शुतुरमुर्ग पक्षी के बारे में जानकारी कैसा होता है , कितने अंडे देता है Common ostrich in hindi

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Common ostrich in hindi शुतुरमुर्ग पक्षी के बारे में जानकारी कैसा होता है , कितने अंडे देता है फोटो दिखाइये ?
पक्षियों की विविधता
अफ्रीकी शुतुरमुर्ग मुख्य लक्षणों की दृष्टि से पक्षियों की संरचना एक-सी होती है पर वासस्थान और जीवन की स्थितियों की दृष्टि से उसमें बड़ी विविधता होती है।
अफ्रीकी शुतुरमुर्ग (आकृति १२०) वर्तमान पक्षियों में सबसे बड़ा पक्षी है। यह लगभग पौने तीन मीटर लंबा हो सकता है और उसका वजन ७५ किलोग्राम तक। शुतुरमुर्ग अफ्रीका के खुले मैदानों में रहता है। यहां उसके लिए पौधों के बीज , कीट, छिपकलियां इत्यादि भोजन और अन्य सभी जीवनानुकूल स्थितियां उपलब्ध हैं। मरुभूमि का निवासी होने के कारण वह कई दिन बिना पानी के रह सकता है।
शुतुरमुर्ग बिल्कुल उड़ नहीं सकते पर वे दौड़ते हैं बड़ी अच्छी तरह से। वे घोड़े को पीछे छोड़ सकते हैं और अड़चनों को आसानी से लांघ सकते हैं। भोजन और पानी की खोज में वे कभी कभी लंबी दूरियां तेै करते हैं। दौड़ने का उपयोग शत्रु से बचाव करने में भी होता है। शुतुरमुर्गे की टांगें इस प्रकार की गति के लिए भली भांति अनुकूल होती है। उसकी लंबी और मजबूत टांगों में सिर्फ दो अंगुलियां होती हैं। उसके मोटे चमड़ीनुमा तलवे होते हैं। तलवे चोटों या रेत की जलन से अंगुलियों की रक्षा करते हैं। अपने पर की फटकार से शुतुरमुर्ग आदमी को जहीं का तहीं ढेर कर सकता है।
शुतुरमुर्ग के डैने उड़ान-इंद्रिय की दृष्टि से अब कोई महत्त्व नहीं रखते। यह पक्षी डैनों का उपयोग केवल तेज दौड़ने के लिए करता है – झट से मुड़ते समय पतवार की तरह और अनुकूल हवा में पालों की तरह। जैनों में सदंड पर नहीं होते। उनकी जगह लंवे, मुलायम पर होते हैं। पूंछ में भी ऐसे ही पर निकल आते हैं।
शुतुरमुर्ग की टांगों का सुपरिवर्द्धन इस कारण हुआ है कि कई पीढ़ियों से दौड़ते समय उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी है। इसी तरह डैनों का अपरिवर्द्धन मेहनत की कमी का परिणाम है।
डैनों और उन्हें गति देनेवाली पेशियों का अपरिवर्द्धन शुतुरमुर्ग के कंकाल की संरचना की विशेषताओं पर प्रकाश डालता है। छाती की हड्डी में उरःकूट नहीं होता और अंस-मेखला की हड्डियां कम विकसित होती हैं।
जिस प्रकार एक लंबे अर्से के दौरान शुतुरमुर्ग की टांगें लंबी होती गयीं उसी प्रकार उसकी गर्दन भी ज्यादा बाहर निकल आयी। लंबे पैरों के साथ छोटी गर्दन होती तो यह पक्षी जमीन पर से अपना भोजन न उठा पाता। अपनी लंबी गर्दन पर स्थित सिर को उठाकर यह पक्षी वहुत दूर से अपने शत्रु को देख सकता है। शुतुरमुर्ग की नजर बड़ी पैनी होती है।
जनन में मादा शुतुरमुर्ग जमीन के साधारण-से गड्ढे में सख्त कवचवाले बड़े बड़े अंडे (जो मुर्गी के अंडों से २० गुना बड़े होते हैं) देती है। रेत में यह गड्ढा बनाया जाता है और उसे खोदते समय निकाले गये कंकड़ उसके चारों ओर रखे जाते हैं। अंडों पर नर और मादा दोनों बैठते हैं। दिन में मादा की पाली रहती है और रात में नर की। मादा का रंग भूरा-कत्थई होता है और दिन में घोंसले पर बैठी हुई मादा मुश्किल से देखी जा सकती है। नरों के काले पर होते हैं। डैनों और पूंछ में ये सफेद रंग के होते हैं।
शुतुरमुर्ग के सुंदर सफेद परों का उपयोग अलंकार की तरह किया जाता है और इसी लिए उनका शिकार किया जाता है और विशेष फार्मों में संवर्द्धन भी। मांस और अंडों का उपयोग खाने के लिए किया जाता है।
सोवियत संघ के अस्कानिया-नोवा स्थान में अफ्रीकी शुतुरमुर्ग रहते हैं। यह उक्रइन की स्तेपी का एक रक्षित उपवन है।
देहाती अबाबील देहाती अबाबील सारा दिन हवा में मच्छरों, मक्खियों और भोजन के अन्य कीटों का शिकार करते हुए गुजारती है (प्राकृति १२१)। कीटों का पीछा करते हुए अबाबील बुरे मौसम में जमीन के पास से और अच्छी हवा में ऊंचाई पर उड़ती है।
अबाबीलें उड़ते समय पानी की सतह का हल्का-सा स्पर्श करती हुई पानी पी लेती हैं और नहा भी लेती हैं। इनकी उड़ान में असाधारण तेजी और फुर्ती रहती हैं। ये अपने पंख फड़फड़ाती हुई आगे की ओर झपटती हैं, उन्हें खोलकर हवा में गतिहीनसी लटकती रहती हैं, फिर ऊपर की ओर उड़ान भरती हैं या नीचे की ओर गोता लगाती हैं। वे बड़ी तेजी से घूम पड़ती और चक्कर लगाती हैं।
अवाबील की उत्कृष्ट उड़ान-क्षमता उसकी संरचना पर आधारित है। उसकी छाती की पेशियां बहुत ही विकसित होती हैं। संकरे पंख इतने लंबे होते हैं कि समेटे रहने की अवस्था में वे शरीर के बहुत पीछे फैले रहते हैं। लंबी कांटेदार पूंछ उड़ान के समय बढ़िया पतवार का काम देती है।
दूसरी ओर आबबील की टांगें बहुत ही छोटी और कमजोर होती हैं। अंगुलियों पर तेज नखर होते हैं जिनके सहारे वह अपने घोंसले में चिपकी रह सकती है।
उसके बड़े और खूब खुलनेवाले मुंह में छोटी-सी चोंच होती है। इसकी रचना उड़ान के समय कीटों को पकड़ लेने के लिए भली भांति अनुकूल होती है।
अवावील घोंसले में अंडे देती है और उनको सेती है। वह अपना घोंसला किसी इमारत की दीवार या शहतीर के सहारे , छत के नीचे एसी जगह में बना लेती है जो बुरे मौसम और शिकारभक्षी प्राणियों से सुरक्षित हो। यह पक्षी गीली मिट्टी या कीचड़ के टुकड़ों को अपनी लार के सहारे जोड़ जोड़कर बड़ी चतुराई से घोंसला बनाता है। यह अर्द्धगोलाकार कटोरी के आकार का होता है।
शरद के प्रारंभ में ही, जब कीटों की संख्या कम हो जाती है, अबाबीलें उत्तरी प्रदेशों से उड़कर अफ्रीका या दक्षिणी एशिया के गरम देशों को चली जाती हैं। अगले साल वे लौट आती हैं। ये गरम वसंत की प्रसन्न संदेशवाहिकाएं हैं।
अबाबीलें कीटों को खाकर बड़ा उपकार करती हैं । अबाबीलों का एक एक परिवार गरमियों में लगभग दस लाख हानिकर कीटों का सफाया कर डालता है।
जंगली बत्तख जंगली बत्तखें किनारों पर घनी झाड़ी-झुरमुटों वाली झीलों में या छोटी नदियों के शांत, एकांत हिस्सों में रहती हैं (आकृति १२२)। यहां जंगली बत्तख के लिए भोजन , घोंसले बनाने के लिए सुविधापूर्ण स्थान और जीवन के लिए आवश्यक अन्य स्थितियां उपलब्ध होती हैं।
जंगली बत्तख के शरीर की रचना जलगत जीवन के अनुकूल होतो है। आकार उसका सपाट पेंदीवाली नाव जैसा होता है। छोटे पैरों में तीन अगली अंगुलियों के बीच तैराकी जाल होते हैं। जब यह पक्षी तैरता है तो पैरों की पीछे की ओर की गति के साथ ये जाल फैलकर डांड़ों का सा काम देते हैं। पैर बहुत ही पीछे की ओर होते हैं ताकि वे पतवार का काम कर सकें।
शरीर के पिछले सिरे पर एक मेद-ग्रंथि होती है जिससे मेद रसता है। बत्तख अपनी चोंच से यह तेल सारे परों पर पोत देती है जिससे वे जलरक्षित बन जाते हैं।
बाहरी सदंड परों के नीचे कोमल रोओं की एक मोटी परत होती है जो शरीर को ठंडे पड़ जाने से बचाती है। यही काम सुविकसित त्वचांतर्गत चरबी की परत भी देती है। परों की मोटी परतों, शरीर में चरबी की समृद्ध मात्रा और . सुविकसित हवाई थैलियों के कारण जंगली बत्तख का आपेक्षिक भार घट जाता है और तरण-क्षमता बढ़ती है।
जंगली बत्तख पानी में अपनी चोंच के सहारे अपना भोजन पकड़ती है। उसके भोजन में पौधे और विभिन्न छोटे छोटे प्राणी (मोलस्क , कीट-डिंभ , छोटे छोटे क्रस्टेशिया, बेंगचियां , इत्यादि) शामिल हैं। चैड़ी और चपटी चोंच के किनारों पर छोटे छोटे शृंगीय दांत होते हैं। भोजन के साथ चोंच-भर पानी लेकर बत्तख उसे अपने दांतों के बीच से निचोड़ लेती है।
चोंच के किनारे और उसका नुकीला सिरा सख्त होते हैं, जबकि ऊपर का हिस्सा नरम। ऊपर के हिस्से में संवेदन तंत्रिकाओं के अनगिनत सिरे होते हैं। इस कारण चोंच एक स्पशेंद्रिय का भी काम देती है। इसकी सहायता से यह पक्षी पानी और छाड़न में अपना भोजन ढूंढ सकता है।
जंगली बत्तखें कमाल की तैराक होती हैं पर जमीन पर उनकी चाल बड़ी .. अटपटी होती है। उनके पैरों के बीच काफी अंतर होता है और यही उनकी डगमग चाल का कारण है।
जाड़ों के लिए जंगली बत्तखें उत्तरी देशों से उड़कर ऐसे इलाकों की ओर ऋऋचली जाती हैं जहां के जलाशयों का पानी जम न जाता हो। फिर वसंत में वे घर लौट आती हैं। न जमनेवाली नदियों के पास वे कभी कभी पूरे जाड़े बिता सकती हैं।
नर जंगली बत्तख का रंग मादा से उजला होता है। उसका सिर मखमली हरे रंग का होता है और पंखों में सफेद चैखटों वाली नीली ‘खिड़कियां‘ होती हैं। मादा वत्तखें हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह रंग उनके लिए सुरक्षा साधन का काम देता है और घोंसलों में रहते हुए वे मुटिकल से पहचानी जाती हैं।
घोंसला आम तौर पर पानी के नजदीक झुरमुटों में जमीन पर ही बनाया जाता है। अंडों से निकले हुए बच्चे फौरन अपनी मां के पीछे पीछे चलने , तैरने और स्वतंत्र रूप से अपना भोजन पकड़ने लगते हैं।

 पक्षियों का मूल
पक्षियों और उरगों के बीच की समानताएं पक्षी का शरीर उरग के शरीर की तुलना में अधिक जटिल होता है। मस्तिष्क , श्वसनेंद्रियां और रक्त-परिवहन इंद्रियां अधिक विकसित, उपापचय अधिक शक्तिशाली और शरीर का तापमान स्थायी होता है। दूसरी ओर पक्षियों में कुछ लक्षण ऐसे हैं जो उरगों में पाये जाते हैं।
उरगों की तरह पक्षियों की त्वचा सूखी और ग्रंथियों से लगभग खाली रहती है। पक्षियों में कई शृंगीय रचनाएं भी होती हैं, जैसे टांगों पर के शल्क, चोंच का आवरण और पर। जनन-क्रिया में पक्षी योक से समृद्ध बड़े अंडे देते हैं। पक्षियों और उरगों के गर्भस्थ शिशु एक दूसरे के समान दिखाई देते हैं। इन समान लक्षणों से पक्षियों और उरगों का रिश्ता सूचित होता है। लुप्त प्राचीन पक्षियों के संबंध में सूचना प्राप्त करने पर तो यह रिश्ता और भी स्पष्ट हो जाता है।
फौसिल प्रारकिलोप्टेरिक्स पृथ्वी के कवच के मेसोजोइक युग से संबंधित स्तरों में फौसिल वैज्ञानिकों को कबूतर के आकार के एक असाधारण पक्षी के कंकाल की छापें मिली हैं। इस पक्षी के लक्षण किसी भी आधुनिक पक्षी की अपेक्षा उरगों से ही अधिक मिलतेजुलते थे (आकृति ११६) । इस प्राणी को प्रारकियोप्टेरिक्स का नाम दिया गया था।
आरकियोप्टेरिक्स का शरीर परों से ढंका रहता था। अग्रांग डैनों की शकल के हुआ करते थे। टांग के कंकाल में एक लंबी नरहर और चार अंगुलियां शामिल थीं जिनमें से तीन का रुख आगे की ओर और एक का पीछे की ओर था। ये सभी लक्षण पक्षियों में पाये जाते हैं। दूसरी ओर यह प्राणी उरगों से भी मिलना-जुन्दता था। उसके डैनों में तीन पूर्ण विकसित अंगुलियां हुआ करती थीं जिनके सिरों पर नखर होते थे। स्पष्टतः आरकियोप्टेरिक्स पेड़ की टहनियों को पकड़ते समय इनका उपयोग करता था। पूंछ इसकी लंबी होती थी और उसपर अनेकानेक कोरुक होते थे। पुच्छ-पर पंखे की तरह नहीं बल्कि दोनों ओर व्यवस्थित रहते थे। खोपड़ी का आकार पक्षियों की खोपड़ी जैसा ही था पर जबड़ों में उरगों के से नन्हे नन्हे दांत होते थे।
प्रारकिोप्टेरिक्स उड़ सकता था , पर अच्छी तरह नहीं। वह एक शाखा से दूसरी शाखा तक खिसक-भर सकता था। ऐसा मान लेने का कारण भी है – उसकी छाती की हड्डी बहुत ही छोटी होती थी और उसके उररूकूट नहीं होता था। इसका अर्थ यह है कि डैनों को गति देनेवाली पेशियां उतनी विकसित नहीं थीं। प्रारकिलोप्टेरिक्स की हड्डियां मोटी होती थीं और उनमें हवा नहीं भरी रहती थी।
प्रारकिोप्टेरिक्स की खोज से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि पक्षियों का विकास प्राचीन उरगों से हुआ है।
यह कैसे हुआ इसका एक चित्र प्रस्तुत किया जा सकता है। कुछ प्राचीन उरग केवल अपने पिछले पैरों के बल ही दौड़ सकते थे। कुछ पेड़ों पर चढ़ सकते थे। इस कारण पिछले पैरों की अंगुलियां लंबी हो गयीं ताकि टहनियों को पकड़ रख सकें। एक अंगुली का रुख वाकी अंगुलियों के विरुद्ध हो गया। इन उरगों को एक से दूसरी शाखा तक फुदकना पड़ता था। फुदकते समय वे अपने अग्रांगों को तान लेते थे। ये अंग दूसरी शाखा पर गिरते समय उन्हें पैराशूट का सा काम देते थे। अंगों पर के लंबे शल्कों के कारण कूद की अवधि बढ़ायी जा सकती थी। बाद में ये शल्क परों की तरह विकसित हुए और अग्रांग डैनों में परिवर्तित हुए।
डैनों की उत्पत्ति और फुदकन से उड़ान में संक्रमण के साथ साथ कुछ और भी परिवर्तन हुए। डैनों की अंगुलियां छोटी हो गयीं , उड़ान की पेशियां ज्यादा मजबूत हुईं , उरोस्थि का आकार बढ़ गया और वक्षास्थि पर उरःकूट कहलानेवाली हड्डी विकसित हुई। इसके अलावा दांतों का लोप हो गया और शरीर के अंदर वायवाशय पैदा हुए।
प्रश्न – १. पक्षियों के कौनसे संरचनात्मक लक्षण उनके और उरगों के बीच समानता दिखाते हैं ? २. कौनसे लक्षणों के कारण हम आरकियोप्टेरिक्स को पक्षियों की श्रेणी में रखते हैं ? ३. आरकियोप्टेरिक्स और उरगों के बीच क्या समानता है ? ४. उरगों से पक्षियों का विकास कैसे हुआ ?