जाति मॉडल किसे कहते है ? जाति मॉडल की मूलभूत विशेषताएं परिभाषा caste model in hindi

By   November 29, 2020

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जाति मॉडल की मूलभूत विशेषताएं
आंद्रे बेटीली ने भारतीय समाज के जाति-मॉडल के इस परिप्रेक्ष्य की बुनियादी विशेषताओं की रूपरेखा एक विश्लेषण योजना के रूप में इसकी उपयोगिता की परख करते हुए तैयार की है। इस ‘जाति-मॉडल‘ की विशेषताएं इस प्रकार हैंः
प) यह मॉडल लोगों के कुछ विशेष वर्गों द्वारा माने और व्यक्त किए जाने वाले विचारों पर आधारित है। यह उनके आचरण पर आधारित नहीं है, हालांकि इसके अध्ययन के लिए द्वितीयक अनुभवजन्य सामग्री भी प्रयोग की गई है।
पप) यह भारत में जाति को एक तरह से पहला और सार्वभौमिक महत्व देता है जैसा कि शास्त्रों में इसकी धारणा दी गई है।
पपप) इस पूरी व्यवस्था को इस रूप में देखा जाता है कि यह कमोबेश स्पष्टतः रचित निश्चित सिद्धांत या ‘‘खेल के नियमों‘‘ से संचालित है।
पअ) आंद्रे बेटीली इस मॉडल से उत्पन्न होने वाले दो जोखिमों की ओर भी इशारा करते हैं। इसमें सबसे पहला खतरा तो यह है कि यह सिद्धांत इतना सामान्य है कि यह किसी भी समाज के लिए प्रयुक्त हो सकता है। दूसरा खतरा यह है कि यह आर्थिक और राजनीतिक जीवन की बारीकियों को लेकर नहीं चलता।

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बेटीली कहते हैं कि यह मॉडल, जो कि मुख्यतः लुई ड्यूमोंट के अध्ययन से जुड़ा है, हिंदुत्व से । संबंधित विश्वासों की व्याख्या में बड़ा उपयोगी रहा है। वह राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को समझने के लिए ‘हितों‘ के अध्ययन को महत्वपूर्ण मानते हैं । उन्होंने तंजोर गांव में जाति का जो विश्लेषण किया है वह इस तरह के सरोकार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। योगेन्द्र सिंह ने अपने अध्ययन में परिवर्तन को समझने का प्रयत्न किया है जिसमें वर्गीय कारक जाति श्रेणियों के ढांचे के भीतर अपनी पहचान के नए बोध के साथ कार्य करते हैं। इस तरह की घटनाओं में जाति । उल्लंघन भी होते हैं जो उन अंतर्विरोधों की तरफ हमारा ध्यान खींचते हैं जो पहले इतने स्पष्ट दिखाई नहीं देते थे।

संस्कृतिकरण का एम.एन. श्रीनिवासन का सिद्धांत जाति या वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन एक इसी तरह का प्रभावी प्रक्रिया है। संस्कृतिकरण को हम उन विशेष संदर्भो में देख सकते हैं जिनमें यह होता है। दूसरा, हम इसे समग्र रूप में वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में भी देख सकते हैं।

सांस्कृतिक परिवर्तन की एक अन्य प्रक्रिया को श्रीनिवास ‘पाश्चात्यकरण‘ कहते हैं। यह लोगों के मूल्यों, आदर्शों और सांस्कृतिक जड़ों में बदलाव लाता है। योगेन्द्र सिंह के अनुसार इन परिवर्तनों में ‘ढांचागत परिवर्तना‘ का अर्थ निहित है जो विशेषकर वर्ण व्यवस्था में और सामान्यतया भारतीय समाज में आ रहे हैं, जिन्हें क्रम परंपरा के विरुद्ध ‘विद्रोह‘ कहा जा रहा है या फिर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में फंसा बताया जा रहा है।

 ढांचागत परिवर्तन
भूमि सुधारों, शिक्षा के प्रसार, सामाजिक विधान, लोकतांत्रीकरण और नगरीकरण के रूप में ढांचागत परिवर्तन नजर आते हैं। इन परिवर्तनों का वर्ण व्यवस्था पर यह असर पड़ता है कि जातिगत संगठन जैसे अनुकूलन युक्तियां अक्सर सामाजिक लामबंदी की युक्ति बन जाती हैं। ये संगठन मुख्य रूप से अपने सदस्यों की भौतिक और सांसारिक जरूरतों और लक्ष्यों की पूर्ति के लिए प्रत्यनशील रहते हैं। इस प्रक्रिया में ये संगठन अपने सदस्यों को अपनी वंचना और ढांचागत अवरोधों के बारे में और अधिक सजग बनाते हैं। ये संगठन अक्सर गैर-जातिगत कार्यों से ही सरोकार रखते हैं। मगर ये वर्ग नहीं हैं, क्योंकि इन संगठनों के सदस्य अनेक वर्ग स्थितियों से जुड़े लोग होते हैं। इनमें अंतर जातिगत अंतर्विरोधों को उठने नहीं दिया जाता है। इससे इनमें साझी वंचनाओं और वर्गीय चेतना की धारणा भी उत्पन्न हो सकती है।

आर्थिक संबंध
वर्ण व्यवस्था को आर्थिक संबंधों की व्यवस्था के रूप में भी देखा गया है। जोआमेचर के अनुसार जो लोग या जातियां इस वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे हैं उनके लिए वर्ण व्यवस्था ने शोषण और दमन के एक बड़े ही व्यवस्थित और प्रभावशाली अस्त्र के रूप में काम किया है। इस व्यवस्था का कार्य ऐसे वर्गों का निर्माण रोकना है जिनके हित साझे हों या लक्ष्य एक हो। मेंचर ने वर्ग को मार्क्सवादी अर्थ में लिया है और जाति संबंधों के विश्लेषण के लिए मार्क्सवादी मॉडल अपनाया है। इस तरह जाति परस्पर निर्भरता और लेन-देन की व्यवस्था के बजाए शोषण की व्यवस्था है। जाति स्तरीकरण ने “वर्ग द्वंद्व” या ष्सर्वहारा चेतना” को विकसित होने से रोकने का काम किया है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘‘जाति को चरम सामाजिक-आर्थिक भेदों को आंशिक रूप से ढक देने से ही मान्यता मिलती है।‘‘
यहां पर गौर तलब बात यह है कि भारतीय समाज में स्तरीकरण की एक व्यवस्था के रूप में ‘वर्ग‘ उस तरह से घिरे हुए नहीं मिलते जिस तरह से जातियां घिरी हैं। तिस पर वर्ण व्यवस्था ने जो भी “समस्याएं‘‘ खड़ी की हैं उनमें से अधिकांश की प्रकृति वर्गीय है जिनका संबंध आर्थिक वर्चस्व और पराधीनता, विशेषाधिकारों और वंचनाओं, स्पष्ट क्षति और महज जीवित बने रहने से है। ये समस्याएं अनिवार्यतः संपन्न और वंचितों की है। इन्हें हम ठेठ मार्क्सवादी अंदाज में मूर्त या ठोस समूहों में नहीं रख सकते क्योंकि यहां वर्गीय वैमनष्य, वर्गीय चेतना और वर्गीय एकता विद्यमान नहीं है। इसलिए भारत की स्थिति अन्य समाजों से इस मामले में भिन्न है कि इसकी समस्याएं ‘वर्गीय‘ चरित्र की तो हैं मगर समाज के टुकड़ों के रूप में ‘वर्ग‘ ठोस-सामाजिक-आर्थिक इकाइयों के रूप में मौजूद नहीं हैं।

सत्ताधिकार और प्रभावी जाति
आंद्रे बेटीली के अनुसार सत्ताधिकार एक प्रभावी जाति से दूसरी प्रभावी जाति के पास चला गया है। यही नहीं यह जाति के ढांचे से निकल कर अपेक्षाकृत अधिक विभेदित ढांचों जैसे पंचायतों और राजनीतिक दलों के पास चला गया है। मगर अपनी इस विवेचना में बेटीली इस अंतरण के परिणामों पर गौर नहीं कर पाए हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या हम जाति ढांचे में हो रहे बदलावों का अध्ययन इनके फलस्वरूप उभरे “अनुपाती न्याय‘‘ ‘‘समानता/असमानता‘‘ के नमूनों का विश्लेषण किए बिना कर सकते हैं? अगर हम एक समतावादी व्यवस्था के नियमों में नैसर्गिक रूप से विद्यमान लचीलेपन का विश्लेषण नहीं कर सकते तो हमारे लिए औपचारिक संस्थाओं और ढांचों के उदय को जाति क्षेत्रों से ‘जाति-मुक्त‘ संरचनाओं के “अंतरण‘‘ के संकेतक के रूप में व्याख्या कर पाना मुश्किल होगा। यदि कोई जाति समग्र रूप से प्रभावीश् नहीं है और ‘‘प्रभावी समूह‘‘ कई जातियों के परिवारों से मिलकर बना हो तो इसका यह मतलब नहीं कि असमानता की विकरालता में भारी कमी आ गई है।

जाति और वर्ग में गठजोड़
हम कह सकते हैं कि बदलाव असमानता के एक ढांचे से दूसरे ढांचे में होता है। पहले भी जाति की विशेषता भूमिकाओं के अंतर-जाति विभेदन के साथ-साथ जातियों के अंदर विभेदन रहा है। इसलिए विभेदन अनिवार्यतः जातिगत असमानताओं में कमी से नहीं जुड़ा रहता। भूमिकाओं का विभेदन नई असमानताओं को जन्म दे सकता है जो मौजूदा असमानताओं को और प्रबल बना सकता है। ऐसी स्थिति में वर्ण व्यवस्था या किसी भी व्यवस्था में सबसे नीचे के समूहों के लिए यह विभेदन दो-धारी तलवार बन जाता है। ग्रामीण समुदायों में नये ढांचे के उदय के फलस्वरूप अब एक ओर “सर्वहारा जमींदार” या भूस्वामी हैं तो दूसरी ओर नव-धनाढ्य, नव प्रभावशाली नव-जमींदारों का वर्ग नजर आता है।

 एककालिक विश्लेषण
जाति पर हुए अध्ययनों का एक लाभ यह रहा है कि इनसे ‘फील्डवर्क‘ की एक परंपरा का सूत्रपात हुआ है। इनमें जाति को एक साम्यावस्थाकारी, समरस और सहमति-जन्य व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करने पर अधिक बल दिया गया है। परिवर्तन को अक्सर संबंधों में जैविक से खंडीय, संवृत से विवृत, समरस से असयरस में अंतरण के रूप में दर्शाया गया। लेकिन अनुभवजन्य प्रमाण हमें बताता है कि वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन अनुकूलनधर्मी और विकासक्रमिक रहा है।

अभ्यास 1
एककालिक विश्लेषण की चर्चा अपने अध्ययन केन्द्र के सहपाठियों से कीजिए। इस चर्चा से आपको जो जानकारी मिलती है उसे अपनी नोटबुक में लिख लें।

वर्ण व्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण हम असमानता और क्रम परंपरा के एक ढांचे से असमानता के दूसरे ढांचे में परिवर्तन से कर सकते हैं। वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन की इस गुत्थी को समझने के लिए हमें किसी एक समाज के लोगों की “संयुक्त स्थिति” का विश्लेषण ‘परिवार‘ या ‘व्यक्ति‘ या दोनों को विश्लेषण की इकाई मानकर करना होगा। इस तरह का मार्ग अपनाने के लिए जरूरी है कि हम जाति को एक गतिशील या प्रक्रिया मानें। इसके बाद हमें परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने के लिए एक कार्यपद्धति की जरूरत पड़ती है। इसी संदर्भ में हम अब जाति-वर्ग गठजोड़ के बारे में चर्चा करेंगे।

जाति और वर्ग पर बहस संकीर्ण वैचारिक दृष्टिकोणों के दायरे में सिमटी रही है। ‘जाति-मॉडल‘ के परिप्रेक्ष्य के अनुसार जाति एक अतिव्यापी वैचारिक व्यवस्था है जो सामाजिक जीवन, विशेष रूप से हिन्दुओं और साधारणतया अन्य सम्प्रदायों के जीवन के सभी पहलुओं को अपने में समेटे रहती है। इस तरह के दृष्टिकोण का एक निहितार्थ यह है कि जाति मूल रूप से भारतीय समाज के आंतरिक ढांचे का ही एक अंग है। इसलिए व्यवसाय, श्रम का विभाजन, विवाह के नियम, अंतर्वैयक्तिक (व्यक्तियों में परस्पर) संबंध बाहरी ढांचे के घटक हैं जो जाति की विचारधारा के पुनर्सजन को अभिव्यक्त करते हैं।