निर्धनता के कारण क्या है लिखिए | निर्धनता के कारणों का वर्णन करें भारत में के कारण बताइए causes of poverty in hindi

By   January 6, 2021

causes of poverty in hindi meaning definition reasons of poverty in india in hindi language निर्धनता के कारण क्या है लिखिए | निर्धनता के कारणों का वर्णन करें भारत में के कारण बताइए ?

निर्धनता के कारण
दक्षिण एशिया में मानव विकास, 1999 आमतौर पर दक्षिण एशिया में और खास तौर पर भारत में गरीबी, असमानता और वंचना की सुस्पष्ट स्थिति दर्शाता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, विश्व जनसंख्या के 23वाला दक्षिण एशिया इस धरती पर सबसे गरीब क्षेत्र है। इस भूभाग की 45 जनसंख्या, यथा लगभग 54 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे रहते हैं, जिनकी दैनिक आय एक अमेरिकी डॉलर से भी कम है। गरीब लोगों की संख्या भारत में सर्वाधिक है, यथा 1999 में 53 लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे (यानी उनकी आय प्रतिदिन एक अमेरिकी डॉलर से भी कम थी)। उक्त रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि धनाढ्यतम सदस्यों के बीच धन-सम्पत्ति और शक्ति का नाटकीय नैराश्य और संकेन्द्रण है। इस क्षेत्र में 20  सर्वोच्च आय वाले स्तर के पास कुछ आय का 40 है, जबकि निम्नतम आय वाले 20 के पास मात्र 10 ही। भारत में 10 धनाढ्यतम लोग देश के 10 निर्धनतम लोगों से 6 गुना अधिक कमाते हैं।

गरीबी का सामाजिक एवं आर्थिक वंचनों के साथ सीधा संबंध है। इन वंचनाओं के कुछ सूचक नीचे दर्शाये गए हैं:
सूचक दक्षिण एशिया भारत
उचित स्वास्थ्य-रक्षक सुविधाओं से वंचित 87.9 करोड़ 66.1 करोड़
स्वच्छ पेय जल से वंचित 27.8 करोड़ 17.8 करोड़
शिशु-जन्म मृत्युदर प्रति 1,00,000 सप्राण जन्म 480 437
घोर कुपोषण से ग्रस्त 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे 7.9 करोड़ 5.9 करोड़
प्राथमिक शिक्षा में नाम न लिखाने वाले बच्चे 5 करोड़ 3.5 करोड़

निर्धनता के अनेक कारण हैं। हम इस भाग में तथा बाद के उप-भागों में इन कारणों की चर्चा कर रहे हैं। पहला कारण है – असमानता और निर्धनता के बीच संबंध । इसके पश्चात् दुष्चक्र सिद्धांत और अंत में भौगोलिक पहलुओं का विवेचन किया जायेगा।

 असमानता और निर्धनता
प्रारंभ में सिर्फ निर्धनता के अध्ययन के ही प्रयास हुए, अर्थात् उसे समाज की स्थितियों से जोड़कर नहीं देखा गया। एक ब्रिटिश समाज कल्याण विशेषज्ञ ने सुझाव दिया की निर्धनता को अपर्याप्त आय के रूप में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि किसी समाज में सम्पत्ति के बँटवारे में विषमता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। माक्र्स के अनुसार विषमता पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में पैदा होती है, जिसमें सम्पत्ति थोड़े से लोगों के हाथों में सिमट कर रह जाती है। ये मुट्ठीभर लोग सम्पत्ति उत्पादन के साधनों, जैसे कि दास, भूमि तथा पूँजी पर अपना कब्जा जमा लेते हैं। वे राजनीतिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करने में सक्षम होते हैं, ताकि इस सामाजिक असमानता को कायम रखा जा सके। चूँकि राजनीतिक रूप से अमीर लोगों के पास शक्ति होती है, इसलिए सरकारी नीतियाँ उनका ही पक्ष पोषण करती हैं। इसी कारण अमीर लोग अमीर तथा गरीब लोग गरीब ही बने रहते हैं। माक्र्स का कहना था कि समूचा मानव इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। इसलिए हालात तभी बदल सकते हैं जब गरीबों के पास अधिक राजनीतिक प्रभाव आ जाए। कुछ अन्य विचारकों का मानना है कि समाज के सदस्यों को अपनी अलग-अलग भूमिका निभानी होती है। कुछ भूमिकाओं के लिए लंबे प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है (चिकित्सक, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक आदि) वे लोग समाज से अधिक लाभ प्राप्त करते हैं। सब्जी-विक्रेता, सफाई कर्मचारी, टैक्सी-ड्राइवर, टाइपिस्ट, जैसे लोगों को कम पारिश्रमिक मिलता है। असमानता तो है, किन्तु क्योंकि समाज के संचालन के लिए ही ऐसा होता है अतः इसे वृत्तिमूलक माना जाता है। समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ये सभी काम किए ही जाने हैं।

 दुष्चक्र सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार निर्धन लोग ऐसी परिस्थितियों में फंसे हुए हैं, जो गरीबी से उनकी मुक्ति को कठिन बना देती हैं। गरीबों को कम भोजन मिलता है, जिससे कम ऊर्जा मिलने के कारण स्कूल तथा काम में वे बढ़िया नहीं निकलते। घटिया तथा कम भोजन के कारण वे जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं। उनके मकानों की हालत ठीक नहीं होती तथा अक्सर अपने काम के लिए उन्हें बहुत दूर जाना पड़ता है। अपने काम के स्थान के समीप मकान लेने में वे या तो असमर्थ होते है या उन्हें वहाँ रहने की अनुमति ही नहीं होती। ये सभी परिस्थितियाँ मिलकर उन्हें गरीब बने रहने को विवश करती हैं। ग्रामीण विकास के एक अग्रणी विशेषज्ञ ने भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त निर्धनता की चर्चा करते हुए यह प्रश्न किया: ‘‘क्या ग्रामीण विकास की नीति में समन्वित ग्रामीण निर्धनता पर विचार किया जाता है?‘‘ इसके पहलुओं में गरीबी, शारीरिक दुर्बलता, असुरक्षा, लाचारी, एकाकीपन आदि शामिल हैं। जैसे कि इस सिद्धांत में कहा गया है, गरीब लोग निर्धनता के चंगुल से मुक्त नहीं हो सकते। किन्तु इस तरह के नियतिवादी विचार को कि वे निर्धनता से बच हो नहीं सकते, स्वीकार करना मुश्किल है। निर्धनता की इस व्याख्या को ‘‘स्थितिपरक सिद्धांत‘‘ भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए कि निर्धन स्वयं को विशेष स्थिति में पाते हैं, जिसमें से यदि वे निकलना भी चाहें तो उनका निकलना बहुत कठिन होता है।

 भौगोलिक पहलू
कभी-कभी निर्धनता की व्याख्या उन भौगोलिक स्थितियों के संदर्भ में की जाती है, जिनमें गरीब लोग रहते हैं। संसाधनों की कमी है और संसाधनों की कमी की इस समस्या से उबर पाने में लोग असमर्थ हैं। रेगिस्तानी तथा पहाड़ी क्षेत्र इस पहलू के अच्छे उदाहरण हैं। भारत में कुछ इलाकों को सूखा क्षेत्र घोषित किया गया है। इन क्षेत्रों में किए गए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि वहाँ न केवल हालात खराब हैं, बल्कि कड़ा परिश्रम करने के बावजूद भी वहाँ के लोग अपनी दशा नहीं सुधार पाते हैं।

इनमें से कोई भी सिद्धांत निर्धनता के व्यापक तथ्य की पूरी तरह व्याख्या करने में असमर्थ है। हाँ, इनसे यह समझने में अवश्य मदद मिलती है कि गरीबी क्यों व्याप्त है?

 निर्धनता के परिणाम
जैसा कि पहले कहा गया है सम्पन्न लोगों में अमीर बने रहने की शक्ति होती है। निर्धनता को जारी रखने में उनका स्वार्थ निहित होता है। गरीबी बनी रहती है क्योंकि समाज के कुछ वर्गों के लिए यह लाभप्रद है। गरीबी से सभी गैर-गरीब तबकों तथा अमीर और शक्तिशाली लोगों को खास तौर पर लाभ होता है। गरीबी के अनेक प्रकार्य हैं। जैसे –

प) निर्धनता यह सुनिश्चित करती है कि ‘‘गंदे काम हो जाएँगे‘‘। बहुत से छोटे काम होते हैं, जिन्हें समाज में किया जाना होता है। ऐसे काम गरीब ही करते हैं।
पप) गरीबी के कारण घटिया वस्तुओं तथा सेवाओं के लिए बाजार उपलब्ध होता है। उतरे हुए कपड़े, बासी खाद्य वस्तुएँ, घटिया मकान तथा अयोग्य लोगों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाएँ गरीब ही इस्तेमाल करते हैं।
पपप) गरीबी के कारण अमीरों का जीवन सुखी बनता है। रसोइयों, मालियों, धोबियों, चैका-सफाई करने वालों आदि की मदद से धनी लोग सुखी जीवन बिता सकते हैं।
पअ) निर्धनता से एक ऐसा वर्ग पनपता है, जो परिवर्तन के राजनीतिक तथा आर्थिक कारणों को आत्मसात कर लेता है। प्रौद्योगिकी के विकास का अर्थ अकुशल लोगों की बेरोजगारी में वृद्धि। बाँधों के निर्माण से ऐसे क्षेत्र ऐसी आबादियाँ बेदखल होती हैं, जहाँ नहरें बनाई जाती हैं। बेदखल भूमिहीन लोगों को कोई मुआवजा नहीं मिलता। बजट में धन की कमी के कारण जिन नीतियों में परिवर्तन होता है, वे जन-कल्याण कार्यक्रमों के बारे में ही होती हैं। निर्धनता को बनाए रखने में सम्पन्न लोगों का और प्रायः स्वयं सरकार का भी निहित स्वार्थ होता है, क्योंकि इससे समाज की स्थिरता बनाए रखने में योगदान मिलता है।

बोध प्रश्न 2
1) निर्धनता के कारण क्या हैं? अपना उत्तर पाँच-सात पंक्तियों में लिखिए।
2) निर्धनता के क्या-क्या प्रकार्य हैं? अपना उत्तर पाँच-सात पंक्तियों में लिखिए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) निर्धनता के अनेक कारण हैं। इनमें पहला कारण है किसी समाज में सम्पदा के वितरण में विषमता। दूसरा है, दुष्चक्र सिद्धांत जिसके अनुसार गरीब लोग धन की कमी के कारण गरीब बने रहते हैं। अंतिम कारण है, भौगोलिक पहलू जिसके अनुसार लोग जिन क्षेत्रों में रहते हैं, वे अनुत्पादक हैं, जिस कारण वे निर्धनता के शिकार होते हैं।
2) निर्धनता के अनेक कार्य हैं। ये इस प्रकार हैं:
प) इससे गंदे कार्यों का सम्पन्न होना सुनिश्चित बनता है।
पप) गरीब लोग घटिया सामान खरीदते हैं तथा घटिया सेवाओं में लगाए जा सकते हैं।
पपप) इससे सम्पन्न लोगों का जीवन सुखी बनाने में मदद मिलती है।
पअ) निर्धनता से ऐसा वर्ग पनपता है, जो परिवर्तन के आर्थिक तथा राजनीतिक कारणों को आत्मसात कर लेता है।