जीर्ण रोग किसे कहते है | जीर्ण रोग की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब दीर्घकालिक रोग chronic disease in hindi

By   January 17, 2021

chronic disease in hindi old disease  meaning definition जीर्ण रोग किसे कहते है | जीर्ण रोग की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब दीर्घकालिक रोग ?

शब्दावली
जनसांख्यिकीय संक्रमण (demographic transition)ः वह सामाजिक प्रक्रिया जिसके द्वारा समाज उच्च प्रजनन क्षमता और उच्च मृत्यु दर से निम्न प्रजनन क्षमता और निम्न मृत्यु दर की ओर अग्रसर होता है।
प्रजनन क्षमता (fertility)ः समाज में महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चों (संतान) की औसत संख्या।

जरा चिकित्सा (geriatries): चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा जो वृद्धावस्था और वृद्ध हो रहे व्यक्तियों की समस्याओं और रोगों से संबंधित है।
जीवन-प्रत्याशा (life expectancy)ः जीवन की औसत अवधि जिसमें एक निर्धारित समय पर उत्पन्न बच्चों के जीने की संभावना हो सकती है।
वृद्ध निर्भरता अनुपात ः
युवा निर्भरता अनुपात ः

वृद्धों की स्वास्थ्य स्थिति
भारत में वृद्धों का स्वास्थ्य उनकी समस्याओं का एक सर्वाधिक उपेक्षित पहलू है। न केवल सम्पूर्ण समाज बल्कि चिकित्सा व्यवसाय भी बुढ़ापे की स्वास्थ्य समस्याएँ और रोगों के विशेष स्वरूप पर ध्यान देने में विफल रहा है। वृद्धों और युवाओं की स्वास्थ्य समस्याओं की एक प्रमुख विशेषता यह है कि जहाँ युवा जन संक्रामक रोगों से ग्रस्त होते हैं वहीं वृद्ध जन जीर्ण बीमारियों से ग्रस्त होते हैं।

वृद्धों की बीमारियों के बारे में अधिकतर उपलब्ध अध्ययन गैर-चिकित्सीय अन्वेषकों ने किए हैं और वे ही हमें वृद्धों के स्वास्थ्य और रुग्णता-दर (morbidity rate) के व्यापक पहलुओं के बारे में कुछ सामान्य जानकारी देते हैं। इनमें से राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने 42वें चक्र में अद्धतन जानकारी प्रदान की है और इसमें 1986-87 के दौरान संपूर्ण देश को शामिल किया गया है।

 जीर्ण रोग

परिभाषा : ऐसा रोग जिसकी गति धीमी होती है अर्थात वह धीरे धीरे शरीर में पनपने लगता है लेकिन उसकी गति धीमी होने के कारण उसका बाह्य रूप देखने को नहीं मिलता है ऐसे रोग को जीर्ण रोग कहते है | जैसे शरीर में मोटापा होने के कारण शरीर में अन्य रोग समय के साथ होने लगते है जैसे ब्लड प्रेसर , शुगर आदि | इसे पुरानी बीमारी भी कहा जा सकता है |
इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से पता चलता है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लगभग 45 प्रतिशत वृद्ध, महिलाएँ और पुरुष किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हैं। जीर्ण रोगों में अधिक प्रचलित रोग जोड़ों का दर्द (गठिया), खाँसी या श्वास समस्या और रक्तचाप हैं। अन्य रोग हैं हृदय रोग, मूत्र समस्या, बवासीर और मधुमेह आदि।

तालिका 5 में दी गई जानकारी से आपको पता चलेगा कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में तथा वृद्ध पुरुषों और महिलाओं में जीर्ण रोगों की आवृत्ति दरों (rate of incidence) में महत्त्वपूर्ण अंतर है। श्वास समस्याएँ और जोड़ों के दर्द की समस्याएँ ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत ज्यादा हैं और रक्त-चाप, हृदय रोग और मधुमेह शहरी क्षेत्रों में मौजूद हैं।

तालिका 5 रू जीर्ण रोगों से पीड़ित होने वाले वृद्धों में जीर्ण रोगों के विभिन्न प्रकारों
का प्रतिशत विवरण, 1995-96
ग्रामीण शहरी
रोग पुरूष महिला पुरूष महिला
खाँसी (श्वास रोग) 25.0 19.5 17.9 14.2 बवासीर 3.3 1.6 2.7 3.8
जोड़ों में दर्द की समस्याएँ 36.3 40.4 28.5 39.3
रक्त चाप 10.8 10.5 20.0 25.1
हृदय रोग 3.4 2.7 6.8 5.3
मूत्र-रोग 3.8 2.3 4.9 2.4
मधुमेह 3.6 2.8 8.5 6.6
स्रोत: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 52वाँ चक्र

इसी प्रकार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में श्वास-रोग, मूत्र-रोग, बवासीर और मधुमेह पुरुषों में ज्यादा हैं जबकि जोड़ों के दर्द की समस्याएँ महिलाओं में अधिक पाई जाती हैं। इस प्रकार के वितरण से पता चलता है कि स्वास्थ्य समस्याओं का वृद्धों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की विशिष्टताओं पर प्रभाव होता है। उपर्युक्त सर्वेक्षण के परिणामों और कई अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि जिन महिलाओं की जीवन-शैली पुरुषों की तुलना में अधिक सुस्त और घरेलू होती है, जोड़ों के दर्द की ज्यादा शिकायत करती हैं और शहरों में रहने वाले मध्यम वर्गीय लोग अधिक दबाव के कारण उच्च रक्त चाप व हृदय रोग से पीड़ित होते हैं। निर्धन वर्गों के वृद्ध व्यक्ति जो सामान्यतया अधिक कुपोषण के शिकार होते हैं अधिक शारीरिक कमजोरी की शिकायत करते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों के वृद्ध जो समय-समय पर आँखों की जाँच नहीं कराते, प्रायः आँखों के रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।

 अस्थायी रोग

जीर्ण बीमारियों के अतिरिक्त वृद्ध अस्थायी बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 28वें चक्र से पता चला कि वर्ष 1973 में ग्रामीण क्षेत्रों में 29 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रों में 26 प्रतिशत वृद्ध अस्थायी बीमारियों से पीड़ित थे। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 36वें चक्र में वृद्धों में पाई जाने वाली शारीरिक दुर्बलताओं का उल्लेख किया गया था और यह पाया गया था कि 11 प्रतिशत वृद्ध शारीरिक रूप से विकलांग थे जिनमें से डेढ़ प्रतिशत दृष्टि से अपंग थे। अन्य आयु श्रेणियों के लोगों के मुकाबले शारीरिक अपंगता स्वाथ्य समस्याओं और बढ़ती हुई आयु के कारण भी वृद्ध संभवतः शारीरिक रूप से कम चल पाते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 42वें चक्र के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 5.4 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.5 प्रतिशत वृद्ध शारीरिक रूप से चल फिर नहीं सकते हैं। यह गतिहीनता (न चलना-फिरना), पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक पाई जाती है और जो महिलाएँ और पुरुष 70 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, उनमें यह अधिक पाई जाती है।

ऐसे कई लक्षण हैं जो वृद्धों की स्वास्थ्य समस्याओं के लिए असाधारण हैं और विकसित देशों में जहाँ पर वृद्धों के कल्याण पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जराचिकित्सा (हमतपंजतपबे) नामक आयुर्विज्ञान की एक विशेष शाखा का सृजन हुआ है जो वृद्धावस्था तथा बूढ़े हो रहे लोगों की समस्याओं और रोगों को देखती है। जरा चिकित्सा ने अभी भारत में प्रगति करनी है क्योंकि भारत में इसकी बहुत आवश्यकता है।

बोध प्रश्न 2
1) वृद्धों की कार्य सहभागिता दर और आर्थिक स्तर किस प्रकार बदल रहा है। लगभग आठ पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
2) वृद्धों की स्वास्थ्य स्थिति का संक्षेप में वर्णन कीजिए। लगभग चार पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) जब वृद्धों की क्षमता में बहुत ज्यादा ह्रास हो जाता है तो सामान्यतया वे श्रमिक बल से स्वयं हट जाते हैं। परंतु जब अर्थव्यवस्था संगठित हो जाती है तो वृद्धों को बिना उनकी इच्छा के कार्य निवृत्त कर दिया जाता है चाहे वे अपना कार्य करने योग्य ही क्यों न हो। अतः जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था ज्यादा से ज्यादा मजबूत होती जा रही है, वैसे-वैसे कार्य से हटने वाले वृद्धों का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ज्यादा से ज्यादा वृद्ध दूसरों पर निर्भर होते जा रहे हैं।
2) वृद्ध संक्रामक रोगों की अपेक्षा जीर्ण रोगों से ज्यादा ग्रस्त होते हैं। उनकी शारीरिक रूप से असमर्थ होने की ज्यादा संभावना बनी रहती है। वृद्धों में जीर्ण रोगों का बारबार होना उनके ग्रामीण-शहरी और लिंग के बीच अंतर के अनुसार बदलता रहता है।

उद्देश्य
इस इकाई में आपको सामान्यतः वृद्धों की समस्याओं, विशेषकर भारत में रहने वाले वृद्धों की समस्याओं की जानकारी दी जाएगी। यह भी बताया जाएगा कि यह समस्या कैसे और क्यों बढ़ती जा रही है और अधिकाधिक जटिल होती जा रही है तथा इसके विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डाला जाएगा।
इस इकाई को पढ़ने के बाद आपके द्वारा संभव होगा:
ऽ यह स्पष्ट करना कि वृद्धों की स्थिति क्यों समस्याएँ उत्पन्न कर रही है;
ऽ समाज में आए परिवर्तनों के कारण ये समस्याएँ किस प्रकार से जटिल और कठिन रूप धारण कर रही हैं, इसकी विवेचना करना;
ऽ वृद्धों की जनसांख्यिकीय, आर्थिक और स्वास्थ्य स्थिति पर चर्चा करना;
ऽ पहले वृद्ध लोग किस प्रकार समाज में आसानी से सामंजस्य स्थापित कर पाते थे और अब वे किस प्रकार कम संतोषप्रद ढंग से समाज में सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं, इसकी जाँच करना;
ऽ वृद्ध महिलाओं की स्थिति से वृद्ध पुरुषों की स्थिति की तुलना करना; और
ऽ वृद्धों की सहायता के लिए सार्वजनिक नीतियों और कार्यक्रमों का मूल्यांकन करना।

 प्रस्तावना
सामान्यतः विश्व में और विशेषकर भारत में वृद्धों की स्थिति दुविधा उत्पन्न कर रही है। एक ओर यह देखने में आता है कि जीवन संभाव्यता (सपमि मगचमबजंदबल) में वृद्धि हो रही है और वृद्धों की जनसंख्या बढ़ रही है जिसे आधुनिक सभ्यता की एक महान् उपलब्धि माना जा सकता है। दूसरी ओर यह भी देखने में आता है कि वृद्ध होना एक समस्या समझा जाता है। वृद्ध लोग इन बदलती हुई परिस्थितियों में अपने आपको ढालने में और अधिक कठिनाइयों का अनुभव कर रहे हैं। भारत में वृद्धों से जुड़े सभी मुद्दों पर इस इकाई में चर्चा की जाएगी। इस इकाई का आरंभ वृद्धों की समस्या के स्वरूप की चर्चा के साथ किया जाएगा। वृद्धों की किसी भी समस्या को समझने के लिए जनसांख्यिकी की विशिष्ट तालिकाओं की सहायता ली जाएगी जिनके बारे में आगे चर्चा की जाएगी। इसके पश्चात् आर्थिक विशेषताओं, स्वास्थ्य स्थिति और सामाजिक सामंजस्य के संबंध में जाँच-पड़ताल की जाएगी। अंत में वृद्धों के लिए सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा और इनका प्रेक्षण किया जाएगा।

सारांश

इस इकाई में जिन मुख्य मुद्दों की हमने चर्चा की है, आइए उनका उल्लेख अब हम संक्षेप में कर लें। आमतौर पर वृद्धों के समक्ष अनेक समस्याएँ होती हैं। वे वृद्धावस्था में जीवन के जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक क्षेत्र में प्रतिकूल घटनाओं का अनुभव करते हैं। जीवन की इस कठिन घड़ी में वृद्धों का समायोजन उनके जीवनकाल के दौरान सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों से या तो सहज हो जाता है अथवा जटिल बन जाता है। ये कारक ऐतिहासिक घटनाओं से प्रभावित होते हैं।

अतीत में सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक कारक वृद्धों के अधिक संतोषजनक सामाजिक समायोजन के लिए अनुकूल थे। जनसंख्या में उनका अनुपात कम था और उनका परिवार उनका आवश्यक भरण-पोषण और देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था करता था। सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में आधुनिक परिवर्तन होने के कारण आजकल वृद्धों का सामाजिक समायोजन जटिल हो गया है। जनसंख्या में उनका प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। सहायता व्यवस्था के तौर पर परिवार कमजोर हो रहा है और वैकल्पिक सार्वजनिक सहायता व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।

भारत जैसे विकासशील समाजों में जिनमें अभी आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण हो रहा है, वृद्धों की स्थिति बहुत अधिक बिगड़ रही है। भारत में यद्यपि कुल जनसंख्या में वृद्धों का प्रतिशत विकसित देशों की तुलना में बहुत अधिक नहीं है, परंतु जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है जो कि काफी बड़ी है। इसके साथ-साथ इस बड़ी संख्या के वृद्धों की आर्थिक, स्वास्थ्य देखभाल संबंधी आवश्यकताएँ और सामाजिक आवश्यकताएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं परिवर्तनों के साथ-साथ परिवार के ढाँचे में भी परिवर्तन हुए हैं और वृद्धों के लिए सहायता व्यवस्था के रूप में परिवार का प्रभाव कम होता जा रहा है।

भारत में वृद्धों की समस्या इसीलिए सामाजिक समस्या बन गई है कि इस समस्या के कारण समाज के लिए वृद्धों के भरण-पोषण की अधिक जिम्मेदारी वहन करना अनिवार्य सा हो गया है। परंतु सार्वजनिक भरण-पोषण व्यवस्था अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में है। संक्षेप में, इस इकाई में हमने वृद्धों के संबंध में सार्वजनिक नीतियों और कार्यक्रमों की जाँच-परख करने पर बल देने के साथ-साथ वृद्धों की समस्याओं के स्वरूप, जनसांख्यिकीय विशेषताओं और आर्थिक विशेषताओं, स्वास्थ्य स्थिति और सामाजिक समायोजन की चर्चा की है।

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