पंथ का अर्थ क्या है | पंथ किसे कहते है परिभाषा अर्थ मतलब बताइए कितने है Cult in hindi meaning

By   February 8, 2021

Cult in hindi meaning definition पंथ का अर्थ क्या है | पंथ किसे कहते है परिभाषा अर्थ मतलब बताइए कितने है ?

पंथ (Panth)
धार्मिक संगठन के रूप में पंथ (रास्ता) एक विशिष्ट स्थान रखता है, यद्यपि इसकी बहुत सी बातें संघ व मठ की परम्परा से ली गई हैं। पंथ का उदय भारत में इस्लाम के राजनीतिक-धार्मिक प्रभुत्व के विरोध में तथा धार्मिक सामाजिक संघारों व पुनःसंगठन के उद्देश्य से हुआ। तब से पंथ परम्परा चली आ रही है।

इसे निर्गुण भक्ति विद्यापीठ (निराकार ईश्वर की उपासना) भी कहा जा सकता है, अतः इसे निर्गुण पंथ भी कहा जाता है। एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले होने पर भी ये मोक्ष के विचार पर विश्वास नहीं रखते। शंकराचार्य के अद्वैतवाद की तुलना में ये अधिक सांसारिक हैं। सामाजिक रूप से यह ‘भगत‘ व गुरू पर आधारित है। ‘भगत‘ गुरू व उसके पक्ष से जुड़ा है। यह रीति-रिवाज की औपचारिकताओं को न: मानता तथा उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पक्का शाकाहारी रहे तथा मदिरा पान न करें। उससे एक साधारण व मितव्ययी जीवन की भी अपेक्षा की जाती है। गुरू उसके आध्यात्मिक सिद्धांत, पंथ तथा परिवार व अपने जाति आधारित आर्थिक क्रिया-कलाप के प्रति समर्पित हैं। ‘भगत‘ एक गृहस्थ साधु है (जो आध्यात्मिक ज्ञान का समावेश पारिवारिक जीवन में करता है)

पंथ वर्णाश्रम का विरोध करता है जो जन्म आधारित जातियों में असमानता, रीति-रिवाज की औपचारिकताएं तथा हिन्दू व इस्लाम धर्म के कट्टरपन का विरोधी है। यह साधनों की पवित्रता, कर्म आधारित है तथा ईश्वर के सामने सबकी समानता पर जोर देता है। वास्तविक जीवन में पंथ अपनी पंथिक रीति-औपचारिकताओं से दूर नहीं रह सका जो कि सरलता तथा जटिलता से परे है। पंथ हिन्दू धर्म और इस्लाम से अलग होते हुए भी उनके अंदर तथा साथ साथ विकसित हुआ है। यह जाति प्रथा की भर्त्सना करता है पर यह उसके साथ ही विकसित हुआ है। यह पूरी तरह से जातिप्रथा के शिकंजे से मुक्त नहीं हो सका।

पंथ एक धार्मिक बंधुत्व है जिसका आधार आदि गुरू (प्रवर्तक) द्वारा दिखाया गया रास्ता है जिसके नाम पर यह एक समूह के रूप में जाना जाता है जैसे कबीर पंथ, दादू पंथ आदि । क्रम में आगे आने वाला उत्तराधिकरी आदि गुरू के चमत्कारी व्यक्तित्व का प्रतीक हो सकता है। आदिगुरू तथा उसके उत्तराधिकारियों द्वारा रचित काव्य ही पंथ का धार्मिक ग्रंथ होते हैं तथा इसके आध्यात्मिक सिद्धांत को प्रकट करते हैं। गुरू के अतिरिक्त सर्वमान्य धार्मिक उपदेश, पंथिक रीतियां, रीति चिह्न तथा पहचान का निशान (जिस अनुयायी द्वारा व्यक्तिगत आभूषणों के रूप में अपनाया जाता है) पंथिक बंधुत्व के लिए बंधन का कार्य करते हैं तथा इसे विशिष्टता की छाप देते हैं।

पंथ का सत्ता तंत्र सीमित लोगों द्वारा संचालित है। आदि गुरू की चामत्कारिक गुरू शक्ति उत्तराधिकार द्वारा अथवा नामांकन द्वारा आगे सौंपी जाती है। आदि गुरू अथवा उसके उत्तराधिकारी के नीचे गुरुओं और महंतों का तंत्र होता है। पंथ का संबंध भी गद्दी से होता है। वह स्थान जहाँ मूल रूप से इसकी स्थापना हुई थी। मूल श्गद्दीश् को आगे गद्दियों (शाखाओं) में विभाजित किया जा सकता है। ये गद्दियां अथवा शाखाएं विभिन्न केन्द्रों में स्थापित होती हैं। शाखा का संचालन स्थानीय महंतों तथा कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाता है जिसकी नियुक्ति स्थानीय अनुयायियों की सर्वसम्मति से होती है।

कार्यकलाप 2
आप जिस धर्म को मानते हैं उसके धार्मिक समूह की पहचान कीजिए और उसकी समूह विशेषताओं को रेखांकित कीजिए। अपने धर्म के अलावा किसी अन्य धार्मिक समूह को ध्यान में रखते हुए उपर्युक्त अभ्यास को दोहराएं।

पंथिक संगठन में गुरू की महत्ता के कारण गुरूद्वारा प्रभावी सामाजिक-जातीय महत्व है। तथापि गुरूंद्वारा दैनिक, अवसर विशेष पर ती त्योहारों पर जनसमूह के जुड़ने का स्थान है। यह बंधुत्व की भावना को मजबूत करता है। पर धार्मिक सामाजिक संवाद का माध्यम भी है। ऐसे पंथ जिसमें संत या महंत (मुखिया) के प्रति पूरी स्वामीभक्ति होती है, उन्हें भी प्रवर्तक की मृत्यु के समय और पंथ में विभिन्न समूहों के उभरने पर फूट का सामना करना पड़ता है।

पंथिक समूह भी विरोध, मतभेद व विभाजन से परे नहीं है। विभाजन का आधार काफी हद तक सैद्धांतिक मामले न होकर आंतरिक मतभेद तथा धार्मिक और धर्मेतर शक्ति को हथियाने के लिए अंतर-गुट प्रतिस्पर्धा होती है। पंथ बंधुत्व को संत तथा जनसाधारण दो भागों में विभाजित किया जाता है। संत पंथ का आध्यात्मिक प्रवक्ता है। वह इसके सिद्धांत का प्रसार करता है तथा इसका प्रचारक व धुमंत मिशनरी है। वह संसार को त्याग चुका अथवा गृहस्थे संत भी हो सकता है। उसके वस्त्र भगवा रंग अथवा अन्य किसी निर्दिष्ट रंग के हो सकते है। (गृहस्थ साधु) होने पर वह साधारण वस्त्र धारण कर सकता है पर पंथ का निशान धारण करना आवश्यक है।

विशिष्ट दीक्षा-पद्वति के कारण पंथ एक विशिष्ट-मतीय बंधुत्व है। पंथ में सम्मिलित होने का अर्थ है गुरू अथवा उसके उत्तराधिकारी के प्रति पूर्ण आस्था । एक पंथ में गुरू और महंत एक ही हो सकते हैं। जबकि किसी अन्य पंथ में उन्हें अलग रखने का प्रावधान है। महंत वास्तव में गुरू नहीं है। वह मठ अथवा संतों के गुट का मुखिया है। किसी अति गोपनीय पंथ के अपने गोपनीय रीति-रिवाज व कोड (सांकेतिक) भाषा हो सकते हैं। कुछ समय पहले तक शिवनारायणी दीक्षा प्राप्त न किए लोगों को अपने गुरुद्वारे में प्रवेश की अनुमति नहीं देते थे तथा उनकी अपनी गोपनीय भाषा भी थी जो अब लुप्त हो रही है। उनके यहाँ महिलाओं को भी गुरूद्वारे में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। शिवनारायणी सदस्य के लिए आवश्यक है कि वह अपने साथ पहचान पत्र (परवाना) रखे जिसे संबंधित गुरुद्वारे के मुख्य महंत द्वारा जारी किया जाता है।

बॉक्स 3
भक्ति के सिद्धांत तथा पंथ के संगठन के माध्यम से उच्च वर्गीय अभिजात वर्ग ने जीवन का सांस्कृतिक रास्ता अपनाया। भक्ति सिद्धांत का दक्षिण में प्रादुर्भाव हुआ तथा इसके प्राथमिक उपदेशक ब्राह्मण वर्ग के थे, यद्यपि एक विचार के रूप में इसकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं। उत्तर में इसे रामानंद द्वारा प्रस्तुत किया गया पर पंथ के संस्थापक अधिकतर मध्य व निम्न जातियों के थे। नानक तथा राधास्वामी पंथ के संस्थापक खत्री थे। शिवनारायणी पंथ की स्थापना एक राजपूत (शिवनारायण) द्वारा की गई। रविदास जाति से चमार थे तथा कबीर मुस्लिम (जुलाहा) जाति के थे।

महत्वपूर्ण बात है कि पंथ के अनुयायी अधिकतर जाति-तंत्रों निचले हिस्सों से ही आए तथा मध्य वर्ग से कभी कभी ही। वर्णाश्रम का विरोध करते पंथ ने संस्कृतिकरण का एक लोकप्रिय संस्करण प्रस्तुत किया। रीतियों के तौर पर अधिक जटिल न होने के कारण यह सैद्धांतिक व सांस्कारिक-सामाजिक जाति गतिशीलता पैदा करने में समर्थ रहा पर अधिक दूर तक नहीं जा सका।

वर्णाश्रम के विरोध के द्वारा इसने वर्ण-भेद में निहित शक्ति – तंत्र का विरोध किया। कुछ स्थानों पर इसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हुआ था तथा कुछ अन्य स्थानों पर इसका राजनीति से संघर्ष भी हुआ। संघर्ष का कारण अक्सर इसके नेतृत्व का धर्मेतर स्वार्थ रहा। तथापि टकराव जितना अधिक तीव्र होता है पंथ उतना ही आक्रामक होता है।

आज मठ की ही भांति पंथ को भी संविधान संचालित व ट्रस्ट के रूप में कार्य करते देखा जा सकता है। इसकी प्रकृति सिद्धांतवादी तथा राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य की होती है। कुछ निश्चित स्थानों पर जैसे कि चमार जाति में पंथ के प्रति आस्था में भटकाव आया है। बिजनौर में रविदास के अनुयायी सिक्ख धर्म की ओर मुड़ गए। देहरादून में बिजनौर के चार विस्थापित आर्य समाज में चले गए। अब नव-बौद्ध धर्म अधिक धार्मिक-सुधारवादी अपील करता प्रतीत हो रहा है। अधिकांशतः आंतरिक जाती मतभेद ही धर्म-भेद व टकराव को प्रश्न करते हैं। (भट्ट, जी. एस. 1961: 229-241)

पंथ (Cult)
पंथ की सामाजिक सच्चाई ‘पंथिक कृत्यश् में निहित है। ( वही: 39-44)। यह कृत्य है पूजा-उपासना की पद्धति से जुड़ा कार्य है। यह भावनाओं व दृष्टिकोण, प्रतीकों (मुद्राएं, शब्द, रीतियां व पद्धतियां) का जटिल मिश्रण है तथा प्राथमिक तौर पर पवित्र शक्ति तथा उससे भी परे पारलौकिक से संबंधित है। यह सह-क्रिया तथा सामाजिक सीमा को लिए हुए है। इसके अन्तर्गत जनसामान्य व पुरोहित वर्ग का संबंध नगण्य तो नहीं है पर दूसरे स्थान पर अवश्य है।

बॉक्स 1
(ओ. डी. वही दृ पृ. 41) के अनुसार:
‘‘…पंथिक क्रिया व्यक्तियों के सामाजिक समूह के रूप में इकट्ठा होने की क्रिया है, जिसमें समूह पवित्र पदार्थों से अपने संबंध की पुनरावृति करता है तथा इसके द्वारा पारलौकिक संबंध की पुष्टि करता है। ऐसा कर यह समूह अपनी एकता व अपने मूल्यों की पुनः पुष्टि करता है। इसके अन्तर्गत अनुयायियों के पारस्परिक संबंध तथा नेतृत्व व अनुयायियों के संबंध प्रदर्शित, पुनः पुष्ट एंव दृढ़ किए जाते हैं। व्यक्ति के लिए यह उसे एक समूह में सम्मिलित करता है जो उसे भावनात्मक साहस देता है तथा अपने धार्मिक अनुभव की पुनरावृति के द्वारा उसका संबंध शक्ति व संतुष्टि से स्थापित करता है।

पंथ एक स्वैच्छिक संस्था है। यह उन सभी के लिए खुली है जो इसमें शामिल होने व भाग लेने की इच्छा रखते हैं। पर जहाँ यह गुप्त है वहाँ यह अति विशिष्ट हो जाता है। जॉनसन के अनुसार ( वही: पृ. 438 ) सामान्यतः पंथ आर्थिक मामलों को छोड़ कर सख्त नहीं है”। तथापि यह अपने सदस्यों को इसकी विचारधारा और सुपरिभाषित अनुष्ठानों की पद्धति के मुताबिक चलाने की ओर प्रवृत होता है। एक पंथ अन्य सभी बातों से ऊपर एक सिद्धांत पर जोर देता है अथवा एक देवता और देवी पर कुछ निश्चित विशेषताओं का दृष्टिकोण लिए केन्द्रित होता है।

पंथों का विकास महानगरों में अधिक तेजी से होता है जहाँ सांस्कृतिक तौर पर अलग-अलग लोग एक साथ रहने के लिए बाध्य होते हैं तथा वे अत्यधिक तेजी से बढ़ते सामाजिक परिवर्तन को महसूस करते हैं। यह दृश्य अनिश्चितता व शक्तिहीनता की स्थितियां पैदा करता है तथा परिणामस्वरूप, सामंजस्यता की समस्या उत्पन्न करता है। पंथ इन स्थितियों को सुलझाने में मदद करते हैं। (विस्तृत अध्ययन व उदाहरणों के लिए देखें जॉनसन: वही: पृ. 438)

बोध प्रश्न 1
प) धर्म संस्था (Ecclesia) पर एक टिप्पणी लिखें । अपना उत्तर लगभग पांच पंक्तियों में दीजिए।
पप) एक ऐसे पंथ का नाम बताएं जिसमें संप्रदाय की विशिष्टता मिलती है।
पपप) ईसाई धर्म में मत-परम्परा के उदय होने के कोई दो कारण बताएं ? अपना उत्तर लगभग पांच पंक्तियों में दीजिए।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
प) धर्म संस्था का शब्दिक अर्थ है लोकप्रिय जनसमूह । तथापि चर्च के रूप में धर्म संस्था का धार्मिक पहलू भी है। धर्म-सस्था (चर्च) ईसा मसीह के धार्मिक अनुभव (जैसा बाइबिल में वर्णित है) के आधार पर की गई थी। ईसा मसीह को ईश्वर तथा मानव के बीच मध्यस्थ के रूप में स्वीकार किए जाने के कारण उनका अनुभव सब रहस्यों को खोलने वाला तथा दोषमुक्त माना जाता है। तथा यह माना जाता है कि यह खोज संभाली जानी चाहिए तथा आगे बढ़ाई जानी चाहिए ताकि मानव जाति का उद्धार हो सके।

पदों और कार्यालयों के तंत्र के रूप में चर्च नौकरशाही की तरह कार्य करता है। चर्चपादरी वर्ग का सदस्य अपने धार्मिक गुण उस पद के प्रभाव से प्राप्त करता है जो उसे आदेश अथवा नियुक्ति के रूप में प्राप्त होता है। इसका मुखिया पोप पदधारकों के एक छोटे समूह के द्वारा बुना जाता है। तंत्र के शेष पदाधिकारी नियुक्त किए जाते हैं।

चर्च अपने कार्यकर्ताओं का शिक्षण व नियुक्ति, अपने आध्यात्मिक शिक्षा संस्थानों द्वारा विचार गोष्ठियों तथा कार्यशालाओं का भी संचालन करता है। यह धर्मेतर शिक्षा के लिए विद्यालयों तथा महाविद्यालयों की स्थापना भी करता है जहाँ धर्मेतर शिक्षा के साथ ईश्वरीय ज्ञान भी दिया जाता है।

पप) काल्विनवाद का जन्म चर्च की प्रभुसत्ता के विरोध में एक मत के रूप में हुआ जो बाद में संप्रदाय बन गया।

पपप) मतवाद की ईसाई धर्म में भर्त्सना की गई है क्योंकि इसका उद्देश्य कुछ हद तक ईसाई धर्म में ही निहित है। मतों के विकास का एक मुख्य कारण व्यक्तिवाद के मूल्यों की स्थापना है। एक अन्य महत्वपूर्ण कारण उन सामाजिक संस्थाओं के प्रति विरोध है जिन्हें चर्च मान्यता प्रदान करता है तथा इसका विरोध कर यह सामाजिक न्याय स्थापित करने की आशा रखता है।