वर्ग चेतना क्या है | वर्ग चेतना की परिभाषा किसे कहते है अर्थ या मतलब हिंदी में स्पष्ट कीजिए class consciousness in hindi

By   December 1, 2020

class consciousness in hindi meaning वर्ग चेतना क्या है | वर्ग चेतना की परिभाषा किसे कहते है अर्थ या मतलब हिंदी में स्पष्ट कीजिए ?

वर्ग-चेतना : एक वर्ग में यह चेतना कि सामाजिक क्रम-परंपरा में उसकी विशिष्ट जगह है।

सामाजिक स्तरीकरण और वेबर
जैसा कि हमने शुरू में जिक्र किया है, मैक्स वेबर को समाजशास्त्र के संस्थापकों के रूप में जाना जाता है। वे समाज के मार्क्सवादी सिद्धांत के सबसे शक्तिशाली विकल्प के जनक माने जाते हैं। इकाई के इस भाग में हम वर्ग और सामाजिक स्तरीकरण के अन्य स्वरूपों पर उनके विचारों पर चर्चा करेंगे। मार्क्स की तरह वेबर का भी मानना था कि वर्ग ही समाज में स्तरीकरण का बुनियादी रूप है। उन्होंने वर्ग की व्याख्या मार्क्सवादी कसौटी मुख्यतः संपत्ति के स्वामित्व के रूप में की। उनके अनुसार इस की बुनियादी श्रेणियां हैं। उन्होंने संपत्ति-स्वामित्व और उत्पादों व सेवाओं की स्वामित्वहीनता के जितने प्रकार होते हैं, उनमें भेद दर्शाया। जो लोग संपत्ति के स्वामी होते हैं वे उत्पादन या वस्तुएं देते हैं, लेकिन जिन लोगों के पास कोई संपत्ति नहीं होती वे सिर्फ अपनी श्रम शक्ति या प्रवीणता ही पेश कर सकते हैं। इस प्रकार कारखाने का मालिक अपने कारखाने में बनने वाले माल की पेशकश कर सकता है मगर दूसरी ओर उसके मजदूर पारिश्रमिक के बदले में सिर्फ अपनी श्रमशक्ति ही दे सकते हैं।
भवन निर्माण में कार्यरत मजदूर
साभार: ए. यादव
5.3.1 वर्ग और जीवन-अवसर
वेबर ने वर्ग के एक अन्य पहलू को महत्व दिया है। वह है जीवन-अवसर। इस शब्द का अर्थ उन अवसरों से है जो किसी व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) को अपने जीवन के विभिन्न चरणों में मिलते हैं। एक श्रमिक के परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति को एक खास किस्म की शिक्षा मिलती है, जो उसे विशिष्ट कार्यों के लिए सक्षम बनाती है। यह शिक्षा उतनी महंगी या गहरी नहीं होगी जो उच्च वर्गीय परिवार में जन्में बच्चे को मिलती है। इसलिए रोजगार के अवसर दोनों के लिए एक दूसरे से अलग-अलग होंगे। उनकी भिन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि भी उन्हें भिन्न वर्गों का हिस्सा बनाती है। ठीक यही पैटर्न हमें उनके सामाजिक व्यवहार और विवाह में मिलता है। श्रमिक वर्ग की पृष्ठिभूमि का व्यक्ति अधिकतर अपने वर्ग के अन्य सदस्यों से ही परस्पर व्यवहार करता है, जबकि उच्च मध्यम वर्ग की पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति के परिचित, मित्र अपने वर्ग के ही लोग होंगे। इस प्रकार वेबर के अनुसार जीवन-अवसर वर्ग-निर्माण का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं।

बॉक्स 5.02
जीवन-अवसरों का विवेचन करते समय वेबर ने व्यक्ति के बजाए समूह या समुदाय पर बल दिया था। उनका कहना था कि वर्ग का निर्धारण करते समय हमें समूह के जीवन-अवसरों को देखना होगा न कि समूह के भीतर अलग-अलग व्यक्तियों के जीवन अवसरों को देखना होगा। एक समूह के रूप में वर्ग का यह अति महत्वपूर्ण पहलू है। यह संभव है कि एक व्यक्ति के जीवन-अवसर दूसरों से बिल्कल भिन्न हों। उदाहरण के लिए किसी कामगार का बच्चा अपने वर्ग के अवरोधों को पार कर सकता है। उसे बेहतर शिक्षा और ऐसा रोजगार मिल सकता है जो उसके संगी-साथियों को प्राप्त अवसरों से भिन्न हो।

एक उद्योगपति का बेटा अपनी योग्यता या अन्य स्थितियों के चलते श्रमिक बन सकता है। मगर ऐसा अपवाद स्वरूप ही होता है। उनके विचार में महत्वपूर्ण बात यह है कि एक ही वर्ग के सदस्यों के लिए जीवन-अवसर समान होते हैं। यही उस वर्ग को स्थायित्व प्रदान करता है क्योंकि आगे की पीढ़ी के अनुसार जीवन-अवसरों की परिभाषा उपलब्ध आर्थिक और सांस्कृतिक वस्तुओं को आपस में बांट ना है जो भिन्न समूहों को भिन्न-भिन्न तरीके से सुलभ हैं।

किसी व्यक्ति के सुलभ होने वाले जीवन-अवसर मोटे तौर पर बाजार-स्थिति से तय होते हैं। एक श्रमिक का बेटा श्रमिक ही बनता है क्योंकि उसकी पृष्ठभूमि के अनुसार यही उसके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है। संपत्तिहीन लोगों के लिए बाजार-स्थिति और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उन्हें मुख्यतः सेवाओं के उत्पादन पर ही निर्भर रहना पड़ता है जिसका कारण यह है कि उनके पास सिर्फ अपनी प्रवीणता होती है, अपने अस्तित्व के लिए उनके पास अपनी प्रवीणता को बेचने के अलावा कुछ भी नहीं होता। मगर वहीं संपत्ति के स्वामी अपनी उत्पादक संपत्ति से होने वाली आमदनी पर आश्रित रह सकते हैं।

इस प्रकार वेबर के अनुसार वर्ग के दो बुनियादी पहलू हैं। पहला यह एक वस्तुगत श्रेणी है। उत्पादक संपत्ति पर सदस्यों के अधिकार एक विशेष वर्ग के सभी सदस्यों को समान जीवन-अवसरों से अलग करते हैं। व्यक्तियों के जीवन अवसर उन लोगों के लिए बाजार-स्थिति पर निर्भर करते हैं जो उत्पादक संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। जिन लोगों के पास ऐसी संपत्ति है उनके जीवन-अवसर उत्पादकता के स्वामित्व से तय होते हैं।

अपनी इस परिभाषा के आधार पर वेबर ने पूंजीवादी समाज को चार वर्गों में बांटा है। ये इस प्रकार हैंः (प) उच्च वर्ग, जिसमें वे लोग आते हैं, जिनके स्वामित्व या अधिकार में उत्पादक संपत्ति है। यह वर्ग मार्क्स के बुर्जुवा (पूंजीवादी वर्ग) के समान है। (पप) सफेदपोश श्रमिक (व्हाइट कॉलर वर्कर्स)ः इस वर्ग में मानसिक श्रम करने वाले लोग शामिल हैं-प्रबंधक, प्रशासक, पेशेवर (प्रोफेशनल) इत्यादि लोग। (पपप) टटपुंजिया या छोटा बुर्जुवाः इस वर्ग में स्वरोजगार में लगे लोग आते हैं जैसे दुकानदार छोटे व्यापारी, डॉक्टर, वकील इत्यादि । (पअ) शारीरिक श्रमिकों का वर्ग-ये लोग दिहाड़ी या वेतन के बदले में अपना शारीरिक श्रम बेचते हैं। श्रमिक वर्ग को वेबर ने इसी वर्ग में शामिल किया है। इस प्रकार वेबर ने मार्क्स के दो-वर्गीय मॉडल के विपरीत समाज को चार वर्गों में विभाजित किया। हालांकि वेबर ने वर्ग संरचना का जो आधार ढूंढा वह मार्क्स के जैसा ही था, मगर समाज में वर्गों के प्रकार को लेकर उनका नजरिया मार्क्स से भिन्न था।