भारत में वामपंथ का इतिहास | कम्युनिस्ट (वामपंथ) और राष्ट्रीय आंदोलन | कम्युनिस्ट विचारधारा क्या है

By   September 11, 2020

कम्युनिस्ट की परिभाषा बताइए , कम्युनिस्ट (वामपंथ) और राष्ट्रीय आंदोलन | भारत में वामपंथ का इतिहास | कम्युनिस्ट विचारधारा क्या है भारत में साम्यवाद का जनक के प्रणेता कौन थे ? communist meaning in hindi communism definition in hindi wikipedia ?

कम्युनिस्ट (वामपंथ) और राष्ट्रीय आंदोलन

इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
भारत में वामपंथी राजनीति की उत्पत्ति
पृष्ठभूमि: विकासकालीन गुट
शुरुआती कम्युनिस्ट गुटों की गतिविधियां
कॉमिन्टर्न में वैचारिक बहस
मानवेंद्र नाथ रॉय की भूमिका
मजदूर-किसान पार्टियां 1926-30
मजदर-किसान पार्टी, एम.एन. रॉय और कांग्रेस
मजदूर-किसान पार्टियों के कार्य और साम्यवादी (कम्युनिस्ट) प्रभाव का विकास
मजदूर-किसान पार्टियों का उग्र-वामपंथी झुकाव
संयुक्त मोर्चा, 1934-40
कांग्रेस के वामपंथी गुट
जन-आंदोलनों का विकास और संयुक्त मोर्चे की अवधारणा पर वैचारिक बहस
वामपंथी मोर्चे में फट का दौर
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कम्युनिस्ट आंदोलन
‘‘जनयुद्ध‘‘ की रणनीति
कम्युनिस्ट और पाकिस्तान का मुद्दा
सारांश
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

 उद्देश्य
इस इकाई का उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में वामपंथी राजनीति की भूमिका पर प्रकाश डालना है। इसे पढ़ने के बाद आप निम्न बातें समझ सकेंगे:
ऽ भारतीय कम्युनिस्टों की सामाजिक उत्पत्ति और उनकी वैचारिक दिशा,
ऽ कांग्रेस और वामपंथीध्समाजवादी राजनीतिज्ञों से उनके संबंध,
ऽ भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सैद्धांतिक और सक्रिय योगदान, और
ऽ राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा देने में भारतीय कम्युनिस्टों की असफलता।

 प्रस्तावना
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न वामपंथी गुटों की भूमिका का मुद्दा बहुत जटिल है। ये गुट कांग्रेस के अंदर रहकर तो काम करते ही थे, अपनी स्वतंत्र गतिविधियां भी चलाते थे। इस दौर के वामपंथ में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) एम.एन. रॉय के समर्थक, और कांग्रेस-सोसलिस्ट पार्टी के अलावा वे जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस भी शामिल माने जाते थे। इन वामपंथी गटों के आपसी संबंध भी काफी जटिल थे। हम उनके मतभेदों और एकता की चर्चा आगे करेंगे। इस इकाई में 1925-47 के दौरान वामपंथी गुटों और महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलनों के संबंधों के विभिन्न आयामों पर भी चर्चा की गई है।

भारत में वामपंथी राजनीति की उत्पत्ति
राष्ट्रीय आंदोलन में वामपंथी धारा की नींव रूसी क्रांति से प्रभावित राष्ट्रवादियों ने डाली।। अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आने वाले ये राष्ट्रवादी राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए नये रास्ते की तलाश में थे।

पृष्ठभूमि: विकासकालीन गुट
भारत में वामपंथी धारा की पृष्ठभूमि में प्रमुख रूप से निम्न 4 विकासकालीन गुट थेः
1) प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के दौरान जर्मनी, अमेरिका, तुर्की, अफगानिस्तान आदि देशों में रहकर भारत में साम्राज्य विरोधी क्रांति की योजना लागू करने की कोशिश करने वाले भारतीय क्रांतिकारी। इस श्रेणी में वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय, एम. बरकतुल्ला, एम.पी.बी.टी. आचार्या, एम.एन. रॉय और अबनी मुखर्जी जैसे लोग प्रमुख थे।
2) सर्व-इस्लामी खिलाफत आंदोलन के राष्ट्रीय क्रांतिकारी जो युद्ध के दौरान (1914-16) विदेश चले गए और वे जो युद्धोपरांत के हिजरत आंदोलन में शरीक हुए थे। इस श्रेणी में मुहम्मद अली सेपासी, रहमत अली खां, फिरोजद्दीन मंसूर, अब्दुल माजिद और शौकत उस्मानी आदि के नाम प्रमुख हैं।
3) अमेरिका के पंजाबी प्रवासी मजदूरों द्वाग गठन गदर पार्टी जिसने कामा गाटा मारू जहाज के भारत पहुंचने पर असफल सशस्त्र क्रांति का प्रयास किया। गदर-क्रांतिकारियों में रतन सिंह और संतोख सिंह प्रमुख थे और काफी समय तक वे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सीधे संपर्क में रहे।
4) सबसे प्रमुख गुट राष्ट्रीय आंदोलन में शरीक क्रांतिकारियों का था। इनमें से अधिकांश कांग्रेस की वामपंथी धारा, आतंकवादी समूहों और पार्टियों, खिलाफत 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेने के बाद वे रूसी क्रांति के प्रभाव में वैज्ञानिक समाजवाद. और किसानों और मजदरो केवग-सगठना का विचारधारा के प्रति आकर्षित हुए। बाद में उनमें से कई विभिन्न क्षेत्रों में शुरुआती कम्युनिस्ट गुटों के संस्थापक बने, जैसे, बंबई में एस.ए. डांगे, मद्रास में सिंगारवेल चेत्रियार, कलकत्ता में मुजफ्फर अहमद और लाहौर का इंकलाब गुट।

शुरुआती कम्युनिस्ट गुटों की गतिविधियां
शुरुआती दौर में कम्युनिस्ट गुटों का समन्वय ताशकंद में, कॉमिन्टन की दूसरी कांग्रेस के बाद 1 अक्टूबर 1920 को एम.एन. रॉय द्वारा गठित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के आधार पर विदेश स्थित कम्युनिस्ट केंद्रों द्वारा होता था। ताशकंद स्थित यह केंद्र विचारधारात्मक और प्रचारात्मक कार्यों का संचालन करता था। यह केंद्र प्रगतिशील राष्ट्रवाद से साम्यवाद में विचारधारात्मक परिवर्तन का प्रमुख वाहक था।

कॉमिन्टन में वैचारिक बहस
भारतीय राजनीति पर पहली मार्क्सवादी बहस जलाई 1920 में कॉमिन्टन के दसरी कांग्रेस में मास्को में हुई। भारत की राजनैतिक स्थिति के बारे में लेनिन और एम.एन. रॉय में गंभीर मतभेद थे। लेकिन कुछ मूलभूत मुद्दों पर उनमें सहमति थी। मसलन राष्ट्रवाद और बुर्जुआ विचारधारा है और सर्वहारा आंदोलन को बुर्जुआ आंदोलन से स्वतंत्र और अलग होना चाहिए। दोनों के मतभेद राष्ट्रीय आंदोलन और सर्वहारा आंदोलन के आपसी संबंधों को लेकर थे। लेनिन के विचार से सर्वहारा आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के साथ सहयोग करना चाहिए जबकि रॉय का मानना था कि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल को भारत में स्वतंत्र कम्युनिस्ट आदालन विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। लेनिन को कम्यनिस्ट पार्टी के गठन के लिए भारत में स्थिति की अनुकूलता पर संदेह था जबकि रॉय की गणना के अनुसार भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन शुरू करने के लिए स्थितियां परिपक्व थीं।

उस समय लेनिन और बॉल्शेविकों को विश्व क्रांति अवश्यंभावी लग रही थी और वे सभी साम्राज्य-विरोधी आंदोलनों को इसकी प्रक्रिया में शरीक करना चाहते थे। उस समय रॉय राष्ट्रीय आंदोलन के समर्थन की लेनिन की राय से सहमत हो गये। भारत में यह असहयोग आंदोलन का दौर था। लेनिन व रॉय को गांधी की अहिंसक रणनीति में कोई आस्था नहीं थी और चैरी-चैरा की घटना के संदर्भ में गांधी द्वारा आंदोलन वापस लेने के बाद तो वे खुलकर गांधीवाद का विरोध करने लगे। रॉय, गांधी को पूंजीपति वर्ग का नेता मानते थे और मानते थे कि इस वर्ग की प्रगतिशील क्षमता समाप्त हो चुकी थी। उनको पक्का विश्वास था कि सशस्त्र क्रांति ही भारत से अंग्रेजी राज की जड़ें उखाड़ सकती थी। और सशस्त्र क्रांति का नेतत्व ससंगठित कम्युनिस्ट पार्टी ही कर सकती थी। गांधी चूंकि हिंसा के विरुद्ध थे, इसलिये वे रॉय के विचार से क्रांति के भी विरुद्ध थे।

 मानवेंद्र नाथ रॉय की भूमिका
रॉय, भारतीय सामाजिक यथार्थ की मार्क्सवादी व्याख्या करने वाले पहले लेखक थे।

1) राष्ट्रवाद, पंजीवादी विचारधारा है और इसकी प्रगतिशील संभावनाएं समाप्त हो चुकी थीं। अतः रॉय के विचार से, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल को उपनिवेशों में चल रहे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन करने की बजाय विरोध करना चाहिए।
2) प्रथम विश्वयद्ध की समाप्ति तक भारत में पर्याप्त पूंजीवादी विकास हो चका था और मजदूर वर्ग, स्वतंत्र रूप से साम्राज्य-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करने में सक्षम था। रॉय के अनुसार, साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन सफल हो सकता था।
3) कांग्रेस भारतीय पंूजीपतियों की पार्टी थी और गांधी पंूजीपति वर्ग के नेता। अतः मजदूरों के वर्ग संगठनों को गांधीवादी जन-आंदोलनों से दूर रहना चाहिए।
4) गांधीवादी शांतिपूर्ण जन-आंदोलनों से राष्ट्रीय आजादी नहीं मिल सकती, सशस्त्र विद्रोह के ही जरिये भारत में अंग्रेजी राज खत्म हो सकता था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतत्व मजूदरों का अनुशासित और गैर काननी संगठन ही कर सकता था। इसलिए भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन आवश्यक था जो प्रगतिशील तत्वों को कांग्रेस के प्रभाव से मुक्त कर सके।

रॉय की व्याख्या में एक मूलभूत गड़बड़ी यह थी कि वे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की पूंजीवादी सुधारवादी और राष्ट्रीय क्रांतिकारी धाराओं को अलग-अलग करके समझने में असफल रहे। इसी के चलते उन्होंने पिछड़े औपनिवेशिक देशों के सर्वहारा संगठनों द्वारा पूंजीवादी-सुधारवादी आंदोलनों के समर्थन की रणनीति का महत्व नहीं समझा। लेकिन रॉय राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से बिल्कुल ही कटे हुए नहीं थे। 1921 में अहमदाबाद में हुए कांग्रेस के आठवें अधिवेशन में एक प्रस्ताव भेजकर उन्होंने मांगों को वरीयता देने का अनुमोदन किया जिससे उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। 1922 के गया अधिवेशन में भी ‘‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्य-योजना’’ शीर्षक से एक दस्तावेज भेजा जिसे अधिवेशन में हसरत मोहानी ने वितरित और पेश किया। इस दस्तावेज में पूर्ण राजनैतिक आजादी, जमींदारी प्रथा का अंत, वयस्क मताधिकार और उत्पादन, वितरण और विनिमय के प्रमख साधनों पर सामाजिक स्वामित्व की मांगों पर जोर दिया गया था। अतः हम पाते हैं कि अपनी वामपंथी संकीर्णतावादी सीमाओं के बावजूद रॉय का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की मार्क्सवादी व्याख्या की शुरुआत की।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दी गई जगह का प्रयोग करें।
ख) इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तरों का मिलान करें।
1) उन प्रमुख गुटों के नाम बताइए जिन्होंने शुरुआती कम्युनिस्टों के उदय की पृष्ठभूमि प्रदान की।
2) भारत की राजनैतिक स्थिति के बारे में लेनिन और एम.एन. रॉय के मतभेदों के क्या कारण थे?
3) ताशकंद केंद्र का क्या महत्व था?
4) भारतीय सामाजिक यथार्थ की एम.एन. रॉय की व्याख्या की प्रमुख बातें क्या हैं?
5) रॉय की व्याख्या में मूलभूत गड़बड़ी क्या थी?

 मजदूर-किसान पार्टियां, 1926-30
1920-25 के दौरान एम.एन. रॉय का भारत में कम्युनिस्टों के साथ संपर्क बना रहा। मार्क्सवाद की अपनी समझ के अनुसार रॉय उन्हें दिशा-निर्देश देते रहते थे। अपने सभी प्रपत्रों में वे भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी के गठन पर जोर देते रहे। लेकिन अंग्रेज शासक ‘‘बालशेविक‘‘ साहित्य और क्रांतिकारियों के भारत में प्रवेश की निगरानी के प्रति काफी चैकस थे। ‘‘पेशावर षड्यंत्र‘‘ (1922-24) और ‘‘कानपुर षड्यंत्र‘‘ (1924) के मुकदमें इसी चैकसी के परिणाम थे। सरकार के दमनकारी रवैये को देखते हुए, संवैधानिक रूप से कम्युनिस्ट पार्टी का गठन असंभव था। मार्क्सवादियों के सामने मुख्य समस्या इन स्थितियों में जन-साधारण तक अपनी बात पहुंचाने की कार्य नीति की थी। इसी संदर्भ में मजदूरों और किसानों की वैधानिक पार्टी ‘‘मजदूर-किसान पार्टी’’ (डब्लू.पी.पी.) के गठन पर पहली बार विचार हुआ जिसके अनुसार, व्यापक जन-आंदोलन वैधानिकता के ढांचे में ही खड़ा किया जा सकता था।

एम.एन. रॉय के अनुसार, डब्लू.पी.पी. (वर्कर्स एंड पेजेंट्स पार्टी) ‘‘वर्ग हितों पर आधारित, राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए जन-आंदोलन का हिमायत करने वाली जन-साधारण की राजनैतिक पार्टी‘‘ थी। लेकिन इस वैधानिक पार्टी के केंद्र में अवैधानिक कम्युनिस्ट पार्टी थी जो इसे नेतृत्व और दिशा-निर्देश प्रदान करती। रॉय का मानना था कि पार्टी पर कम्युनिस्ट नियंत्रण से ही राष्ट्रीय आंदोलन में मजदूरों की नेतृत्वकारी भूमिका सुनिश्चित की जा सकती थी। इस दोहरे उद्देश्य वाली पार्टी-मजदूर किसान पार्टी के गठन की बात रॉय ने 1922 में चलायी। रॉय के अनुसार, ‘‘मजदूर-वर्ग के हितों की जागरूक प्रहरी’’ की भूमिका में इस वैधानिक पार्टी का प्रथम उद्देश्य था अंग्रेजी-राज से राष्ट्रीय स्वतंत्रता और फिर ‘‘सर्वहारा-तानाशाही‘‘ की स्थापना।

मजदूर-किसान पार्टी, एम.एन. रॉय और कांग्रेस
जैसा कि पहले बताया जा चुका है, कांग्रेस की वामपंथी धारा में वे लोग थे जो रूसी क्रांति और उसके बाद के सामाजिक पुनर्निर्माण से प्रभावित थे। मजदूरों और किसानों के आंदोलनों तथा समाजवादी आदर्शों के प्रति आकर्षित ये युवा-कांग्रेसी तीसरे इंटरनेशनल (कॉमिन्टन) के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे, न ही इनके पास भारतीय क्रांति की कोई स्पष्ट रूपरेखा थी। अपनी साम्राज्य-विरोधी नीतियों के कारण, कॉमिन्टन, स्वाभाविक रूप से औपनिवेशिक लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगा। वे बालशेविक के प्रशंसक तो थे किन्तु बालशेविक विचारों और उनकी भाषा उन्हें नहीं स्वीकार्य थी। उनके लिए रूसी क्रांति का महत्व नैतिक प्रेरणा के स्रोत के ही रूप में था, विचारों और रणनीति के नहीं।

रूसी अनभव को आदर्श मानने वाले रॉय की शब्दावली में कांग्रेस के वामपंथी, नकली समाजवादी थे। और ‘‘नकली समाजवादियों’’ से अलग पहचान बनाने के लिए हिंसक क्रांति के सिद्धांत और कम्युनिस्ट पार्टी को वे आवश्यक मानते थे। रॉय के विचार में जो लोग हिंसक-क्रांति और भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का समर्थन नहीं करते वे कम्युनिस्ट कहलाने के हकदार नहीं थे। इस दौरान रॉय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भारत में गठन करने के प्रयास में थे किन्तु उन्हें कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। सरकार षड्यंत्र मुकदमों के तहत राष्ट्रवादियों को आतंकित कर रही थी। इस कारण मार्च-अप्रैल 1925 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कार्यकारिणी द्वारा पारित प्रस्ताव को कार्य रूप देने के उद्देश्य से उन्होंने मजदूर-किसान पार्टी (डब्लू.पी.पी) के गठन का फैसला किया।

जैसा कि बताया जा चुका है कि ज्यादातर जन-पक्षीय गुट कांग्रेस से ही निकले थे, इसलिए उनका कथित उद्देश्य कांग्रेस के नेतृत्व वाले आंदोलन को जन-पक्षीय बनाना था। इसके लिए वे मजदूरों और गरीब किसानों की भागीदारी से कांग्रेस के जनाधार को व्यापक बनाना चाहते थे। 1922 में बंबई में श्रीपाद अमत डांगे ने अपने पत्र ‘‘सोसलिस्ट’’ के माध्यम से कांग्रेस के अंदर भारतीय समाजवादी मजदूर पार्टी के गठन का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य कांग्रेस में ‘‘निहित स्वार्थों के विरुद्ध एक सशक्त गट’’ तैयार करना था। इस संगठन का अंतिम उद्देश्य तो समाजवाद की स्थापना करना था, इसके तत्कालिक उद्देश्य समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार ट्रेड-यूनियनों का गठन और वैधानिक सुधार थे। इसी प्रकार मद्रास में एम. सिंगारवेलु ने ‘‘हिंदुस्तान की मजदूर-किसान पार्टी’’ का गठन प्रस्तावित किया। बंगाल में हेंमत कमार सरकार, काजी नजरूल इस्लाम और मुजफ्फर अहमद ने ‘‘मजदूर-किसान पार्टी (डब्लू.पी.पी.) का गठन किया। के.एन. जोगलेकर और आर.एस. निंबकर ने बंबई में अब्दुल माजिद और सोहन सिंह जोश ने पंजाब में और पी.सी. जोशी ने संयुक्त प्रांत में । मजदूर-किसान पार्टियों का गठन किया। इन पार्टियों ने मजदूरों और किसानों के संघर्ष में, असहयोग, सत्याग्रह, रचनात्मक कार्यक्रम और सिविल नाफरमानी (सविनय अवज्ञा) जैसे ‘‘गाधीवादी तरीको का भी उपयोगी माना।

इसी बीच सत्यभक्त ने 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के लिए एक सम्मेलन का आयोजन किया। मजदूर-किसान पार्टियों के गठन में व्यस्त कम्युनिस्टों को यह बात आश्चर्यजनक लगी। उल्लेखनीय है कि सत्यभक्त का न तो कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से कोई ताल्लुक था और न ही कोई अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण, वे एक ष्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करना चाहते थे। इसलिए कम्युनिस्टों ने सम्मेलन में हिस्सा लेकर इस पर कब्जा करने का फैसला किया। इसलिए तकनीकी दृष्टिकोण से कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में हुआ लेकिन वास्तव में संगठन का काम मजदूर-किसान पार्टियों के माध्यम से ही होता रहा। वास्तव में, देखा जाए तो कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1928 में, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के निर्देश पर मजदूर-किसान पार्टियों के विघटन के बाद ही हुआ।

इसके पहले भारतीय कम्युनिस्ट, एम.एन. रॉय या कॉमिन्टर्न के आदेशों का पालन करने को तैयार नहीं थे। रॉय की इच्छा के विपरीत वे न तो भूमिगत कम्यनिस्ट पार्टी बनाने को राजी थे न ही कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से संबद्ध होने को। उनका तर्क था कि परिस्थितियों की भिन्नता के चलते भारत में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की रणनीति उपयुक्त नहीं थी।

कांग्रेस के अंदर मजदूर-किसान पार्टियों का आंदोलन तेजी से बढ़ रहा था। 1928 में एक अखिल भारतीय पार्टी गठित करने के उद्देश्य से कलकत्ता में भारत की सभी मजदूर-किसान पार्टियों में कम्युनिस्टों की भूमिका अहम् थी किन्तु इसका नेतृत्व सिर्फ कम्युनिस्टों के ही हाथ में नहीं था। इस सम्मेलन द्वारा गठित अखिल भारतीय मजदूर-किसान पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 16 निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम 10 कम्युनिस्ट थे। 1928 के पहले किसी केंद्रीय संगठन के बिना ही विभिन्न प्रांतों की मजदूर-किसान पार्टियों में लगभग सभी मुद्दों पर सहमति थी। कम्युनिस्ट नेताओं के बीच आपसी तालमेल बना रहता था। कम्युनिस्ट कार्यकर्ता, कांग्रेस में वामपंथी गुट के रूप में, अपने संगठनात्मक और प्रचार कार्यों के लिए कांग्रेस के मंच का उपयोग करते थे। थोड़े ही समय में जन साधारण में खासकर शहरों के मजदूरों में उनका अच्छा-खासा आधार बन गया। देश के विभिन्न हिस्सों से उनके मुख पत्र प्रकाशित होने लगे। इन में, बंबई से क्रांति, बंगाल से जनवाणी और पंजाब से मेहनतकश और कीर्ति प्रमुख थे।

 मजदूर-किसान पार्टियों के कार्य और साम्यवादी (कम्युनिस्ट)
प्रभाव का विकास
मजदूर-किसान पार्टियां एक तो कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में काम करते हुए कांग्रेस की नीतियों को जनोन्मुख बनाने का काम कर रही थीं और दूसरे मजदूरों को संगठित करके ऑल इंडिया ट्रेड युनियन कांग्रेस (एटक) को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेने का प्रयास कर रही थी। 1927 के पहले एटक का नेतृत्व ऐसे उदारवादियों के हाथ में था जो राष्ट्रीय आंदोलन में मजदूरों की भागीदारी के पक्ष में नहीं थे। चूंकि यह नीति औपनिवेशिक हितों के अनकल थी इसलिए इसे सरकारी प्रोत्साहन मिलता था और जनेवा स्थित अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन (आइ.एल.ओ.) के साथ इसके संबंधों पर सरकार को कोई आपत्ति नहीं थी। 1927 के अंत तक में कांग्रेस के मद्रास अधिवेश में इस पर डब्लू.पी.पी. का प्रभाव जाहिर होने लगा था। सब्जेक्ट्स कमेटी में जोगेलकर द्वारा प्रस्तावित और जवाहरलाल नेहरू द्वारा समर्थित पूर्ण-स्वराज्य का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया। खुले अधिवेशन में तो यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। नेहरू और बोस जैसे जनपक्षीय राष्ट्रवादियों के सहयोग से, मटठी भर कम्यनिस्ट, राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक पैमाने पर प्रभावित करने में सफल हो सके। औपनिवेशिक शासक डांगे और जोगेलेकर की ही तरह नेहरू को भी कम्युनिस्ट मानते थे।

1928 के अंत तक सरकार बंबई में ‘‘कम्युनिस्टों के बढ़ते प्रभाव’’ से चिंतित होने लगी और वामपंथी प्रभाव को खत्म करने के उपाय सोचने लगी। कलकत्ता में कम्युनिस्टों के नेतत्व में लामबंद 30,000 मजदूरों ने कांग्रेस पंडाल पर अधिकार कर लिया। 1927 तक मजदरों में वामपंथियों का कोई खास प्रभाव नहीं था लेकिन 1928 खत्म होते-होते वामपंथियों ने देश भर में, खासकर बंबई में तमाम ट्रेड यूनियनों पर वर्चस्व स्थापित कर लिया। 1928 में बंबई की कपड़ा मिलों के मजदूरों की आम-हड़ताल लगभग 6 महीने तक चली। इस हड़ताल के चलते कम्युनिस्टों ने गिरवी कामगर यूनियन नाम से अपनी अलग यूनियन बना ली। इस समय दो अंग्रेज ट्रेड यूनियन नेता-ब्रैडले और हचिसन भी भारतीय कम्युनिस्टों के साथ काम कर रहे थे। हड़ताल की शुरुआत में, 23 मई 1928 को पंजीकृत गिरनी कामगर युनियन (जी.के.यू.) की सदस्य संख्या भाग 324 थी जो अप्रैल 1928 तक बढ़कर 54,000 हो गई। 1928 के अंत तक लगभग सभी ट्रेड यूनियनों में कम्युनिस्टों का वर्चस्व स्थापित हो गया। नगरपालिका, यातायात, डाक के कर्मचारियों और जी.आई.पी. रेलवे यूनियन भी कम्युनिस्टों के प्रभाव-क्षेत्र में आ गए। बंगाल में, कम्युनिस्टों और उनके समर्थकों ने जूट मजदूरों, सफाई कर्मचारियों, रेलवे कर्मचारियों और इस्पात कारखानों के मजदूरों को संगठित करना शुरू किया। मद्रास में सिंगारवेलु और के आयंगर ने वर्मा आयल कंपनी के मजदूरों का संगठन बनाया।

एटक के सातवें अधिवेशन (1927) में एस.वी. घाटे इसके सहायक सचिव निर्वाचित हुए। आठवें अधिवेशन (नवंबर 1927) में पारित कई प्रस्तावों का अनुमोदन डब्लू.पी.पी. अध्यक्ष पद के लिए भी अपना उम्मीदवार खड़ा किया। इसके सदस्य मुजफ्फर अमहद और डी.बी. कुलकर्णी उपाध्यक्ष, डांगे और भाखले सहायक सचिव तथा ब्रैडले और स्प्रैट कार्यकारिणी के सदस्य पदों पर निर्वाचित हुए। एटक ने भारत को समाजवादी गणतंत्र बनाने का उद्देश्य घोषित किया। साइमन-विरोधी प्रदर्शनों में डब्लू.पी.पी. ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। यह पहला मौका था जब युवकों और मजदूरों ने राष्ट्रीय आंदोलन में व्यापक पैमाने पर हिस्सा लिया। 1929 में जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस और एटक दोनों के ही अध्यक्ष निर्वाचित हुए। राष्ट्रवादी और समाजवाद के समन्वय की यह एक सांकेतिक शुरुआत थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू ने सामाजिक और राजनैतिक आजादी के समन्वय की वकालत की।

राष्ट्रवाद और समाजवाद के समन्वय के अपने दृष्टिकोण के चलते नेहरू की छवि गांधीवादियों और कम्युनिस्टों दोनों से ही अलग थी। नेहरू ने साम्राज्य-विरोधी सभी ताकतों की एकताबद्ध संघर्ष का समाजवादी दिशा देने की हिमायत की। राष्ट्रीय आंदोलन को समाजवादी दिशा देने की बात अंग्रेज शासकों के लिए चिंता का विषय तो थी ही, यह बात एम.एम. जोशी जैसे एटक के उदारवादी नेताओं को भी खटकने लगी। 1929 के नागपुर अधिवेशन में उदारवादियों के विरोध के चलते एटक दो हिस्सों में बंट गई और मजदूर वर्ग के आंदोलन का उफान थोड़ा धीमा पड़ गया।

मजदूर संगठनों में डब्लू.पी.पी. सराहनीय भूमिका के प्रतिकूल किसानों में इसका काम नगण्य था। बंगाल और पंजाब के कुछ हिस्सों को छोड़कर किसानों को संगठित करने के मामले में इसका योगदान न के बराबर था। तमाम खामियों के बावजूद इस दौर में कम्युनिस्टों ने राष्ट्रवाद और समाजवाद समन्वित कार्यक्रम और संगठन के मामले में सराहनीय काम किया। बाद के दिनों में (1930-34) कम्युनिस्टों ने राष्ट्रवाद को पूंजीवादी विचारधारा करार दिया और इसे समाजवाद विरोधी बताना शुरू कर दिया।

मजदूर-किसान पार्टियों का उग्र-वामपंथी झुकाव
1928 के अंत तक मजदूर-किसान पार्टियों (डब्लू.पी.पी.) की राजनीति में बदलाव शुरू हो गया। कांग्रेस को भारतीय पूंजीपतियों की पार्टी के रूप में देखा जाने लगा और मजदूर-किसान पार्टियों की स्वतंत्र भूमिका की वकालत की जाने लगी। यह कांग्रेस और मजदूर-किसान पार्टियों के बीच संबंध विच्छेद की शुरुआत थी। यहां तक कि कांग्रेस की वामपंथी धारा अखिल भारतीय इंडीपेंडेंस लीग को भी जन-विरोधी करार दे दिया गया। वामपंथ को विभिन्न धाराओं के समन्वय के बजाय अखंडित धारा के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। इस नई परिभाषा के अनुसार, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से संबद्ध मजदूरों की कम्युनिस्ट पार्टी ही वामपंथी कहलाने की हकदार थी और इसी पार्टी के नेतृत्व में ही अंग्रेजी शासन के खिलाक सशस्त्र क्रांति हो सकती थी।

मजदूर-किसान पार्टी की राजनीति में यह बदलाव जुलाई 1928 के कॉमिन्टर्न की छठी कांग्रेस द्वारा पारित कट्टरपंथी नीतियों का परिणाम था। कॉमिन्टर्न की नई नीति इस समझ पर आधारित थी कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाश्चात्य देशों में पूंजीवाद गंभीर राजनैतिक संकट की दिशा में बढ़ रहा था। और क्रांति की संभावनाएं साकार होती नजर आ रही थीं। कम्युनिस्ट पार्टियों को वामपंथ की अन्य सभी धाराओं के प्रति गैर समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए गए क्योंकि वे क्रांति का भ्रम पैदा कर रही थीं। भारत के मामले में तीसरे इंटरनेशनल की नीति, कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा कांग्रेस तथा नेहरू और बोस के नेतृत्व वाले इसके वामपंथी गुट का विरोध करने की राय की समझ के ज्यादा करीब थी। दिसंबर 1928 में कलकत्ता में होने वाले अखिल भारतीय मजदूर-किसान पार्टियों के सम्मलेन को कॉमिन्टर्न ने मजदूर-किसान पार्टी को विघटित करने का निर्देश दिया क्योंकि यह एक केंद्रीकृत भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में बाधक सिद्ध हो रहा था। शुरुआती हिचकिचाहट के बाद य कम्यनिस्टों ने मास्को से जारी निर्देशों पर अमल करना शरू कर दिया। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय कम्युनिस्ट अपने अनुभवों की उपेक्षा करके कॉमिन्टर्न नेतृत्व के अनुयायी बन गए।

इस नई नीति के तहत कम्युनिस्टों ने लाल झंडा यूनियनों का गठन करके जन-आंदोलनों की शुरुआत की। लाल झंडे तले उन्होंने किसान रैलियों का आयोजन शुरू किया। मजदूर-किसान पार्टियों के इस अखिल भारतीय सम्मेलन ने उसी समय कलकत्ता में ही हो रहे कांग्रेस अधिवेशन में साम्राज्य-विरोधी, सामंत-विरोधी ओर जनतांत्रिक कार्यक्रमों के तहत पूर्ण स्वराज्य के लिए संघर्ष का आह्वान किया। 1928 के अंत तक मजदूर आंदोलन भी अपने उत्कर्ष पर था। इन्हीं बातों से आतंकित होकर अंग्रेज शासकों ने कम्युनिस्ट आंदोलन को दबाने के लिए षड्यंत्र चलाने का फैसला किया।

इसी नीति के तहत सरकार ने मार्च 1929 में मेरठ षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्ध मामले में 31 कम्युनिस्ट और ट्रेड युनियन नेताओं को गिरफ्तार करके मुकदमा चलाया। इसी दौर (193034) में कम्युनिस्टों ने गांधी और नेहरू को प्रतिक्रियावादी घोषित किया। 27-29 दिसंबर 1929 को नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई। इस कार्यकारिणी के सदस्य थे: एस.एस. मिराजकर, एस.ए. डांगे, आर.एस. निंबकेर, के.एन. जोगेलोकर, ए.वी. घाटे, मुजफ्फर अहमद, अब्दुल हलीम, शमसुल हुदा, अब्दल माजिद और संतोख सिंह जोश। 1930 में बोस के नेतृत्व में बोस के नेतृत्व वाले एक से अलग होकर कम्युनिस्टों ने लाल ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन किया। कॉमिन्टन से रॉय के निष्कासन के बाद टेड यनियन में कम्यनिस्टों की जगह रॉय के समर्थकों ने लेनी शुरू कर दी। रॉय 1930 में भारत आ गए और सात महीनों में उनके समर्थकों की संख्या काफी बढ़ गई। ट्रेड यूनियनों में आपसी फूट के चलते कम्युनिस्टों द्वारा शुरू की गई मजदूरों की हड़तालें असफल रहीं। 1934 तक कम्युनिस्ट, मजदूर आंदोलनों और राष्ट्रीय आंदोलन, दोनों ही मोर्चा पर अलग-थलग पड़ गए। 16 जनवरी 1933 को मेरठ षड्यंत्र मुकदमे का फैसला सुना दिया गया। इस मुकदमे का दूरगामी परिणाम कम्युनिस्टों के पक्ष में गया क्योंकि इसने कम्युनिस्टों को अखबारों के माध्यम से विचारधारा प्रसारित करने का उपयुक्त मंच प्रदान किया।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दी गई जगह का प्रयोग करें।
ख) इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से अपने उत्तरों का मिलान करें।
1) 1927-29 में भारतीय कम्युनिस्टों ने मजदूर-किसान पार्टियों का गठन क्यों किया?
2) एम.एन. रॉय और कांग्रेस के वामपंथी गुट के मतभेदों पर प्रकाश डालिए।
3) एम.एन. रॉय और भारतीय कम्युनिस्टों के मतभेदों पर प्रकाश डालिए।
4) मजदूर-किसान पार्टियों के आंदोलनों की प्रमुख उपलब्धियां क्या थीं?
5) मजदूर-किसान पार्टियों को विघटित करने के क्या कारण थे?

संयुक्त मोर्चा, 1934-40
जुलाई, 1934 में सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया। यह प्रतिबंध 1942 तक लगा रहा। 1934-35 में पी.सी. जोशी कम्युनिस्ट पार्टी के नए महासचिव बने। इस दौरान दूसरे देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों की सलाह, राष्ट्रीय आंदोलन में अलग-थलग पड़ जाने की स्थिति ओर सरकारी दबाव की स्थितियों में भारतीय कम्युनिस्ट, ट्रेड यूनियन में संयुक्त मोर्चा की रणनीति पर विचार करने को बाध्य हो गये। 1934 में कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी.) के गठन ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

कांग्रेस के वामपंथी गुट
नागरिक अवज्ञा आंदोलन के दौरान युवा-वर्ग संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में था। इस दौर में जब नेहरू कांग्रेस कार्यकर्ताओं में समाजवादी विचारों का प्रसार कर रहे थे, यवा-वर्ग जन-पक्षीय ‘‘विचारों को आत्मसात कर रहा था। 1933-35 के दौरान कांग्रेस के अंदर समाजवादी प्रवृत्तियों उभर रही थीं। कम्युनिस्टों की ही तरह, कांग्रेस के समाजवादी भी गांधी की अहिंसा, खादी और ग्रामोद्योग की नीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपना रहे थे। समाजवादियों का उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में और भारत की परिस्थितियों के अनुकूल मार्क्स और लेनिन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के आधार पर वर्ग संघर्ष के जरिये सोवियत रूस के ढांचे पर समाजवादी राज्य की स्थापना करना था। लेकिन वे कॉमित से संबद्ध नहीं थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेने के बाद सभी वामपंथी गुट गांधी की नीतियों को क्रांति के रास्ते की रुकावट मानने लगे थे। मई, 1933 में सुभाष चंद्र बोस और विटठल भाई पटेल ने वियना से गांधी की अप्रासंगिकता की घोषणा कर दी। उन्होंने कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन और इसके पुनर्गठन की वकालत की। नेहरू, बाकी वामपंथी गुटों के नेतृत्व परिवर्तन के विचार से असहमत थे। उनका मानना था कि भारत की आजादी की लड़ाई गांधी के ही नेतृत्व में लड़ी जा सकती थी। वे गांधी को गरीबों और किसानों के हिमायती के रूप में देखते थे। बाद की घटनाओं से स्पष्ट हो गया कि समाजवादियों के गांधी-विरोधी रवैये से समाजवादी उद्देश्य को नुकसान पहुंचा। उनके गांधी से अनेक मतभेद थे किन्तु उनका मानना था कि जनता में खासकर किसानों में अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्व के प्रश्न पर गांधी का कोई और विकल्प नहीं था।

1933 में नासिक जेल में, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, मीन मसानी, एन.जी. गोरे, अशोक मेहता, एस.एम. जोशी और एम.एल. दांतवाला जैसे युवा समाजवादियों ने कांग्रेस के भीतर ही एक अखिल भारतीय समाजवादी संगठन बनाने पर विचार शुरू किया। उनका प्रमख उद्देश्य कांग्रेस की नीतियों को सामाजिक दिशा प्रदान करना था। नेहरू और बोस ने भी इस विचार का स्वागत किया। इन समाजवादियों ने जमींदारी उन्मूलन, जमीन पर राज्य के स्वामित्व, बैंकों और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण और मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी के कार्यक्रम प्रस्तावित किये। 17 मई 1934 का आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में पहला सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन ने कांग्रेस से गरीबों और दलितों के आर्थिक उद्धार के कार्यक्रम अपनाने का आग्रह किया। शीघ्र ही काग्रेस सोसलिस्ट पाटी की इकाईयां देश के विभिन्न भागों में गठित कर ली गई और जयप्रकाश नारायण इसके प्रमुख प्रवक्ता बन गये। दक्षिणपंथियों को यह बात अच्छी नहीं लगी। उनके सी.एस.पी. का पहला वार्षिक अधिवेशन 21-22 अक्तूबर को बंबई में हुआ जिसमें 13 प्रांतों के 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। समाजवादियों का मानना था कि सभी वामपंथियों को कांग्रेस के भीतर ही लामबंद होकर इसकी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करना चाहिए। संयुक्त वाम मोर्चा की अपनी समझ के तहत कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी ने रॉय समर्थकों और कम्युनिस्टों को व्यक्तिगत रूप से पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण दिया। इस तरह एक बार फिर सी.एस.पी. के माध्यम से कम्युनिस्टों ने कांग्रेस में प्रवेश किया। उनमें से कई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी बन गये। नेहरू की अध्यक्षता में कई सदस्य कांग्रेस कार्य समिति में भी शामिल किए गये। कांग्रेस समाजवादी 1936 में होने वाले चुनावों में कांग्रेस की हिस्सेदारी के फैसले के विरुद्ध थे। बाद में वे चुनाव में हिस्सेदारी के लिए तो राजी हो गए पर कांग्रेस द्वारा मंत्रिमंडल बनाने का विरोध करते रहे। लेकिन इस मुद्दे पर कांग्रेस का बहुमत उनके साथ नहीं था। परिणामस्वरूप, सात प्रांतों में कांग्रेस ने मंत्रिमंडल बना लिया। लेकिन इस मुद्दे पर मतदान से पता चलता है कि कांग्रेस में समाजवादियों का प्रभाव बढ़ रहा था। रॉय समर्थक और कम्युनिस्ट सी.एस.पी. का हिस्सा होते हुए भी अपनी अलग अस्मिता बनाए हुए थे और तीनों गुटों में आपसी प्रतिद्वंद्विता भी जारी थी। इसके चलते आपसी झगड़े शुरू हो गये और 1940 के अंत तक संयुक्त वाम मोर्चा पूरी तरह से टूट गया।

जन-आंदोलनों का विकास और संयुक्त मोर्चे की अवधारणा
पर वैचारिक बहस
संयुक्त मोर्चे का दौर किसानों, मजदूरों और युवा-वर्ग में अभूतपूर्व जागृति का दौर था। एन.जी. रंगा, इंदू लाल याग्निक, स्वामी सहजानंद सरस्वती आदि के नेतृत्व में अखिल भारतीय किसान सभा की पहली बैठक 1936 में लखनऊ में हुई। किसान संगठनों ने जमींदारी उन्मूलन और लगान में कमी की मांग की। तीन धड़ों में बंटे एटक में फिर से एकता कायम हई। 1936 और 1940 के बीच कई महत्वपूर्ण हड़तालें हई। 1936 में किसान सभा की सदस्य संख्या 2,95,781 थी जो 1944 में बढ़कर 5,33,427 हो गई। बिहार में तो किसान आंदोलन बहुत ही सशक्त था। 1938 में बिहार किसान सभा की सदस्य संख्या 80,000 थी। 1943 में एटक की सदस्य संख्या 2,69,803 थी। 1935 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की सातवीं कांग्रेस ने विश्व स्तर पर संयुक्त मोर्चे की नीति अपनाई। इस नीति के तहत पूंजीवादी देशों में सर्वहारा के नेतृत्व में फासीवाद विरोधी मोर्चा और औपनिवेशिक और अर्ध-औपनिवेशिक देशों में साम्राज्य-बिरोधी संयुक्त मोर्चे की हिमायत की गई।

भारतीय कम्युनिस्टों के लिए आर.पी. दत्त और बेन ब्रैडले ने संयुक्त मोर्चे की रूपरेखा तैयार की। इस प्रस्तावित संयुक्त मोर्चे को निम्न जिम्मेदारियां सौंपी गई:
1) पूर्ण स्वराज्य के लिए संघर्ष के लिए कांग्रेस के सभी संगठनों-ट्रेड यूनियनों, किसान और युवा संगठनों में एकता स्थापित करना,
2) स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रम में मजदूरों और किसानों की मांगों को शामिल करना,
3) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और प्रत्यक्ष मतदान के आधार पर संविधान सभा की मांग।

1936 के बाद सभी वामपंथी गुट कांग्रेस के अंदर दक्षिण पंथी गुटों के एकताबद्ध होना शुरू किया। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में वामपंथियों की एकता के फलस्वरूप पट्टाभि सीतारामैया के विरुद्ध सुभाष चंद्र बोस विजयी रहे। वामपंथियों की समझ से बोस की विजय गांधीवादी नेतृत्व को बेदखल करने के संघर्ष का हिस्सा थी। बोस ने दक्षिणपंथियों पर आरोप लगाया कि वे साम्राज्य-विरोधी संघर्ष के प्रति गंभीर नहीं थे। और वे औपनिवेशिक सरकार के साथ समझौतावादी दृष्टिकोण अपना रहे थे। नेहरू, वामपंथियों द्वारा पुराने नेतृत्व की निंदा करने की नीति से सहमत नहीं थे उनकी राय में इन नेताओं की संकीर्णतावादी विचारधारा के बावजूद उनकी साम्राज्य-विरोधी प्रतिबद्धता पर संदेह नहीं। किया जा सकता था। उनके अनुसार अध्यक्षीय चुनाव की खींचातानी से साम्राज्य-विरोधी आंदोलन कमजोर होता। इसीलिए नेहरू इस मुद्दे पर तटस्थ बने रहे।

वामपंथी मोर्चे में फूट का दौर
29 जनवरी 1939 को कांग्रेस के अध्यक्षीय चुनाव में बोस सीतारामैया के 1375 मतों की तुलना में 1580 मतों से विजयी हुए। इसमें वामपंथियों के एकताबद्ध प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इससे पता चलता है कि कांग्रेस में वामपंथी और उनके समर्थक काफी शक्तिशाली थे। गांधी ने घोषणा की, ‘‘सीतारामैया की हार मेरी हार है।’’ गांधी के निर्देश पर दक्षिणपंथी नेताओं ने बोस के अध्यक्षता में वर्किंग कमेटी में शामिल होने से इन्कार कर दिया। इससे कांग्रेस के विभाजन का खतरा पैदा हो गया। ऐसे समय में समाजवादियों ने तटस्थता की नीति अपना ली। परिणामस्वरूप बोस को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ गया।

3 मई 1939 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद बोस ने एक नई पार्टी फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की। इस पार्टी का उद्देश्य कांग्रेस के अंदर सभी जनपक्षीय और साम्राज्य-विरोधी प्रगि तिशील ताकतों को लामबंद करना था। एम.एन. रॉय ने रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी नाम से एक अलग पार्टी की स्थापना की। दक्षिण भारत की कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी की इकाईयां कम्युनिस्टों के प्रभाव क्षेत्र में चली गई जिससे समाजवादियों और कम्युनिस्टों के आपसी संबंधों में कटुता और भी बढ़ गई। 1939 में वामपंथी गुटों ने संयुक्त कार्यक्रमों के लिए लेफ्ट । कंसालिडेशन कमेटी बनायी जो ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी।

इस तरह हम देखते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध की पूर्व संध्या पर भारत में वामपंथ कई गुटों में बंट चुका था। ये गुट समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता तो जाहिर करते थे किंतु उनकी यह प्रतिबद्धता काफी हद तक अमूर्त थी जिसके चलते वे राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी के नेतृत्व का सही विश्लेषण नहीं कर सके। यह उनमें फूट का मुख्य कारण था। वे समाजवाद और राजनैतिक आजादी के समन्वय की कोई साझी रणनीति तैयार करने में भी असफल रहे। वे कांग्रेस के अंदर अलग-अलग उद्देश्यों और परिप्रेक्ष्यों के तहत काम कर रहे थे। हर गुट अन्य गटों की कीमत पर आगे बढ़ना चाहता था। समाजवादी, कांग्रेस के बाहर एक अलग पार्टी बनाने के कम्युनिस्टों के विचार से असहमत थे। नेहरू का निश्चित मत था कि समाजवाद की स्थापना आजादी के बाद ही संभव थी। इस बीच उन्होंने समाजवादियों को सलाह दी कि वे दक्षिणपंथियों और गांधी के साथ मिलकर साम्राज्य-विरोधी संघर्ष को तेज करें और साथ ही समाजवादी विचारों का प्रचार भी करते रहे। वामपंथ का उद्देश्य कांग्रेस के समाजवादीकरण की बजाय इसे सही अर्थों में जनता की पार्टी बनाना होना चाहिए। अन्य वामपंथी गुट नेहरू की इस सलाह को मानने के लिए तैयार नहीं थे।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणीः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दी गई जगह का प्रयोग करें।
ख) इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से अपने उत्तरों का मिलान करें।
1) वामपंथी, गांधी के नेतृत्व का क्यों विरोध करते थे?
2) अन्य वामपंथी गुटों के साथ नेहरू के क्या मतभेद थे?
3) भारतीय कम्युनिस्टों ने संयुक्त मोर्चे की नीति क्यों अपनायी?
4) सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से क्यों इस्तीफा दिया था?
5) संयुक्त मोर्चा दौर में वामपंथी गुटों में फूट के कारणों पर प्रकाश डालिए।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कम्युनिस्ट आंदोलन
14 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका पर विचार करने के लिए कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई। बैठक ने युद्ध को साम्राज्यवादी बताते हुए घोषणा की कि भारत और अन्य जगहों पर साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए लड़ी जा रही इस लड़ाई से भारत को अलग रहना चाहिए। एक स्वायत्त संप्रभु संविधान सभा के जरिये आत्म निर्णय के अधिकार पर भी जोर दिया गया। बैठक ने प्रस्ताव पारित करके अंग्रेजी शासन से मांग की कि वह भारत के संदर्भ में युद्ध के अपने उद्देश्यों का खुलासा करें। भारतीय कम्युनिस्टों को उस समय हिटलर के फासीवाद और पाश्चात्य जनतंत्रों में कोई फर्क नहीं नजर आया। उन्होंने इसे साम्राज्यवादी बताया और कांग्रेस से तुरंत नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की मांग की।

युद्ध के शुरुआती दौर में कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के साथ संयुक्त मोर्चे की नीति अपनायी। कम्युनिस्ट नेताओं को उम्मीद थी कि आंदोलन के प्रथम चरण में कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी के बाद नेतृत्व की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ जाएगी। इसके आलावा, उन्हें लगता था कि जन आंदोलन आगे चलकर क्रांतिकारी रास्ता अपनाता।

मार्च 1940 में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता की शर्त पर युद्ध में मित्र राष्ट्रों को समर्थन देने का प्रस्ताव पारित किया। कांग्रेस समाजवादियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया किंतु कम्युनिस्टों को कांग्रेस की देखो और इंतजार करो, की नीति पसंद नहीं आई। बोस ने गांधी पर अंग्रेजी शासन के साथ समझौता परस्ती का आरोप लगाया। गांधी ने कहा, ‘‘बोस का यह आरोप कि मैं अंग्रेजों के साथ समझौता करने को उत्सुक हूँ, सही है, यदि समझौता सम्मान के साथ हो सके।’’ शीघ्र ही कम्युनिस्टों ने ‘‘गांधीवाद का पर्दाफाश’’ करने और ‘‘गांधीवादी नेतृत्व के सशक्त विरोध‘‘ की नीति पर जोर देना शुरू किया। अकेले एम.एन. राय का गुट ही अंग्रेजों के युद्ध प्रयासों को पूर्ण समर्थन दे रहा था।

‘‘सर्वहारा पथ’’ (प्रोलिटैरियन पाथ) पर सशस्त्र विद्रोह के उद्देश्य से कम्युनिस्टों ने प्रमख उद्योगों में आम राजनैतिक हड़तालों को आयोजित करना शुरू किया। गांधी और नेहरू की ‘‘निष्क्रियता’’ की निंदा के साथ ही कम्युनिस्टों ने बोस और कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी की भी आलोचना करना शुरू की। अकेले राष्ट्रीय आंदोलन चलाने की कम्युनिस्टों की नीति को कामिंटर्न का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। अपनी इस नीति के चलते कम्युनिस्ट एक बार फिर, कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन में अलग-थलग पड़ गये। सरकार ने कम्युनिस्टों पर दमन के विभिन्न भागों से 480 प्रमुख कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए फलस्वरूप पार्टी लगभग अपंग हो गई। ज्यादातर गिरफ्तार कम्युनिस्टों को देवली कैंप में रखा गया।

‘‘जनयुद्ध’’ की रणनीति
जून 1941 में जब हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया तो पाश्चात्य देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनी सरकारों के युद्ध प्रयासों का समर्थन करना शुरू किया। ऐसे में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भी युद्ध संबंधी नीति में परिवर्तन की जरूरत महसूस की जाने लगी। विडम्बना यह थी कि जहां एक तरफ ब्रिटेन और सोवियत संघ के हितों में साम्य था वहीं भारत ब्रिटेन का अभी भी उपनिवेश था। कामिंटर्न के युद्ध के प्रयासों के समर्थन को लेकर पार्टी दो धड़ों में बंट गई। जो कम्युनिस्ट पी.सी. जोशी के नेतृत्व में अभी जेल के बाहर रह रहे थे और युद्ध विरोधी गतिविधियों में संलग्न थे उनका मानना था कि भारत की । स्थितियों में चुंकि कोई परिवर्तन नहीं हुआ था इसलिए युद्ध विरोध की पुरानी नीति जारी रखनी चाहिए। दूसरा धड़ा, जिसके ज्यादातर सदस्य जेल में थे, उनका विचार था कि सोवियत संघ की विजय के महान उद्देश्य के लिए, अंदरूनी संघर्ष फिलहाल छोड़ देना चाहिये। उनका तर्क था कि नई परिस्थितियों में, साम्राज्यवादी युद्ध का चरित्र बदल गया था और अब वह जनता की लड़ाई थी। अन्ततोगत्वा यही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की अधिकारिक नीति बन गई। लेकिन कुछ ऐसे भी कम्युनिस्ट थे जो इस नीति से सहमत नहीं थे। परिणामस्वरूप कम्यनिस्टों ने औपनिवेशिक शासन के युद्ध प्रयासों का समर्थन करना शुरू कर दिया। उत्पादन जारी रखने के लिए वे कारखानों में हड़तालों न होने देने का यथासंभव प्रयास करने लगे। किसान मोर्चे पर उन्होंने अधिक अन्न उपजाओ का नारा दिया। सामंत-विरोधी अंतर विरोधों को तेज करने की भी नीति मुल्तवी कर दी गई।

9 अगस्त 1942 के बाद से गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए ‘‘भारत छोड़ो’’ आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से, सरकार ने कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। इसी बीच पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी ने सरकारी अधिकारियों से मिलकर बंदी कम्युनिस्टों को छोड़ने का आग्रह किया। विभिन्न जेलों से बहुत से कम्युनिस्टों को रिहा कर दिया गया।

1942 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से प्रतिबंध हटा लिया गया और वह वैधानिक पार्टी के रूप में काम करने लगी। कांग्रेस पार्टी के प्रतिबंधित होने की वजह से कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों के लिए राजनैतिक क्षेत्र खाली था। 1942-43 के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य संख्या में तो वृद्धि हुई लेकिन जनता में इसकी प्रतिष्ठा काफी गिर गई।

पार्टी का पहला वैधानिक अधिवेशन 1943 में हुआ, इस समय तक इसकी सदस्य संख्या लगभग 5000 तक पहुंच गई थीं।

कम्युनिस्ट और पाकिस्तान का मुद्दा
1945 में युद्ध समाप्त होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के राजनैतिक विरोधियों ने इसकी ‘‘जनयुद्ध’’ की नीति की राष्ट्र विरोधी नीति कहकर निंदा करना शुरू किया। राष्ट्रीय मुख्यधारा के विरूद्ध कम्युनिस्टों की एकमात्र यही नीति नहीं थी। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा पाकिस्तान आंदोलन के समर्थन का था। कम्युनिस्टों ने पाकिस्तान की मांग को सांप्रदायिक या अलगाववादी कहने वालों का विरोध करते हुए इसे राष्ट्रीय आत्म-निर्णय की मांग बताया। उन्होंने प्रचार करना शुरू किया कि पाकिस्तान के निर्माण की मांग जनतांत्रिक थी इसलिए कांग्रेस को यह मांग मान लेनी चाहिए। इससे वे राष्ट्रीय मुख्य धारा के जनमत और भी अलग थलग पड़ गए।

अब तो यह सर्वविदित है कि आर.पी दत्त की सलाह पर कम्युनिस्टों ने एकाएक मार्च 1946 से पाकिस्तान की मांग का विरोध करना शुरू कर दिया। दिसंबर 1945 में पार्टी की केंद्रीय समिति ने संयुक्त राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की नीति का अनुमोदन किया। इसमें कम्युनिस्टों को कांग्रेस और मुस्लिम लीग से साथ मिलकर संयुक्त मोर्चा बनाने की बात कही गई।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दी गई जगह का प्रयोग करें।
ख) इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से अपने उत्तरों का मिलान करें।
1) द्वितीय विश्व युद्ध के मुद्दे पर कांग्रेस कार्य समिति ने क्या नीति अपनाई?
2) युद्ध के प्रति कम्युनिस्टों का क्या दृष्टिकोण था?
3) कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा श्जनयुद्धष् की नीति अपनाने के पीछे क्या कारण थे?
4) कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन क्यों किया?

सारांश
भारतीय वामपंथियों और खासकर कम्युनिस्टों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका निभायी। वामपंथियों के दबाव के ही चलते कांग्रेस ने पूर्ण-स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकार किया। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ मजदूरों और किसानों की मांगों को जोड़ने का श्रेय भी प्रमुख रूप से कम्युनिस्टों को जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन से भारतीय मजदूर आंदोलन को जोड़ने का काम भी कम्युनिस्टों ने ही किया।

लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत की वामपंथी ताकतें कई धाराओं में बंटी हुई थी। इन धाराओं की सबसे बड़ी गलती यह थी कि इन्होंने महात्मा गांधी को अपना प्रमुख विरोधी माना। नेहरू ही ऐसे वामपंथी थे जिन्होंने गांधी की महत्ता को समझा। बहुत बार वे एक दूसरे के ही संग खींचने में व्यस्त थे। आपसी फूट के कारण ही वे एक सशक्त मजदुर किसान आंदोलन खड़ा कर पाने में असफल रहे। इससे सिर्फ समाजवादी समाज की स्थापना के उद्देश्य के साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन को भी क्षति पहुंची।

बोध प्रश्न 5
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दी गई जगह का प्रयोग करें।
ख) इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से अपने उत्तरों का मिलान करें।
1) भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कम्युनिस्टों का प्रमुख योगदान क्या था?

कुछ उपयोगी पुस्तकें
पैंथम थॉमस और डौयश कैनेथ एल., मॉडर्न इंडियन पॉलिटिकल थॉट सेज पब्लिकेशंस नई दिल्ली।
पन्निकर के.एन. (संपा), इंडियन लेफ्ट मूवमेंट: अ क्रिटिकल अप्रेजल, विकास नई दिल्ली 1980