गठबंधन की राजनीति क्या है समझाइए | गठबंधन की राजनीति किसे कहते हैं इतिहास बताओ लाभ alliance government in hindi

By   October 16, 2020

alliance government in hindi गठबंधन की राजनीति क्या है समझाइए | गठबंधन की राजनीति किसे कहते हैं इतिहास बताओ लाभ ?

प्रस्तावना
‘गठबंधन‘ शब्द अंग्रेजी के ‘कोअलिशन‘ (ब्वंसपजपवद) शब्द का अनुवाद है जो लैटिन शब्द के ‘कोअलिशियो‘ (ब्वंसपजपव) शब्द से निकला है। यह शब्द ‘कोअलैसर‘ यानी सम्मिलन- सह अथवा साथ-साथ, और ‘अलैसर‘ यानी मिलन – बढ़ना का क्रिया-संबंधी सत्तावाचक है, जिसका अर्थ है बढ़ना अथवा साथ-साथ । इस प्रकार गठबंधन का अर्थ है सम्मिलन की क्रिया अथवा एक निकाय – दलों के एक संघ, में संगठित होना। विशिष्ट राजनीतिक संदर्भ में गठबंधन शब्द किसी एकल सरकार को बनाने के लिए राजनीतिक ताकतों के एक गठजोड़ अथवा अस्थायी संगठन को इंगित करता है । इस प्रकार के गठबंधन किसी लोकतांत्रिक राज्य में किसी बहुदलीय प्रणाली की आकस्मिक आवश्यकताओं के फलस्वरूप सीधे उत्पन्न होते हैं। गठबंधन सरकारों को सामान्यतः उन एकदलीय सरकारों के विषम रूप में देखा जाता है जिनमें एक दल ही सरकार बनाता है।

कोई गठबंधन किसी सामान्य खतरे के बोध से एक साथ लाए गए प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक कर्त्ताओं का समूहीकरण होता है, अथवा इस मान्यता के फलस्वरूप उनके लक्ष्य विलग रूप से काम करके नहीं प्राप्त किए जा सकते। सामान्य शब्दों में किसी गठबंधन को उस संसदीय अथवा राजनीतिक समहीकरण के रूप में लिया जाता है जो किसी दल अथवा गुट अथवा किसी हित-समूह की बनिस्पत कम टिकाऊ होता है।

 गठबंधन राजनीति के प्रकार
किसी देश की संवैधानिक संरचना और निर्वाचन प्रणाली उसी आकार को निर्धारित करती है जो गठबंधन राजनीति धारण करती है। ये स्वभावतः तीन हैं: संसदीय, चुनावीय और सरकारी।

संसदीय गठबंधन में उस स्थिति में हो सकता है जब किसी एक दल के पास पूर्ण बहुमत न हो। वह दल जिसको सरकार बनाने को कहा जाता है, अपने अस्तित्व के लिए अन्य दल अथवा दलों के साथ समझौते पर भरोसा करते हुए एक अल्पसंख्यक सरकार के रूप में शासन करने का प्रयास करता है। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार एक ऐसी ही सरकार थी। ऐसी सरकार विधि-निर्माण के विभिन्न मुद्दों के लिए विपक्षी राजनीतिक दलों से समर्थन माँग सकती है अथवा वह सरकार मात्र इसलिए चल सकती है कि विपक्ष या तो राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए अथवा उसको वर्तमान राजनीतिक आधार से वंचित न किए जाने के लिए सरकार को हराना पसंद ही न करता हो। 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार अपने आरंभिक कार्यकाल में इसी प्रकार की सरकार थी।

चुनावीय गठबंधन दो अथवा दो से अधिक ऐसे राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ऐसा समझौता करते हैं कि जिससे किसी चुनाव में आपस में प्रत्याशियों के नाम वापस ले सकें ताकि संबद्ध दल द्वारा उन निर्वाचन क्षेत्रों में वोट कटने से बच सकें जहाँ वे क्रमानुसार मजबूत स्थिति में हैं। ऐसे गठबंधन बनाना तब मुश्किल होता है जब सुदृढ़ स्थानीय आधार वाले दल और संगठन किसी प्रत्याशी को खड़ा करने के लिए अपने अधिकारों का समर्पण नहीं कर सकते । संयुक्त मोर्चा तथा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के रूप में ऐसे चुनावीय गठबंधन हाल के बीते दिनों में भारत में आम हो गए थे।

गठबंधन सरकारें सामान्यतः ऐसी एकदलीय सरकार के विषम रूप में देखी जाती है जिसमें एक ही दल सत्तारूढ़ होता है। ऐसी सरकारों को उन गैर-पक्षावलम्बी सरकारों से भी भिन्न रूप से देखा जाना चाहिए जिनमें मंत्रिपरिषद् के सदस्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के रूप में कार्य नहीं करते। गठबंधन सरकारें दलीय सरकारें होती हैं। किसी गठबंधन सरकार की सदस्यता प्रचलित रूप में उन दलों के रूप में परिभाषित की जाती है जिनको मंत्रिपरिषद् में प्रतिनिधित्व दिया जाता है। कुछ संसदीय सरकारें, तथापि, उन दलों के साथ भी सुसंगत रूप से सहयोग करती हैं जिनका मंत्रिपरिषद् में प्रतिनिधित्व नहीं होता।

सरकारी के स्तर पर विभिन्न प्रकार के गठबंधन हुआ करते हैं। पहला प्रकार है राष्ट्रीय सरकार जिसमें अधिकांश, यदि सब नहीं, मुख्य दल युद्ध अथवा आर्थिक संकट से पैदा हुई एक राष्ट्रीय आपात् स्थिति से निबटने के लिए एकजुट होते हैं। इस प्रकार की सरकार गठित किए जाने के पीछे तर्क यह है कि राष्ट्रीय संकट के दौरान दलगत झगड़ों को छोड़ने की आवश्यकता होती है और किसी सर्वमान्य दिशा में सभी ताकतों को संकेंद्रित किया जाना होता है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान आस्किथ तथा लॉयड जार्ज और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान विन्सटन चर्चिल के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारें राष्ट्रीय सरकारों के उदाहरण थे।

सत्ता-बाँट गठबंधन सरकारें उस वक्त बनायी जाती हैं जब दो अथवा दो से अधिक राजनीतिक दल जो अपने बूते बहुमत सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हैं, एक बहुमत सरकार बनाने के लिए एकजुट होते हैं। नब्बे के दशक में संयुक्त मोर्चा और भा.ज.पा. के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारें ऐसी ही थीं। सत्ता-बाँट गठबंधन सरकारें उन नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू करने के लिए भरसक प्रयास करती हैं जो कि गठबंधन साझीदारों के बीच तय हुआ होता है। योरोप महाद्वीप के देशों को ऐसी सरकारों का बहुधा अनुभव हुआ है।

 गठबंधन व्यवहार
गठबंधन व्यवहार का अध्ययन निम्नलिखित प्रश्न सामने रखता है: वे विशिष्ट परिस्थितियाँ क्या हैं जो विभिन्न रानीतिक दलों को गठजोड़ करने के लिए प्रवृत्त करती हैं? एक दल विशेष अन्य दलों के साथ गठजोड़ करना क्यों पसंद करता है? कोई राजनीतिक दल किसी गठबंधन में शामिल होकर किन लाभों की उम्मीद कर सकता है?

विभिन्न देशों तथा विभिन्न कालों में गठबंधन राजनीतिक के ऐतिहासिक अनुभवों से लेकर किए गए एक तुलनात्मक अध्ययन से निम्नलिखित प्रव त्तियाँ उजागर हुईं:

प्रथम, वे सभी राजनीतिक दल जो गठबंधन में शामिल होते हैं, का उद्देश्य होता है निर्णयन प्रक्रिया पर अपने दीर्घकालीन प्रभाव को बढ़ा सकें।

दूसरा, गठबंधन के पुनर्वितरणीय परिणामों से संबंधित जागरुकता के चलते, सदस्य दल पुनर्वितरण के लाभों के आबंटन पर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं।

तीसरा, गठबंधन साझीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा उस सीमा से बँधी है जहाँ तक प्रत्येक साझेदार सहयोगियों की तरफ से प्रतिस्पर्धात्मक माँगों को बर्दाश्त कर सकने के इच्छुक हैं।

चैथा, ऐसी परिस्थिति में जहाँ गठबंधन साझीदारों के बीच सहनशीलता उच्च स्तर की हो, प्रतिस्पर्धात्मकता को राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से गैर-आनुपातिक रूप से उच्च लाभों के साथ नवाजा जाता है।

 गठबंधन सरकार: एक तुलनात्मक अध्ययन.
युनाइटिड किंगडम, न्यूजीलैण्ड तथा कनाडा जैसी शुद्ध अथवा परिष्कृत द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणालियों में गठबंधन सरकारें शांतिकाल में कम ही होती हैं। बहुदलीय प्रणाली वाले देशों में जैसे बेल्जियम तथा नीदरलैण्ड्स, लगभग सभी सरकारें गठबंधन वाली ही रही हैं। डेनमार्क तथा स्वीडन जैसे बहुदलीय प्रणाली वाले अन्य योरोपीय देश भी हैं जहाँ सरकारें गठबंधनात्मक अथवा एकदलीय (अक्सर अल्पमत वाली) में से कोई एक हैं। सामान्य परिस्थितियों में गठबंधन सरकारें दो से पाँच दलों द्वारा बनायी जाती हैं। तथापि, विगत दिनों में भारत जैसे देशों में देखा गया है कि गठबंधन सरकार 18 दलों की नींव पर बनायी जा रही है यथा 1998 में वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार । स्विट्जरलैण्ड एक अनोखा उदाहरण है जहाँ सभी बड़े दल गठबंधन सरकारों में नियमित रूप से शामिल किए जाते हैं।

गठबंधन सरकारें अनिवार्य रूप से संसदीय प्रकार की सरकारों का अभिलक्षण होती हैं, परन्तु वे फ्रांस तथा स्विट्जरलैण्ड जैसे देशों में भी बनायी गई हैं जहाँ ‘परिष्कृत‘ संसदीय अथवा ‘अर्ध-अध्यक्षीय‘ प्रणाली है। विकसित देशों में लगभग सभी दल केन्द्रवादी विचारधारा अपनाते हैं। सत्ता-बाँट अधिकांशतः इस प्रकार की सरकारों का मुख्य आधार होता है। बहरहाल, भारत तथा श्रीलंका जैसे विकासशील देशों में गठबंधन सरकारें सैद्धांतिक आधार पर बनायी गई हैं। इटली, डेनमार्क, फ्रांस तथा स्वीडन जैसे कुछ विकसित देशों को भी सैद्धांतिक समांगता के आधार पर बनी गठबंधन सरकारों का अनुभव है।

विकसित तथा विकासशील, दोनों प्रकार के देशों में गठबंधन सरकारों के व्यापक अस्तित्व के बावजूद, गठबंधन सरकारों के गठन तथा विलय की प्रक्रिया के संबंध में कोई पर्याप्त संवैधानिक प्रावधान नहीं है। जर्मन का संविधान एक महत्त्वपूर्ण अपवाद है जिसमें ऐसे प्रावधान हैं जो किसी विकल्प को समर्थन देने के लिए तैयार हुए बगैर किसी सरकार को गिरा देना गैर-जिम्मेदार सांसदों के लिए असंभव बनाते हैं। स्वीडन में, सरकारी दस्तावेज 1974 कुछ विस्तार के साथ गठबंधन – सरकार की निर्माण-प्रक्रिया की व्याख्या करने का प्रयास करता है।

बोध प्रश्न 2
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) गठबंधन व्यवहार में विभिन्न प्रवृत्तियाँ क्या है?
2) गठबंधन सरकारों के गठन और विलय की प्रक्रिया के संबंध में क्या कोई संवैधानिक प्रावधान हैं? स्पष्ट करें।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) ये हैं: सभी दल एक गठबंधन बनाते हैंय गठबंधन के सदस्य पुनर्वितरण लाभों के आबंटन पर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैंय गठबंधन साझीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा एक सीमा से बँधी हैय और, गठबंधन साझीदारों की प्रतिस्पर्धात्मकता को राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से असंगत रूप से उच्च लाभों के साथ नवाजा जाता है।

2) जर्मन संविधान को छोड़कर, कहीं भी कहीं भी ऐसे कोई प्रावधान नहीं है।

 भारत में गठबंधन राजनीति (1947-1967)
1947 से 1967 तक का काल भारतीय राजनीति में स्वभावतः गठबंधनात्मक रहा। यह राजनीतिक दलों अथवा राजनीतिक संगठनों के स्तर पर था। रजनी कोठारी, मोरिस-जोन्स तथा मायरन दीनर जैसे क्रियाशीलवादी राजनीति-शास्त्रियों ने एक एकदलीय प्रभुत्व प्रणाली अथवा कांग्रेस प्रणाली के विचार के माध्यम से साठ के दशकांत में इस स्तर पर एक सैद्धांतिक आदर्श विकसित किया। कांग्रेस का प्रभुत्व उसके द्वारा केन्द्र में संसद में प्राप्त सीटों की संख्या के तथा राज्यों में बनायी गई सरकारों के लिहाज से, दोनों में प्रकट हुआ, साथ ही विधानमंडल निकायों के बाहर उसकी दुर्जेय संगठनात्मक शक्ति के लिहाज से भी। इस प्रकार पहले तीन आम चुनावों में कांग्रेस ने 45 प्रतिशत के आसपास वोट प्राप्त किए और संसद में 75 प्रतिशत सीटें जीतीं। छोटे-मोटे व्यवधानों को दरकिनार करते हुए कांग्रेस लगभग सभी राज्यों में तथा केन्द्र में सत्ता सम्भालती रही। मोरिस-जोन्स के अनुसार, कांग्रेस प्रणाली ‘प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व वाले प्रभुत्व नहीं वरन् लेशमात्र भी विकल्प के बगैर‘ में प्रतिबिंबित हुई। राजनीतिक व्यवस्था में कांग्रेस के इस प्रकार के विराट् प्रभुत्व ने अन्य दलों को हाशिये पर धकेल दिया।
इससे यह बात सामने आती है कि इस काल के दौरान भारत की राजनीतिक प्रणाली को सरकार व विपक्ष की मानक पाठ्यपुस्तक आरूप को साथ लेकर नहीं समझा जा सकता था। ये राज्य स्तर के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर विराट् कांग्रेस बनाम छोटी व बिखरी विपक्षी ताकतें थीं । कांग्रेस ने मौरिस डुवर्जर के उस नियम को सफलतापूर्वक परिभाषित किया जो द्वि-दलीय प्रणाली से अपेक्षा करता था कि वह उसकी सीमाओं के भीतर राजनीति प्रतिस्पर्धा तथा मण्डलीय व्यवस्था लागू करते हुए तथा फिर भी गुटों के एक उत्कृष्ट प्रबंध माध्यम से इसे एकजुट रखते हुए एक बाहुल्य निर्वाचन प्रणाली में प्रकट हो । गुटों के इस प्रकार के वृहद् गठजोड़ को रचने और बनाये रखने में भारतीय समाजों की उन जटिलताओं और संदिग्धार्थताओं से बड़ी ही मदद मिली जिन्होंने ध्रुवीकरण अथवा अन्तर्विरोधों को पैदा किए जाने की जाने की अनुमति नहीं दी वरना उससे सर्व-समाविष्ट्य गठबंधन में दरार पड़ जाती। इसमें मायरन वीनर के अनुसार, उन पारम्परिक मूल्यों तथा समझौते की भूमिकाओं से भी मदद मिली जो कांग्रेस पार्टी ने चतुरता से अपना लीं । ठीक इसी प्रकार, रजनी कोठारी ने भी कांग्रेस पार्टी द्वारा अपनाए गए अनेकवाद, समायोजन तथा सौदेबाजी पर आधारित सहमतिजन्य राजनीति पर विशेष प्रकाश डाला है।

इस प्रकार, सर्वसम्मति वाली एक केन्द्रीय गैर-आनुपातिक रूप से बड़ी पार्टी के इर्द-गिर्द ऐसे दवाब वाले काफी मिलते-जुलते विपक्षी दल खड़े हो गए जिन्होंने सत्तारूढ़ दल तथा विपक्षी दलों व समूहों, दोनों पर एक गठबन्धनात्मक युक्तियुक्त विचार थोप दिया। कांग्रेस के अत्यधिक संगठनात्मक आकार, क्षेत्रीय प्रसार, तथा सैद्धान्तिक विविधता ने कांग्रेस को वैचारिक रूप से भिन्न समूहों वाले एक निर्बन्ध संगठन में बदल दिया। वैचारिक तथा क्षेत्रीय रूप से इन अपसारी समूहों ने उन विपक्षी दलों के साथ अनुबद्धता में प्रतिपक्षी की भूमिका अदा की जिनके साथ उन्होंने विचारधारा व हितों के लिहाज से समरूपता निभाई थी। विपक्षी दलों के लघु आकार ने सुनिश्चित कर दिया कि अप्रत्यक्ष दवाब-समूहों की भाँति और अधिक कार्य करके ही वे राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं । कोठारी के तर्कानुसार, “कांग्रेस प्रणाली लक्षणतः हमेशा रही है।‘‘ गठजोड़ बहु-गुट वाली और आन्तरिक सौदेबाजी तथा लामबन्दी की एक सतत् प्रक्रिया के द्योतन वाली प्रणाली गठबंधन का युक्तियुक्त विचार न सिर्फ कांग्रेस के अन्तः समूहों पर वरन् विपक्षी दलों पर भी थोपा गया। इस अवधि के दौरान सरकारी नीतियाँ अधिकतर प्रतिदल समूह-दलों द्वारा तय की जाने लगी बजाय इसके कि वे आन्तरिक पार्टी मतदान अथवा सरकार अथवा विपक्ष के किसी परम्परागत मत-विभाजन की लीक पर तय की जातीं।

भारतीय राजनीति का गठबन्धात्मक स्वभाव तब स्पष्ट हुआ जब केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व ने अक्सर विजयी गठबंधन के समर्थन के प्रति निश्चिंत होने पर कोई न कोई निर्णय पार्टी के भीतर ही ले लेने की बजाय पूरी राजनीति व्यवस्था पर छोड़ दिया। यही वह तरीका था जिससे कांग्रेस के संकट दूर हुए जैसा कि मैक्स जिनका कांग्रेस का अध्ययन उजागर करता है।

 भारत में गठबंधन सरकारों का उद्गमन (1967-1977)
1967 के चुनावों में गठबंधन राजनीति एक अन्य रूप में देखी गई – अब गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों को भी शामिल किया जाने लगा। विपक्षी दल एक चुनावी गठजोड़ में शामिल होकर छह राज्यों में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हराने में सक्षम थे। आर्थिक कठिनाइयाँ, घटती औरसता और यह तथ्य कि कांग्रेस ने डाले गए वोटों के लिहाज से कभी भी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं किया, कांग्रेस की बाधा को स्पष्ट करते हैं। 1967 के चुनावों ने, मोरिस-जोन्स के अनुसार, एक प्रायः नियमित और सतत् दलबदलू-बाजार‘ की ओर ले जाती एक “बाजार नीति‘‘ के उद्गमन की ओर प्रवृत्त किया। इस प्रकार, विपक्षी दलों द्वारा सत्ता-बाँट गठबंधन के निर्माण और कांग्रेस गुटों के दल-त्याग ने नौ राज्यों में गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकारों की ओर प्रवृत्त किया।

बहरहाल, गठबंधन तकनीक जो कांग्रेस के लिए बड़ी कारगर थी, ने विपक्षी दलों के मामले में ठीक उलटा किया। यह इस तथ्य द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है कि अपसारी विचारधाराओं वाले विपक्षी दलों को व्यापक समर्थनाधार मिलने से चुनावी रूप से फायदा हुआ। तथापि, गठबंधन सरकारों की विफलता की ओर ले जाते प्रशासन में संकट की ओर इसी कारक ने प्रवृत्त किया।

कांग्रेस, इस प्रकार, 1967 के चुनावों में हारे गए राज्यों में से अधिकांश में फिर से सत्तारूढ़ होने में सक्षम थी। तथापि, 1967-उपरांत कांग्रेस ने एक नई राजनीतिक प्रक्रिया अपनायी जिसकी पहचान थी – सहमतिजन्य राजनीति का स्थान विपक्ष के प्रति मुकाबलावादी राजनीति द्वारा लिया जाना। इसे नीति के ‘बाजारीकरण‘ के साथ-साथ पार्टी में सत्ता के अति-केन्द्रीकरण से भी, यानी दोनों से, निबाहना था। कांग्रेस ने इस प्रकार चुनावी राजनीति का एक जनमत तरीका अख्तियार कर लिया जिसने पार्टी में संस्थागत ह्रास की ओर प्रवृत्त किया। इससे राज्य स्तर के उन कांग्रेसी नेताओं की अक्षमता स्पष्ट होती है जो हित-सम्मिलन और गुटीय राजनीति के सृजन और परिचालन द्वारा राज्यों में राजनीतिक संतुलनों को कायम रखने में ‘निर्वाचित‘ की बजाय ‘नामांकित‘ थे। एक अति-केन्द्रीकृत राजनीतिक नेतृत्व द्वारा राज्य-स्तरीय कांग्रेस के विध्वंस ने राज्य स्तर पर कांग्रेस से वास्तविक प्रतिस्पर्धा के उद्गमन की ओर प्रवृत्त किया।

यद्यपि 1971 के चुनाव में इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की अभूतपूर्व चुनावी जीत प्रारम्भतः कांग्रेसी आधिपत्य के पुनरुत्थान के रूप में देखी गई, अनुदर्शन में यह स्पष्ट है कि कांग्रेस का आभासी सातत्य भ्रामक था। वह कांग्रेस जिसको 1971 में इन्दिरा गाँधी सत्ता में लाईं, अनेक प्रकार से ऐसी नई पार्टी थी जिसको उस चुनावी राजनीति के एक नए मैदान हेतु मोल-तोल करना पड़ा, जो इसे वास्तविक प्रतिस्पर्धा में बदलती चुनावी राजनीति के खेल में ‘मध्यम‘ कृषक जातियों व क्षेत्रीय समूहों से आते अनेक नए प्रवेशकों की उपस्थिति से संकेतित थी।

इससे पता चलता है कि कांग्रेस अब कोई एकल प्रबल दल नहीं रही थी परन्तु पूरे सत्तर व अस्सी के दशक में यह लगातार शासन करने वाली स्वाभाविक पार्टी बनी रही यानी वह ध्रुव जिसके इर्द-गिर्द चुनावी प्रतिस्पर्धा आयोजित थी। इसके उपरांत, कांग्रेस के विरुद्ध एक चुनावी गठबन्धन खड़ा करने के लिए विपक्षी दलों द्वारा किए गए प्रयासों की सफलता अथवा विफलता ने चुनावी नतीजों के प्रति एक निर्णायक भेद उत्पन्न किया।