प्रतिस्पर्धा की परिभाषा क्या है | प्रतिस्पर्धा किसे कहते है अर्थ मतलब competition in hindi meaning

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competition in hindi meaning definition प्रतिस्पर्धा की परिभाषा क्या है | प्रतिस्पर्धा किसे कहते है अर्थ मतलब ?

शब्दावली (Glosary)

प्रतिस्पर्धा (Competition) – एक ही सीमित अनिवार्य संसाधन के लिए दो या अधिक जीवों अथवा प्रजातियों द्वारा एक साथ मांग का होना। अर्थात उन दोनों में इस बात की होड़ लग जाती है कि वह सिमित और अनिवार्य संसाधन किसे मिले और दोनों ही ये चाहते है कि खुद हो मिले ताकि वह उससे अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर सके या अपने हितों को पूरा कर सके |
सक्रिय सुदूर संवेदन (Active remote sensing) – इसमें संवेदक (सेंसर) में विकिरण-स्रोत लगा होता है।
कृषि-पारितंत्र (Agroecosystem) – एक ऐसा पारितंत्र जिसका जोड़-तोड़ मानव द्वारा होता रहता है जिसमें प्ररूपतरू थोड़ी सी सामान्य अथवा प्रमुख प्रजातियां (फसलें) तथा बहुसंख्यक विरल अथवा गौण प्रजातियां (मुख्यत: पीड़क) आते हैं।
स्वपोषी (Autotroph) – जीव जो स्वयं अपना भोजन बना सकते हैं।
नितल (Benthos) – जीव तो जल-आगारों में तली पर रहते पाए जाते हैं।
जीवोम (Biome) – समान प्रकार के पारितंत्रों का समूह।
जैविक विभव (Biotic potential) – जीव की सहज क्षमता कि वह जनन एवं अपनी संख्या वृद्धि करता हो।
जैव प्ररूप (Biotype) – उन जीवों के लिए प्रजाति स्तर से नीचे दिया जाने वाला पद जो उसी प्रजाति के अन्य सदस्यों से आकारिकीय, पारिस्थितिकीय (जैसे तापमान अथवा आर्द्रता आवश्यकताएं) अथवा शरीरक्रियात्मक विशिष्टताओं (परजीवी सुप्रभाव्यता अथवा परपोषी अभिरुचि) में भिन्न होता है।
अंशांकन (Calibration) – एक विशिष्ट प्रयोग की दिशा में निदर्श को ढाला जाना।
फसल-पीड़क निदर्श (Crop-pest model) – फसल अनुकार निदर्श जिसमें पीड़क क्षति क्रियाविधियां भी जोड़ी गयी हों।
कृष्य किस्म (Cultivar) – प्रजाति के वे सदस्य जो अपनी ही प्रजाति के अन्य सदस्यों से इस प्रकार भिन्न हों कि वह भिन्नता उन्हें एक पृथक प्रजाति की पहचान देने की दिशा में अपर्याप्त हो।
क्षति क्रियाविधि (Damage mechanism) – पीड़क-क्षति से प्रभावित होने वाली पादप शरीरक्रियात्मक प्रक्रियाएं।
घनत्व-निर्भर कारक (Density dependentf actor) – मृत्युता कारक जिसकी तीव्रता संबद्ध जीव के समष्टि-घनत्व पर निर्भर होती है।
घनत्व निरपेक्ष कारक (Density independentf actor) – मृत्युता कारक जिसकी तीव्रता संबद्ध जीव के समष्टि-घनत्व पर निर्भर नहीं होती।
गतिज सतत् निदर्श (Dynamic continuous model) – ऐसा निदर्श जो गतिकीय सतत् तंत्र का प्रतिदर्श हो।
गतिज सतत् तंत्र (Dynamic continuous system) – ऐसा तंत्र जो बहुत ही धीमा बदलता हो, जैसे फसलें।
पारिस्थितिकी (Ecology) – ऐसे संबंधों का अध्ययन, जो विभिन्न परस्पर जीवों के बीच, उनके पर्यावरण तथा एक-दूसरे के बीच पाये जाते हैं। जीवों के वितरण एवं उनकी प्रचुरता का अध्ययन।
पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological succesion) – किसी खास आवास के भीतर जैविक समुदयों में क्रमबद्ध परिवर्तन ।
आर्थिक क्षति स्तर (EILL) – पीड़क समष्टि घनत्व जो इतना पर्याप्त हो कि पीड़क के कारण होने वाली आर्थिक क्षति, पीड़क घनत्वों को कम करने के लिए नियंत्रण-कार्य में आयी लागत से अधिक हो।
आर्थिक आरम्भन-सीमा (Economic thresold) – पीड़क समष्टि का वह घनत्व जिस पर वह उपाय आरम्भ कर दिया जाना चाहिए जिससे पीड़क घनत्व आर्थिक क्षति स्तर (EIL) तक न पहुंच पाए।
अनुभवजन्य निदर्श (Empirical model) – निदर्श जिसमें संबंधों की क्रियाविधि स्पष्ट न हो रही हो।
पर्यावरण प्रतिरोध (Environmental resistance) – पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक मृत्युता कारक।
पारितंत्र (Ecosystem) – किसी एक सुस्पष्ट प्रदेश अथवा क्षेत्र में समस्त जीवों तथा वहां के भौतिकीय पर्यावरण को एक साथ मिलाकर एक सम्पूर्णता।
संतुलन स्थिति (Equilibrium position) – संतुलन की स्थिति में समष्टि का घनत्व।
निर्मोक (Exuviae) – आर्थोपोड़ों में निर्मोचन के कारण अर्भक (निम्फीय) अथवा डिंभक (लार्वीय) की उतार फेंकी गयी त्वचा।
खाद्य श्रृंखला (Food chain) – पोषण संबंधों का एक ऐसा सरल रैखिक निरूपण जिसमें ऊर्जा-प्रवाह को उत्पादकों से शाक भक्षियों और उनके आगे मांसभक्षियों में चलता हुआ दिखाया गया हो।
खाद्य-जाल (Food web) – खाद्य शृंखलाओं का परस्पर जुड़ा-मिला होना।
भू-सत्य (Ground truth) – प्रतिबल के स्थान से प्रतिबल के कारण की पुष्टि ।
आवास (Habitat) – स्थान जहां कोई जीव रहता हो।
विषमपोषी (Heterotroph) – ऐसे जीव जो अपना भोजन दूसरे जीवों से प्राप्त करते हों।
समाकलित पीड़क प्रबंधन (Integrated Pest Management , IPM) – एक ऐसा तंत्र जो किसी पीड़क अथवा किन्ही पीड़कों की समष्टि को उस स्तर पर अथवा उस स्तर से नीचे ही बनाए रखे जिससे क्षति अथवा हानि होती हो और साथ ही जिससे समाज अथवा पर्यावरण पर कम से कम हानिकर प्रभाव पड़े।
अंतरप्रजातीय (Interspecific) – विभिन्न प्रजातियों के सदस्यों के बीच होने वाली परस्परक्रियाएं।
सम-हानि वक्र (Iso-los curve) – ऐसा वक्र जिसमें फसल-आयु तथा पीड़क क्षति का संयोजन दिखाया गया हो जिसमें समान हानि होती है।
लैंड सैट, मीटियोसैट, इनसैट (Land Sat, Meteosat, Insat) – उपग्रहों के नाम ।
क्रियाविधिक निदर्श (Mechanistic model) – निदर्श जिसके द्वारा संबंध की क्रियाविधि स्पष्ट होती हो।
निदर्श (Model) – यथार्थता का एक सरलीकृत प्रतिदर्शन। यह किसी समष्टि अथवा किसी फसल तंत्र के अवयवों का कोई गणितीय प्रतिदर्श हो सकता हो।
बहुस्पेक्ट्रमी स्कैनर (Multispectral scanner) – संवेदक, जो विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के अनेक भागों से परावर्तिता को ज्ञात कर सकता है।
प्राकृतिक शत्रु (Natural enemy) – पीड़कों पर आहार करने वाले परभक्षी, परजीवी तथा रोगजनक।
निकेत (Niche) – किसी जीव का अपने समुदाय में कार्यात्मक स्थान ।
केंद्रक बहुविगलन वाइरस (Nuclear ployhedrosis virus, NPV) – कीटों का विशेषकर कुछ खास लेपिडॉप्टेरा तथा हाइमेनॉप्टेरा के लार्यों का एक घातक वाइरस रोग।
महामारी (Outbreka) – किसी विशिष्ट पीड़क प्रजाति की अत्यधिक संख्या हो जाना।
निष्क्रिय सुदूर संवेदन (Psaive remote sensing) – संवेदक के भीतर विकिरण स्रोत मौजूद नहीं होता।
पीड़क नियंत्रण (Pest control) – पीड़कों को समाप्त करने, उनके पैदा न होने देने अथवा उनकी संख्या सीमित करने की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम अथवा फसल की लाभप्रदता अथवा कृषि परिचालनों में पीड़कों के दखल को रोकने की दिशा में उठाया जाने वाला कोई भी कदम।
पीडक प्रबंधन रणनीति (Pest management strategy) – पीड़क समस्या से राहत पाने के लिए एक सर्वसम्मिलित योजना।

पीड़क क्षेत्रण (Pest zonation) – ऐसे क्षेत्रों का पता लगाना जिनमें समान पीड़क आक्रमण की संभावना हो।
घटना विज्ञान (Phenology) – जीव की वृद्धि अवस्थाएं जिनमें से होकर वह कालांतर में गुजरता है।
पादपप्लवक (Phytoplankton) – जल राशियों में उतराते पौधे ।
समष्टि (Population) – किसी एक विशिष्ट स्थान पर, विशिष्ट समय पर प्रजाति के व्यष्टिगत सदस्य।
प्राथमिक उपभोक्ता (Primary consumer) – पौधों पर भोजन करने वाले जीव (शाकभक्षी)।
समष्टि घनत्व (Population density) – किसी प्रजाति के प्रति इकाई क्षेत्र में पाये जाने वाले व्यष्टियों की संख्या ।
समष्टि गतिकी (Population dynamics) – किसी प्रजाति की विभिन्न पीढ़ियों में होने वाले परिवर्तन।
गुणात्मक निदर्श (Qualitative model) – एक ऐसा निदर्श जिसमें चरों के बीच गणितीय संबंध बनाए गए हों।
रडार (Radar) – रेडियो डिटेक्शन एंड रेजिंग।
यादृच्छिक प्रतिदर्श (Random sample) – ऐसा प्रतिदर्श संग्रहण जिसमें समष्टि के प्रत्येक सदस्य के चयन की समान संभाव्यता हो।
सुदूर संवेदन (Remote sensing) – वस्तुओं का दूर से प्रेक्षण।
जनन विभव (Reproductive potential) – जनन के लिए जीव की जन्मजात क्षमता।
जोखिम विश्लेषण (Ris analysis) – विदेशी पीड़कों के प्रभाव का मूल्यांकन ।
द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary consumer) – प्राथिमक उपभोक्ताओं का अशन करने वाले परभक्षी।
संवदेनशीलता विश्लेषण (Sensitivity analysis) – निदर्श उत्पादन पर प्राचल मूल्य में परिवर्तन का प्रभाव।
अनुक्रमी प्रतिदर्शन (Sequential sampling) – ऐसा प्रतिदर्शन जिसमें लिए गए प्रतिदर्शों की संख्या भिन्न हो सकती है और जो इस बात पर निर्भर होती है कि क्या प्रतिदर्शनों के किए जाने से प्राप्त परिणामों से पीड़क की विपुलता के विषय में कोई निश्चित उत्तर मिल पाता है।
स्पेक्ट्रमी चिन्हक (Spectral signature) – वस्तु से निकली परावर्तिता का मान ।
चिपकना पाश (Sticky trap) – ऐसा पाश जिसमें एक चिपकना पदार्थ लगा होता है जिस पर कीट चिपक जाते हैं जिन्हें गिना जा सकता है।
पोषण स्तर (Trophic level) – खाद्य श्रृंखला में किसी जीव का अशन-स्थान ।
मान्यकरण (Validation) – निदर्श के नतीजे की प्रयोग के साथ तुलना करके निदर्श का मान्यकरण करना।
खरपतवार (Weed) – अनावश्यक पौधे का उगना।
प्राणिप्लवक (j~ooplankton) – जलराशियों में उतराते प्राणी।

प्रस्तावना
कृषि इतिहास पर यदि एक नजर डालें तो हमें ज्ञात होगा कि किसान, विशेष रूप से विकासशील देशों में पीड़कों, पादप रोगों और अपतृणों से निरंतर ही लड़ते आए हैं। उन्होंने बहुत तरीकों से देसी पीड़क-प्रबंधन का देसी तकनीकी ज्ञान विकसित किया जिसके अंतगर्त उन्होंने प्रतिरोधी पादप-किस्मों का इस्तेमाल किया जो उनकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से मेल खाती थीं। अपने अनुभवों और प्रखर प्रेक्षण से किसानों ने अपनी फसलों के प्रमुख पीड़कों को पहचाना और उनके लिए फसलों के नियंत्रण के उपाय किए, आपेक्षिक रूप से प्रतिरोधीध्सह्य कृषि जोप जाति (cultivars) का इस्तेमाल किया और उन प्राकृतिक उत्पादों को पीड़कनाशियों और परिक्षकों के रूप में इस्तेमाल किया जो स्थानीय रूप से उपलब्ध होते हैं। ये पारंपरिक कीटरसायन हमारे पर्यावरण को प्रायरू कोई हानि नहीं पहुँचाते। इस इकाई में आपको किसानों की देसी तकनीकी जानकारी (IFTK) से और पीड़क-नियंत्रण में उसके उपयोग से अवगत कराया जाएगा। आपके दिमाग में एक मूलभूत प्रश्न आ सकता है कि पीड़क-प्रबंधन में प्थ्ज्ज्ञ किस प्रकार महत्वपूर्ण हो सकता है। इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आप वास्तव में पीड़क-प्रबंधन में प्थ्ज्ज्ञ के योगदान को समझ सकेंगे।

उद्देश्य
इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आप इस योग्य हो जाएंगे कि –
ऽ पीड़क-नियंत्रण पद्धति के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य की व्याख्या, कर सकें,
ऽ पीड़क-प्रबंधन-कार्यक्रम के संदर्भ में कुछ मिथ्या धारणाओं और मान्यताओं का वर्णन कर सकें,
ऽ संभावी परंपरागत पीड़क-नियंत्रण पद्धतियों और पीड़कनाशियों की विवेचना कर सकें, और
ऽ देसी पीड़क-प्रवर्धन पद्धतियों की कुछेक वैज्ञानिक व्याख्याओं की विवेचना कर सकें।

सारांश
इस इकाई में आपने सीखा कि –
ऽ किसान विशेष रूप से विकासशील देशों के किसानों, पीड़कों, रोगों और अपतृणों से निरंतर ही लड़ते रहे हैं।
ऽ प्राचीन संस्कृत साहित्य में परंपरागत कृषि के भी उल्लेख मिलते हैं। बुद्धिमान व्यक्तियों ने बताया कि सबसे उत्तम किस्म के बीजों को पीड़कों के आक्रमण से बचाने पर कृषकों को संपन्नता प्राप्त होगी।
ऽ उन्होंने परंपरागत पीड़कनाशियों और पद्धतियों के आधार पर देसी पीड़क-प्रबंधन तकनीकी जानकारी को विकसित किया जो उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति से मेल खाती थीं। अनुभव और प्रेक्षण के आधार पर, खेती करने वालों ने अपनी फसलों के प्रभाव पीड़कों को पहचाना और उनके खिलाफ सस्य-नियंत्रण की पद्धति, आपेक्षिक रूप से प्रतिरोधीध्सह्य कृषिजोप जाति, तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध प्राकृतिक उत्पादों के रूप में पीड़कनाशी और पीड़कों से बचाव करने वाले पदार्थों को विकसित किया।
ऽ प्राकृतिक उत्पादन और परंपरागत पद्धतियाँ प्रायरू पारिअनुकूली होती हैं, अतरू उनकी वैज्ञानिक अभिपुष्टि होनी चाहिए और उन्हें हमारे प्च्ड कार्यक्रमों में समुचित रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

 अंत में कुछ प्रश्न
1) आप परंपरागत पीड़कनाशियों से क्या समझते हैं?
2) किसाम तेज काली मिर्चध्मिर्च, नीम की पत्तियों, जिम्सन अपतृण (धतूरा स्ट्रैमोनियम), अंरडी तेल, पपीते की पत्तियों और लकड़ी की
राख, चिकनी मिट्टी, हल्दी, गेहूँ, आदि से विभिन्न पदार्थ बनाते हैं। इन पदार्थों से उन्हें नियंत्रण पद्धतियों में किस प्रकार सहायता
मिलती है?

अंत में कुछ प्रश्न
1) पीड़कों का नियंत्रण करने के लिए उन्हें मारने के लिए इस्तेमाल करने वाले सभी परंपरागत पदार्थों को परंपरागत पीड़कनाशी कहते
हैं।
2) ये पदार्थ इल्लियों, घुनों (बीविल), भंगों (बीटल), ऐफिडों, उद्यानों में पाए जाने वाले बगों और उन अन्य पीड़कों का निरीक्षण करने में
सहायता करते हैं जो फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं। इस प्रकार ये कीट स्वस्थ कृषि-पद्धतियों को बढ़ावा देते हैं।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
1) कॉन्सैप्टस इन इन्टीग्रेटिड पैस्ट मैनेजमैंन्ट, राबर्ट एफ. नोरिस, इ.पी. कैसवैल – चौन एण्ड मारकोज कोगन (2003) पीयरसन एजुकेशन, इन्क न्यू जरसी।
2) पैस्ट मैनेजमैंन्ट जी. ए. मैथूयज ध् लॉग मैन इन्क।
3) जनरल एनीमल इकॉलोजी। आनन्तकृष्णन टी. एन. एण्ड विश्वनाथन, टी. आर (1983), मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, मद्रास ।
4) इन्सैक्ट पैस्ट कन्ट्रोल। कुमार, आर (1986) ELBS / एडवार्ड आरनल्ड, लंदन।
5) बेसिक इकॉलॉजी। ओडम, डी पी (1983) होल्ट, सांडरज इंटरनेशल पब्लिशिंग, जापान ।
6) इकोलॉजिकल मैथडज। साउथवुड, टी. आर. इ. और हैंडरसन, पी. ए. (2000) ब्लैकवैल साइंस लिमिटेड, ऑक्सफोर्ड।
7) ऑन सिस्टमज एनालिसिस एण्ड सिमुलेशन ऑफ इकॉलोजिकल प्रोसैजिज। लॉफलेर, पी. ए. (1995) क्लूवर एकेडिमिक पब्लिशरज, लदंन ।
8) रिसेंट एडवांसिज इन इंडियन एन्टोमॉलोजी। लाल, ओ. पी. (1996) एपीसी पब्लिकेशन्ज प्राइवेट लिमिटेड, लंदन ।
9) सिस्टमज एपरोच फॉर एग्रीकल्चरल डेवेल्पमेंन्ट। टेन्ग, पी. एस. एण्ड डी व्राइज, एफ. पी. (1992) एल्सीवियर एप्लाइड साइंस, लदंन
10) सिमुलेशन ऑफ इल्ड लॉसिज कॉजड बाए राइस डिजिजिस, इन्सेक्ट्स एण्ड वीडस इन ट्रॉपिकल एशिया। विलोकवेट, एल. सेवेरी, एस. फरनेडिज, एल. इलाजीगुई एफ. एण्ड टेन्ग, पी. (1999) इन्टरनेशनल राइस रिसर्च इन्सटीट्यूट मनीला, फिलिपीन्स ।

इन इकाइयों का अध्ययन करते समय हो सकता है कि आपको पाठ्य-सामग्री के कुछ अंश कठिन महसूस हुए हों। पाठ्यक्रम को और आगे बेहतर बनाने हेतु आपकी कठिनाइयाँ और आपके सुझाव आमंत्रित हैं। अतरू कृपया इस खण्ड से संबंधित निम्नलिखित प्रश्नावली को भरकर हमारे पास अवश्य भेजें।

प्रश्नवाली
APM-01

क्रमांक खण्ड -1

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इकाई संख्या 1 2 3 4
कुल घंटे

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पृष्ठ संख्या कठिनाई का प्रकार
प्रस्तुतिकरण स्पष्ट नहीं है भाषा कठिन है चित्र स्पष्ट नहीं है शब्दावली को स्पष्ट नहीं किया गया है।

 

3) हो सकता है कि आप कुछ बोध-प्रश्नों अथवा अंत के प्रश्नों का उत्तर न दे पाए हों। निम्नलिखित सारणी में कुछ संभव कठिनाइयां सूचीबद्ध की गयी हैं। कृपया संबद्ध इकाई एवं प्रश्न संख्या आदि के संबंध में कठिनाई-प्ररूप पर सही (√) का निशान लगाएं।

इकाई
संख्या बोध प्रश्न
की संख्या अंत के प्रश्न
की संख्या कठिनाई का प्रकार
ठीक से प्रस्तुत नहीं किये गये दी गयी सूचना के आधार पर उत्तर नहीं दे सकतें दिया गया उत्तर (इकाई के अंत में) स्पष्ट नहीं है। दिया गया उत्तर पर्याप्त नहीं है।

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5) अन्य कोई सुझाव

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सेवा में,
पाठ्यक्रम समन्वियका (एपीएम 01 : समाकलित पीड़क प्रबंधन)
विज्ञान विद्यापीठ
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय
मैदान गढ़ी
नई दिल्ली-110068