उपनिवेशवाद क्या है ? नव उपनिवेशवाद क्या है colonialism and neocolonialism difference विशेषता

By   September 29, 2020

colonialism and neocolonialism in hindi difference उपनिवेशवाद क्या है ? नव उपनिवेशवाद क्या है विशेषता की परिभाषा किसे कहते है ? समाप्ति , भारत में उपनिवेशवाद के विभिन्न चरणों की विवेचना कीजिए तथा उपनिवेशवाद को परिभाषित कीजिए तथा इसके भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव की परिचर्चा कीजिए ?

उपनिवेशवाद क्या है?
पूँजीवाद के विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसका लगातार विस्तार होता है। यही कारण है कि सामंतवाद के खात्में तथा पूँजीवाद में उसके संक्रमण के बाद भी नयी राज्यसत्ता राजस्व के नये स्रोतों की तलाश करती रही है। राजस्व और लाभ की यही चाहत उन्हें दूसरे समाजों के धन पर कब्जा करने के लिए उकसाती रही। यह अकारण नहीं था कि यूरोपीय राज्यों ने अज्ञात क्षेत्रों की खोज प्रायोजित और प्रोत्साहित किया। उदाहरण के लिए मार्को पोलो और क्रिस्टोफर कोलंबस ने भारत प्रशांत द्वीप, अमरीका की खोज की। इस तरह यूरोपियों को हिंद महासागर तथा चीनी महासागर के रास्तों का पता चला। वहीं, जेम्स की समुद्री यात्रा से न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया का पता चला। दुनिया के समुद्री रास्तों की खोज से वस्तुओं के लेन देन का पैमाना काफी व्यापक हो गया। नतीजतन, इन नए क्षेत्रों की विपुल संपदा जैसे बहुमूल्य धातुएँ, मसाले, रेशम आदि यूरोप के बाजारों में पहुँचने लगी। संपत्ति के इस बहाव के कई नतीजे निकले, यूरोप अब काफी ऐशो-आराम की जिंदगी बसर कर सकता था। पूँजीवाद के विकास को बाहर से सहायता मिली तथा एशिया, अफ्रीका व अमरीका के पूर्व पूँजीवादी अथवा खेतिहर समाजों की लूट, जीत और उन्हें उप-निवेश बनाने की होड़ शुरू हुई। उपनिवेशों की खोज तथा उन पर कब्जा और नियंत्रण जमाने की जितनी जरूरत निजी उद्यमियों, कंपनियों को थी उतनी ही राज्य को भी थी। इस तरह हम कह सकते हैं कि 16वीं सदी के नाविकों और व्यापारियों की अगुआई में यूरोपीय राज्यों के विस्तार का साक्षी बना। इस क्षेत्र में कुछ ऐसे उद्यमी भी शामिल थे जो पूर्व के देशों की वस्तुओं को लूट कर उन्हें यूरोपीय बाजारों में बेचते थे। बहुत से व्यापारियों ने सुरक्षा की दृष्टि से निजी सैन्य टुकड़ियों का गठन भी किया था। उदाहरण के लिए, पुर्तगाली व्यापारी निरापद समुद्र यात्रा की गारंटी देकर सुरक्षा सेवा मुहैया करा रहे थे। इन सबका अंतिम परिणाम अनेक क्षेत्रों में । औपनिवेशिक सत्ता की स्थापना के रूप में सामने आया। लैटिन अमेरिका कैरिबियाई द्वीपों, अफ्रीकी राज्यों से होता हुआ उपनिवेशवाद एशिया में पहुंचा।

उपनिवेशवाद नए पूँजीवाद की महत्वपूर्ण विशेषता है। यह पूँजीवाद काफी तेजी से विकसित हुआ। औपनिवेशिक शोषण से हासिल संपत्ति सामंती साम्राज्यवादी लाभों से अलग थी। दूसरे, यह जीवनशैली जहाँ कुछ के लिए कुछ बर्बादी थी तो अनेक के लिए अनुत्पादक। वहीं पहली स्थिति में उत्पादन संबंधों को बढ़ावा देकर बहुसंख्यक के आनंद के लिए ज्यादा धन पैदा किया गया। उपनिवेशवाद औपनिवेशिक सत्ता और उपनिवेशों के बीच विशेष रिश्तों का सूचक था जबकि सामंती साम्राज्यवादी जीतें (उदाहरण के लिए मुगल, ऑटोमैन आदि) केवल अतिक्रमण थी। वे विजेताओं के लिए कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं कर पायी। दरअसल उपनिवेशवाद उपनिवेशों के साथ राजनीतिक व आर्थिक दोनों तरह के संबंध विकसित करने पर जोर देता है। उपनिवेश बना दिये गए देश तथा औपनिवेशिक विजेता देश विकास के अलग अलग चरणों में थे। उदाहरण के लिए, जब स्पेन और पुर्तगाल लैटिन अमरीका को उपनिवेश बना रहे थे तो वे खुद सामंती समाज थे।

लेकिन जब ब्रिटेन, फ्रांस एवं जर्मनी अफ्रीका को उपनिवेश बना रहे थे (उन्नीसवी सदी के अंत में) तब वे औद्योगिक पूंजीवादी देश थे।

आधुनिक काल के आते-आते सभी साम्राज्य चीन और जापान को छोड़कर, यूरोपीय औपनिवेशिक सत्ता के नियंत्रण में आ गये थे। प्रश्न उठता है कि यूरोपीय देशों ने अफ्रीका और एशिया पर अपना आधिपत्य कैसे कायम किया। बहुत हद तक यह उनकी बेहतर तकनीक, बेहतर मारक क्षमता तथा उनके उच्चस्तरीय अनुशासन का नतीजा था जिनकी बदौलत वे दूसरे दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों से लोहा ले सके। इन औपनिवेशिक साम्राज्यों के लिए 1880 से लेकर 1940 तक की अवधि स्वर्णकाल रही थी। किन्तु यह भी सच है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत के साथ ही उपनिवेशों के अंत की कहानी भी शुरू हो जाती है। औपनिवेशीकरण की शुरूआत यों तो पूरब की विलासितापूर्ण सामानों के व्यापार से होती है किन्तु बाद में औद्योगिक उत्पादों के लिए बाजार खोजने की होड, प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम के दोहन ने औपनिवेशिक विस्तार को अमली जामा पहनाया। प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत यदि जर्मनी के उपनिवेशों को मित्र राष्ट्रों के बीच मैडेट के रूप में वितरित कर दिया गया तो द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत इटली के उपनिवेशों को ब्रिटेन के पास ट्रस्ट क्षेत्र के रूप में गिरवी रख दिया गया। इसी तरह प्रशांत क्षेत्र के द्वीपों, जिन पर जापान का कब्जा था, पर अमरीकी आधिपत्य स्थापित कर दिया गया। केवल नामीबिया ही गोरे शासन के अंतर्गत बना रहा। अंततः 21 मार्च, 1990 को नामीबिया भी आजाद हो गया अन्यथा, पुर्तगाल को एक तरह से इस औपनिवेशिक होड़ का प्रथम और अंतिम यूरोपीय राज्य होने का गौरव प्राप्त है।

 नव-उपनिवेशवाद
द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत विश्व की संरचना और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति में आमूलचूल परिवर्तन आया। युद्ध में यूरोपीय अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गयी जिससे उपनिवेशवाद की बुनियाद हिल गई। फ्रांसीसी, अंग्रेजी, पुर्तगाली और स्पैनिश उपनिवेशों का टूटना शुरू हो गया और यह साफ हो गया कि अब उनके दिन लद चुके । कभी महान ताकत रहे इन देशों की चूलें हिल गयी। अब इनका पुराना दबदबा भी. नहीं रहा। उनकी जगह तुरंत ही संयुक्त राज्य अमरीका काबिज हो गया क्योंकि 1945 के बाद वह एक दबंग अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के रूप में स्थापित हो गया था।

साम्राज्यवाद अब दूसरे रूप में प्रकट होने लगा। युद्ध से पहले अमरीकी पूँजीवाद केन्द्रीय अमरीका, कैरिबियाई क्षेत्रों, फिलीपीन्स और प्रशांत द्वीपों पर अपना साम्राज्यवादी दबदबा कायम करने में दिलचस्पी रखता था किन्तु युद्धोपरांत जब एशिया एवं अफ्रीका में पुराने उपनिवेशों में स्वतंत्र किन्तु आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों का उदय हुआ, तब अमरीका की आर्थिक सैन्य और राजनीतिक गतिविधियां इन क्षेत्रों में भी पसरने लगी।

इसके लिए अमरीकी विदेश नीति ने अपने मित्र राष्ट्रों को आर्थिक सहायता तथा राजनीतिक और सैन्य समर्थन देना शुरू किया। अमरीका के ये नये मित्र राष्ट्र अक्सर तानाशाही को प्रश्रय देने वाले तथा जन आंदोलनों के विरोधी थे। संयुक्त राज्य अमरीका इन राष्ट्रों की मदद दिल खोलकर करने लगा जो वामपंथी अथवा कम्युनिस्ट समर्थक आंदोलनों को कुचल रहे थे या विरोध कर रहे थे। अमरीकी आर्थिक सहायता तथा विश्व बैंक पर अमरीकी दबदबे का मकसद यही था कि ये राष्ट्र अमरीकी विदेश नीति का आंख मंद कर अनपालन करें। विश्व बैंक की नीतियों ने निजी उद्यम व बढ़ावा दिया तथा राष्ट्रीयकरण आदि का विरोध किया। अमरीका अपनी उन नीतियों की वजह से नये उपनिवेशवाद का अगुवा बन बैठा। यह एक उपनिवेशवाद था जिसमें न उपनिवेश थे, न कोई नियंत्रण। इसे ही बाद में नव-उपनिवेशवाद का नाम दिया गया।

नवउपनिवेशवाद आर्थिक उपनिवेशवाद के नाम से भी जाना जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आर्थिक रूप से ताकतवर राज्य आर्थिक सहायता तथा व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों के बूते अल्पविकसित राज्यों पर अपने नियंत्रण कायम कर सकते हैं।

शीतयुद्ध की समाप्ति के उपरांत नव-उपनिवेशवाद एक नया और खतरनाक आयाम ले चुका है। शीतयुद्ध से पहले, दोनों महाशक्तियों के बीच एक तरह की स्पर्धा थी जो आर्थिक और सैन्य सहायता नवसाम्राज्यवाद के चंगुल में फंसे देशों को मुहैया करा रहे थे, उसका निर्धारण भी इसी स्पर्धा के जरिये होता था। 20वीं सदी के अंतिम दशक में दो महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी। शीतयुद्ध समाप्त हुआ तथा सोवियत रूस का विखंडन हुआ। नतीजतन, संयुक्त राज्य अमरीका को अपना दबदबा कायम करने का मौका मिला। दूसरे, अनेक देशों, जिनमें भारत और चीन भी शामिल हैं, ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है तथा पूर्वी यूरोप के देशों में भी बाजार अर्थव्यवस्था को अंगीकार कर लिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस स्थिति में पश्चिम के विकसित और पूँजीवादी देश नव-उपनिवेशवाद की नीतियों को साहस के साथ अंजाम देने में लगे हुए हैं। वे । आर्थिक और सैन्य सहायता तो दे रहे हैं, साथ ही अपने बहुराष्ट्रीय निगमों को खुली छूट देकर वे तीसरी दुनिया के विकासशील देशों पर अपना आधिपत्य भी कायम करना चाहते हैं।

आर्थिक उदारीकरण की वजह से अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण धीमा हुआ है। योजना की रूसी अवधारणा धूमिल हुई है तथा बाजार आर्थिक विकास को संचालित एवं नियंत्रित करने लगा है। तीसरी दुनिया के देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का निर्बाध आगम न हुआ है। भारत में कार्यरत विदेशी बैंक बेहतर सेवा प्रदान कर समृद्ध तबके के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। ‘‘नतीजतन घरेलू बैकिंग संस्थाएँ बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पैसे के जोर पर ऐसे-ऐसे विज्ञापन देती हैं कि एक आम आदमी भी उनके उत्पादों को खरीदने के लिए मचल उठता है। जैसे-जैसे अधिक से अधिक लोग आकर्षित होते जा रहे हैं, वैसे वैसे स्वेदशी कपनियां सिमटती जा रही है। घरेलू कंपनियों की तालांबदी से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी शिंकजा कसने का खतरा बढ़ गया है।

तीसरी दुनिया के जो देश विश्व बैंक तथा अमरीका, जर्मनी और जापान जैसे देशों से कर्ज लेते हैं, उन्हें ऋणदाताओं की शर्तों को भी स्वीकार करने की प्रवृत्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे विकासशील देश ऋणजाल में फंसते जाते हैं और इस तरह से नवसाम्राज्यवाद अथवा नवउपनिवेशवाद के शिकार हो जाते हैं।

अधिकांश देशों में राज्य नियंत्रित विकास की प्रक्रिया विफल साबित हुई। रूस के समाजवाद के ढहने के बाद, लोग पश्चिम उत्पादों और जीवन शैली के पीछे पागल हो रहे हैं। नतीजतन, मुद्रास्फीति में भंयकर बढ़ोतरी हो रही है। अगर पूर्व सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों को बाजार अर्थव्यवस्था को अंगीकार करने के लिए बाध्य किया गया तो दक्षिण के विकासशील देश आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया से नहीं बच सकते। सच्चाई यही है कि उदारीकरण के पश्चिमी देशों के वर्चस्व को बढ़ावा दिया है और आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों मुख्य चिंता का कारण बनी हुई हैं। यह इसलिए कि विकासशील देशों को उनके दबाव में आकर अपने निर्णय लेने के संप्रभु अधिकार के साथ ही समझौता करना पड़ता है। विश्व बैंक और विदेशी बैंकों से लिए गए कर्ज पर हर साल जो भावी ब्याज देना पड़ता है उससे स्थिति और खराब हुई है। यानी अब साम्राज्यवाद का विकास बदस्तूर जारी है, भले ही हमारा नेतृत्व स्वतंत्रता और संप्रभुता का राग अलापता रहे। हम अपनी बात की समाप्ति नवसाम्राज्यवाद की उस शास्त्रीय परिभाषा से कर सकते हैं जो उसके कट्टर विरोधियों के सरगानाओं में एक क्वेम क्रुमैक ने दी हैं वे घाना के प्रथम राष्ट्रपति भी थे। उन्हीं के शब्दों में:

‘‘नव-साम्राज्यवाद का मूल तथ्य है कि इसका अधीनस्थ राज्य सिद्धांत में तो स्वतंत्र और अंतर्राष्ट्रीय संप्रभुता के समस्त बाहरी आवरणों एवं साधनों से युक्त होता है। किन्तु वास्तविकता में उसकी अर्थव्यवस्था और उसकी राजनीतिक नीति भी कहीं बाहर से नियंत्रित होती है। इसका तरीका व स्वरूप अलग-अलग रूपों से प्रकट हो सकता है। उदाहरण के लिए एक चरम स्थिति में नव-साम्राज्यवाद देश की सैन्य टुकड़ियों और नव औपनिवेशिक राज्य की सैनिक छावनियों पर अपना अधिकार कायम कर सकता है और उसकी सरकार को नियंत्रित कर सकता है। तथापि नव साम्राज्यवादी नियंत्रण अक्सर आर्थिक एवं मौद्रिक तरीकों से कायम होता है। नव औपनिवेशिक देशों को साम्राज्यवादी देश को बने उत्पादक खरीदने के लिए मजबूर किया जा सकता है। ऐसा देश बाजार की स्पर्धा का लाभ नहीं उठा सकता। नव औपनिवेशिक देशों की सरकारी नीति पर नियंत्रण स्थापित करने के अलग-अलग हथकंडे हैं, कभी राज्य संचालन के लिए जरूरी धन उपलब्ध कराकर, कभी महत्वपूर्ण पद पर अपने प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त करवाकर, तो कभी साम्राज्यवादी ताकत द्वारा नियंत्रित बैंकिंग प्रणाली को जबरन उन पर लादकर विदेशी मुद्रा भंडार पर नियंत्रण कायम करके।‘‘ (नवसाम्राज्यवाद: साम्राज्यवाद की अंतिम अवस्था, 1965)

टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर को मिलाइए।
(1) साम्राज्यवाद के विकास पर प्रकाश डालिए।
2) उपनिवेशवाद की प्रक्रिया में पूँजीवाद की क्या भूमिका थी ?
3) नवसाम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं ?

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1. इंगलैंड में हुई औद्योगिक क्रांति, जिसमें शहरों और अंतसीमतीय संघर्षों का विकास हुआ, के साथ ही सामंतवाद का पतन शुरू भी हुआ। सामंतवाद को हटाकर जो पूँजीवाद स्थापित हुआ, उसने कच्चे माल बाजार की तलाश में अपने डैनों को यूरोप से बाहर भी फैलाया। जैसे जैसे उपनिवेशवादी राजनीतिक सत्ता हासिल करते गये, वैसे-वैसे साम्राज्यवाद का भी विकास होता रहा।

2. उपनिवेशवाद सीधे रूप से पूंजीवाद का प्रतिफल था। औपनिवेशिक शोषण से प्राप्त धन पूंजी बनता रहा। नतीजतन, उपनिवेशवादी देशों का उपनिवेशों में राजनीतिक व आर्थिक नियंत्रण कायम हो गया। पूंजीवाद का उपनिवेशवाद से सीधा संबंध था।

3. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवाद का जो नया रूप प्रकट हुआ उसे नव साम्राज्यवाद का नाम दिया गया। अफ्रीका व एशिया के नव स्वतंत्र देशों का आर्थिक शोषण करके उन पर राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करने का नाम ही नव उपनिवेशवाद है।