तथ्य एकत्रीकरण में विशिष्ट अभिरुचि क्या है समझाइये | समाजशास्त्र में aggregate fact table in hindi

By   November 22, 2020

aggregate fact table in hindi तथ्य एकत्रीकरण में विशिष्ट अभिरुचि क्या है समझाइये | समाजशास्त्र में किसे कहते है परिभाषा बताइए ?

तथ्य एकत्रीकरण में विशिष्ट अभिरुचि
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मानव संस्कृतियों का अध्ययन करने वाले इन विद्वानों को लगा कि विकासवादी तथा प्रसारवादी दोनों तरह के विचारकों ने कम विश्वसनीय प्रमाणों के आधार पर मानव के अतीत की पुनर्रचना की। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक केवल एक विद्वान एल.एच. मॉर्गन (1818-1881) को छोड़कर किसी भी नृशास्त्री अथवा समाजशास्त्री ने जिन लोगों का अध्ययन किया, उनके बीच जाकर प्रत्यक्ष प्रेक्षण से तथ्य एकत्र करने का प्रयास नहीं किया। इवन्स-प्रिचर्ड (1954-72) ने इसका कारण यह बताया है कि उन्नीसवीं शताब्दी में मानव संस्कृतियों में रुचि रखने वाले लगभग सभी विद्वानों ने विज्ञान का अध्ययन नहीं किया था । दूसरी ओर, उनका यह भी कहना है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जिन विद्वानों ने मानव समाजों के अध्ययन का काम संभाला, उनमें से अधिकतर प्राकृतिक वैज्ञानिक थे दिखिए कोष्ठक 22.4)। उन्हें प्रशिक्षण मिला था कि वे अपने सिद्धांतों की परख अपने द्वारा किए गए प्रत्यक्ष प्रेक्षण के आधार पर करें। इसलिए वे विश्व के विभिन्न भागों में विद्यमान समाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के बारे में प्रत्यक्ष सामग्री स्वयं एकत्र करने के लिए प्रतिबद्ध थे।

कोष्ठक 22.4ः समाज के अध्ययन में बीसवीं सदी के प्राकृतिक विज्ञानविदों की रुचि
इवन्स प्रिचर्ड (1954ः 72) ने कहा है कि सामाजिक संस्थाओं पर कलम चलाने वाले प्रारंभिक विद्वानों में मेन, मैक्लनन और बखोफन वकील थे। हर्बर्ट स्पेंसर दार्शनिक, एडवर्ड टाइलर विदेशी भाषा के क्लर्क तथा फ्रेजर शास्त्रीय (बसंेेपबंस) विद्वान थे। इसके विपरीत, प्रारंभिक बीसवीं शताब्दी में जिन विद्वानों ने मानवीय समाजों के अध्ययन किए, उनमें से अधिकतर प्राकृतिक विज्ञानों से जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए बोआस भौतिकशास्त्री तथा भूगोलविद थे। ए.सी.हैडन समुद्री-जन्तु वैज्ञानिक थे, रिवर्स शरीर वैज्ञानिक, सैलिगमैन चिकित्सक, इलियट स्मिथ शरीर-विज्ञानी तथा मलिनॉस्की भौतिक शास्त्री थे। ए.आर. रैडक्लिफ-ब्राउन प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ थे। ये विद्वान स्वभावतः अपने कथनों को प्रेक्षण तथा अनुभव के आधार पर परखते थे। इसलिए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जिन सामाजिक स्थितियों का अध्ययन किया जाए, उनका प्रत्यक्ष प्रेक्षण करना आवश्यक है।

दूसरी बात यह है कि इन विद्वानों को लगा कि मानव संस्कृतियों के बारे में व्यवस्थित ढंग से एकत्र किए गए तथ्य समाज की प्रारंभिक स्थिति के संबंध में विचार बनाने के साथ-साथ कुछ और उद्देश्यों के लिए भी काम आ सकते हैं। जैसे कि बीटी (1964ः 91) ने कहा कि व्यावहारिक कारणों से भी आदिम समाजों के सामाजिक-सांस्कृतिक आचरण को समझने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला। उपनिवेशीय प्रशासकों तथा ईसाई मिशनरियों को उन लोगों के बारे में नृजातिविवरण के तथ्य एकत्र करना उपयोगी लगा, जिन पर उन्हें शासन करना था या जिनका उन्हें धर्म-परिवर्तन करना था। वास्तव में, आदिम लोगों के कुछ प्रारंभिक विवरण ऐसे ही लोगों द्वारा तैयार किए गए थे। इस प्रकार की सामग्री की उपयोगिता से मानव समुदायों के बारे में नियोजित ढंग से प्रत्यक्ष सामग्री एकत्र करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला। धीरे-धीरे मानव संस्थाओं के इतिहास की पुनर्रचना का स्थान तथ्य एकत्र करने में तीव्र अभिरुचि ने ले लिया और जीवंत समुदायों (सपअपदह बवउउनदपजपमे) के अध्ययन की दिशा में प्रगति होने लगी।

सामग्री एकत्र करने के अभियानों का श्रीगणेश अमरीका में हुआ। वहां मॉर्गन (1851) ने इरोक्वा इंडियन्स के बारे में तथ्य एकत्र किए थे। वे उन लोगों के बीच जाकर रहे और बाद में इरोक्वा जनजाति ने उन्हें अपने समाज का सदस्य बना लिया। 1883-84 में फ्रेंज बोआस ने एस्किमो तथा बाद में उतर-पश्चिमी तट (ब्रिटिश कोलम्बियरा, कनाडा) में अमरीकी इंडियनों का अध्ययन किया। उसने उन लोगों की भाषा सीखने पर विशेष बल दिया।

इंग्लैंड में नृशास्त्रीय अध्ययन के उद्देश्य से प्रत्यक्ष तथ्य एकत्र करने के लिए यात्राएं करने के सिलसिले का शुभारम्भ केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के विद्वान ए.सी. हैडन ने किया। उसने 1878-79 में प्रशांत महासागर में स्थित टोरेस स्ट्रेट्स के प्रसिद्ध अभियान का नेतृत्व किया। इस अभियान का उद्देश्य विद्वानों को क्षेत्रीय शोध कार्य में प्रशिक्षण देना था। हैडन ने अपने दल में विभिन्न विषयों के विद्वानों को शामिल किया। पश्चिमी द्वीपों में चार सप्ताह तथा पूर्वी द्वीपों में चार महीने रह कर उन लोगों ने दुभाषियों की मदद से पिजिन-इंग्लिश में तथ्य एकत्र किए। इस अभियान की जो रिपोटें प्रकाशित हुई, उनमें विद्वानों की विशेष अभिरुचियां स्पष्ट रूप से सामने आई। उदाहरण के लिए, डब्ल्यू.एच.आर. रिवर्स ने व्यक्तिगत नामों, वंशावलियों, रिश्तेदारों और विवाह से संबंधित अध्याय लिखे। सी.जी. सेलिगमैन को जन्म, बाल्यकाल तथा महिलाओं के रजस्वला होने से संबंधित अध्याय सौंपे गए। ए.सी.हैडन ने व्यापार, युद्ध-कौशल, जादू, धर्म तथा लोक-जीवन की व्यवस्था से संबंधित अध्यायों की रचना की। विद्वानों के इस दल ने स्थानीय जीवन शैली के सभी पहलुओं को समेटने का प्रयास किया। इसमें क्षेत्रीय शोध कार्य की स्थितियों के साथ-साथ उन स्थानीय लोगों का भी स्पष्ट परिचय दिया गया, जिन्होंने सामग्री इकट्ठा करने में मदद की। इस अभियान से इन विद्वानों के लिए क्षेत्रीय शोध कार्य के अनुभव के महत्व को दृढ़ आधार मिला। दो विद्वानों डब्ल्यू. एच. आर. रिवर्स तथा सी.जी. सेलिगमैन ने इस अभियान के बाद और अध्ययन भी किये। सी.जी. सेलिगमैन ने 1904 में मलेनेशिया में और 1907-08 में श्रीलंका की वेड्डा जनजाति के बीच काम किया। 1909-12 तथा 1921-22 में उन्होंने सूडान में क्षेत्रीय शोधकार्य करके सांस्कृतिक तथा भाषा-संबंधी पहलुओं पर प्रकाश डाला। डब्ल्यू.एच.आर.रिवर्स ने 1901 में भारत में नीलगिरि क्षेत्र में टोडा जनजाति का अध्ययन किया। रिवर्स की 1906 में प्रकाशित पुस्तक द टोडा में क्षेत्रीय शोधकार्य की परिस्थितियों और टोडा लोगों के विश्वासों तथा प्रथाओं का उल्लेख है। पुस्तक के एक अलग भाग में क्षेत्रीय शोधकार्य सामग्री की व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

1898-99 में टोरेस स्ट्रेट्स का अभियान समाज के नृशास्त्रीय अध्ययन के इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुई। इसके बाद, विद्वानों के लिए नृशास्त्र विषय का एक स्वतंत्र अस्तित्व बन गया और साथ ही, क्षेत्रीय शोधकार्य का अनुभव नृशास्त्रियों के प्रशिक्षण का अभिन्न अंग बन गया। नृशास्त्रीय सामग्री एकत्र करने की प्रक्रिया में एक और उपलब्धि थी – 1906-08 में ए. आर.रैडक्लिफ-ब्राउन की भारत में अण्डमान द्वीप समूह की यात्रा। इस क्षेत्रीय शोध कार्य तथा इस पर आधारित 1922 में प्रकाशित पुस्तकं की चर्चा इकाई 24 तथा 25 में की जाएगी। इसके अतिरिक्त रैडक्लिफ-ब्राउन के बारे में तथा उसके अंडमानी शोधकार्य के बारे में तैयार किया गया श्रव्य कार्यक्रम भी आप अवश्य सुनिए।

आइए अब हम ब्रोनिस्लॉ मलिनॉस्की द्वारा शुरू की गई बहुचर्चित क्षेत्रीय शोधकार्य की पंरपरा का विवेचन करें। मलिनॉस्की ने न्यू गिनी की तीन अध्ययन यात्राएं कीं। उसके अध्यापक सी.जी. सेलिगमैन ने उसे क्षेत्रीय शोधकार्य यात्रा पर न्यू गिनी जाने का सुझाव दिया। न्यू गिनी की अपनी पहली यात्रा के दौरान मलिनॉस्की ताउलोन (ज्वनसवद) द्वीप में पश्चिमी पपुआ मलनेशियाई समूह के मैलू (डंपसन) लोगों के बीच रहा। यह यात्रा सितंबर 1914 से मार्च 1915 के दौरान हुई। जून 1915 में वह ट्रोब्रिएण्ड द्वीप समूह गया (देखिए मानचित्र) और मई 1916 तक वहां रहा । तीसरी बार वह अक्तूबर 1917 में गया और एक वर्ष तक वहां रहा।
मानचित्र 22.1ः पपुआ न्यूगिनी और ट्रोब्रियंड द्वीप समूह का विस्तृत मानचित्र

मलिनॉस्की ने शुरू में तो ट्रोबिएण्ड द्वीपवासियों से पिजिन-इंग्लिश में बातचीत की किंतु तीन महीनों में ही वह स्थानीय बोली में लोगों से बातें करने लगा। ट्रोब्रिएण्ड द्वीपों में दो वर्ष के अपने प्रवास के दौरान कुल मिलाकर केवल 6 महीने उसने यूरोपीय लोगों के साथ गुजारे। उसने अपना तम्बू स्थानीय लोगों की झोपड़ियों के बीचों बीच जाकर गाड़ दिया। इससे वह उन लोगों के रहन-सहन का निकटता तथा बारीकी से प्रेक्षण करने में सफल हआ। क्षेत्रीय शोधकार्य में आई मुसीबतों का सामना उसने कैसे किया, उसकी भी एक लम्बी दास्तान मलिनॉस्की ने तैयार की जो नृजातिशास्त्र के समस्त लेखन में मानवीय सहृदयता से परिपूर्ण कृति मानी जाती है दिखिए कैबरी 1959ः 77)। क्षेत्रीय शोधकार्य की उसकी डायरियों की झलक पाने के लिए कूपर (1975ः 27-32) को पढ़ें।

एक उल्लेखनीय बात यह है कि मलिनॉस्की समाज का निष्क्रिय प्रेक्षक अथवा तथ्य एकत्रकर्ता मात्र नहीं था। उसने तथ्य एकत्र करने की विशिष्ट विधियाँ अपना कर सामग्री जमा की। आदिम समुदाय विशेष में क्षेत्रीय शोधकार्य करने वाला वह पहला व्यावसायिक दृष्टि से प्रशिक्षित नृशास्त्री था। उसने क्षेत्रीय शोधकार्य की कई विधियाँ विकसित कीं।

मलिनॉस्की के अनुसार, इन तकनीकों पर अमल करने में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि विद्वान विशेष को मानव संस्कृतियों के अध्ययन के सिद्धांत में कितना प्रशिक्षण प्राप्त है। नृजातिविवरण की अथाह सामग्री ने उसे प्ररित किया कि वह अपने शोध के परिणामों को प्रस्तुत करने में सैद्धांतिक दृष्टिकोण का विकास करे। उसके नृजातिविवरण ग्रंथ (इस खंड के अंत में संदर्भ ग्रंथ सूची देखिए) विशुद्ध नृजातिविवरण के उदाहरण मात्र अथवा ट्रोब्रिएण्ड वासियों के विश्वासों तथा जीवनशैली का रिकॉर्ड मात्र नहीं है। इसमें समाज के संगठन के सिद्धांतों तथा उनके अंतर्संबधों का परिचय मिलता है। अब आपको आसानी से यह स्पष्ट हो सकता है कि समाज तथा उसकी संस्थाओं के बारे में सामग्री एकत्र करने का प्रमुख आशय था- मानव संस्कृतियों का अध्ययन तथा उनकी व्याख्या करने के लिए वैकल्पिक विधियां विकसित करना। अगले भाग में हमने मलिनॉस्की की संस्कृति की अवधारणा की व्याख्या दी है। संस्कृति के प्रति उसकी दृष्टि से ही प्रकार्यवाद का उसका सिद्धांत विकसित हुआ। इसी सिद्धांत से उसे तथा उसके शिष्यों को मानव संस्कृतियों के विश्लेषण की नई विधि प्राप्त हुई।