द्रविड़ मुनेत्र कड़गम आंदोलन क्या है dravida munnetra kazhagam in hindi स्थापना किसने और कब की थी

By   December 6, 2020

dravida munnetra kazhagam in hindi द्रविड़ मुनेत्र कड़गम आंदोलन क्या है स्थापना किसने और कब की थी ?

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम आंदोलन का जन्म
भाषा के मुद्दे पर उत्तर और दक्षिण के बीच विभाजन आंरभिक पश्चिमी विद्वानों जैसे रॉबर्टो डी मोबिली (1577-1656), कोंस्टेनियस बेशी (1680-1743) रेव. रॉबर्ट काल्डवेल (1819-1891) के समय से चला आ रहा है। इस सिद्धांत को गढ़ने का श्रेय मूलतः काल्डवेल को जाता है, कि संस्कृत को आर्य ब्राह्मण उपनिवेशक दक्षिण भारत लाए थे जिन्होंने ठेठ हिन्दुत्व को जन्म दिया जिसमें मूर्तिपूजा की जाती थी। तमिल भाषा को वहां के मूल वासियों ने ही विकसित किया जिन्हें ये ब्राह्मण आर्य लोग शूद्र कहकर बुलाते थे। इन सब में ब्राह्मणवादी वर्चस्व के चिन्ह हैं क्योंकि वहां के मूलवासी सरदार, सैनिक, किसान इत्यादि थे। आप्रवासी ब्राह्मण इन तमिल भाषियों को जीत नहीं पाए। इन विद्वानों ने तर्क दिया “शूद्र‘‘ संबोधन को हटाकर उसकी स्थानीयता के अनुसार प्रत्येक द्रविड़ का नाम प्रयोग किया जाना चाहिए। (उर्सविक 1969) इससे स्पष्ट हो जाता है कि दक्षिण में भाषायी जातीयता की जड़ें जातिगत राजनीति में हैं।

मद्रास के गवर्नर माडंटस्टुअर्ट एलफिन्स्टन ने 1866 में मद्रास कॉलेज के स्नातकों को एक अभिभाषण में कहा थाः “हम यूरोपवासियों में नहीं बल्कि इन्हीं संस्कृतभाषी लोगों दक्षिणवासी नस्लों की गिनती राक्षसों में की थी। उन्हीं लोगों ने जानबूझकर वर्ण, रंग के आधार पर सामाजिक विभेद खड़े किए।” इन घटनाओं के आधार पर बारनेट निष्कर्ष निकालते हैंः “इस प्रकार गैर ब्राह्मणों की विचाराधारात्मक श्रेणी के बनने से पहले एक ऐसे द्रविड़ सांस्कृतिक इतिहास के बोध का जन्म हुआ जो दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों की संस्कृति से अलग, विशिष्ट और संभवतः उससे श्रेष्ठ थी।‘‘ इसी सांस्कृतिक इतिहास के बोध ने 1916 में साउथ इंडियन लिबरेशन फेडरेशन (जस्टिस पार्टी.) को जन्म दिया। यह प्रतिक्रियावादी आंदोलन ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए शुरू हुआ था, उसके राजनीतिक संवाद की भाषा तमिल के बजाए अंग्रेजी थी। इसी से यह अर्थ निकाला जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद दक्षिण भारत में हुए भाषा आंदोलन मूलतः हिन्दी विरोधी और अंग्रेजी समर्थक तो थे मगर वे अनिवार्यतः तमिल समर्थक नहीं थे।

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द्रविड़ पहचान का समर्थन ही इस आंदोलन का मुख्य ध्येय था। जस्टिस पार्टी ने अपने अंग्रेजी प्रकाशन जस्टिस और तमिल साप्ताहिक विड़ियन के माध्यम से इस आंदोलन को फैलाया। उसने वर्णाश्रम और धर्म को अपनी आलोचना का निशाना बनाया और जब महात्मा गांधी ने हिन्दू धर्म में वर्णाश्रम व्यवस्था को उचित ठहराया तो उनकी तीखी आलोचना हुई। अभिजात सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं पर ब्राह्मणों के वर्चास्व ने दक्षिण भारत में ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच मौजूद खाई को और गहरा किया।

बहरहाल, तमिल भाषा के महत्व का पता हमें द्रविड़ियन के 29 सितंबर 1920 अंक में छपे एक लेख से चलता है। इस लेख में एक तमिल विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रस्ताव पर संतोष व्यक्त किया गया था। यह प्रस्ताव त्रिचुरापल्ली में हुए एक गैर ब्राह्मण सम्मेलन में पारित हुआ था। लेख में यह तर्क दिया गया थाः “आजकल के विश्वविद्यालयों में तमिल को समुचित प्रोत्साहन नहीं दिया जाता और इन विश्वविद्यालयों में पदासीन प्रभावशाली विदेशी आर्यों ने ही तमिल भाषा की ऐसी दुर्दशा की है।” इस लेख का कहना था कि तमिल भाषी लोग तभी प्रगति और राजनीतिक प्रभाव प्राप्त कर सकते हैं जब तमिल भाषा को मान्यता मिले।

इस प्रकार ही ब्राह्मण विरोधी भावनाओं को 1924 में ई. वी. रामास्वामी द्वारा सेल्फ रेस्पेक्ट लीग (आत्मसम्मान लीग) की स्थापना के बाद और मजबूती मिली। यह आत्म सम्मान आंदोलन एक सक्षम सांस्कृतिक विकल्प ढूंढने का प्रयास था। इस आंदोलन ने गैर ब्राह्मणों की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को आमूलचूल बदल डाला। आत्मसम्मान आंदोलन की महत्ता काँग्रेस में व्यावहारिक राजनीति के उदय के साथ कम होती गई। फिर 1930 और 1940 के दशकों के दौरान गैर ब्राह्मण काँग्रेसी सक्रिय रहे क्योंकि उन्हें यह महसूस होने लगा था कि स्वतंत्र भारत में काँग्रेस ही राज करेगी। कम्मा और कप्पू जैसे अग्रणी गैर ब्राह्मण समुदाय काँग्रेस समर्थक थे। काँग्रेस ने 1936 में मद्रास प्रेसिडेंसी में चुनाव जीते जो 935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत हए थे। इसके बाद सी. राजागोपालाचारी काँग्रेस की प्रांतीय सरकार के प्रीमियर नियुक्त हुए। यहीं से द्रविड़ आंदोलन ने जन्म लिया जिसका कारण कुछ स्कूलों में हिन्दुस्तानी को अनिवार्य विषय बनाया जाना था। कुडी आरसू विद्रोह और जस्टिस हिन्दी और हिन्दुस्तानी का 1920 के दशक से ही विरोध करते आ रहे थे जो उनकी दृष्टि से उत्तर की आर्य भाषाएं थी। इससे भाषा का मुद्दा गैर काँग्रेस दलों के लिए मोर्चाबंद होने का बहाना बन गया। इसके बाद 1938 में एक जबर्दस्त आंदोलन छिड़ गया। विरोधी राजनीतिक दलों ने प्रीमियर के घर के सामने धरना दिया। कुछ खास हाई स्कूलों के सामने जुलूस निकाले गए। इसके बाद कई सभाएं और प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान सबसे उत्तेजक नारा यह लगाया जाता थारू ‘‘ब्राह्मण राज खत्म हो” गृह विभाग ने 1939 में जो रिपोर्ट तैयार की थी उसके अनुसार इस आंदोलन के दौरान 536 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन यह आंदोलन एक वर्ष बीतते-बीतते ठंडा पड़ गया। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसने सी.एन अन्नादुर्रे जैसे प्रवीण संगठनकर्ता और आंदोलनकारी को जन्म दिया वहीं ई.वी.रामास्वामी को नवंबर 1939 में आयोजित तमिलनाडु महिला सम्मेलन ने ‘पेरियार‘ की उपाधि दी। मद्रास प्रेसीडेंसी के तमिल भाषी उत्तरी आरकोट, सालेम, त्रिचुरापल्ली, तंजौर, मदुरै और रामनाड जिलों को मिलाकर 1 जुलाई 1939 को एक द्रविडनाडु निर्माण दिवस मनाने की घोषणा की गई। ‘‘द्रविड़ों के द्रविडनाड़” का यह नारा असल में ब्राह्मणवादी राजनीतिक प्रभुत्व और तमिल संस्कृति में आर्यों के विचारों की घुसपैठ के खिलाफ प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति थी। हिन्दुस्तानी विरोधी आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध के चलते समाप्त हो गया। इसी बीच काँग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ा और अंग्रेजों को युद्ध में सहायता देने से मना कर दिया। मगर दूसरी और ई.वी. रामास्वामी ने अंग्रेजों का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने क्रिप्स कमीशन से मुलाकात करके उसके सामने एक पृथक द्रविड़नाड की मांग रखी। उन्होंने इस विषय पर जिन्ना और अंबेडकर से मुलाकात की। लेकिन 1939-1944 के बीच अपने तमाम प्रयासों के बावजूद रामास्वामी को द्रविड़ कड़गम की स्थापना होने तक लोगों से कोई विशेष समर्थन नहीं मिल पाया । बारनेट ने इस काल की घटनाओं पर बड़ी सटीक टिप्पणी की हैः ‘‘द्रविड़ विचारधारा में आमूल परिवर्तन मुख्यतः1930 के दशक में हुआ। लेकिन इसकी जड़ें ई. वी. रामास्वामी के प्रयासों में हैं जो 1924 में कुडी अरासू की स्थापना से शुरू हुए थे। तीस के दशक के दौरान काँग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता, जो कि 1936 की चुनावी जीत से सिद्ध हो गई थी, और द्रविड़ आंदोलन में चरमपंथियों और मध्यमागियों के बीच मतभेदों के बावजूद ‘द्रविड‘ राजनीतिक पहचान प्रमुख बनी रही।

अभ्यास 2
क्या आप समझते हैं कि भाषा के आधार पर राज्य सही है? अपने सहपाठियों और मित्रों से इस पर चर्चा कीजिए और उसके निष्कर्ष को अपनी नोटबुक में लिखिए।

 द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का उदय
द्रविड़ कड़गम की स्थापना में 1944 सालेम में आयोजित जस्टिस पार्टी एक सम्मेलन में की गई थी। यूं तो रामास्वामी जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष 1938 से थे लेकिन हिन्दुस्तानी विरोधी आंदोलन के दौरान उन्हें जब जेल भेज दिया गया तो वे आंदोलन के लिए अपेक्षित जनसमर्थन नहीं जुटा पाए। मगर जस्टिस पार्टी के द्रविड़ कड़गम में बदल जाने से अन्नादुरै का पार्टी के राजनीतिक एजेंडे पर प्रभाव स्पष्ट हो गया। अन्नादुरै ने यह जान लिया था कि जस्टिस पार्टी का कोई जनाधार नहीं था क्योंकि उसे धनाढ्यों की पार्टी समझा जाता था। अन्नादुरै ने जनसाधारण में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं के जगाने का प्रयत्न किया जिसे द्रविड़ कड़गम की लोकप्रियता बढ़ी मगर भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 1947 को रामास्वामी और अन्नादरै में मतभेद गहरे हो गए। इसके फलस्वरूप द्रविड कडगम में औपचारिक विभाजन हो गया। इस प्रकार अन्नादुरै के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) एक राजनीतिक दल के रूप में उभरा द्रविड़ कड़गम (डीएम) के लगभग 75,000 सदस्य उनके दल में शामिल हो गए। हालांकि दोनों दलों का एजेंडा वही रहा। सी. अनादुरै ने जब आर्यन इल्यूजन के नाम से एक पुस्तक प्रकाशित की तो इससे उनकी राजनीतिक लोकप्रियता में बड़ी उछाल आई। बाद में भारत सरकार ने 1952 में इस पुस्तक को उत्तेजक और भड़काऊ बताकर प्रतिबंधित कर दिया गया।

 सार्वजनीन प्राथमिक शिक्षा की भूमिका
जुलाई 1952 में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी ने सार्वजनीक प्राथमिक शिक्षा की योजना चालू की। इस योजना के तहत बच्चों को आधे दिन तक अपने स्कूलों में पढ़ाई करनी थी और शेष आधा दिन अपने पांरपारिक धंधों पर लगना था। इस पर डीएमके ने जातिगत शिक्षा का ठप्पा लगाया और एक जबर्दस्त आंदोलन छेड़ दिया। इस के साथ-साथ डीएमके ने त्रिची जिले के डालमियापुरम का नाम बदलकर कलाकुडी रखने की मांग भी की। इसकी मांग इसलिए उठाई गई क्योंकि डालमिया उत्तरी भारत के बड़े सीमेंट निर्माता थे। आजाद भारत में ये नई घटनाएं थीं जिनमें दक्षिण राज्यों में उत्तर के वर्चस्व को चुनौती दी जा रही थी। आंदोलन बड़ा उग्र और हिंसक था जिसमें नौ लोगों की मृत्यु हुई और सैकड़ों घायल हुए।

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इस काल में कांग्रेस के अंदर कामराज गुट भी तेजी से उभरा। ई.वी. रामास्वामी की सलाह पर कामराज 1954 में राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। उन्हें रामास्वामी ने श्पक्का तमिझनश् (सच्चा तमिल) कहा क्योंकि कामराज पिछड़ी जाति के थे। कामराज ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे और कांग्रेस के अन्य प्रतिष्ठित नेताओं की तरह धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे। उन्होंने 1954 से 1963 तक राज्य पर शासन किया और उन्हीं के शासनकाल में डीएमके ने अपना जनाधार बनाया।

इस आंदोलन में कई तमिल विद्वान शामिल थे। मुरासोली, मामनाडू द्रविड़ और मानराम जैसे पार्टी समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के प्रकाशन से तमिल साहित्य और भाषा में पुनर्जागरण का दौर आया। तमिल चेतना को फैलाने के लिए नाटक और अन्य लोक माध्यमों का प्रयोग किया गया। तमिलों की गरीबी और उनके मोहभंग को नाटकों के जरिए उजागर किया जाता था। ऐसे ही एक नाटक परशक्ति की रचना एम. करुणानिधि ने 1952 में की थी। इस नाटक में शिवाजी गणेशन जैसे कलाकार ने भूमिका निभाई थी। जनाकर्षण और जन संचार माध्यमों ने डीएमके की विचारधारा को घर-घर तक पहुंचाया। इन्हीं प्रभावों के तहत तमिल भाषा के मुद्दे ने 1965 में हिंसक मोड़ लिया।

भारत में भाषायी जातीयता
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
भारत में भाषा का इतिहास
भाषायी जातीयता और राज्यों का पुनर्गठन
भाषायी जातीयता और राज्य
भाषा और आधुनिकीकरण
द्रविड़ आंदोलन
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का उदय
सार्वजनीन प्राथमिक शिक्षा की भूमिका
भाषा के मुद्दे पर भारत सरकार की नीति
भाषा का मुद्दा
पंजाबी सूबा आंदोलन
एक पृथक भाषीय राज्य
नेहरू-मास्टर समझौता
भाषायी जातीयता के अन्य आंदोलन
राज्यों का पुनर्गठन
जनजातीय भाषायी आंदोलन
संथाली भाषा आंदोलन
मिशिंग लोगों का भाषा आंदोलन
अँतिया लोगों की जातीय-भाषायी अपेक्षाएं
भाषा और संस्कृति
भाषा आंदोलन के मूल कारण
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

 उद्देश्य
भारत में भाषायी जातीयता पर इस इकाई को पढ़ने के बाद आपः
ऽ भारत में भाषा के इतिहास के मुख्य पहलुओं के बारे में बता सकेंगे,
ऽ भाषायी जातीयता के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बारे में बता सकेंगे,
ऽ डीएमके मूवमेंट की चर्चा कर सकेंगे,
ऽ पंजाबी सूबा आंदोलन और अन्य भाषायी आंदोलनों पर रोशनी डाल सकेंगे, और
ऽ भारत में जनजातीय भाषा आंदोलनों के बारे में बता सकेंगे।

प्रस्तावना
‘जातीयता‘ शब्द का सबसे पहला प्रयोग 1953 में एक जातीय समूह की विशेषताओं या गुणों को बताने के लिए हुआ था। जातीय (एथनिक) समूह की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘एथनोस‘ से हुई जिसका अभिप्राय ऐसी जन श्रेणी से है जिसे उनकी संस्कृति, धर्म, नस्ल या भाषा के आधार पर अलग पहचाना जा सकता है। अपनी पहचान के लिए इनमें से किसी भी विशेषता का प्रयोग करने वाला जनसमूह जरूरी नहीं कि इन पहचान चिन्हकों को भेदभाव बरतने के लिए प्रयोग करे। इन श्रेणियों में सहभागी व्यक्ति अंतः समूह एकात्मता को मजबूत करने के लिए इन प्रतिमानों को दृढ़ता से रख सकते हैं। इस प्रकार की साहचर्पता का एक बड़ा माध्यम भाषा है और एक ही बोली बोलने या भाषा का प्रयोग करने वाले जन-समूह को जो अंतर सामूहिक एकात्मता की भावना का एहसास होता है उसे ही हम भाषायी जातीयता कहते हैं। भारत में 1500 से ज्यादा मातृभाषाएं प्रचलित हैं। जैसा कि आप जानते हैं हिन्दी राष्ट्र भाषा है जिसके साथ संविधान की आठवीं अनुसूची के तहत अन्य 14 क्षेत्रीय भाषाओं को भी मान्यता दी गई है । अन्य भाषाओं को राजकीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। ऐसा अनुमान है कि 1000 या उससे अधिक व्यक्ति लगभग 105 भाषाएं बोलते हैं, ऐतिहासिक दृष्टि से भाषा विज्ञानियों में इस बात को लेकर सहमति नहीं है कि भारत में ठीक-ठाक कितनी भाषाएं बोली जाती हैं।

जॉर्ज कायर्सन ने भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया में 179 प्रमुख भाषाओं और 544 बोलियों के बारे में बताया है। पहला भाषायी जनगणना सर्वेक्षण उन्नीसवीं सदी में किया गया था जिसके अनुसार “भारत में हर 20 मील के बाद भाषा बदल‘‘ जाती है। फिर 1961 की जनगणना से पता चला कि भारत में 1652 भाषाएं बोली जाती हैं जिनमें 1549 भाषाएं देशज हैं । ऐसा माना जाता है कि 9 देशज भाषाओं में लगभग 572 भाषाओं को भारत की 99 प्रतिशत जनसंख्या बोलती है। भारतीय संविधान में जिन 15 भाषाओं को मान्यता दी गई है उनकी लगभग 387 बोलियां प्रचलित हैं और ऐसा कहा जाता है कि इन्हें भारत की 95 प्रतिशत जनता बोलती है। भारत के बहुभाषी चरित्र को स्वतंत्रता के बाद गठित राज्य पुनर्गठन आयोग ने स्वीकार किया था। भाषायी और सांस्कृतिक समरूपता के आधार पर राज्यों का गठन भारतीय लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य की बहुभाषा प्रकृति की पुष्टि थी। इस आयोग के तहत 1956 तक आठ प्रमुख भाषा समूहों असमी, बंगाली, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, तेलुगु और तमिल को स्वंतत्र राज्यों का दर्जा दे दिया गया था। गुजराती और मराठी भाषा समूहों को 1966 तक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया और फिर इसी वर्ष पंजाबी को भी राज्य की मान्यता मिल गई। वर्ष 1966 तक संस्कृत, उर्दू और सिंधी भाषाओं को छोड़कर पांच हिन्दी भाषी राज्यों समेत सभी मान्यताप्राप्त भाषाओं को राज्य का दर्जा मिल गया था। जाने या अनजाने में भाषा स्वतंत्र भारत में राज्यों के पुनर्गठन का वैध मानक बन गई।