आर्य समाज का शुद्धि आन्दोलन आर्य समाज सुधार क्या है Arya Samaj Movement and Reform Shuddhi in hindi

By   February 2, 2021

Arya Samaj Movement and Reform Shuddhi in hindi आर्य समाज का शुद्धि आन्दोलन आर्य समाज सुधार क्या है ?

आर्य समाज आन्दोलन एवं समाज सुधार (Arya Samaj Movement and Reform)
आर्य समाज ने, समूचे उत्तरी भारत में बालक व बालिकाओं के लिए बड़ी संख्या में शिक्षा संस्थान खोले । अनाथालय खोले गए और इस तरह से ईसाई मिशनरियों को, लोगों को, ईसाई धर्म में शामिल करने से रोका गया। आर्य समाज ने भूकम्प राहत के लिए सेवा, कार्य किया। 1923 में जब मालाबार के मोपलाओं द्वारा जबर्दस्ती हिन्दुओं को इस्लाम धर्म अपनाने पर विवश कर दिया था, तब आर्य समाज ने ही उन्हें दोबारा हिन्दू धर्म में शामिल किया था। महात्मा गांधी द्वारा अछुतोद्धार का काम अपने हाथों में लिए जाने से पहले आर्य समाज ही था जिसने उन्हें हिन्दू समाज में बराबरी का दर्जा प्राप्त सदस्यों के रूप में मान्यता दिलाने हेतु प्रयास किये थे। उन्होंने उनके बीच फैले अंधविश्वासों को दूर करने तथा उन्हें धर्म की बुनियादी प्रस्थापनाओं की शिक्षा देने के लिए भी अथक प्रयास किया था।

आर्य समाज के शिक्षा कार्यक्रम के तहत दयानन्द ने अनेक गुरुकुलों की स्थापना की। पहले डी.ए.वी. (दयानन्द एॅग्लोवैदिक) कॉलेज की स्थापना लाहौर में दयानन्द की स्मृति को अमर बनाने के लिए 1883 में अजमेर में उनका निधन हो जाने के बाद की गई। यह संस्थान देश में राष्ट्रीय शिक्षा का केन्द्र बिन्दु बन गया। लाहौर कॉलेज के संस्थापकों का इरादा, विद्यार्थियों को उनकी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जड़ों से अलग किये बिना उनके भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना था। उस समय तक केवल ब्रिटिश सरकार अथवा विदेशी ईसाई मिशनरियों द्वारा ही इस प्रकार के अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय स्थापित किये गये थे। हालांकि दयानन्द के कुछ अनुयायियों, उदाहरण के तौर परय स्वामी श्रद्धानन्द ने शिक्षा के माध्यम के साथ सहमति प्रकट नहीं की और उत्तर प्रदेश में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में, एक गुरुकुल नामक समानान्तर संस्थान की स्थापना की और वह भी आगे चलकर काफी विकसित हुआ। यह आवासीय पाठशालाओं के प्राचीन उद्देश्य पर आधारित था, जिसमें शिक्षकगण एवं विद्यार्थी एक परिवार की तरह रहते थे। आज भारत भर में गुरुकुल की संख्या 50 से अधिक है, जिनमें से अधिकांश हरियाणा में हैं। उस समय दोनों पक्षों (डी.ए.वी. तथा गुरूकुल) के बीच विवाद उठ खड़ा हुआ था, क्योंकि दोनों ही दयानन्द का वास्तविक अनुयायी होने का दावा कर रहे थे। शिक्षा केन्द्र, सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त थे और ब्रिटिश विरोधी माने जाते थे। पुनः डी.ए.वी. कॉलेज, आन्दोलन के नेतृत्व में आर्य समाज की राजनीतिक तौर पर उद्धार शाखा ही थी, जिसने शिक्षित मध्यम वर्ग पर अधिक गहरा प्रभाव डाला। मध्यम वर्ग 19वीं शताब्दी में यह भारतीय नवजागरण का अग्रदूत था। इस तरह आर्य समाज की शिक्षा नीति लार्ड विलियम बैण्टिक (1834 की नीति) तथा ईसाई मिशनरियों की नीति से पूरी तरह भिन्न थी, जिनका उद्देश्य तो प्रशासन के लिए लिपिक तैयार करना था अथवा धर्मान्तरण किये हुए ईसाई पैदा करना था।

 हिन्दू धर्म को तीन चुनौतियाँ (Three Challenges to Hinduism)
हिन्दू धर्म विकसित हुआ एवं पनपा और इसमें किसी भी नये व्यक्ति को अपने अन्दर सम्मिलित करने की क्षमता थी। यह धर्म साधारण रूप से अपनी शाश्वत प्रकृति के बारे में सुनिश्चित था, यानि यह विश्वास किया जाता था कि यह धर्म सदा बना रहेगा। परन्तु इतिहास साक्षी है, कि इस धर्म को तीन बार संघर्षपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। एक बार बौद्ध एवं जैन धर्मों से, बाद में इस्लाम से एवं अन्त में ईसाई धर्म से। अंग्रेजी शासनकाल में, हिन्दुत्व पर तीसरी बार, जो आखिरी विपदा आई थी, उसमें आर्य समाज ने इस धर्म की रक्षा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हिन्दुओं की बहुसंख्या में, ईसाई धर्म में परिवर्तनों पर आर्य समाज ने सफलता पूर्वक रोक लगा दी थी। हिन्दुत्व की प्रतिरक्षा में आर्य समाज ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

आर्य समाज एवं महिलाओं का उद्धार (Arya Samaj and Emancipation of Women)
हरिजनों की भांति महिलाओं को दासों का दास कहा जाता था । पुरुष, अंग्रेजों के दास थे एवं महिलाएं इन दास बनाए गए पुरुषों की दास थीं। महिलाओं के अधिकार बेहद सीमित होते थे, उनको मामूली स्वतंत्रताएं प्राप्त थी एवं उनको पुरुष की मान्यता शायद ही प्रदान की जाती थी।

आधुनिक काल में महिलाओं को अधिकार एवं समानता दिलवाने में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द अगुआओं में से एक थे। उन्होंने स्त्रीय/पुरुष की बराबरी के पक्ष का समर्थन किया था। दयानन्द ने महिलाओं को वेदों के अध्ययन करने की अनुमति प्रदान की थी, जो उस समय एक क्रान्तिकारी कदम माना जाता था। उनको गायत्रीमंत्र के उच्चारण करने की भी अनुमति प्रदान की गई थी। जबकि परंपरा उन्हें इस तरह की सुविधा देने की इजाजत नहीं देती थी। दयानन्द ने बलपूर्वक यह तर्क प्रस्तुत किया था कि अकेले ऋग्वेद में 200 मंत्र महिला ऋषियों द्वारा बनाए गए हैं।

उसने बाल विवाह के विरुद्ध भी एक धर्म युद्ध चलाया था। स्वामी दयानन्द ने आदेश दिया था, कि किसी भी कन्या का विवाह 16 वर्ष की आयु से पूर्व एवं लड़के का 25 वर्ष की आयु के पूर्व नहीं करना चाहिए। इस प्रकार उसको उस समय की प्रचलित ‘‘शास्त्रीय निषेधाज्ञा‘‘ का सामना करना पड़ा था, जिसके अनुसार कन्या को यदि अपने पिता के घर में मासिक धर्म हो तो कन्या के पिता एवं भाई को नरक जाना पड़ता था। स्वामी दयानन्द ने इस धारणा को निर्मूल कर दिया था। उसने यह तर्क दिया था कि इस कुदरती प्रक्रिया के लिए किसी व्यक्ति को नरक में क्यों जाना चाहिए।

स्वामी दयानन्द का कहना था कि पुरुष एवं महिलाओं को केवल एक बार विवाह करना चाहिए। किसी युवा विधवा के लिए विधवा विवाह की अपेक्षा वह ‘‘नियोग‘‘ को वरीयता प्रदान करता था । ‘‘नियोग‘‘ से उनका आशय अपने दिवंगत पति के भाई या किसी अन्य आत्मीय के साथ एक या दो पुत्र प्राप्त करने के लिए अस्थायी रूप से पुनर्मिलन करना था, परन्तु बच्चे दो से अधिक नहीं होने चाहिए। परन्तु “नियोग‘‘ के विचार को आर्यों ने स्वीकार नहीं किया था और स्वामी दयानन्द ने भी इसके लिए अधिक दबाव नहीं डाला था । वास्तव में, पंजाब के आर्य समाज ने विधवा विवाह के लिए विज्ञापन देकर कुछ विवाह सम्पन्न करवाये थे और स्वामी दयानन्द ने उनको अपनी स्वीकृति प्रदान की थी।

आर्य समाज ने, सामान्य तौर पर जन साधारण की शिक्षा में काफी सुधार किया था एवं महिलाओं की शिक्षा का बहुत प्रभावी ढंग से प्रचार किया था। जैसा कि पहले उल्लिखित है, इसने सारे देश में लड़के एवं लड़कियों, दोनों के लिए अनेक स्कूलों एवं विद्यालयों की व्यवस्था की है जहां मातृभाषा में शिक्षा प्रदान की जाती है । दयानन्द ऐंग्लो वैदिक विद्यालयों की स्थापना की गई। कुछ कट्टरपंथी आर्य समाजियों का विचार था कि इन विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा समुचित रूप से वैदिक नहीं है, इसलिए मुंशी राम के नेतृत्व में उन्होंने हरिद्वार में गुरूकुल को शुरू किया, जहां प्राचीन रीति-रिवाजों से शिक्षा प्रदान की जाती है। महिलाओं के लिए स्कूलों एवं विद्यालयों और गुरूकुलों को खोलने में अग्रणी होने के कारण आर्य समाज ने सन 1896 में जालन्धर में प्रथम कन्या महाविद्यालय की स्थापना की थी।

बोध प्रश्न 2
1) लाहौर के आर्य समाज के सदस्यों की शैक्षिक योग्यताओं के बारे में एक संक्षिप्त विवरण लिखिए। पांच पंक्तियों में अपना उत्तर दीजिए।
2) महिलाओं के उद्धार में आर्य समाज की भूमिका को विस्तार से लिखिये । सात पंक्तियों में अपना उत्तर दीजिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 2
1) शुरू के लाहौर आर्य समाज के सदस्य उच्च शिक्षा प्राप्त थे और उनमें वकील, डाक्टर, स्नातक एवं स्नातकोत्तर मौजूद थे। इस तरह समाज के सदस्य उच्च शिक्षा प्राप्त थे।

2) औपनिवेषिक भारत में महिलाएं गुलामों की भी गुलाम थीं । दयानन्द ने इस गुलामी के विरुद्ध संघर्ष किया। उन्होंने बाल-विवाह के खिलाफ भी संघर्ष किया तथा नियोग को प्रस्तुत किया तथा अनेक गहरी जड़े जमाये बैठी रूड़ियों का विरोध किया। उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह कराये । महिलाओं की शिक्षा के लिए दयानन्द ने ष्गुरूकुलष् नामक महिलाओं के शिक्षा संस्थान शुरू किए।