चिपको आन्दोलन क्या है | चिपको आंदोलन किससे सम्बन्धित है के जनक कौन है कब हुआ था chipko movement in hindi

By   October 25, 2020

chipko movement in hindi चिपको आन्दोलन क्या है | चिपको आंदोलन किससे सम्बन्धित है के जनक कौन है कब हुआ था कब शुरू हुआ कहां हुआ था ?

चिपको आन्दोलन
सन् 1973 में, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की जा रही वनों की नीलामी की नीति के प्रति विरोध प्रकट करने के लिए दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल नामक गांधीवादी संगठन ने चिपको आंदोलन प्रारंभ किया था। चिपको सक्रियतावादी वनों पर लोगों के अधिकार के समर्थक हैं और उन्होंने वृक्ष रोपण के लिए महिला-दलों का गठन किया है। श्चिपकोश् का अर्थ है ष्पेड़ों को बाँहों में भर कर खड़े हो जाओश् जिससे उन्हें काटकर गिराया न जा सके। भारत में पर्यावरण आन्दोलनों में सबसे अधिक समर्थन प्राप्त आन्दोलन यही है। इसका प्रारंभ सुंदरलाल बहुगणा तथा चंडी प्रसाद भट्ट ने किया था।

इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप अनेक वन्य जीवन अभयारण्यों की स्थापना की गई हैं जिनमें शिकार करना संज्ञेय अपराध माना जाता है। वस्तुतः पशुओं एवं पक्षियों की लुप्त प्राय प्रजातियों को मारने पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून साठ के दशक के मध्य में ही पारित हुए थे। गिर का सिंह, बंगाल के चीते, भारतीय सारंग तथा ऐसे ही कुछ अन्य जीवों की प्रजातियों को इन कानूनों से सुरक्षा प्राप्त हुई है। कुछ प्रजातियोंय जैसे, भारतीय चीता और कस्तूरी मृग के लिए ये कानून देर से बन सकें। किंतु पर्यावरणवादियों ने कुछ मूलभूत प्रश्न उठाए हैं। संपूर्ण पर्यावरण आन्दोलन का सारतत्व इन्हीं प्रश्नों में निहित है।

अनेक वर्षों के अनुभव के बाद इसी आन्दोलन ने कर्नाटक में एक और आन्दोलन श्आपिकोश् को प्रेरित किया जिसमें पश्चिमी घाट के पेड़ों की कटाई रोकने के लिए उन्हें बाँहों में भरकर लोग खड़े हो जाते थे।

अनिवार्यताएँ
सम्पूर्ण विश्व के परोपकारवादी, स्वयंसेवी संगठनों के रूप में, सामाजिक न्याय और पारिस्थितिक सुरक्षा एवं पुनर्लब्धि के हेतु अपनी प्रतिबद्धता के साथ प्रारंभ में सरकारी गतिविधि के अनुलग्नक, बाद में विकास के बेहतर अभिकर्ता के रूप में तथा आज नवोदित (किंतु कम शक्ति संपन्न) राजनीतिक बलों की भूमिकाओं में खुलकर मैदान में आ गए हैं। भारत के पर्यावरण-रक्षा-आन्दोलन यहाँ की जनतांत्रिक व्यवस्था की उपज हैं। वे तीन मोर्चों पर सक्रिय हैंरू देशभर के स्वयंसेवी अभिकरणों तथा सामाजिक सक्रियतावादियों की भागीदारी में वृद्धि का प्रयत्न, देश के जन संचार माध्यमों तथा न्यायालयों तक उनकी पहुँच में वृद्धि। भारतीय पर्यावरण संगठनों ने वनों की कटाई, ऊँचे बाधों के निर्माण, अतिशय खनन, प्रदूषण तथा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों के स्थापन का विभिन्न सफनना – स्तरों तक विरोध किया है।

 विभिन्न देशों में हुए आन्दोलन
 सरवाक जनजातीय आन्दोलन
सरवाक इंडोनेशिया के कालीमंटन (बोर्नियों) द्वीप में मलयेशिया का अंतर्वती क्षेत्र है। यहाँ मलेशिया सरकार ने जंगलों की अंधाधुंध कटाई शुरू करा दी। कटे हुए पेड़ों का निर्यात जापान को किया जाता था जहाँ से वे यूरोप के कुछ देशों को भेजे जाते थे। सरकारी आदेश के अनुसार लाभ का एक अंश मलयमूल के ठेकेदारों को जाता था। मुख्य भूमि के लोगों का सरवाक क्षेत्र में प्रवेश कानूनन वर्जित था। पूरी कार्रवाई पर गोपनीयता का पर्दा पड़ा हुआ था। सरवाक के मूल निवासी जो संसाधनों के अवक्षय तथा लाभांश से वंचित रखे जाने की दुहरी मान तो झेल ही रहे थे जब सेंसरशिप के द्वारा सूचना प्राप्त के अधिकार से भी दूर कर दिए गए तो उन्हें जले पर नमक छिड़कने जैसी पीड़ा का अनुभव हुआ और वे भड़क उठे। एक शिक्षित आदिवासी युवक हैरसिन – गाओ के नेतृत्व में इमारती लकड़ी की कटाई के विरुद्ध आन्दोलन हुआ और तब तक चलता रहा जब तक आदिवासियों को कुछ रियायतें न मिल गई। संसाधनों एवं लाभांश संबंधी अन्याय एक बड़ी सीमा तक कम हुए, पूरे विश्व को इस राजसी अत्याचार विरोधी संघर्ष की जानकारी मिली जिसकी चरम परिणति गाओ को मिले नोबल पुरस्कार के रूप में हुई।

ब्राजील में उष्ण करिबंधीय वनों का सरंक्षण
ब्राजील में भारी वर्षा वाले वन पशुपालकों, खनिज संभावनाओं रबर की खेती तथा इमारती लकड़ी की कटाई के कारण निरंतर खतरे में थेद्य कुछ भागों में रबर के वृक्षारोपण के कारण प्रिस्टाइन वन समाप्त कर दिए गए जिसके कारण स्थानीय आदिवासियों को रबर के बागों में सस्ती दर पर मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा। स्थानीय आदिवासियों को शाइको मोडेस के नेतृत्व में इस उत्पीड़न का प्रतिरोध करना पड़ा। जब सरकारों और जन संचार माध्यमों में सजगता आ रही थी और थोड़ी सी न्यायिक समानता दिखाई पड़ने लगी थी तभी रबर माफिया के लोगों ने शाइको की हत्या कर दी। किन्तु आन्दोलन व्यर्थ नहीं गया।

 चीन में वृक्षारोपण का माओवादी आन्दोलन
चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति के दौर में माओ से तुंग ने पारिस्थितिकी तथा मानव जाति के लिए। कल्याणकारी पर्यावरण निर्माण में वृक्षों की भूमिका के महत्व को अत्याधिक गंभीरता से समझा। परिणाम स्वरूप पुरे चीन में युवा क्रान्तिकारियों द्वारा 50 करोड़ वृक्ष लगाए गए और शासनादेश द्वारा उस समय उनकी देखभाल की गई जब तक कि आवास में स्थायित्व का विकास नहीं हुआ।

 मैक्सिको में जनजातीय प्रतिरोध
मैक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा में हुए उत्तरी अमरीकी मुक्त व्यापार समझौते की उत्तर कथा के रूप में मैक्सिको के दक्षिण पूर्वी एंजटेंक क्षेत्र में खेती के ढाँचे को बदलने का प्रयत्न किया गया। स्थानीय आदिवासियों ने अपने परपंरागत मोर्स के ढंग में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का सशस्त्र विद्रोह के रूप में प्रतिरोध किया। उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते पर भी सवाल उठाए गए जिसके फलस्वरूप सरकार को आदिवासियों के पक्ष में हस्तक्षेप करने को बाध्य होना पड़ा।

 फिलीपीन्स में शाइको आन्दोलन
फिलीपीन्स के उत्तरी भाग में प्रवाहित शाइको नदी पर बाँध बनाने की योजना थी जिससे मैदानी भाग में सिंचाई और बिजली की व्यवस्था की जा सकती। उस निर्माण का विरोध किया गया क्योंकि अविकसित होते हुए भी दशकों से उस क्षेत्र की उपेक्षा की गई थी। अतः सरकार इस बात पर राजी हुई कि बाँध के निर्माण के साथ-साथ उस क्षेत्र का विकास भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। बाँध पर काम करने वाले मजदूरों ने काम रोक दिया जिसके कारण सरकारी दमन चक्र को आमंत्रण मिला। प्रतिक्रिया स्वरूप स्थानीय लोगों ने विद्रोह किया। स्थानीय लोगों की धारणा यह थी कि सिंचाई तथा बिजली का लाभ दूसरों को मिलने जा रहा था। वे स्वयं इनका लाभ उठाना तो दूर इन्हें समझने में भी असमर्थ थे। प्रतिहिंसा ने धीरे-धीरे गुरिल्ला युद्ध का रूप ले लिया। मनीला सरकार स्थानीय लोगों के नैसर्गिक संसाधनों का अपहरण औरों के लिए करने के अपने प्रभाव के विरुद्ध उठे सशस्त्र विद्रोह को दबाने में असमर्थ रही।

दक्षिणी नाइजीरिया का प्रतिरोध आन्दोलन
दक्षिणी नाइजीरिया पूरे देश से भिन्न है। वहाँ प्राकृतिक संसाधन बहुत हैं, लोग शिक्षित एवं सुसंस्कृत हैं किन्तु क्रिश्चियन होने के कारण बहुसंख्यक होते हुए भी राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हैं। स्थानीय लोगों में देश की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी द्वारा संसाधनों के दोहन को लेकर असंतोष था। केन सरोवियों के नेतृत्व में मानवाधिकारों के लिए एक आन्दोलन प्रारंभ हुआ जो क्रमशः जोर पकड़ता गया। आन्दोलन में इस क्षेत्र से प्राप्त पैट्रोलियम के राजस्व में से भागीदारी की माँग की गई। तेल कंपनियों और सरकार में बैचेनी फैलने लगी क्योंकि आन्दोलन में जैसा प्रायः होता है, हिंसा का प्रवेश हो गया था। आन्दोलन के नेताओं को बंदी बना लिया गया और विश्व नेताओं के सभी विरोधों की कोई चिंता न करते हुए केन सरोविको को प्राणदंड दे दिया गया।

जर्मनी का ग्रीन आन्दोलन
संसार भर के पर्यावरण आन्दोलनों में जर्मनी का श्डाई गुनेनश् सबसे अधिक महत्वपूर्ण रहा है। इस समूह का गठन 1970 के दशक में उस समय किया गया था जब अपनी अपनी निहित अपर्याप्तताओं में अनेक क्षेत्रीय समुदायों ने अनुभव किया कि पारिस्थितिकी संबंधी चेतना सभी के लिए समान रूप से चिंता का विषय था। अतः वामपंथी, नारीवादी, अराजकतावादी, मार्क्सवादी, मुक्तिवादी, हिप्पी, नास्तिक, निरनुरूपतावादी और इसी प्रकार के अन्य समुदाय पारिस्थितिक बोध के एक मात्र उद्देश्य को लेकर एक साथ हुए। इस उद्देश्य के साथ मार्क्सवाद भी सहमत था और गांधीवाद भी। इससे विरोध का स्वर इतना मुखरित हुआ कि इन लोगों की गणना आतंकवादियों तथा अराजकतावादियों के साथ की जाने लगी और उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया जिससे वे किसी भी सार्वजनिक पद को ग्रहण करने के अधिकारी नहीं रहे। परन्तु, जन साधारण में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। सरकार की आत्मघाती नीतियों में किसी प्रकार का परिवर्तन न होता देखकर उन्होंने चुनावों में भाग लिया और कुछ निगमों पर अधिकार कर लिया। फिर भी वे आंशिक रूप से ही सफल हो सके। इस भय से कि कहीं वे राजनीति की मुख्य धारा में शामिल न हो जाएँ, सरकार ने यह कानून बना दिया कि केवल उसी राजनीतिक दल के सदस्य संसद में बैठ सकेंगे जिसे कुल राष्ट्रीय मतों के कम से कम 57 मत मिले हों। उन्हें 7ः से अधिक मत मिल गए और ग्रीन्ज संसद में प्रविष्ट हो गए। संसार के पारिस्थितिकी आन्दोलन में यह एक असाधारण सफलता का उदाहरण है।

ग्रीन आन्दोलन पूरे यूरोप में फैल गया। परंपरागत राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में पारिस्थितिक कार्यसूची को शामिल किया। अगले चुनावों में जर्मनी में ग्रीन्ज को सफलता नहीं मिली किंतु यूरापीय देशों में समाज पारिस्थितिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील हो चुका था। हाल ही के चुनावों में जर्मनी में ग्रीन्ज पुनः शक्तिशाली होकर उभरे हैं। वे अब अन्य दलों के साथ सत्ता में भागीदार हैं। अब संपूर्ण यूरोप में ऐसे संगठन हैं।

उन्होंने ग्रीन-घोषणापत्रों के माध्यम से पृथ्वी के प्रति चेतना जगाई है, एक निर्विरोध एवं सर्वमान्य कार्यसूची का विकास किया है, नागरिक पर्यावरणवाद एवं (पर्यावरण) निर्वाचकवाद को प्रस्तुत किया है। संक्षेप में पारिस्थितिकी का राजनीतिकीकरण हुआ है और राजनीति का पारिस्थितीकरण हुआ है। इस आन्दोलन के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में से एक पेट्राकैली हुए हैं।