औपनिवेशिक किसे कहते हैं | औपनिवेशिक स्वराज्य शासन शब्द का अर्थ की परिभाषा क्या है भारत का इतिहास

By   October 27, 2020

भारत का इतिहास औपनिवेशिक किसे कहते हैं | औपनिवेशिक स्वराज्य शासन शब्द का अर्थ की परिभाषा क्या है ? aupniveshik shasan kya hai ?

औपनिवेशिक साम्राज्य की प्रकृति और अवस्थाएँ
जबकि उपनिवेशवाद का मुख्य उद्देश्य साम्राज्यिक समाज को समृद्ध करने हेतु उपनिवेश का शोषण और उसके आधिशेष का विनियोजन (उसको कब्जे में लेना) है, उपनिवेशवाद के स्वभाव को इन शब्दों में सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है कि यह किस प्रकार कार्यान्वित किया जाता है। उपनिवेश का शोषण करने के तरीके विभिन्न चरणों में पूरे हुए। ये चरण या तो सामान्य प्रवृत्ति के रूप में अथवा यंत्रवाद व करणत्वों के साथ संमिश्रित प्रवृत्ति के रूप में देखे जा सकते हैं। किसी-न-किसी रूप में उस तरीके में अनर्थकारी परिवर्तन हुए जिससे आधिशेष विनियोजित किया जाता था। इसीलिए, औपनिवेशिक शोषण कोई नियत नहीं थाय यह हमेशा बदलता रहता था। दोनों तरीकों में से जो भी अपनाएँ उस पर निर्भर करते हुए हम दो थोड़े-से भिन्न प्रतिमान पाएँगे। सामान्य प्रवृत्ति पर विश्वास करते हुए बिपन चन्द्र तर्क प्रस्तुत करते हैं कि उपनिवेशवाद तीन चरणों में पूरा हुआ, प्रत्येक साम्राज्यिक अर्थव्यवस्था, समाज और राजतंत्र में परिवर्तनों के परिणामस्वरूप। प्रथम चरण वह “एकाधिकार व्यापार और राजस्व विनियोजन‘‘। के रूप में पहचानते हैं जिसका संकेत “लूटपाट के घटक और आधिशेष के प्रत्यक्ष अभिग्रहण‘‘ तथा उत्पादन के किसी भी महत्त्वपूर्ण आयात के अभाव द्वारा मिलता है। दूसरे चरण को वह “व्यापार के माध्यम से शोषण‘‘ के उस रूप में मानते हैं जिसमें उपनिवेश (औद्योगिक) वस्तुओं के लिए बाजार और कच्चे माल का एक आपूर्तिकर्ता बन गया – औपनिवेशिक शोषण का सर्वाधिक सुपरिचित तरीका जिसके द्वारा उपनिवेश को एक “सहयोगी व्यापार साझेदार‘‘ में बदला जाता था। तीसरे चरण को वह ‘‘उपनिवेशों के लिए विदेशी निवेशों और प्रतिस्पर्धा‘‘ का काल कहते हैं जिसके दौरान आधिशेष साम्राज्यिक पूँजी उपनिवेशों को निर्यात कर दी जाती थी ताकि वे वहाँ उद्योग लगाकर कच्चे माल का प्रत्यक्ष दोहन करें और लाभ कमाकर ले जाएँ।

उपर्युक्त वर्गीकरण में हम देख सकते हैं, शोषण का मौलिक ढंग बदलता है। पहले वाले अदृश्य नहीं होते बल्कि गौण रूप में बने रहते हैंय अर्थात् वसूली पर एकाधिकार रहता है लेकिन यह असमान व्यापार और व्यापार आधिशेष द्वारा अनुपूरित किया जाता है। यही बात अगले चरण में रहती हैं जहाँ लाभ-स्वामित्वहरण (किसी को स्वामित्व से वंचित कर देना) मूल रीति बन जाता है परन्तु असमान व्यापार एक अनुषंगी रीति बना रहता है। इन चरणों में हम किसी भी रीति को देखें, ऐसे प्रतिरूप आसानी से समझे जा सकते हैं।

राजनीतिक आधिपत्य के स्वरूप और स्रोत को शोषण के यंत्रवाद और करणत्वों से जोड़कर हम औपनिवेशिक शासन के चरणों की एक थोड़ी-सी भिन्न तस्वीर पाते हैं, जैसा कि हम अमिया बागची के साथ देखेंगे । प्रथम काल 1757 से 1858 तक, रॉबर्ट क्लाइव द्वारा बंगाल के नवाब की पराजय से शुरू होकर महा-विद्रोह यानी स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम तक फैला है। यही वह काल था जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजनीतिक शक्ति का प्रयोग उस ब्रिटिश पार्लियामेण्ट द्वारा प्रत्याभूत एक घोषणा-पत्र पर किया गया जिसने गवर्नर-जनरल की नियुक्ति भी की। द्वितीय काल 1858 से 1947 तक फैला हैय यही है विभाजन के साथ देश की स्वतंत्रता तक ब्रिटिश पार्लियामेण्ट द्वारा सत्ता का सीधा अधिग्रहण।

स्वयं प्रथम चरण को ही दो कालों में बाँटा जा सकता है। पहले साठ साल, यानी 1757-65 से 1813 तक, एक विशुद्ध व्यापारिक काल था (जिसमें व्यापारीवर्ग सुदूर व्यापार को संचालित करता प्रबल वर्ग था)। ब्रिटेन का औद्योगिक क्रांति में प्रवेश अभी होना था और इस कारण उत्पादित माल के बृहद्-स्तरीय निर्यात का कोई प्रश्न ही न था। इस काल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत और चीन समेत पूर्व के साथ व्यापार के एकाधिकार का लाभ उठाया । यहाँ शुरू होता है एक भिन्न, एक नया काल, जब 1913 में भारत के साथ (और 1934 में चीन के साथ भी) व्यापार हेतु कम्पनी का एकाधिकार समाप्त हो गया। इस समय तक ब्रिटेन संसार के एक अग्रणी औद्योगिक राष्ट्र के रूप में सुव्यवस्थित हो गया था और शोषण के एक भिन्न प्रकार के यंत्र-प्रबंध की समय को आवश्यकता थी। कम्पनी की स्थिति पर कुछेक “एजेन्सी ग हों‘‘ ने अधिकार कर लिया जो आगे चलकर ‘‘प्रबंधक एजेन्सियाँ‘‘ बन गई। ये ही सारा विदेश-व्यापार (पश्चिमी भारत में व्यापार के एक भाग के अतिरिक्त्त) संचालित करती थीं और थोक के अधिकांश आंतरिक व्यापार विशेषतः निर्यात-योग्य उपभोक्ता-वस्तुओं में, की साम्राज्यिक अर्थव्यवस्था को बेहद आवश्यकता थी। 1813 के बाद के काल को एक मुक्त व्यापार के मार्फत शोषण की संज्ञा दी जा सकती है।

1858 ने सत्ता सीधे ‘क्राउन‘ अथवा ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के हाथ में जाती देखी। गंवर्नर-जनरल अब वायसरॉय भी हो गया। 1858 ने यद्यपि राजनीतिक नियंत्रण के स्वभाव में एक वैध परिवर्तन देखा, शोषण के तरीकों में ज्यादा बदलाव नहीं आया। 1858 से 1914-18 की अवधि ने मुक्त व्यापार पर आधारित शोषण का उत्कर्ष देखा। लेकिन इस काल ने भारतीय अर्थव्यवस्था का पूर्ण रूप से विश्व पूँजीवादी बाजार के लिए खुलना और विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उसका पूर्ण एकीकरण देखा। शोषण के तरीके में बिना किसी परिवर्तन के, विश्व-पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में एकीकरण ने घरेलू आधिशेष के समायोजन हेतु नाना प्रकार के उत्तोलक अथवा लीवर जुटा दिए। रेलमार्गों और परिवहन-व्यवस्था के विकास ने भी एक ऐसे एकीकृत आर्थिक नेटवर्क में विविध आंतरिक अर्थव्यवस्थाओं का घुलना-मिलना देखा, जिसका सब कुछ विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर बल्कि मुख्यतः ब्रिटेन की ओर उन्मुख था। यह जारी रहा लेकिन 20वीं सदी के दूसरे दशक, प्रथम विश्वयुद्ध की ओर अग्रसर अवधि के आसपास, ने शोषण के एक नवीन चरण को देखा जो 1947 तक चलता रहा लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने पर उसका चलना रुका नहीं। वास्तव में, अनेक छद्म वेषों में यह आज भी चल रहा है।

हम इसे शोषण का “नव-औपनिवेशिक‘‘ तरीका कह सकते हैं। ब्रिटेन में पूँजीवाद संतृप्ति के एक सापेक्ष स्तर पर विकसित हो चुका था। निवेश के लिए पूँजी ब्रिटिश अर्थव्यवस्था व ऐसे ही अन्य विकसित पूँजीवादी देशों में जितनी संभव थी उससे कहीं ज्यादा अब थी। अन्य देशों को पूँजी निर्यात करने की एक होड़-सी लगी थी। भारत महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों में एक था। उन्नत पूँजीवादी देशों से पूँजी बल्कि पूर्णतः ब्रिटिश पूँजी भारत के खनन व उद्योग की ओर प्रवाहित होने लगी। भारत ने कुछ क्षेत्रों में उद्योग की एक गौरतलब वृद्धि देखीय कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, अहमदाबाद जैसे कुछ परिक्षेत्रों में चहद्-स्तर पर व कई अन्य स्थानों में एक लघु स्तर पर आधुनिक उद्योग पनपे। सरलता से उपलब्ध कच्चे माल का प्रयोग करने (बजाय इसके कि इसे इंग्लैण्ड निर्यात किया जाए) और स्थानीय रूप से उपलब्ध सस्ते श्रमिकों का प्रयोग करने से तात्पर्य था भारत में ही वस्तुओं का उत्पादन करना (बजाय इसके कि उन्हें ब्रिटेन से आयात किया जाए)। जो अधिलाभ लिए जाते थे उनका सम्पत्ति हरण ब्रिटेन हेतु होता था। इस प्रकार के औद्योगीकरण को ‘‘आयात प्रतिस्थापन‘‘। के रूप में भी जाना जाता है। इस आधुनिक उद्योग के विकास के साथ-साथ कुछ और भी आया जो था भारतीय बुर्जुआ वर्ग की श्रेणियों में तेजी से विस्तार और एक व्यापारी से लेकर उद्योगपतियों तक अपनी स्थिति में बदलाव। इस प्रक्रिया का प्रथम विश्व युद्ध के बाद तेजी से वर्धन हुआ जब भारतीयों ने ब्रिटिशों पर, अमेरिका के प्रति अवनति में, मुक्त-व्यापार को संयत करने तथा भारतीय उद्योगपतियों को रियायतें व कुछ संरक्षण देने के लिए दवाब डाला। इसके साथ भारतीय पूँजीपतियों के तहत पूँजीवाद ने महान् वृद्धि दर्ज की।

उपनिवेशवाद और उसके विभिन्न चरणों के स्वरूप का अवलोकन करते-करते एक बात स्पष्ट हो जाती है। ये उपनिवेश अथवा गृह-अर्थव्यवस्था की आवश्यकताएँ अथवा अपेक्षाएँ नहीं हैं जो औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा बनाई गई नीतियों अथवा विकल्पों को निर्धारित करती हैं। इनकी बजाए यह निर्धारण वहाँ पूँजीवाद के विकास के शब्दों में साम्राज्यिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं से अधिक जुड़ा होता है। ब्रिटिश पूंजीवाद की ये अपेक्षाएँ ही हैं जो निर्णयकारी प्रभाव बन जाती हैं। अतः भारत में जो कुछ भी घटता है, यदि हम ‘‘विकास‘‘ के शब्दों में कहें, सहज ही परिणामी होता है। औपनिवेशिक सत्ताओं द्वारा भारतीय समाज हेतु कुछ भी नहीं किया गया।

इस प्रकार औपनिवेशवाद के स्वभाव और उसकी अवस्थाओं पर नजर डालने के बाद अब विस्तृत परिणामों को समझना अधिक आसान होगा। इस इकाई के शेष भाग में भारत में उपनिवेशवाद के परिणामों का उल्लेख होगा।

 प्रभाव: प्रथम चरण-कृषिवर्ग और उसकी दुर्दशा
हम सबने सुना है कि उपनिवेशवाद ने किस प्रकार से भारतीय कृषिक अर्थव्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया जो कृषिवर्ग को कंगाली (वह प्रक्रिया जिसके द्वारा किसी को गरीब बनाया जाता है) की ओर ले गया। अनेक लेखकों द्वारा यह भी उल्लेख किया गया है कि अंग्रेजों ने टोडरमल द्वारा समाप्त कर दी गई मुगल भू-राजस्व व्यवस्था के अनेक अभिलक्षणों को कायम रखा। इस इकाई में हम पहले ही देख चुके हैं कि 18वीं सदी के दौरान ब्रिटेन से उत्पादनों का निर्यात कम ही होता था, इसलिए हस्त-कलाओं को कलाकारों पर दवाब डालकर बरबाद नहीं किया जा सका। तो फिर यह कैसे हुआ? अन्य शब्दों में, कंगाली शुरू कैसे हुई? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, भारत को कंगाल बनाने की प्रक्रिया को और अधिक समझने हेतु एक मुख्य बिन्दु।
जहाँ अंग्रेजों ने मुगल राजस्व व्यवस्था को काफी हद तक कायम रखा, उन्होंने इसकी समस्त संरचना के भीतर कुछ विस्तृत सखत परिवर्तन किए। पहला, यद्यपि एक छोटा-सा, था कि उन्होंने वसूले गए राजस्व के अंश को बहुत अधिक बढ़ा दिया। यह अनुमान लगाया गया है कि ब्रिटिश शासन के प्रथम कुछ वर्षों में ही बंगाल दीवानी से वसूला गया कुल राजस्व दुगुना हो गया जबकि पिछले 100 वर्षों में यह उतना ही रहा था। यह एक विशाल वृद्धि थी। यह याद रखना महत्त्वपूर्ण होगा कि यह भीषण अकाल की ओर ले गया, एक-तिहाई जनता कंगाल हो गई, लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि राजस्व-वसूली बढ़ती ही गई। साथ ही, यह भी याद रखना महत्त्वपूर्ण होगा कि मुगलों के शासन में राजस्व वसूली के एक अंश का अर्थव्यवस्था की सहायता करने में और स्थानीय उत्पाद को विकसित करने हेतु पुनर्निवश किया जाता था, लेकिन ब्रिटिश शासन में बहुत ही थोड़ा वापस आता था।

आइए उनके द्वारा किए गए उन परिवर्तनों पर नजर डालते हैं जिनमें उन्होंने मुगल राजस्व व्यवस्था को कायम रखा। एक मौलिक परिवर्तन जो उन्होंने किया वह राजस्व को वास्तव में जोती गई भूमि की बजाय जोतने के लिए तय कुल भूमि पर गणनीय बनाना। यह निर्याणक थाय इसीलिए, हम एक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं। मुगल शासन में यदि किसान, उदाहरण के लिए, 100 एकड़ भूमि जोतने का हकदार था लेकिन वास्तव में उसने 55 एकड़ ही जोती, तो राजस्व. मात्र 55 एकड़ के लिए ही वसूला जाता था लेकिन ये ब्रिटिश राजस्व का निर्धारण और वसूली पूरी 100 एकड़ भूमि के लिए करते थे। अब कल्पना कीजिए उस विशाल बोझ की जो किसानों पर डाला जाता होगा क्योंकि कुछेक को छोड़कर कोई भी अपने जोत के हक वाली पूरी भूमि को नहीं जोतता था। अन्य शब्दों में, कहा जा सकता है कि मुगल शासन में निर्धारण उपज पर आधारित था न कि जोतों पर और इसी कारण उनकी व्यवस्था में एक सन्निहित सुनम्यता थी। दूसरे, कई लोगों द्वारा यह भी देखा गया है कि पूरा वास्तविक लगान हमेशा ही वसूल नहीं किया जाता था और किसानों की समस्याओं पर ध्यान दिया जाता था। तीसरे, मुगल शासन में राजस्व नकद रूप में आकलित किया जाता था परन्तु बहुधा यह सहृदयता से वसूला जाता था ताकि किसान को विपदग्रस्त बिक्री हेतु न जाना पड़े। अन्ततः, और बहुत महत्त्वपूर्ण रूप से, मुगल शासन में समय से भुगतान करने से चूकने अथवा अन्य प्रकार के कों को चुकाने में असमर्थ होने पर किसानों को भूमि से हाथ नहीं धोना पड़ता था। ब्रिटिश राजस्व अथवा अन्य कों को चुकाने में असफल रहने पर भूमि की नीलामी हेतु दवाब डालते थे और पहली बार उन्होंने गैर-किसानों को भूमि खरीदने की स्वीकृति दी। इससे पहले भूमि दूसरे किसान को सिर्फ हस्तांतरित की जा सकती थीय गैर-किसान कृषक-भूमि का स्वत्व-अंतरण नहीं कर सकते थे। अतरू कृषिवर्ग में ही थोड़ा-बहुतं हस्तांतरण हुआ करता था।

उपर्युक्त से यह जाहिर है कि अंग्रेजों द्वारा लाई गई व्यवस्था उन स्थितियों में कृषिक अर्थव्यवस्था की मौजों के संबंध में अनम्य थी जो हमारी मानसून पर निर्भर उष्णकटिबंधी जलवायु में प्रभावी थीं। इससे भूमि को एक उपभोक्ता-वस्तु जैसी चीज में बदलने का सिलसिला बढ़ा, हालाँकि भूमि कोई कपड़े की भाँति उपभोक्ता-वस्तु तो बन नहीं सकती। फिर भी भूमि का स्वत्व-अंतरण कृषिक संबंधों का एक अभिलक्षण बन ही गया। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव था, एक, बकायों की उगाही के लिए . उच्च धारकों अथवा साहूकारों द्वारा किसानों की भूमि का किसी-न-किसी बहाने अधिहरण किए जाने की निपुणता तथा, दो, उच्च धारकों, जैसे जमींदार की भूमि भी, कर्ज और उस पर चढ़े सूद को चुकाने में असफल रहने पर साहूकार द्वारा जब्त की जा सकती थी। परिणामतरू भू-स्वामियों के एक वृहद् आयाम के रूप में ऐसे दूरवासी भू-स्वामियों का उद्गमन हुआ जो फिर कमर-तोड़ लगोन अथवा बटाई पर भूमि को उठाने लगे।

कहीं ऐसा न हो यह गलत समझ लिया जाए, यहाँ एक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। यह बंगाल की दीवानी और वहाँ लाए गए भूमि धारणाधिकार से सीमाबद्ध नहीं था। लेकिन यह ब्रिटिश प्रशासन के तहत सम्पूर्ण भारत के लिए एक सामान्य लक्षण था, भूमि धारणाधिकार की किसी भी व्यवस्था को ले लीजिए। बंगाल में कार्नवालिस द्वारा बनाए गए स्थायी बंदोबस्त को ही लें, जहाँ सरकार ने राजस्व वसूली का अधिकार उन मुट्ठीभर बड़े जमींदारों को सौंप दिया जो अब काश्तकार बन गए किसानों पर प्रभुत्व रखते थे। जमींदारों को सरकार को एक नियत धनराशि देनी होती थी जो हमेशा के लिए तय कर दी जाती थी लेकिन 19वीं सदी के अन्तिम दशकों तक लगान-दरों पर कोई प्रतिबंध नहीं होता था। या फिर बम्बई प्रेसीडेन्सी में एल्फिन्स्टन की और मद्रास प्रेसीडेन्सी में मुनरो की रैयतबाड़ी को देखें जहाँ भूमिधारियों के साथ सीधे बन्दोबस्त किए जाते थे और आवधिक राजस्व निर्धारण प्रत्येक 20-30 वर्षों में किया जाता था। उपर्युक्त नए अभिलक्षण जो कृषिवर्ग के लिए अलाभकारी थे बड़े आम थे। कृषिवर्ग की तबाही ही वह सवाल था जो दारिद्रय बढ़ोत्तरी के सापेक्ष था (दरिद्र वह है जिसे जीवित रहने के लिए भीख माँगनी पड़े)।

बोध प्रश्न 2
नोटः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा उठाए गए नए कदम क्या थे?
2) कृषिवर्ग के लिए इनके क्या परिणाम हुए?
3) इतिहास में भारतीय दरिद्रता के मूल को आप इतिहास में कहाँ पाते हैं?

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) उन्होंने राजस्व का अंश बढ़ा दिया। लगान किसान की कुल भूमि के आधार पर उगाहया जाता था, न कि बुआई किए गए क्षेत्र के आधार पर।
2) यह किसानों से लगान वसूल करने में फलित हुआ। लगान चुकाने में असफल रहने पर जमीन से उनकी बेदखली होने लगी। किसान कंगाल हो गए।
3) यह औपनिवेशिक काल में देखा जा सकता है।

 प्रभाव: द्वितीय चरण-अनौद्योगीकरण और उसके प्रभाव
इस चरण के दौरान उपनिवेशवाद का भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर दोहरा प्रभाव रहा – विनाशात्मक और विकासात्मक।

विनाशात्मक भूमिका
अंग्रेजों के आने से काफी पहले से भारत के पास एक वृहद् और विशाल रूप से फैला उद्योग अथवा द्वितीयक विनिर्माण था। वास्तव में, अकबर के समय में, यह कहा जाता है, कि एक महकमा-ए-कारखाने (उद्योग विभाग) शुरू किया गया। अपने कुटंबों के अंदर कार्यरत शिल्पकारों अथवा शिल्प संघों में कार्यरत हस्तशिल्पकारों के नियंत्रण में ये विनिर्माण पूर्णतरू संगठित थे। पश्चिमी यूरोप में कुछ देशों द्वारा लिए जाने वाले कुछेक प्रौद्योगिक लाभों को छोड़कर, जैसा कि हमने पहले देखा, राष्ट्रीय तंदरुस्ती और हमारे देश में शासकों के अधीन धन-सम्पत्ति किसी तरह कम नहीं थीय वास्तव में, कुछ अनुमानों के अनुसार यह अधिक ही थी। यहाँ, यद्यपि, अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि भारत में (पूर्व-पूँजीवाद) विनिर्माण देशभर में फैले थे और कई उदाहरणों में, शिल्प संघों के अपवाद के साथ, ये कृषिक अर्थव्यवस्था में भली-भाँति रचे-बसे थेय कृषि और विनिर्माणों के बीच संबंध परस्पर लाभदायक था। उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान अधिकांश द्वितीयक विनिर्माण नष्ट हो गए और भारत में इस काल के दौरान कोई नया उद्योग नहीं पनपा। इस प्रक्रिया को अर्थशास्त्रियों द्वारा अनौद्योगीकरण के रूप में जाना गया। हम इस प्रक्रिया का संक्षिप्त रूप से अवलोकन करेंगे और इसके वृहद् प्रभाव पर गौर करेंगे।

अनौद्योगीकरण की इस प्रक्रिया की शुरुआत, पूर्व कथन से जोड़ते हुए, 1813 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापार-एकाधिकार की समाप्ति के साथ ही हुई जो ब्रिटेन में पूरी तरह से गतिमान औद्योगिक क्रांति से स्वयं ही ढंक गई। भारत, 1800 के आसपास से आरंभ कर, औपनिवेशिक शोषण के एक पारम्परिक साँचे में ढल गया, जिसे सामान्यतया साम्नाज्यिक अर्थव्यवस्था द्वारा “कच्चे माल का आयात और तैयार वस्तुओं का निर्यात‘‘ अथवा अगर भारत या किसी अन्य उपनिवेश के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसके विपरीत के रूप में भी ठीक समझा गया है। यह अनौद्योगीकरण हुआ कैसे? और इसके क्या परिणाम हुए?

किसी भी वक्तव्य से पूर्व एक टिप्पणी करना उचित होगा क्योंकि यह अनेक अन्तर्दृष्टियों का स्रोत हो सकती है। 18वीं सदी के अंतिम चतुर्थांश में ब्रिटेन अपने औद्योगीकरण पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7 प्रतिशत निवेश कर रहा था। इसी अवधि के दौरान, वास्तव में, 1765 के पहले से शुरू करके, ब्रिटेन बंगाल से सकल घरेलू उत्पाद का 6 से 7 प्रतिशत प्राप्त कर रहा था, जिसमें से 4 प्रतिशत से अधिक ब्रिटेन में निवेश कर दिया जाता था (ब्रिटेन को अप्रतिदत्त आधिशेष के रूप में हस्तांतरण द्वारा), इसने ब्रिटेन के त्वरित औद्योगीकरण में बड़ा योगदान दियाय जबकि शेष को भारत के अन्य भागों पर विजय-युद्ध करने में प्रयोग किया जाता था। अतरू पहली विजयों के बाद भारत पर विजय हासिल करने के लिए ब्रिटेन का कुछ नहीं लगा, उसने केवल भारत के कुछ हिस्सों को बस कंगाल कर दिया क्योंकि वे अन्य भागों पर विजय के लिए धन देते थे। (विस्तृत विवरणों व वास्तविक आँकड़ों के लिए अमिया बागची को पढ़ें।)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक के आसपास से एकतरफा मुक्त-व्यापार शुरू किया गया। (यानी ब्रिटेन से वस्तुओं के निर्यात पर आयात-शुल्क में छूट)। आइए, एक विशिष्ट उपभोक्ता-वस्तु, सूती-वस्त्र, पर नजर डालते हैं, जिसकी उत्पादन-गुणवत्ता के लिए भारत सभी जगह मशहूर था और जिसे वह भारी तादात में निर्यात किया करता था। कुछ ही दशकों के भीतर सूती-वस्त्र भारत की निर्यात-सूची से पूरी तरह गायब ही हो गया। भारत में वस्त्र-उत्पादन में एक अनर्थकारी गिरावट हुई। इसके स्थान पर देश की आयात-सूची में सूत-उत्पादन की अत्यधिक वृद्धि हुई। औद्योगिक क्रांति के आलोक में ब्रिटेन विश्व में सूती-वस्त्र का अग्रणी उत्पादक हो गया था। भारतीय बाजार फैलते ब्रिटिश उद्योग के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ। उदाहरण के लिए 1880 के दशक में, जो वस्त्र-उत्पादन का शिखर-बिन्दु था, भारत अकेले ही ब्रिटेन की दुनिया में साझीदारी का 40 प्रतिशत हिस्सा था। बागची द्वारा आकलित सही-सही आँकड़ों में, 1885 में ब्रिटेन से सूती-माल का कुल निर्यात 6.9 करोड़ पाउण्ड आया और इसमें भारत का हिस्सा था 2.8 करोड़ पाउण्ड । भारत में उत्पादित सूती-माल पर ब्रिटेन से आयातित की अपेक्षा कहीं अधिक शुल्क देना पड़ता था।

अनेक प्रकार के निर्मित माल के साथ यही कहानी थी। रेशमी-माल के लिए, अंग्रेजों ने अपने अधीन बुनकरों पर बुनाई छोड़ देने के लिए दवाब डाला और इसके स्थान पर कच्चे रेशम का उत्पादन रखा क्योंकि यूरोप में कच्चे रेशम की बिक्री अधिक लाभप्रद दिखाई पड़ी। ब्रिटेन ने नमक, अफीम (चीन के साथ व्यापार में एक मुख्य मद), नील (सूती-माल को ब्लीच करने में बहुत महत्त्वपूर्ण), आदि के उत्पादन और बिक्री पर भी एकाधिकार किया। कई अन्य निर्मित वस्तुएँ भी दसांश रह गईं। उदाहरण के लिए, राजनीतिक सत्ता की हानि के साथ, आग्नेयास्त्र-निर्माण उद्योग (पूर्व-औपनिवेशिक भारत में महत्त्वपूर्ण) समाप्त हो गया और उसके साथ ही हुआ इस्पात-ढलाई कारखानों का वृहद् स्तर पर सफाया।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक अनौद्योगीकरण पूरा हो चुका था। कृषि पर इसका प्रभाव, गौरतलब है, अत्यधिक विनाशकारी था। द्वितीयक उत्पादन कार्यों से निकाल फेंके गए व्यक्ति प्रत्यक्ष पोषण के लिए कृषि में धकेल दिए गए, भूमि को कुछ और लाख लोगों का पोषण करना पड़ा। इसने पहले से ही कंगाल, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं, कृषिवर्ग को और अधिक बर्बादी की ओर उन्मुख किया। चूंकि भूमि पर लोगों की संख्या बढ़ती ही रही, कृषकों के भु-स्वामी (अथवा वरिष्ठ स्वामी) के साथ संबंध तो एक ओर खराब होते जा रहे थे और भूमिहीन कृषिक श्रमिकों की संख्या विशाल रूप से बढ़ गई। इस प्रक्रिया का परिणाम तत्काल एक दोहरे चरित्र वाला था रू पहले, कृषि कार्यों में कामगारों के वेतनों में निरंकुश गिरावट तथा उसके बाद दूसरे, लगान में बढ़ोत्तरी जिसको चुकाने के लिए किसानों पर दवाब डाला जाता था (निष्ठुर लगान एक सामान्य अभिलक्षण बन गया, और लगान पूरा अथवा समय पर चुकाने में असफल रहने के कारण ने बटाई-काश्तकारों के रूप में अधिभोक्ताओं की आसानी से बेदखली की ओर अग्रसर किया। कंगाली, एक सापेक्ष अर्थ में नहीं बल्कि एक निरपेक्ष स्वरूप में व्यापक हो गई। भारत देश आजतक उनके लिए भयंकर पीड़ा से ग्रस्त है जिनके पास थोड़ी-सी ही जमीन है अथवा बिल्कुल नहीं है।

विकासात्मक प्रभाव
भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर उपनिवेशवाद का निम्नलिखित विकासात्मक प्रभाव हुआ:

उन्नीसवीं शताब्दी से आरंभ कर, अंग्रेज पहले एक आधुनिक प्रशासनिक प्रणाली निश्चित कर रहे थे और उसके बाद एक न्यायिक व्यवस्था, तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानों को साथ लेकर यह भारत के लिए एक नए प्रकार की सामाजिक आधारिक संरचना थी। इसे चलाने के लिए बड़ी संख्या में भारतीयों की आवश्यकता थी। इसीलिए अंग्रेजों ने इन सार्वजनिक व निजी संस्थाओं को चलाने के लिए एक नए प्रकार की शिक्षा-प्रणाली भी निर्धारित की। काफी तर्क-वितर्क के बाद, 1830 के दशक से प्रशासन व शिक्षा दोनों का पूरी तरह से अंग्रेजीकरण लागू कर दिया। अंग्रेजी में भली-भाँति दक्ष भारतीयों के एक नए वर्ग का उद्गमन हुआ। आरंभ में वे अधिकतर हिन्दुओं से निष्कर्षित थे और पूर्णतः उन तीन उच्च जातियों से थे जिन्होंने पहले नौकरियों पर एकाधिकार स्थापित किया और फिर अन्य व्यवसाय जैसे वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, कम्पनी कार्यकारी, इत्यादि, भारतीयों के बीच एक उच्च रूप से लाभान्वित समूह पर। इसका उच्चतर स्तर था – नया भारतीय संभ्रान्त वर्ग। उनका प्रधान्य आज भी जारी है जो दलित आदि निम्न जातियों व पिछड़ी जातियों तथा प्रायः उन मुस्लिमों के बीच जो औपनिवेशिक शासन के आरंभ से ही शिक्षा में पिछड़े रहे, विद्वेष का कारण है।

इस काल के दौरान दूसरा अति महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम था रेलमार्गों के निर्माण की शुरुआत। 1854 में शुरू होने वाले पहले दो मुख्यमार्गीय रास्ते चालू किए गए और तब इसका निर्माण एक वृहद् स्तर पर जारी रखा गया। 1914 तक, भारत के सभी मुख्य क्षेत्रों को जोड़ते 34,000 मील लम्बे रेलमार्गों का निर्माण किया गया। चीन से तुलना करके हम देख सकते हैं कि यह नेटवर्क कितना विस्तृत था। चीन जैसे एक अधिक बड़े देश में भी अर्ध-औपनिवेशिक शासन के अंत तक मात्र 12,000 मील तक ही रेलमार्ग नेटवर्क था। भारत भर में माल और लोगों के आवागमन को सरल बनाकर रेलमार्गों ने व्यापार और पूँजी के विकास में अत्यधिक योगदान किया। इससे इस प्रकार एक परस्पर सक्रिय अर्थव्यवस्था में विभिन्न स्थानीय आर्थिक क्षेत्रों का एकीकरण हो गया। इसने एक अखिल-भारतीय बाजार के विकास में मदद की। आज ये रेलमार्ग एक भौतिक वांछित आधारभूत ढाँचा बने हुए हैं जो माल व लोगों और व्यापार एवं वाणिज्य के संचलन तथा तेजी से बढ़ती औद्योगिक अर्थव्यवस्था के निवेशों की आपूर्ति में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बल्कि इन रेलमार्गों ने आश्चर्यजनक रूप से एक महानगर के भीतर भारतीय अर्थव्यवस्था के एक महत्तर एकीकरण में भी योगदान किया है और इस प्रकार भारत के आर्थिक शोषण के विवर्धन में योगदान किया है। इसने ऐसा एक असाधारण मार्ग. समूहन और किराया-ढाँचे के द्वारा किया है। मुख्य शहरों को राजधानी से जोड़ते मुख्य-पथ मार्गों के अतिरिक्त, ये रेलमार्ग मुख्य रूप से आंतरिक प्रदेशों को उन पोत शहरों से जोड़ने के लिए ही एकीकृत किए गए जहाँ से भारत और ब्रिटेन के बीच इधर-उधर व्यापार को सरल बनाते हुए, तैयार वस्तुएँ भारत में निर्यात की जाती थीं और कच्चा-माल बाहर ले जाया जाता था।

यदि दो आंतरिक प्रदेशों के बीच माल का परिवहन किया जाता था तो भाड़ा अधिक लगता था, उदाहरणार्थ इंदौर और ग्वालियर के बीच, लेकिन यही माल यदि आंतरिक प्रदेश से पोत शहरों को लाना-ले जाना हो तो यह काफी कम (प्रायः आधा ही) लगता था, उदाहरणार्थ ग्वालियर अथवा इंदौर से बम्बई अथवा कलकत्ता कोय ताकि इससे आंतरिक व्यापार निरुत्साहित हो परन्तु ब्रिटेन के साथ बाह्य व्यापार में मदद मिले। अतरू इस प्रकार “कच्चे-माल के बदले तैयार वस्तुएँ। वाली प्रक्रिया तेजी से चल पड़ी और इससे ही हुआ भारत के शोषण का विवर्धन । यही था वह घटनाक्रम जिसको महान् राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री और स्वतंत्रता-सैनानी दादाभाई नौरोजी ने नाम दिया ‘‘निकास सिद्धांत‘‘।

तीसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन जो प्रासंगिक है, वह है आधुनिक सिंचाई नेटवर्क का विकास । रेलमार्गों के विकास के साथ ही, सिंचित क्षेत्रों में भी तीव्रता से विस्तार हुआ। विशाल सिंचाई नेटवर्कों का यद्यपि कुछ ही क्षेत्रों में परिसीमित निर्माण किया गया लेकिन इसके साथ ही कुओं व ग्राम-सरोवरों जैसे पारम्परिक सिंचाई साधनों की उपेक्षा भी होने लगी। अतः सकल आदेश-क्षेत्र सिंचित क्षेत्र में वास्तविक वृद्धि के बराबर नहीं रहे। 1914 तक, 2.5 करोड़ एकड़ सिंचाई के अंतर्गत था। पूर्व-पारम्परिक व्यवस्था किसानों के हाथ में ही थी इसलिए फसल-मिश्रण और फसल-घूर्णन आदि पर उनका नियंत्रण था। आधुनिक नेटवर्कों ने खेतिहरों को उन सिंचित सम्बद्ध जमींदारों की अनुकंपा पर आश्रित कर दिया जिनका उदाहरणार्थ, नहरों जैसे सरकारी सार्वजनिक कार्यों पर नियंत्रण था। यह कृषिक अर्थव्यवस्था पर जमींदारों की अपेक्षिक बल-वृद्धि में और इसीलिए कृषिवर्ग के एक दयनीय अस्तित्व में भी फलित हुआ।

सिंचाई में निवेशों का एक महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण याद रखने योग्य है। लगभग सारा निवेश दो को जाता था, ब्रिटिश भारत के तीन क्षेत्र, और इनमें से इसका अधिकांश पंजाब को जाता था। अनुमान दर्शाते हैं सम्पूर्ण निवेश का 3ध्5 (पूर्व काल में लेकिन बाद में आंशिक रूप से फिर भी एक विस्तृत भाग कायम रहते हुए) पंजाब को जाता था, शेष मद्रास प्रेसीडेन्सी के कुछ तटीय क्षेत्रों और बम्बई प्रेसीडेन्सी में कुछ क्षेत्रों के आसपास विभाजित कर दिया जाता था। तब ये ही वे क्षेत्र थे जहाँ उत्पादकता में अधिक वृद्धि देखी गई। यह बात नहीं है कि इन क्षेत्रों के किसान अधिक मेहनती हैं. जैसा कि पंजाब के किसानों के बारे में आधुनिक मिथक तर्क देता है, बल्कि वे निश्चित उत्पादन के कारण इन क्षेत्रों में अधिक श्रम व पूँजी लगाते हैं। इस निवेश के विषम स्वभाव ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच एक नए प्रकार के अनमेलपन को बढ़ावा दिया।

सिंचाई के विकास के साथ दो महत्त्वपूर्ण परिणाम सामने आए, इनका संक्षिप्त वर्णन महत्त्वपूर्ण है। सिंचाई ने फसल पद्धति में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की ओर उन्मुख किया। इससे निर्यात-योग्य खाद्यान्न और वाणिज्यिक फसलों की वृद्धि को मदद मिली, सिंचित क्षेत्रों में प्रत्यक्ष प्रभाव द्वारा बल्कि अन्य क्षेत्रों हेतु लाभप्रद कृषि का स्वभाव दर्शाकर भी। इन नए निर्यात-योग्य खाद्यान्नों ने ज्वार-बाजरा (अल्प जल की आवश्यकता वाले मोटे अनाज और गरीबों के प्रमुख आहार) तथा दलहन (गरीबों के लिए मुख्य व एकमात्र प्रोटीन-स्रोत) के उत्पादन को हाशिये पर धकेल दिया। क्षेत्रों व विभिन्न वर्गों के बीच कृषि में विकास का सम्पूर्ण स्वभाव एक बेहद असम प्रकृति का था। एक सामाजिक स्तर की ओर उद्गमोन्मुखी कृषिवर्ग के बीच धनी कहे जाने किसानों का उद्गमन हुआ। यह भी ध्यातव्य है कि 1914 तक, कुल फसल-क्षेत्र का लगभग 25ः क्षेत्र नकदी-फसलों के तहत आता था, इनमें से अनेक उद्योगार्थ-निवेश प्रकृति के भी थे, नामतरू तम्बाकू, जूट, कपास, गन्ना (गुड़ व खांडसारी की बजाय परिष्कृत चीनी का उत्पादन करके), आदि। भारत में आधुनिक कृषि, 1947 से, बहुत बदल गई है, लेकिन आधारभूत संरचना बड़े ध्यानाकर्षक रूप से वही रही।

रेलमार्गों के साथ-साथ, नकदी-फसलों के विकास के साथ सिंचाई, और वृहद्-स्तर खनन ने भारत के भीतर और भारत व अन्य देशों विशेषतः ब्रिटेन के बीच दोनों ही प्रकार के व्यापार के विकास को काफी प्रोत्साहित किया। इसीलिए 1880 के दशक तक एक अच्छा-खासा भारतीय पूँजीपति वर्ग आकार ले रहा था और अनेक क्षेत्रों में विद्यमान था परन्तु पूर्णतरू पोत-कस्बों में और उनके आसपास ही संकेंद्रित था। इससे भारतीय उद्यमियों के तहत पूँजीवाद की शुरुआत को कम ही बढ़ावा मिला और आधुनिक उद्योग का धीमा विकास हुआ। यही था भविष्य हेतु व्यापक महत्त्व वाला एक अभिलक्षण।

बोध प्रश्न 3
नोटः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) ब्रिटिशों ने दोहन की बजाय “कच्चे माल के निर्यात और तैयार वस्तुओं के आयात‘‘ पर जोर देना क्यों शुरू कर दिया?
2) भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ इसने क्या किया?
3) कृषिक अर्थव्यवस्था ने अनौद्योगीकरण को कैसे प्रभावित किया?

बोध प्रश्न 3 उत्तर
1) वे इंग्लैण्ड में उत्पादित माल के लिए बाजार चाहते थे।
2) इसने भारत की पारम्परिक अर्थव्यवस्था को चैपट कर दिया, जिसको अनौद्योगीकरण की प्रक्रिया के रूप में जाना गया।
3) अनौद्योगीकरण के कारण, भारतीय कृषि से सम्बन्धित पारम्परिक उद्योग व फसल पैदावार तबाह हो गए। इसने भारतीयों को कंगाल कर दिया।