गोपाल कृष्ण गोखले (gopal krishna gokhale in hindi) , के विचार , निबन्ध , जीवनी गोपाल कृष्ण गोखले के गुरु कौन थे

By   August 27, 2020

गोपाल कृष्ण गोखले के गुरु कौन थे ? (gopal krishna gokhale in hindi) के विचार , निबन्ध , जीवनी और , सामाजिक और आर्थिक सुधार क्या है ? जीवन परिचय ? gopal krishna gokhale was political teacher of whom ?

गोपाल कृष्ण गोखले (1866-1915)
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
गोखले के राजनीतिक जीवन का विकास
जीवन वृत्तांत
रचनात्मक प्रभाव
गोखले के राजनीतिक विचारों के स्रोत
राजनीतिक विचार
भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति प्रतिक्रिया
उदारवाद
राजनीतिक लक्ष्य और कार्यक्रम
आर्थिक और सामाजिक विचार
उपसंहार
कछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक विचारों की चर्चा की गयी है। आजादी के पूर्व तमाम उदारवादी राजनीतिक विचारकों में गोखले का एक उदारवादी विचारक और उदारवादीकर्ता के रूप में अद्वितीय स्थान था। इस इकाई का मकसद आपको गोखले के राजनीतिक विचारों से परिचित कराना है जो भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के शुरुआती दौर के राजनीति विचारधारा के उदारवादी परम्परा का हिस्सा रही है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप जानेंगे किः
ऽ गोखले के राजनीतिक जीवन का विकास और रचनात्मक प्रभाव जिन्होंने उनकी राजनीतिक विचारधारा को आकार दिया,
ऽ भारत में अंग्रेजी शासन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के संदर्भ में उनके राजनीतिक विचार, उदारवाद का उनका सिद्धांत, राजनीति में साध्य और साधन के बारे में उनके विचारए उनका राजनीतिक कार्यक्रम और आर्थिक और सामाजिक विचार।

प्रस्तावना
आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन का विकास भारतीय राष्ट्रीय आंदोलनों के विकास के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में गांधी के प्रमुख राजनीतिक हस्ती के रूप में उभरने से पूर्व दो उदारवादी और उग्रवादी विचारधाराओं के रूप में जानी जाती है। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के शुरुआती दौर में न्यायमूर्ति एम.जी. रानाडे डी.ई. वाचा, फिरोजशाह मेहता और दादा भाई नौरोजी जैसे उदारवादी विचारकों का प्रभुत्व था, जिन्होंने भारत में उदारवादी राजनीतिक विचारधारा की नींव रखी। गोपाल कृष्ण गोखले अपने जमाने के एक अग्रणी उदारवादी विचारक थे। आधुनिक विचारक उस उदारवादी राजनीतिक दृष्टिकोण के हिमायती थे और सम्पूर्ण परन्तु क्रमिक सामाजिक विकास के प्रवक्ता थे। वे तिलक, अरविन्दो बी.सी. पाले, और दूसरे उग्रवादी विचारकों से गम्भीर मतभेद रखते थे। भारत में ब्रिटिश राज भारतीय सामाजिक स्थिति की समझ और सामाजिक और राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के तरीकों को लेकर उनके उग्रवादियों से मतभेद थे। मोटे तौर पर कहा जाए तो उदारवादी भारत में ब्रिटिश शासन का स्वागत और तारीफ करते थे और यह मानते थे कि इससे भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू होगी। वे सामाजिक और आर्थिक सुधारों पर ज्यादा जोर देते थे क्योंकि उनका विश्वास था कि सामाजिक और आर्थिक विकास के एक न्यूनतम स्तर को पाए बिना मात्र राजनीतिक आजादी का कोई अर्थ नहीं था। एम.जी. रानाडे के बाद गोखले प्रमुख उदारवादी चिंतक थे। जिन्होंने राजनीति के उदारवादी तरीकों में काफी योगदान दिया। एम.जी. रानाडे के आदर्श शिष्य और महात्मा गांधी के पूज्य राजनीतिक गुरू, गोखले ने रानाडे और गांधी के बीच एक महत्वपूर्ण बौद्धिक कड़ी प्रदान की। निम्न पृष्ठों में हम गोखले के राजनीतिक विचारों को भी समझने की कोशिश करेंगे।

गोखले का राजनीतिक जीवन
गोखले के राजनीतिक विचारों को समझने के लिए पहले यह जरूरी है कि यह देखा जाय कि गोखले का राजनीतिक विकास कैसे हुआ। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ उनके विचारों तथा उन प्रभावों से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई हैं जिसने उसका मार्ग दर्शन किया।
जीवन वृत्तांत
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 में रतनगढ़ी जिले के एक छोटे से गाँव कोतलक के एक मध्यवर्गीय चिंतपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ। उसके पिता कृष्णराव पहले एक क्लर्क थे किंतु बाद में पदोन्नति पाकर वे पुलिस सब इन्सपैक्टर बने। जब गोपाल राव मुश्किल से 13 वर्ष का था तब उनकी मृत्यु हो गयी। गोपाल राव के बड़े भाई गोविन्द राव ने परिवार की जिम्मेदारी कन्धों पर ली। गोपाल राव ने कोलापुर के निकट कगाल में अपनी प्राथमिक शिक्षा पाई और 1881 में हाई स्कूल पूरा किया। उन्होंने तीन विभिन्न कॉलेजों में उच्च शिक्षा ग्रहण की। ये थे कोलापुर का राजाराम कॉलेज, पूना डक्कन कॉलेज और बम्बई एलफिन्स्टन कॉलेज जहाँ से उन्होंने 1884 में स्नातक किया। एक बार उन्होंने इंजिनियर बनने की सोची किंतु अन्त में शिक्षा के उद्देश्य के लिए अपने को समर्पित करने का निर्णय लिया। पुणे में देश भक्त युवाओं के एक समूह ने ‘द न्यू इंगलिश स्कूल‘ नाम का एक सेकेन्डरी स्कूल प्रमुख राष्ट्रवादी विष्णुशास्त्री चिपलंकर की प्रेरणा से चला रहे थे। गोपाल राव ने ‘दी न्यू इंगलिश स्कूल‘ में एक अध्यापक की नौकरी कबूल कर ली। डेक्कन स्कूल सोसाइटी के मालिकों को उसकी ईमानदारी ने प्रभावित कर दिया और उन्होंने उसे सोसाइटी का आजीवन सदस्य बना दिया। शीघ्र ही गोपाल राव की पदोन्नति एक प्राध्यापक के रूप में फरगूसन कॉलेज में हुई। यह कॉलेज ‘डेक्कन एडुकेशन सोसाइटी’ द्वारा चलाया जाता था, तब से उन्होंने अपने जीवन के 18 साल अध्यापन में बिता दिए।

अपने अध्यापक काल के दौरान उनका परिचय एम.जी रानाडे से हआ और तभी से उन्होंने अपनी प्रतिभा और सेवा को रानाडे के सयोग्य निर्देशन में सार्वजनिक जीवन के लिये समर्पित कर दिया। वे सार्वजनिक सभा के सचिव बने। यह सार्वजनिक सभा एम.जी. रानाडे ने आम जनता के हितों की अभिव्यक्ति के लिए शुरू की। सभा का एक प्रभावशाली त्रैमासिक पत्र था जिसका गोपाल राव ने संपादन किया। कुछ समय तक उन्होंने सुधारक नाम की पत्रिका के अंग्रेजी प्रभाग में भी लिखा, जिसे 19वीं सदी के महाराष्ट्र के एक दिग्गज समाज सुधारक गोपाल गणेश अगारकार ने शुरू किया था। 1889 में पहली बार गोपाल राव ने भातीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र में हिस्सा लिया और तब से वह उसकी मीटिंगों में एक नियमित वक्ता थे। 1886 में जब तिलक और उनके। सहयोगियों ने सार्वजनिक सभा से खुद को अलग कर लिया और डेक्कन सभा नाम का एक नया संघ कायम किया। गोखले सभा की गतिविधियों में गहरी रुचि लेते थे। सभा की ओर से उन्हें इंग्लैंड में वेलबी कमीशन के समक्ष गवाही देने के लिए भेजा गया जिसकी नियुक्ति सरकार द्वारा ब्रिटिशे और भारत सरकार के बीच खर्चों के ज्यादा समान बंटवारे के तरीकों के लिए की गई थी। यह उनकी पहली इंग्लैंड यात्रा थी, उनके श्रेष्ठ कार्य ने कई उम्मीदें जगाई। 1902 में फरगसन कॉलेज से वे रिटायर हुये और जीवन के बाकी 13 साल उन्होंने पूर्ण रूप से राजनीतिक कार्य के लिये समर्पित किये। इस काल में वे बार-बार इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिये निर्वाचित हुये। जहाँ उन्होंने एक प्रमुख सांसद के रूप में अपनी पहचान बनाई। खासतौर से उनके बजट भाषण यादगार बन चुके हैं क्योंकि उनमें बहत कुछ सकारात्मक था और साथ ही सरकारी अर्थनीति की उसमें निर्भीक आलोचना थी।

महात्मा गांधी की पहल पर गोखले दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों के मामले में भी रुचि लेते थे। 1910 और 1912 में उन्होंने इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में नटाल के भारतीय मजदूरों की राहत के लिए प्रस्ताव रखे। गांधीजी के आमंत्रण पर वे 1912 में दक्षिण अफ्रीका गए और वहाँ से भारतीयों की समस्याओं को सुलझाने भूमिका निभाई। 1905 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलनों की मदद कोष इकट्ठा किए। गोखले की कठोर दिनचर्या आखिरकार फरवरी 1915 में उनकी असमायिक मृत्यु का कारण बनी।

रचनात्मक प्रभाव
राजनीतिक विचार और सिद्धांत शून्य में पैदा नहीं होते। उनका उदय एक खास सामाजिक वातावरण में होता है। एक विचारक अपने समय की उपज होता है। गोखले इसके कोई अपवाद नहीं थे। उनके विचार और सिद्धांत मुख्यतः अपने समय के अग्रणी व्यक्तियों और घटनाओं जिनसे उनका सामना हुआ, द्वारा प्रभावित थे। ब्रिटिश शिक्षण प्रणाली की उपज होने के नाते गोखले का जीवन के प्रति एक आधुनिक दृष्टिकोण अपनाना लाजिमी था, जो उनके समय के अंग्रेजी शिक्षित अभिजात वर्ग का चरित्र था। अपने छात्र जीवन में उन्होंने ब्रिटेन के ‘पब्लिक स्पीकर’ को कंठस्थ कर लिया था, बेकन के ‘‘ऐसेज‘‘ और ‘‘द .एटवानमेंट ऑफ लर्निंग‘‘ के लेखांश दोहराते थे, फोसेट के राजनीति अर्थशास्त्र में पारंगत हो गए और बर्क की ‘‘रिफलेक्सन्स ऑन दि फ्रेंच रिव्यूलशन‘‘ को कंठस्थ कर लिया। इन तमाम चीजों का उनके राजनीतिक विचारों पर दरगामी प्रभाव पड़ा। जोन स्टअट मिल के उदारवादी विचारों ने उन पर गहरी छाप डाली और वे खास तौर से मिल के राजनीतिक सिद्धांतों से प्रेरित हुए। इतिहास के विद्यार्थी होने के नाते गोखले खासतौर से आइरिश होमरूल भूवमेंट से प्रभावित थे। यूरोपीय इतिहास से सम्बद्धता, उसकी गतिशीलता और जनतांत्रिक विकास ने उनके विचारों को काफी प्रभावित किया और इससे उन्हें लगा कि पश्चिम से सीखने के लिए बहुत कुछ है।

भारतीय कार्यक्रमों में गोखले को काफी हद तक एम.जी. रानाडे ने प्रभावित किया। रानाडे के अनयायी होने पर गोखले को हमेशा फखाथा। वे खासतौर से रानाडे के सामाजिक और राजनीतिक विचारों से प्रभावित थे। हालांकि गोखले को तिलक और दसरे राष्ट्रीय नेताओं के बलिदान के प्रति गहरी श्रद्धा थी परन्तु वे उनके राष्ट्रवादी सिद्धांतों की ओर ज्यादा आकर्षित नहीं थे, और इससे वे डी.ई. वाचा और फिरोजशाह मेहता जैसे उदारवादी विचारकों के निकट आए, जो उन पर पार्टी संगठन और तकनीक के मसलों पर काफी प्रभाव डालते थे।

इंग्लैंड में समकालीन उदारवादी राजनीतिज्ञों जैसे मोरले और दूसरों का भी गोखले के राजनीतिक जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा। ग्लैडस्टोन और मोरले के प्रति गोखले का आदरपूर्ण रवैया था और वे विश्वास करते थे कि भारत के शासन में वे न्यायोचित सिद्धांत अपनाएंगे। गोखले के राजनीतिक विचार निश्चित तौर पर उनके समय के उदारवादी लोकाचार के प्रतिनिधि थे और यह वह उदारवादिता थी, जिसने उनके सामाजिक विचारों और राजनीतिक विचारों को आकार दिया।

गोखले के राजनीतिक विचारों के स्रोत
गोखले सही मायनों में राजनीतिक चिन्तक नहीं थे। उन्होंने हॉब्स और लॉक की तरह कोई राजनीतिक ग्रंथ नहीं लिखे, न ही उन्होंने तिलक की ‘‘गीता रहस्य‘‘ और गांधी की ‘‘हिंदू स्वराज्य‘‘ जैसी राजनीतिक टीकाएं लिखीं जिनसे उनके राजनीतिक सिद्धांतों का हवाला दिया जा सके किन्तु उन्होंने विभिन्न अवसरों पर कई लेख लिखे जिनसे उनके राजनीतिक सोच का पता चलता है। इसी तरह महत्वपूर्ण सामाजिक.आर्थिक मसलों पर उनके कई भाषण और उनके समकालीनों के साथ उनके पत्र व्यवहार अब संकलित रचना के रूप में उपलब्ध हैं जिनसे उनकी राजनीतिक विचारों को जाना जा सकता है। गोखले पर कई विद्वतापर्ण किताबें हैं, जो उनके राजनीतिक विचारों के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इस प्रकार, इन स्रोतों के आधार पर हम गोखले के राजनीतिक सोच का वर्णन कर सकते हैं।
बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: 1) निम्न स्थान पर उत्तर दें।
2) इकाई के अंत में दिए गए मॉडल उत्तरों के साथ अपने उत्तर मिलाएं ।
1) गोखले ने भारतीय राष्टीय कांग्रेस के सत्र में पहली बार……………………………………………………………….में भाग लिया।
2) जिन भारतीय हस्तियों ने गोखले को प्रभावित किया उनमें से ……………………………………………..प्रमुख थे।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) 1809
2) एम.जी.ा् रानाडे

 राजनीतिक विचार
गोखले के राजनीतिक विचार अपने समय के सामाजिक राजनीतिक मसलों के इर्द-गिर्द धमते हैं न कि राज्य तथा राष्ट्र व संप्रभुता जैसी राजनीति की मूल अवधारणाओं के इर्द-गिर्द। इसलिए उनके राजनीतिक सिद्धांतों को समझने के लिए उस समय के बुनियादी राजनीतिक मसलों का उल्लेख करना होगा तथा उन मसलों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को जानना होगा। ये मामले अनेकों थे, और स्वभाव से जटिल थे। इन मामलों के प्रतिक्रिया स्वरूप जो विचार उभरकर आए वे गोखले की राजनीतिक सोच की समृद्ध विविधता को दर्शाते हैं। इस पाठ में हम गोखले के राजनीतिक विचारों की चर्चा तीन मुख्य शीर्षकों के तहत करेंगे। ये शीर्षक हैए भारत में ब्रिटिश राज के प्रति गोखले की प्रतिक्रिया उनका उदारवाद तथा उनका राजनीतिक कार्यक्रम जिसको उन्होंने तैयार किया और जिसके लिए उन्होंने काम किया।

 भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति प्रतिक्रिया
अपने समय के अधिकतर उदारवादी भारतीय चिंतकों की तरह ही गोखले ने भारत में ब्रिटिश राज की प्रशंसा की और उसका स्वागत किया। उनका यह रवैया दो बातों पर आधारित था। सबसे पहली बात यह थी कि तमाम उदारवादियों की तरह गोखले मानते थे कि भारतीय समाज में ब्रिटिश राज के कारण आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। अंग्रेज कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को मानने वाले थे, उन्होंने प्रतिनिधि सरकार के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, चाहे सीमित स्तर पर ही सही। उन्होंने प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी। ये तमाम चीजें निस्संदेह नयी थीं। इसके अलावा, अंग्रेजों ने ही भारत में राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया शुरू की। भारतीयों को उनमें से सीखने के लिए बहुत कुछ था। इसलिए गाखल का तक था कि हमें कुछ समय और उन्हें झेलना चाहिए और उद्योगए वाणिज्य, शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में प्रगति करनी चाहिए। गोखले मानते थे कि यदि ब्रिटिश राज कुछ समय और रहता है, तो भारत पूरी तरह आधुनिक हो जाएगा और फलस्वरूप यूरोप के अन्य स्वतंत्र राज्यों की तरह राष्ट्रों के समुदाय में शामिल हो जाएगा।

गोखले का मानना था कि अपनी उदार परम्परा को रखते हुए अंग्रेज अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगे और भारत को उस दिन स्वशासन सौंप देंगे जिस दिन स्वयं भारतीय इस योग्य हो जाएंगे। ‘‘इंग्लैंड की भारत के प्रति प्रतिज्ञा‘‘ की अवधारणा टामस मनरो, हेनरी लौरेंस और महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणाओं के आधार पर बनी हैं। यह इस तथ्य के बावजूद 1884 से रिपन के वायसराय काल के खत्म होने से लेकर 1917 के अगस्त घोषणा के बाद के तमाम वायसरायों और सचिवों ने जोर देकर भारत में ब्रिटिश राजनीतिक संस्थाओं को लागू करने की संभावनाओं को नकार दिया। गोखले का अभी भी विश्वास था कि अंग्रेजों के उदारवादिता की भावना को अपील करने से, उन्हें भारत की सही सामर्थ्य को शान्ति करने पर अंग्रेज अंततः मान जाएंगे और भारत में पश्चिमी राजनीतिक संस्थाओं को लागू करेंगे। अंग्रेजों के उदारवाद में इस आस्था के चलते गोखले भारत में अंग्रेजी राज को जारी रखने के हिमायती थे।

भारत में अंग्रेजी राज के जारी रहने के उनके औचित्य का मतलब यह नहीं था कि वे भारत में अंग्रेजी प्रशासन से पूर्ण रूप से संतुष्ट थे। उदाहरणस्वरूप वे कर्जन प्रशासन के मनमाने पक्ष के कट आलोचक थे और उन्होंने कई मौकों पर कहा कि अंग्रेज यहाँ संसदीय प्रणाली को लागू करने में हिचक रहे थे, और उनका उददेश्य यहां राज करना था न कि प्रजातंत्र स्थापित करना। फिर भी उनका विश्वास था कि अंग्रेजी राज की नियति थी कि वो भारत में अपना दैवकृत मिशन पूरा करते।

गोखले ईमानदारी से महसूस करते थे कि जहाँ तक लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं के विकास का सवाल है, भारतीय इतिहास के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं है। जलाई, 1911 में गोखले ने लंदन में हुई युनिवर्सल रेस कांग्रेस में पर्चा पढ़ते हुए स्वीकार किया था किए ‘‘भारत में राजनीतिक स्वतंत्रता का राष्ट्रीय विचार पश्चिम की तरह विकसित नहीं हआ था।‘‘ उनका मानना था कि देश की सामाजिक.राजनीतिक संस्थाओं को पश्चिम की तर्ज पर सुधारा जाना चाहिए। उनके अनुसार यूरोप का इतिहास लोकतांत्रिक विचारों के विकास की स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसलिए वह हमारे स्वतंत्रता और लोकतंत्र के विचारों को आकार देने के लिए काफी उपयोगी होगा। अंग्रेजों से संबंध इस मामले में जरूर मदद पहंुचाएंगे। इसलिए उन्होंने भारत में ब्रिटिश राज का स्वागत किया। अपने मित्र गोखले को उन्होंने एक पत्र में लिखा, ‘‘तुम्हें मालूम होना चाहिए कि नौकरशाही की जा भी कमियां हो‘‘, किन्तु एक अंग्रेज कितनी भी गुस्ताखी करे, आज केवल वे ही देश के विधि व्यवस्था के पक्षधर हैं और बिना किसी विधि व्यवस्था के हमारे लोगों की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है। इस वजह से, गोखले के अनुसार, ब्रिटिश राज भारत में सामाजिक व्यवस्था का पक्षधर था, तो प्रगति की एक पूर्व शर्त भी इसीलिए उन्होंने भारत में अंग्रेजी राज के जारी रहने को न्यायोचित ठहराया।

उदारवाद
जैसा कि पहले कहा जा चुका है गोखले मूलतः एक उदारवादी विचारक थे किन्तु उनका उदारवाद 18वीं और 19वीं सदी के यूरोपीय उदारवाद से थोड़ा भिन्न था। गोखले के उदारवाद की विशिष्टता को समझने के लिए जरूरी है कि हम उदारवादी विचारधारा से परिचित हो लें। एक विचारधारा के रूप में, व्यक्ति और समाज की जीवन पद्धति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। स्वतंत्रता उदारतावाद का एक प्रमुख सिद्धांत है और यह जीवन के किसी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के रचनात्मक हस्तक्षेप की मुखालिफत करता है। सामाजिक क्षेत्र में उदारवाद धर्मनिरपेक्षता का पक्षधर है। यह धार्मिक कट्टरता की बेड़ियों से व्यक्ति की आजादी का हिमायती है, और यह आस्था की स्वतंत्रता में विश्वास रखता है। आर्थिक क्षेत्र में यह स्वतंत्र व्यापार का हिमायती है और इसके अलावा आन्तरिक उत्पादन की स्वतंत्रता और बाहय निर्यात का हामी है। यह निर्यात में स्वतंत्र प्रतियोगिता का पक्षधर है। यह स्वतंत्र प्रतियोगिता का हिमायती है जिसका अर्थ है कि माल के आयात और निर्यात पर कोई रोक नहीं रहे। इस कारण यह प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और आर्थिक लाभों को कछ लोगों के हाथ में वितरित करने के हिमायती है। राजनीति के क्षेत्र में उदारवादी इस बात पर जोर देते हैं कि यह राजनीतिक स्वतत्रता की पूर्व शर्त है, मोटे तौर पर गोखले राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में इन सभी मान्यताओं में विश्वास करते थे। इसलिए उन्हें उदारवादी कहा जा सकता है। लेकिन उदारवाद के क्लासिकी अर्थशास्त्र से उनका मतभेद था। और राज्य का सिर्फ देश के आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि औद्योगिक विकास व व्यापार को बढ़ाने में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका चाहते थे।

उदारवादी होने के नाते गोखले व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व देते थे। लेकिन उनके लिए स्वतंत्रता का मतलब किसी अंकुश का न होना नहीं था। इसके विपरीत उनका मानना था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता तभी दी जा सकती है जब व्यक्ति आत्म नियंत्रण और संगठन में रहे, वो जानते थे कि स्वतंत्रता तब तक नहीं दी जा सकती है ज स्वतंत्रता के कुछ अधिकार नहीं दिए जाएं। उनके विचार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता व्यक्तिगत स्वतंत्रता पाने के लिए जरूरी था। इसलिये उन्होंने 1904 ऑफिशियल सीक्रेट बिल का विरोध किया। क्योंकि वह यह मानते थे कि इससे सरकार को प्रेस को नियंत्रित करने के ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे।

गोखले व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार और समझौते के हिमायती थे। भू.राजस्व संहिता संशोधन विधेयक पर टिप्पणी करते हुए गोखले ने कहा कि आम नागरिक अपनी जो के मालिकाना अधिकार से इतनी गहराई से जुड़ी है कि वह इन अधिकारों पर किसी प्रत्यक्ष और परोक्ष हमले का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा, यह समझना मुश्किल नहीं है कि इससे जमीन ले लेने का प्रस्ताव अपने अधिकारों का अतिक्रमण लगेगा। इस प्रकार गोखले ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, व्यक्तिगत सम्पत्ति, और समझौते की स्वतंत्रता का जोरदार समर्थन किया जो कि उदारवादी सिद्धांत का मूल सार है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आवश्यक नागरिक अधिकारों को कायम रखने के लिए गोखले ने देश में प्रतिनिधि संस्थानों को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। उनके अनुसार ब्रिटेन और भारत के बीच सम्बन्ध सुधारने की पहली शर्त यह होगी कि ‘‘इंग्लैंड भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं के विकास को आगे बढ़ाने तथा उस नीति पर कायम रहने की स्पष्ट घोषणा करें। हालांकि गोखले ने सार्वभौमिक मताधिकार की माँग नहीं की। उन्होंने मताधिकार के लिए सम्पत्ति की योग्यता का प्रस्ताव रखा। उदाहरण के लिए ग्राम पंचायत के चनाव में मतदान के बारे में गोखले ने कहा कि केवल वे ही लोग मतदान करें जो न्यूनतम भू-राजस्व देते थे।

गोखले ने हितों के प्रतिनिधित्व के साथ विधायिका में जनता के प्रतिनिधित्व को वरीयता दी। अपनी अंतिम वसीयत में उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक प्रान्त की विधायिका परिषद के सदस्य 75 से 100 तक होने चाहिए। बम्बई का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि विधानसभा में एक-एक सीट करांची अहमदाबाद मिल के मालिकों और दक्कन के सरदारों के लिये होनी चाहिए। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व का सुझाव दिया। हिंदुओं और मुसलमानों के साम्प्रदायिक भेदभाव को जानते हुए गोखले ने मुसलमानों के लिए अन्य प्रतिनिधित्व की बात कही। इस तरह गोखले ने उदारवादी होने के नाते क्रान्तिकारी स्वतंत्रता का समर्थन किया और दूसरी तरफ प्रतिनिधि संस्थानों की स्थापना का भी समर्थन किया।

गोखले का राज्य की भूमिका के बारे में विचार क्लासिकल उदारवाद से काफी अलग थी। क्लासिकल उदारवाद एक मुक्त राज्य की बात करता है। क्लासिकल उदारवाद राज्य को सिर्फ मुख्य व्यवस्था की इजाजत देता है। उनका मानना है कि जो सरकार सबसे कम राज करती वह सबसे अच्छी है। लेकिन गोखले न्यायमूर्ति एम.जी. रानाडे के पदचिन्हों पर चलते हुए देश की आर्थिक और सामाजिक जीवन में राजकीय हस्तक्षेप का समर्थन करते हैं। यहाँ गोखले के विचार जे.एस. मिल के विचार से बिल्कुल अलग हैं। गोखले के विचार थे कि सरकार न केवल वितरण प्रणाली में बल्कि उत्पादन की प्रणाली में भी हस्तक्षेप करें। गोखले के अनसार सरकार का कार्य जनता का नैतिक और न्यायोचित हितों को बढ़ाना है। इन बातों को हासिल करने के लिए सरकार विकास के अस्वाभाविक प्रतिबन्धों को अनदेखा नहीं कर सकती है। गोखले के अनुसार सरकार को विकास की गति को तेज करने के लिए। इन अस्वभाविक प्रतिबन्धों को दूर करना चाहिए। गोखले ने कहा कि भारतीयों को ऐसी सरकार की जरूरत है जिसके सामने जन कल्याण के अलावा सब चीजें गौण हो जाए और जो भारतीयों को विदेशों में अपमानित किए जाने का विरोध करें और हर उपलब्ध तरीके से भारत और विदेशों में रह रहे भारतीयों के नैतिक और भौतिक हितों को बढ़ाने की कोशिश करे। इस प्रकार, गोखले के अनसार राज्य सिर्फ पुलिस राज्य नहीं है बल्कि जब-जब जरूरत हो यह देश की आर्थिक जिन्दगी में हस्तक्षेप करे और जन कल्याण की गतिविधियों की शुरुआत करे। हम इस तरह कह सकते हैं कि गोखले के उदारवाद की प्रेरणा मिल का उदारवाद था लेकिन यह क्लासिकल उदारवाद से दो चीजों में अलग है। एक तरफ यह अतिक्रान्तिवाद को बढ़ावा नहीं देता है और दूसरी तरफ राज्य का देश की आर्थिक और सामाजिक जिन्दगी में हस्तक्षेप की बात करता है।

राजनीतिक लक्ष्य और कार्यक्रम
भारत में ब्रिटिश राज के बारे में गोखले की समझदारी उनके राजनीतिक लक्ष्यों और कार्यक्रमों को तय करने में एक कारण थे। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि गोखले यह मानते थे कि अंग्रेज लम्बे समय में भारत की मदद करेंगे। इसलिए ऐसे किसी विचार उन्हें नफरत थी जिसमें इन सम्बन्धों को तोड़ने की बात कही जाती हो। इसलिए जो राजनीतिक लक्ष्य वे सामने लाए वे भारत का अपना शासन था। पहले के कांग्रेसी नेता अच्छी सरकार के विचार से संतुष्ट थे इसका मतलब यह सक्षम और समझदार सरकार थी, लेकिन दादा भाई नौरोजी की तरह गोखले यह समझने लगे कि अपनी सरकार के बिना अच्छी सरकार संभव नहीं है। इसके अलावा, वह मानते थे कि अंग्रेजों ने समाज में कानून और व्यवस्था कायम कर के अच्छी सरकार दी लेकिन, अब समय आ गया है कि भारतीय सरकार के काम से जड़ें और यह तब ही संभव था जब अंग्रेज भारत को अपना शासन करने की इजाजत दें। 1905 में कांग्रेस में अध्यक्षीय भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि अब इन सब में परिवर्तन होना चाहिए और सबसे पहले भारत को भारतीयों के हित में चलना चाहिए। यह लक्ष्य हम उसी अनुपात में हासिल कर पाएंगे जितनी ज्यादा आवाजें देश की सरकार के लिए उठेंगी।

इस प्रकार गोखले ने केवल ‘‘अच्छी सरकार’’ पर जोर देने के बजाय भारत के लिए एक कदम आगे बढ़कर स्व-शासन की माँग की। किन्तु, स्व-शासन का क्या अर्थ है गोखले की स्व-शासन की अवधारणा उग्रवादी चिंतक अरविन्द और विपिन चन्द्र पाल से अलग थी। स्व-शासन से उनका अभिप्राय भारत के लिए पूर्ण आजादी नहीं था। वे केवल ब्रिटिश साम्राज्य में स्व-शासित उपनिवेशों का दर्जा चाहते थे। लेकिन उग्रवादी जैसे अरविन्द भारत के लिए पूर्ण आजादी चाहते थे। जिसका कि ब्रिटेन से कोई सम्बन्ध न हो। गोखले स्व-शासन की माँग करते हुए उतने दूर तक नहीं गये, न ही गोखले ने तिलक की भांति स्व-शासन के लिए स्वराज शब्द को बेतहर समझा तिलक के स्वराज्य की अवधारणा का व्याप्त अर्थ था, जोकि पूर्ण आजादी पाने पर ही हासिल किया जा सकता था। गोखले ने पूर्ण आजादी का संकेत कभी नहीं दिया। तिलक के लिए वह जनता का जन्मसिद्ध अधिकार था जिसके लिए कोई दूसरी विशेष शर्त की जरूरत नहीं थी। दूसरी ओर गोखले मानते थे कि जनता को प्रतिनिधि संस्थाओं को चलाने के लिए अपने आप को तैयार करना चाहिए। उन्होंने सोचा कि पश्चिम के राजनीतिक संस्थाओं की उपयोगिता पूर्वी लोगों द्वारा व्यावहारिक शिक्षण और प्रयोग द्वारा की जा सकती है। गोखले यह मानते थे कि भारतीयों द्वारा यह राजनीतिक प्रशिक्षण और प्रयोग अंग्रेजों से सम्बन्ध बना कर किया जा सकता है। स्व-शासन के लक्ष्य को तय कर लेने के बाद गोखले ने एक ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम बनाया जिससे इसको पाया जा सके। उनके राजनीतिक कार्यक्रम में बहुत से परिवर्तन शामिल थे। इन परिवर्तनों को चार भागों में बांटा जा सकता है।
1. वह परिवर्तन जो प्रशासन और उनके कार्यों में ज्यादातर भारतीयों को शीमल कर सके। इनमें विधान परिषद का सुधार, भारतीयों को राज्य परिषद के सचिव के रूप में नियुक्ति और भारतीय कार्यकारी परिषद की नियुक्ति और देश में सार्वजनिक सेवा में यूरोपीय एजेंसीयों में भारतीयों की ज्यादा भागीदारी की बात कही गई।
2. वह सुझाव जिसमें प्रशासन में सुधार की बात कही गयी है जैसे न्यायिक प्रणाली को कार्यकारी कार्यों से अलग करना और पुलिस सुधार।
3. वह सुझाव जिसमें वित्तीय प्रबन्धों के फेर बदल जिससे कर देने वालों पर कम बोझ पड़े और उपलब्ध संसाधनों का सक्षम उपयोग किया जा सके। इससे अन्तर्गत सैनिक खर्चों में कमी, और भूमि आंकलन को संतुलित करना आदि।
4. वह कार्य जिनसे जनता की स्थिति सुधरे, इसमें प्राथमिक शिक्षा का विस्तार, औद्योगिक और तकनीकी निर्देश, सफाई के लिए अनुदान और किसानों पर बढ़ते कर्ज को दूर करने का वास्तविक प्रयास हो। गोखले यह मानते थे कि यदि भारतीय ऐसी अपने को केन्द्रित करें तो कछ समय के अन्दर ही परिणाम आएगा जो निराशाजनक नहीं होगा।
1956 की बनारस कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में गोखले ने आशा व्यक्त की कि जब से कांग्रेस के आंदोलन में ब्रिटेन की क्रान्तिकारी उदारवादी पार्टी ने इंग्लैंड में शुरू किया तब इंग्लैंड में आक्रामक साम्राज्यवाद के खिलाफ एक मजबूत धारा उत्पन्न हुई। इस आशा ने गोखले को कांग्रेस में प्रस्तावित कार्यक्रम पर बढ़ने को प्रोत्साहित किया।

अपने राजनीतिक लक्ष्य व कार्यक्रम को हासिल करने के लिए गोखले ने जिस राजनीतिक तरीके की वकालत की वे मूलतः संवैधानिक थे। उनके अनुसार केवल संवैधानिक आंदोलन ही हमारे राजनीतिक आकांक्षाओं को प्राप्त करने का मार्ग हो सकता है। गोखले के मुताबिक संवैधानिक आंदोलन को अर्थ था-प्रार्थनाएं और ..ा् ..ा् याचिकाएं। हालांकि गोखले ने अन्तिम रास्ते के तौर पर निष्क्रिय प्रतिरोध संभावना से इंकार नहीं किया। बम्बई टाउन हॉल में 9 सितम्बरए 1909 में हुई सभा सामाजिक-राजनीतिक सुधार में गोखले ने कहा‘‘…..ट्रान्सवाल की परिस्थिति में जिस तरह का निष्क्रिय प्रतिरोध को गांधी जी ने संगठित किया, वह न केवल वैधानिक है बल्कि, यह तमाम आत्म स्वाभिमानी लोगों का कर्त्तव्य है। यह निष्क्रिय विरोध क्या है एक अन्यायी कानुन या रचनात्मक तरीके और उस कानून को स्वीकृति या दण्ड सहने का तरीका और सहने को तैयार रहना निष्क्रिय प्रतिरोध है। इसे विकास भी कहा जा सकता है। यदि हम सिद्धांत व ईमानदारी से महसूस करते हैं कि कानून न्यायसंगत नहीं है और उसे ठीक करने की कोई सूरत नहीं है तो मैं समझता हूँ कि इसे मानने से इन्कार करना ही उन लोगों के लिए रास्ता बच जाता है जो भौतिक और तत्कालिक लाभों के ऊपर अपनी ईमानदारी और आत्मसम्मान को रखते हैं। हालाँकि गोखले का निष्क्रिय प्रतिरोध उग्रवादियों से अलग था। जहाँ उग्रवादी नेता जैसे अरविन्द और तिलक ने निष्क्रिय प्रतिरोध को आक्रमण का तरीका बताया वहीं गोखले इसे रक्षा का एक तरीका बताते थे। इसके अलावा गोखले का निष्क्रिय प्रतिरोध के विचार में विद्रोह या विदेशी हमले का साथ देना नहीं था। अन्त में गोखले ने निष्क्रिय प्रतिरोध की हिमायत एक अंतिम अस्त्र के रूप में करने की बात की जिस समय के बाकी सब तरीके असफल हो चुके हों। निष्क्रिय प्रतिरोध आंदोलन नैतिक, आध्यात्मिक, और बिना किसी प्रतिरोध के होना चाहिए। इस तरह हम कह सकते हैं कि गोखले निष्क्रिय प्रतिरोध में विश्वास करते थे लेकिन वह तरीका भारत में नहीं अपनाना चाहते थे क्योंकि वह मानते थे कि भारत में चल रही स्व-सरकार के आंदोलन में हजारों संवैधानिक तरीके बाकी हैं। उन्होंने यह भी महसूस किया कि भारत में निष्क्रिय प्रतिरोध का आंदोलन नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि यह लोगों में लोकप्रिय नहीं था। इसलिए गोखले, तिलक के राजनीतिक तरीकों का विरोध करते थे। संयम गोखले की राजनीति का आदर्श वाक्य था और वे इससे कभी नहीं हटे। दूसरी उग्रवादी नेताओं के विपरीत गोखले जन आंदोलन की बजाए संवैधानिक तरीके पर ज्यादा विश्वास करते थे। वे अंग्रेजों को भारतीयों की समस्याओं से अवगत करना चाहते थे न कि जन आंदोलन से दवाब डालना। यह उनके उदारता को प्रकाश में लाता है।
बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: 1) निम्न स्थान पर उत्तर लिखें।
2) इकाई के अंत में अपने उत्तरों को जाँच लें।
1) गोखले के अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता किस प्रकार उपयोगी हो सकती है?
…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..
2) गोखले ने राज्य की भूमिका को किस तरह देख?
…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

बोध प्रश्न 2 उत्तर :
1) गोखले के अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ कोई बंदिश का न होना नहीं है।
स्वतंत्रता उपयोगी तब ही हो सकती है जब व्यक्ति आत्मसंयम और आत्मसंगठन से व्यवहार करें।
2) गोखले ने देश के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की बात कही। इस तरहए उन्होंने जो कार्य राज्य को सौंपा वह क्लासिकल उदारवाद द्वारा राज्य को सौंपे गए कार्यों से भिन्न था।

आर्थिक और सामाजिक विचार
जैसे कि हम पहले देख चुके हैं गोखले के आर्थिक और सामाजिक विचार उनकी राजनीतिव सोच का अंग थी। वह सही मायने में एक अर्थशास्त्री नहीं थे न ही एक सामाजिक चिंतक थे, जिनके पास समाजशास्त्रीय दृष्टि हो। हालांकि कांग्रेस का नेता होने के नाते और विधान सभा का सदस्य होने के नाते गोखले से उस समय के कई सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर सोचना पड़ता था, जिसने उनके आर्थिक और सामाजिक विचारों को जन्म दिया। ये विचार उनके सोचने के तरीके को दर्शाते हैं जिसमें उस समय की सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को काफी हद तक प्रभावित किया।

जहाँ तक गोखले के आर्थिक विचारों का सवाल है, वे न्यायमूर्ति एम.जी. रानाडे और जर्मन अर्थशास्त्री प्रो. लिस्ट के विचारों से प्रभावित था। रानाडे और लिस्ट दोनों के विचार क्लासिकी अर्थशास्त्र एवं स्मिथ और रिकार्डों से काफी भिन्न थे। रानाडे ने तर्क दिया कि राजनीतिक अर्थशास्त्र एक परिकल्पना विज्ञान है। और उसकी स्थापनाएँ यूक्लिड के स्वयंसिद्ध सत्य पर आधारित नहीं है इसलिए सभी जगह सभी समय लागू नहीं होते। इसलिए यदि कोई आर्थिक नीति इंग्लैंड के लिए सही है तो कोई जरूरी नहीं वह भारत के लिए भी सही हो। इसी बात पर आधारित रानाडे ने भारत में मुक्त व्यापार नीति का विरोध किया जो कि क्लासिकल अंग्रेजी अर्थशास्त्रों द्वारा कहा गया। रानाडे ने तर्क दिया कि भारत को मक्त व्यापार नीति नहीं बल्कि संरक्षण की नीति की जरूरत है। रानाडे ने देखा कि जर्मनी में राज्य की पहल के कारण ही जर्मनी प्रथम श्रेणी की आधुनिक ताकत में तब्दील हुआ। इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि राज्य को औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में बढ़ाने के लिए पहल करनी चाहिए। प्रो. लिस्ट के समान रानाडे का विचार था कि देश की व्यापार नीति आर्थिक नीति से जड़ी है इसलिए उन्होंने महसूस किया कि सरकार को निजी प्रयासों को प्रोत्साहन देना चाहिए तब तक कि निजी उद्योग धन्धे अपने आप को चला सकें। इसे निजी पूँजीपतियों को काम ऋण पर कर्ज देना चाहिए और उन्हें निवेश और जगह चनने में मदद करनी चाहिए। रानाडे के अनुसार भारत की सबसे गम्भीर समस्या गरीबी है और यह तब तक दूर नहीं की जा सकती जब तक औद्योगीकरण की प्रक्रिया शुरू न हो। ब्रिटिश राज द्वारा चलायी गयी मुक्त व्यापार नीति और मुक्त प्रतियोगिता भारत के औद्योगीकरण के विकास के लिए अनुकूल नहीं है इसलिए रानाडे ने देश के आर्थिक क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा हस्तक्षेप का समर्थन किया।

गोखले ने 1875 से 1908 तक भारतीय वित्त की गहन अध्ययन किया और इसे चार भागों में बाँट कर खर्च में वृद्धि की तुलना निम्न है।
राजस्व और खर्च में औसत बार्षिक वृद्धि
काल राजस्व में वृद्धि खर्च में वृद्धि
1874-84 1.25 प्रतिशत 0.67 प्रतिशत
1884-94 1.5 प्रतिशत 1.5 प्रतिशत
1894.1901 1.5 प्रतिशत 1.5 प्रतिशत
1901.1909. 2.5 प्रतिशत 5.0 प्रतिशत
(संदर्भ: भारत में 1840-1914 में आर्थिक विचारों का विकास गोपाल कृष्ण पी.के., 1959)
अपने अध्ययन से गोखले ने यह निष्कर्ष निकाला कि खर्च में वृद्धि आय में वृद्धि से ज्यादा है जब कि दोनों में संतुलन जरूरी है। इसलिए अतिरिक्त बजट का कोई मतलब नहीं बनता जबकि आम आदमी का बजट असंतुलित है। अतिरिक्त बजट के काल में गोखले ने रोज्य के लिए निम्नलिखित कदमों की सिफारिश की:
1. राज्य द्वारा जमीन पर 25 से 30 प्रतिशत माँग की कमी।
2. 10 लाख स्टलिंग के एक फंड की स्थापना जिससे भारतीय कृषकों को कर्ज के दबाव से बचाया जा सके।
3. मिस्र की पद्धति के अनुसार कृषक बैंकों की स्थापना जिससे सहकारी ऋण संघों को चालित किया जा सके।
4. औद्योगिकीकर.ा और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा और इस कार्य के लिए ज्यादा धन आवंटित करना।
5. मुक्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा।
6. स्थानीय निकायों की वित्तीय अवस्था को सुधारना।
उपरोक्त प्रस्तावों से जाहिर होता है कि गोखले का मानना था कि अतिरिक्त बजट का कोई अर्थ नहीं है जब तक आम आदमी का बजट संतुलित न हो। यदि अतिरिक्त बजट हो भी तो इसे राज्य के विकास कार्यों को बढ़ाने में खर्च किया जाना चाहिए।

गोखले को भारत के कृषि जीवन के विषय में भी जानकारी थी। उन्होंने पाया कि भारत का कृषि उद्योग अवनति पर है और प्रति एकड़ उपज काफी कम है। ऐसी स्थिति में उन्होंने साफ कहा है कि भू-राजस्व और अप्रत्यक्ष कर गरीबों पर असहनीय बोझ बन जाते हैं। वे चाहते थे कि राज्य कृषि की समृद्धि के लिए सिंचाई और वैज्ञानिक पद्धति पर ध्यान दे। उन्होंने सूती कपड़ों पर चंगी का विरोध किया क्योंकि उनके विचार से यह आयात पर लगे कर को प्रति संतुलित करने के लिए हैं। गोखले के विचार से ऐसा कर गरीबों पर दबाव को बढ़ाता है।

जर्मनी अर्थशास्त्री प्रो. लिस्ट का अनुसरण करते हुए गोखले ने भारत में नए उद्योगों को संरक्षण देने की बात कही क्योंकि भारत औद्योगिक रूप से पिछड़ा हआ होता है और वहाँ सार्वजनिक प्रतियोगिता शुरू हो जाती है इन देशों के साथ जो भाप और मशीन का इस्तेमाल होता है तो वैसी स्थिति में सबसे पहले स्थानीय उद्योग वहाँ खत्म हो जाते हैं और देश एक बार फिर खेती पर आधारित हो जाता है तब, राज्य की भूमिका आती है। जब ऐसी स्थिति आ जाती है तब राज्य की संरक्षण की न्यायोचित व्यवस्था का विकास करना चाहिए और वैसे उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए जिससे की नवीन तरीकों का इस्तेमाल वह उद्योग कर सके और सारी दुनिया की प्रतियोगिता को झेल सके। मैं जोर देकर कहना चाहंगा कि भारत की सरकार को इस सुझाव सूची का अनुसरण करना चाहिए। संक्षेप में गोखले ने औद्योगिक विकास की हिमायत कीए औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए राज्य की वकालत की, नए उद्योगों के संरक्षण की माँग की और इस तरह उन्होंने पूँजीवाद के विकास के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

गोखले सरकार की अर्थनीति की आलोचना पर ही नहीं रूके बल्कि उन्होंने स्वदेशी मकसद की भी हिमायत की। हालांकि वे स्वदेशी को बहिष्कार से नहीं जोड़ते थे। उनके अनुसार स्वदेशी आंदोलन देशभक्त और आर्थिक आंदोलन दोनों ही था। जहाँ तक देश भक्तों के पहलू का सवाल है, यह मातृभूमि की श्रद्धा से जुड़ा था किन्तु, इस आंदोलन का भौतिक पक्ष आर्थिक था। इसने उन वस्तुओं के उपभोग की गारंटी दी, जो देश में उत्पादित होते थे और देशी वस्तुओं की माँग को बनाए रखने में स्थायी उत्प्रेरक का काम किया। गोखले के अनुसार उत्पादन का सवाल पूँजी, उद्यम और कुशलता का सवाल था। और जो कोई भी इन क्षेत्रों में किसी एक क्षेत्र में मदद पहुंचा, उसे स्वदेशी मकसद के लिए एक कार्यकर्ता कहा जा सकता है। गोखले ने स्वदेशी मकसद में सरकारी सहयोग लेने में झिझक नहीं दिखाई। स्वदेशी आंदोलन के जरिए गोखले ने देशी पूँजीवाद के विकास की नींव डालने की कोशिश की है।

सामाजिक सुधारों के मामले में गोखले ने रानाडे का पक्ष लिया। रानाडे की तरह ही गोखले का भी मानना था कि सामाजिक सुधारों के साथ राजनीतिक सुधार भी होने चाहिए। 1890 की शुरुआत में रानाडे ने कुछ सुधारों की हिमायत की जैसे कि 1) एक साल की आय से ज्यादा खर्च पुत्र या पुत्री के विवाह समारोह में नहीं किया जाना चाहिएए 2) लड़कों की शादी 16) 18 या 20 से पहले तथा लड़कियों की शादी 10) 12 या 14 से पहले नहीं होनी चाहिए, 3) बहुपति प्रथा पर प्रतिबंध लगना चाहिए, 4) 60 के बाद किसी को शादी नहीं करनी चाहिए, 5) महिलाओं की शिक्षा के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। कमोबेश रानाडे का मानना था कि इन सुधारों को धीरे-धीरे लागू करना चाहिए और सामाजिक परिवर्तन के लिए विधायकी प्रक्रिया द्वारा जहाँ कहीं जरूरी हो, राज्य का उपयोग किया जा सकता है। किन्त, रानाडे मोटे तौर पर मानते थे कि ‘‘लोकप्रिय पहलष् सामाजिक परिवर्तन के लिए मददगार होगी न कि थोपे गए कानून। हालांकि यह ध्यान रखने वाली बात है कि तिलक की तरह रानाडे सामाजिक परिवर्तन के लिए राज्य की हस्तक्षेप के पूरी तरह खिलाफ नहीं थे। गोखले न इस मामले में रानाडे का अनुसरण किया। उनका मत था कि राज्य को समाज के प्रगतिशील तत्वों की मदद करनी चाहिए। इस प्रकारण उन्होंने सिविल मैरिज बिल के प्रस्ताव का समर्थन किया। प्रभावशाली प्रबुद्ध अल्पसंख्यक की मदद से गोखले चाहते थे कि राज्य सामाजिक परिवर्तन को आगे बढ़ाए।

गोखले ने जनता के लिए मुक्त और जरूरी प्रारम्भिक शिक्षा का सुझाव दिया। गोखले प्रारंभिक शिक्षा को सिर्फ पढ़ने और लिखने की क्षमता तक ही सीमित नहीं मानते थे। इसका अर्थ थाए व्यक्ति की अधिक नैतिक और आर्थिक सक्षमता और उसी के कारण मक्त व अनिवार्य शिक्षा के लिए उन्होंने कठोर प्रयास किए। उन्होंने शराब पर प्रतिबंध लगाने की बात की जिससे व्यक्तित्व के विकास के मार्ग की बाधाओं और कठिनाइयों को दूर किया जा सके।

गोखले के बताए गए सुधारों में उनके सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रमों में उदारवादी आस्थाओं को आसानी से देखा जा सकता है। उदारवाद व्यक्ति के सम्मान को बहुत महत्व देता है। हालांकि यह सम्मान तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक कि व्यक्ति चेतन और शिक्षित न हो। इसी उद्देश्य से उदारवाद में आस्था रखने वाले गोखले मानव जीवन के इस पहल को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। जैसे व्यक्तित्व का विकास। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के मार्ग में जातिगत बंधन, नस्लवाद, सांप्रदायिक दुर्भाव, अज्ञानता धार्मिक कठमल्लावाद, नारी दमन जैसी बाधाएं हैं और इन्हें तुरंत दूर किया जाना चाहिए। इस प्रकार, गोखले का सामाजिक सुधारवाद उनके उदारवादी दृष्टिकोण की उपज थी। उनके राजनीति के आध्यात्मिकरण के विचार व्यक्ति के नैतिक शुद्धिकरण, तथा ज्ञानोदेश की पूर्व मान्यता थी जो कि उनके सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रम से स्पष्ट झलकता है।
बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: 1) नीचे के रिक्त स्थानों में अपने उत्तर लिखें।
2) इकाई के अंत में दिये उत्तरों से अपने उत्तर मिलायें।
1) गोखले ने स्वदेशी आंदोलन के माध्यम से……………………………………………………………………………………………….
की नींव डालनी चाही।
2) …….. और …….
ने गोखले के विचारों को प्रभावित किया।

बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 3
1) वेशी पूँजीवाद
2) न्यायमूर्ति एम.जी. रानाडे और प्रो. लिस्ट
 सारांश
हमने गोपाल कृष्.ा गोखले के मुख्य राजनीतिकए आर्थिक और सामाजिक विचारों को देर अब हम उनके चिन्तन का सारांश देखेंगे।

गोखले एक नरमपंथी और उदारवादी राजनीतिक विचारक थे। उनके राजनीतिक विचार बेंथम, मिल और रानाडे जैसे उदारवादी विचारकों से मुख्य रूप से प्रभावित थे। जहाँ तव उनकी राजनीतिक मान्यताओं का प्रश्न है, उनका विश्वास था कि
1. भारत की राजनीतिक प्रगति को कानून और, व्यवस्था पर आधारित होना चाहिए,
2. उनका राजनीतिक लक्ष्य था औपनिवेशिक स्वशासन, और
3. उनके लिए इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति का एकमात्र रास्ता संवैधानिक आंदोलन था।

वे एक उदारवादी विचारक थे परन्तु क्लासिकी उदारवादी विचारकों से कुछ मायनों में भिन्न थे, खासतौर से राज्य की भूमिका और लेसेस-फेयर (मुक्त व्यापार) की नीतियों पर विचारों के संबंध में।

गोखले एक प्रबल समाज सुधारक थे। उन्होंने कुछ सामाजिक परिवर्तनों के लिए विधेयकों की वकालत की। सामाजिक पविर्तन के प्रति उनका रुख निश्चित रूप से मानवतावादी और उदार था। एक खास पंथ और विश्वास के रूप में धर्म ने उनके विचार में ज्यादा महत्व नहीं पाया हालांकि उन्होंने राजनीति के आध्यात्मिकरण पर जोर दिया। यह नैतिकता, धर्मनिरपेक्षता पर आधारित थी और यह किसी भी तरह के धार्मिक कट्टरतावाद की ओर इंगित नहीं करती थी। इस तरह इस क्षेत्र में वे महात्मा गांधी के पूर्वगामी थे। तिलक और गांधी की तरह गोखले एक जन नेता नहीं थे इसके विपरीत उनका मत था कि थोड़े से प्रबुद्ध, शिक्षितों को समाज और जनता का सही दिशा में नेतृत्व करना चाहिए। इसी कारण उन्होंने मुख्य सामाजिक, आर्थिक मसलों पर शिक्षित लोगों के सचेत होने पर अधिक जोर दिया बजाय इसके जनता को राजनीतिक रूप से लाभबंद करने के।

संक्षेप में, राजनीति के क्षेत्र में गोखले ने संविधानवाद की नींव डाली। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उन्होंने पंूजीवादी विकास की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने जाति, नस्ल, धर्म, भाषा और वर्ग को भेदभाव किए बगैर व्यक्ति के सम्मान को बढ़ाने का कठिन प्रयास किया। इस प्रकार, हर अर्थ में भारतीय समाज का आधुनिकीकरण करने वाले थे।
6.7 कुछ उपयोगी पुस्तकें
वी.आर. नन्दा-गोखले दिल्लीए 1977
कार्वे डी.जी. एण्ड अम्बेडकर डी.बी., स्पीचेस एण्ड राइटिंग ऑफ गोपाल कृष्ण गोखले खण्ड 2 पॉलिटिकल (बम्बई, एशिया प्लानिंग हाउसए 1986)
कार्वे डी.जी. ए.ड अम्बेडकर डी.बी. स्पीचेस एण्ड राइटिंग ऑफ गोपाल कृष्ण गोखले खण्ड 3, एड्यूकेशनल, (बम्बई, एशिया पब्लिशिंग हाउस) 1967)
पटवर्धन आर.पी. एण्ड अम्बेडकर डी.बी. स्पीचेस एण्ड राइटिंग ऑफ गोपाल कृष्ण गोखले, खण्ड 1-इक्नॉमिक्स, (बम्बई, एशिया पब्लिशिंग हाउसए 1962)