है एक सामाजिक तथ्य की व्याख्या के लिए वह कारण मात्र दिखा देना जिस पर वह आधारित है, पर्याप्त नहीं है, सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने में उसके प्रकार्यों को दिखाना भी आवश्यक है‘‘ (रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मैथड)।

दूसरे शब्दों में, दर्खाइम के लिए तथ्यों की समाजशास्त्रीय समझ तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि सामाजिक व्यवस्था कायम करने में इन तथ्यों के प्रकार्यों या उनकी भूमिका को न समझा जाए। दर्खाइम की समस्त कृतियों में प्रकार्य की अवधारणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। डिविजन ऑफ लेबर में वह यह देखने का प्रयास करता है कि व्यावसायिक विशिष्टीकरण की प्रक्रिया किस प्रकार सामाजिक व्यवस्था और संबद्धता बनाए रखने में काम करती है। इस विषय में आपको इस खंड की इकाई 20 में अधिक विस्तार से जानकारी मिलेगी। इकाई 19 में आपको मालूम होगा कि दर्खाइम ने एलिमेंट्री फार्स ऑफ रिलीजस लाइफ में यह दिखाया है कि धार्मिक अनुष्ठान और विश्वास के प्रकार्य सामाजिक बंधनों को मजबूत करते हैं। दर्खाइम की सारी कृतियों में सामाजिक व्यवस्था के निरूपण की आवश्यकता दिखाई देती है। इस बिंदु पर दर्खाइम की प्रकार्यात्मक विश्लेषण पद्धति को आत्मसात करने हेतु सोचिए और करिए 2 को पूरा करें।
सोचिए और करिए 2
अपने समाज की दो सामाजिक संस्थाओं का चयन कीजिए। उदाहरण के तौर पर विवाह, परिवार, जाति, गोत्र इत्यादि। प्रकार्यात्मक विश्लेण कर इन्हें समझाने का प्रयास कीजिए। दो पृष्ठों का निबंध लिखिए और यदि संभव हो तो अपने अध्ययन केन्द्र के अन्य विद्यर्थियों के निबंधों के साथ इसकी तुलना कीजिए।

संक्षेप में दर्खाइम ने समाजशास्त्र के लिए एक ऐसी विषय वस्तु निर्धारित करने का प्रयास किया जिसके द्वारा समाजशास्त्री सामाजिक तथ्यों के प्रति वस्तुनिष्ठ और तटस्थ दृष्टिकोण अपना सकें। दर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्री का काम सामाजिक तथ्यों को समाजशास्त्रीय ढंग से समझाना है। इस प्रकार सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायक सामाजिक तथ्यों के प्रकार्यों से जुड़ी व्याख्या संभव होगी।

यदि आपने मार्क्स और दर्खाइम की विचार पद्धतियों पर उपरोक्त पृष्ठ ध्यान से पढ़े हैं तो दोनों में एक मुख्य अंतर अवश्य पाया होगा, वह यह कि मार्क्स द्वंद्व और संघर्ष पर जोर देता है, जबकि दर्खाइम व्यवस्था पर। आइए अब इन चिंतकों के सापेक्ष महत्व की तुलना संक्षेप में करें। किन्तु इससे पहले आपने अभी तक कितना समझा है, यह बोध प्रश्न 2 को पूरा कर देख लें।

बोध प्रश्न 2
प) निम्नलिखित वाक्यों के सामने “सही या गलत” लिखिये।
क) दर्खाइम के अनुसार सर्वशक्तिमान समाज की तुलना में व्यक्ति निरर्थक है। सही/गलत
ख) सावयवी एकात्मता का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति समाज से अलग रह सकते हैं। सही/गलत
पप) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर तीन पंक्तियों में दें।
क) किसी “सामाजिक तथ्य‘‘ को किस प्रकार पहचाना जा सकता है? एक उदाहरण दें।
ख) दर्खाइम के प्रकार्यात्मक विश्लेषण के दो उदाहरण दें।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
प) क) गलत
ख) गलत
पप) क) सामाजिक तथ्य व्यक्ति पर बाधक होते हैं और व्यक्ति को विशिष्ट प्रकार का बर्ताव करने पर विवश करते हैं। उदाहरण के तौर पर क्रिकेट मैच देखते समय जब दर्शक उत्तेजित होते हैं तब आपका बर्ताव भी अन्य दर्शकों जैसा होगा ।
ख) श्रम विभाजन के बारे में लिखते समय दर्खाइम ने देखा कि किस प्रकार का प्रक्रिया सामाजिक एकात्मता बनाने में सहायक होती है। धर्म के संदर्भ में दर्खाइम ने यह दिखाने का प्रयास किया कि किस तरह अनुष्ठान और मान्यताएँ सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने का कार्य करती हैं।