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bodo tribe in hindi of assam upsc tribal movement बोडो आंदोलन क्या है | बोडो जनजाति कहाँ पाई जाती है किसे कहते है ?

बोडो आंदोलन
समकालीन दौर में बोडो आंदोलन एक बड़ा रोचक विषय है। इस आंदोलन को ऑल बोडो स्टुडेंट्स यूनियन (अखिल बोडो छात्र संगठन) ने 1987 में शुरू किया था। इस आंदोलन की मुख्य दो मांगे हैंः (क) ब्रह्मपुत्र के नदीतट पर एक पृथक राज्य की मांग और (ख) संविधान की छठी अनुसूची में बोडो-कहारी कुछ अन्य जनजातियों को शामिल किया जाना। इस आंदोलन के मूल में हम एक गैर जनजातीय बहुल राज्य में एक प्रभावी जनजातीय समूह के रूप में बोडो लोगों की स्थिति को देख सकते हैं। सरकार का जनजातीयों के प्रति उपेक्षापूर्ण और उदासीन रवैया, आर्थिक शोषण, भूमि, नौकरियों और अन्य संसाधनों के नियंत्रण, भाषा, लिपि और जनजातीय जीवन के अन्य सांस्कृतिक पहलुओं के मद्देनजर बोडो पहचान को खोने का डर इत्यादि कारकों ने इस आंदोलन में उत्प्रेरक का काम किया।

 जनजातीय जातीयता का स्तरीकरण का आधार बनना
जातीयता की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि जाति की तरह यह भी एक स्थिति समूह है। परिवार और राज्य या राष्ट्र के बीच एक मध्यस्थ है। वेबर के अनुसार स्थिति समूह एक ऐसा जनसमूह है जिसे ऐसे ही अन्य समूहों की तुलना में एक विशिष्ट प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त रहता है। किसी भी वृहत्तर समूह में सांस्कृतिक भेद होना लाजमी है। मगर उभरती जातीय चेतना के चलते कुछ सांस्कृतिक भेदों को समूह की पहचान के जातीय चिन्हकों के रूप में प्रयोग किया जाने लगता है। सामूहिक पहचान और चुनिंदा चिन्हकों की यह जोरदार अभिव्यक्ति समूह को आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इत्यादि तरह-तरह के सामूहिक उद्देश्यों, हितों की पूर्ति के लिए लामबंद करने में सहायक होती है। ये सामूहिक उद्देश्य और हित जिस हद तक पूरे होते हैं या नहीं होते वह सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

सारांश
जातीयता को अगर साकारात्मक नजरिए से देखें तो वह समानता, आत्मोत्कर्ष सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, सांस्कृतिक विविधता, समतावादी सामाजिक व्यवस्था के प्रसार इत्यादि का एक बड़ा माध्यम है। इस अर्थ में जातीय समूह की लामबंदी राजसत्ता के सत्ताधिकार को कम करने का जरिया है। मगर वहीं यह कलह, जातीय संघर्ष, जातीय असहिष्णुता, समूहों की दासता इत्यादि का कारण भी बन सकती है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
ए.सी. भूपिंदर सिंह (संपा.) ट्राइबल स्ट्रीज ऑफ इंडिया सिरीज 183 एंटिक्विटी टु मॉडर्निटी इन मॉडर्न इंडिया (खंड प्प्) पृ. 221-247

बर्मन, बी.के. रॉय, 1972 ‘‘इंटेग्रेटेड एरिया एप्रोच टु द प्रॉब्लेम्स ऑफ ट्राइबल्स इन नॉर्थ-ईस्टर्न इंडिया‘‘ के. सुरेश सिंह (संपा.) ट्राइबल सिचुएशन इन इंडिया, नई दिल्ली/शिमला, मोतीलाल बनारसीदास

जातीय आंदोलन
जातीय आंदोलनों को आम तौर पर एक खास सामाजिक परिस्थिति में समूहों की प्रतिक्रिया के रूप में लिया जाता है जिसमें समूह विशेष को यह महसूस हो रहा हो कि उन्हें वंचित किया जा रहा है। इसकी वजह यह है कि उसे वह सब नहीं मिलता है जिसे वह अपने लिए न्यायोचित समझता है। इस न्यायोचित मान्यता का मतलब यह है कि जैसे उसके सदस्यों से हैसियत में बराबरी का बर्ताव नहीं किया जा रहा हो (यह उन्हें स्थिति तुल्य नहीं माना जा रहा हो) या उन्हें अन्य समूह से निचले दर्जे पर अनुचित रूप से रखा गया हो । उसका सरोकार स्थिति हैसियत की बराबरी या अपने ‘अधिकार‘ के रूप में ऊंची स्थिति हो सकती है। इस प्रकार भौतिक हितों के अलावा स्थिति, सामाजिक मान्यता, प्रतिष्ठा के सरोकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कोई भी जनजाति या आदिवासी समूह समानता की मांग कर सकता है या फिर अपनी संस्कृति, भाषा इत्यादि की श्रेष्ठता को प्रतिष्ठित करना चाह सकता है। जनजातीय लोगों के घोर संघर्ष के पश्चात आयाम राज्य से नागालैंड, मिजोरम और मेघालय राज्यों का उदय और उसके बाद अपने अलग राज्य, भाषा और लिपि के लिए बोडो लोगों का जारी आंदोलन इन सबने अंतः जातीय और अंतरजातीय स्तरीकरण व्यवस्था को कई महत्वपूर्ण कोणों से प्रभावित किया है।

जातीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक लाभ, नौकरी, शैक्षिक सुविधा इत्यादि प्राप्त करने की स्थिति में आने के लिए लामबंदी से जुड़ा है। यह इस प्रकार की मांग का रूप ले सकती है कि कुछ पद स्थान सिर्फ एक खास जनजाति को ही दिए जाएं या उन्हें जनजातीय आबादी के अनुपात के अनुसार बांटा जाए। इस प्रकार जातीय लामबंदी की प्रक्रिया संघर्ष दो सामान्य स्तरों पर प्रभावित करती है। (क) एक है उचित मान्यता के लिए संघर्ष (ख) दूसरा है विशेष आधार पर अधिक आर्थिक और राजनीतिक लाभ के लिए संघर्ष के आरंभ होते ही विभिन्न सांगठनिक और नेतृत्व स्तरों पर नए पदध्स्थान अस्तित्व में आ जाते हैं जिनको अलग-अलग सत्ताधिकार, प्रतिष्ठा और आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। यह नया परिवर्तन समूह के अंदर मौजूदा संबंधों को बदल सकता है।

 गतिशीलता और जातीय समूह
वृहत्तर जातीय समूहों के अंदर व्यक्तियों और उप-समूहों को नए किस्म के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं जिसके फलस्वरूप निजी और उप-वर्गों के स्तरों के बीच उपरिगामी और अधोगामी गतिशीलता उत्पन्न होती है। अगर कोई समूह अपने समूह के अंदर संस्कृति, सम्मान, प्रतिष्ठा इत्यादि भेदों को प्रतिष्ठित करता है तो इससे आमदनी, जीवनशैली, शिक्षा इत्यादि में मौजूदा व्यावयायिक विभेदन और विकसित रूप ले सकता है। तिर्यक-समूह समानताओं को पैदा कर और अंतरासमूह भेदों को बढ़ा करके यह प्रक्रिया विभिन्न जातीय समूहों के बीच मौजूद सीमा चिन्हकों को खतरे में डाल सकती है। विशेषकर जब वर्ग संबंध और वर्ग संबंधी जीवन शैलियां जातीय समहों की सीमाओं को तोडकर एक नया गठबंधन बना ले औ मान्यता और पुरस्कार पाने के लिए अपनी घनिष्ठता को अभिव्यक्ति दें। बल्कि यह पृथक राज्य या पृथक प्रांतीय स्वायत्तता की मांग उठा सकती है। इस लक्ष्य की पूर्ति होते ही इस समूह में नए विकार पैदा होने की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। विशेषकर पूर्वोत्तर जैसी स्थिति में भारतीय संविधान की छवि का कार्यान्वयन, संरक्षणात्मक भेद की गति विकास और एकीकरण की नीति, चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी इन सबने जातीय चेतना को और धारदार बना दिया है जिसे वृहत्तर राजनीतिक सत्ताधिकार, संसाधनों और गतिशीलता पाने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इन सब कारणों से जनजातीय और गैर जनजातीय लोगों के बीच संबंध भी बदल रहे हैं। एक सामाजिक श्रेणी के रूप में जनजातीय लोगों को अब घृणा से नहीं देखा जाता या निकृष्ट नहीं समझा जाता है बल्कि वे राज्य में प्रभावी समूह के रूप में देखे जा सकते हैं। जनजातीय समूह एक वंचित समूह हो सकता है जिसके अंदर कठोर असमानताएं मौजूद रहती हैं। इस प्रकार एक हद तक जनजातीय और सामान्य लोगों में भेद तुलनीय शैक्षिक वर्ग स्थिति वालों के मुकाबले घट रहे हैं, जिनमें समानता जनजातीय और गैर जनजातीय लोगों के बीच विद्यमान समानताओं से कहीं ज्यादा समतावादी हो सकती है।