देह की धारणा क्या है | देह की परिभाषा किसे कहते है  संप्रेषणीय देह Deh in hindi meaning

By   December 7, 2020

Deh in hindi meaning देह की धारणा क्या है | देह की परिभाषा किसे कहते है  संप्रेषणीय देह ?

 देह की धारणा
देह स्पश्टतः संस्कृति का माध्यम है। हम अपने देह की देखभाल करते हैं और उसे चुस्त दुरुस्त बनाए रखते हैं, सजते संवरते हैं, अन्य लोगों से बातचीत करते हैं। मगर देह संस्कृति का सिर्फ तानाबाना ही नहीं है। बल्कि. यह “सामाजिक नियंत्रण का आधार‘‘ भी है। इसलिए हम जैसा चाहते हैं वैसा नहीं बन पाते। बल्कि हमारा रूप हमारा व्यक्तित्व संस्कृति के जरिए ही बनता है। हमारे इसी रूप को फॉलकॉल्ट “विनेय देह‘‘ की संज्ञा देते हैं जिसे सांस्कृतिक जीवन के आदर्श नियमित करते हैं।

भारत के संदर्भ में देह पर एक महत्वपूर्ण कृति डेविड आरर्नाल्ड द्वारा रचित कोलोनाइजिंग द बॉडी (दह का औपनिवेशीकरण) है। आर्नल्ड कहते हैं कि देह औपनिवेशिक शक्ति के लिए उपनिवेश स्थल तो है ही, यह उपनिवेश बनने वाले और उपनिवेश बनाने वाले राष्ट्रों के बीच संघर्ष का मैदान भी है।

 देह की समाजशास्त्रीय व्याख्या
मानव-विज्ञानियों और समाजशास्त्रियों ने नारी देह के विशिष्ट स्वरूप की व्याख्या जाति, धार्मिक विश्वास, सामाजिक नियमों और प्रथाओं की रोशनी में की है और यह बताया है कि नारी के देह रूप और उसकी लैंगिकता किस तरह सामाजिक मर्यादा या सीमा के महत्वपूर्ण चिन्हकों का काम करते हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि नारी की लैंगिकता को जाति और वर्गीय कारक नियंत्रित करते हैं। नारी की देह और उसकी लैंगिकता पुरुष के नियंत्रण क्षेत्र में रहती है। यह सिर्फ पितृसत्तात्मक शक्ति का ही नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण का आग्रह भी है। स्त्री को अपनी लैंगिकता की एक स्वतंत्र, स्वगमित व्याख्या या उसकी अभिव्यक्ति करने की अनुमति नहीं होती। उसकी देह जाति, वर्ग और सामुदायिक आन की अभिव्यक्ति का माध्यम और प्रतीक बन जाती है। शुचिता, पवित्रता और शुद्धता का महिमामंडन कुल, संप्रदाय और राष्ट्र की आन स्त्रियोचित गुणों के रूप में किया जाता है। एक तरह से नारी की देह उसकी नहीं रहती बल्कि समाज में अपनी छवि को प्रतिष्ठापित करने और उसे वैध बनाने के लिए समुदाय विशेष उस पर अपना अधिकार समझता है। इस समुदाय में स्त्री और पुरुष दोनों ही शामिल रहते हैं।

नारी देह वह आधार है जिस पर लिंग समानता बनती है, स्थापित होती है और उसे वैधता मिलती है इसलिए नारी देह को विभिन्न संदर्भो, परिवेशों और परिस्थितियों में समझना जरूरी है।

 संप्रेषणीय देह
नारी की देह को जब हम संप्रेषणशील या जिए जाने वाली काया के रूप में देखते हैं तभी हम जिए-जाने वाले अनुभव की सामाजिक प्रस्थापना के निहितार्थों को समझ सकते हैं। इसके साथ-साथ अपने देहरूप और उसकी अभिव्यक्ति को लेकर महिलाओं की अपनी जो समझ है उसे भी हम जाने सकते हैं। सामाजिक लिंग सोच की छाप महिलाओं पर उनके दैनिक जीवन में सामाजिक रूप से और उनके जीवन अनुभवों, बोध, आकांक्षाओं, फंतासियो के जरिए बनी रहती है। इस तरह लिंग पहचान इस मायने में विरचित और अनुभूत दोनों है।

नारी की पहचान के मूल में नारी देह के निरूपण का अंतःकरण है।

बोध प्रश्न 1
1) देह की समाजशास्त्रीय धारणा उसकी जीव-वैज्ञानिक धारणा से किस तरह से भिन्न है? आठ पंक्तियों में बताइए।

14.3 लिंग-पहचान को जन्म देने वाले कारक
आइए अब देखते हैं कि समाजीकरण किस तरह लिंग पहचान को प्रभावित करता है।

बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
1) शरीर को लेकर जो जीव-वैज्ञानिक धारणा प्रचलित है वह स्त्री और पुरुष के बीच शारीरिक भेदों को बताती है । जैव नियतिवादी मानते हैं कि स्त्री और पुरुषों में विद्यमान आचरण संबंधी भिन्नता और उसके फलस्वरूप लिंग भूमिकाओं की व्याख्या के मूल में शारीरिक भेद हैं। लेकिन समाजशास्त्रियों ने देह की जो धारणा बनाई है वह उसकी जैविक धारण से बिल्कुल विपरीत है। समाजशास्त्रियों के अनुसार देह संस्कृति का वाहक, उसका माध्यम है। प्रत्येक समाज के सांस्कृतिक नियम ही देह की धारण परिभाषित करते हैं और काफी हद तक सामाजिक लिंग सोच जन्य भूमिका और इससे संबंधित स्तरीकरण को ठोस स्वरूप प्रदान करते हैं।

 सारांश
स्त्री की रचना असल में समाज ने की है और उससे जो सामाजिक-लिंग सोच उपजी है वही रोजमर्रा की दुनिया में नारी के देहरूप के स्वभाव को समझने में मुख्य है। ऐसा नहीं है कि सामाजिक लिंग सोच और पहचान स्थायी और अपरिवर्तनीय हो। यह रचित और अनुभूतिपरक दोनों ही है। कभी-कभी इसे पार भी किया जा सकता है। इसलिए यह संप्रेषण और विनिमय की प्रक्रिया के दौरान निरंतर बनने वाली चीज है, जो स्त्रियों के रोजाना के जीवन अनुभवों के माध्यम से विकसित होती है।

 शब्दावली
सामाजिक लिंग: ‘सेक्स‘ या लिंग का अभिप्राय स्त्री और पुरुष की जैविक विशेषताओं से होता है। सोच (जेंडर) लेकिन सामाजिक लिंग सोच को एक.सामाजिक रचना माना जाता है, जिसमें व्यक्तित्व संबंधी सभी विशेषताएं, मूल्य, आचरण और वे सभी क्रिया-कलाप आते हैं जिन्हें समाज पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग तरीके से सौंपता है।
सामाजिक लिंग सोच: नर या मादा होने का बोध जो प्रायः दो वर्ष की उम्र तक जन्य पहचान हो जाता है।
सामाजिक लिंग सोच: सामाजिक लिंग सोच जन्य (जेंडर) भूमिकाओं का सामाजिक जन्य समाजीकरण और पारिवारिक अपेक्षाओं और इन भूमिकाओं का अन्य लोगों द्वारा निर्वाह करके उन्हें अंगीकार करना।
सामाजिक नियंत्रण: इसे मानव समाज में प्रचलित नियमों और प्रथाओं के पालन के लिए प्रयोग किए जाने वाले सभी प्रकार के बलों और अंकुशों के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
समाजीकरण: अपनी संस्कृति के अनुकूल ढलने के लिए समाज के मूल्यों के आत्मसातीकरण या अंतःकरण की प्रक्रिया जो यह तय करती है कि समाज में स्त्री-पुरुष किस तरह से आचरण करें।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
तपन, मीनाक्षी (संपा) 1997, एंबोडिमेंटः एसेज ऑन जेंडर एंड इक्वैलिटी, नई दिल्ली, ऑक्सफर्ड यूनि. प्रेस
मैत्रेयी कृष्णराज और करुणा चानना (संपा) 1989, जेंडर एंड द हाउसहोल्ड डोमेनः सोशल एंड कल्चरल डायमेंसंस, नई दिल्ली, सेज पब्लिकेशंस
फैथ, कार्लीन (1994) ‘‘रेजिस्टेंसः लेसंस फ्रॉम फॉकॉल्ट एंड फैमिनिज्म” (संपा.) एच. लॉरेन रैडके और एच.जे. स्टैम (संपा.) पावर/जेंडर सोशल रिलेशंस इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस, लंदन, सेज पब्लिकेशंस में

बोध प्रश्न 2
1) समाजीकरण के वाहक कौन हैं
(ं) परिवारय (इ) विश्वविद्यालयय (ब) पुस्तकालयय (क) संगी साथी समूह
1) सिर्फ ं
2) सिर्फ इ
3) सिर्फ ब
4) सिर्फ क
5) सभी
2) सिगमंड फ्रायड के अनुसार लिंग पहचान किस उम्र में स्थापित हो जाती है?
1) 18 वर्ष
2) 25 वर्ष
3) 30 वर्ष
4) 2 वर्ष
3) संचार माध्यम लिंग पहचान के निर्माण को किस तरह से प्रभावित करते हैं? पांच पंक्तियां में बताइए।

बोध प्रश्न 2
1) 5 (सभी)
2) 4 (2 वर्ष)
3) दृश्य और प्रकाशन दोनों ही माध्यम सामाजिक लिंग सोच जन्य पूर्वाग्रहों के मुख्य स्रोत हैं और इनके जरिए प्रचारित रूढ़िप्ररूप आदर्श व्यक्तित्वों (स्टीरियोटाइप रोल मॉडल) से सामाजिक लिंग सोच जन्य पहचान प्रभावित होती है। इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण ‘पूर्ण‘ या ‘वांछनीय‘ देह के रूप में नारी देह की छवि का शक्तिशाली केबल टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं समेत विभिन्न संचार माध्यमों से प्रचार है।

सामाजिक लिंग सोच (जेंडर) पहचान का बनना
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
सामाजिक नियंत्रण के माध्यम के रूप में देह
देह की अवधारणा
देह की समाजशास्त्रीय व्याख्या
संप्रेषणीय देह
लिंग पहचान को जन्म देने वाले कारक
समाजीकरण की प्रक्रिया
संस्कृति
धर्म
शिक्षा
संप्रेषण और संचार माध्यम
भाषा
सामाजिक परिवेश
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ लेने के बाद आपः
ऽ निजी-व्यक्तित्व, देह, पहचान इत्यादि धारणाओं के विकास को समझ सकेंगे, और
ऽ समाजीकरण-धर्म, शिक्षा, संस्कृति, जन-संचार माध्यम सामाजिक लिंग सोच जन्य पहचान की रचना को किस तरह से प्रभावित करते हैं, यह जान सकेंगे।

 प्रस्तावना
सामाजिक-लिंग सोच (जेंडर) लिंग की जीव-वैज्ञानिक धारणा से एकदम भिन्न है। सामाजिक लिंग-सोच की रचना की जाती है जिसकी अभिव्यक्ति सामाजिक जीवन के कई क्षेत्रों में होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्त्री और पुरुष में कुछ विशेष शारीरिक भेद मौजूद रहते हैं। ये जैविकीय भेद दोनों में व्यवहार-संबंधी भेदों को भी जन्म देते हैं या नहीं और इस प्रकार जैविक लिंग भूमिकाओं और सामाजिक लिंग सोच जन्य स्तरीकरण का एक कारण है या नहीं, यह समाजशास्त्रियों में बहस का मुद्दा रहा है। जैविक नियतिवाद का मानना है कि जैविकी इन बातों को प्रभावित करती है। लेकिन समाजशास्त्री इस विरोध में तर्क देते हैं उदाहरण के लिए, जन्म से ही मादा शिशु को नर शिशु से एकदम भिन्न तरीके से लिया जाता है। शोध अध्ययनों से पता चलता है कि बच्चे का जन्म होते ही इस धारणा पर ही बल दिया जाता है कि स्त्री पुरुष से निम्न है। फिर समाज द्वारा लड़कियों और महिलाओं के लिए निर्दिष्ट आचार संहिताएं इस धारणा को मजबूत बनाती है। इसलिए समाजशास्त्री कहते हैं कि सामाजिक-लिंग सोच जन्य भेदभाव और भूमिकाएं काफी हद तक समाज ही थोपता है।

सामाजिक नियंत्रण के माध्यम के रूप में देह
आइए अब देह और उसकी संकल्पना पर आते हैं।