Dip and strike in hindi नति तथा नतिलम्ब

नति तथा नतिलम्ब Dip and strike in hindi :

Dip (नति) : निर्माण के समय अवसादियां शिलाएं संस्तरित हो जाती है तथा ये प्राय: क्षैतिज होती है परन्तु पृथ्वी पृष्ठ पर होने वाले अनेक संचलनो के कारण इनमे परिवर्तन हो जाता है और ये क्षैतिज नहीं रह पाते है

इनमे कुछ झुकाव उतपन्न हो जाता है जो क्षैतिज तल से मापा जाता है इस झुकाव या कोण को dip (नति) कहते है

जिस दिशा में संस्तर का झुकाव होता है उसे नति की दिशा कहते है

strike (नतिलम्ब )

एक ऐसी लाइन जो bedding plane और horizontal plane की intersection line हो strike कहलाती है

नोट : strike direction के along dip शून्य होता है

Dip and strike

नोट : Dip angle clinometer से मापा जाता है

Types of Dip 

dip को दो भागों में बांटा गया है

  1. true dip (वास्तविक नति ) : शिला संस्तर के झुकाव के अधिकतम कोण को वास्तविक नति कहते है , यह हमेशा strike के right angle से मापा जाता है
  2. Apparent Dip (भ्रान्ति नति) : true dip के अलावा किसी भी दिशा में मापा गया dip apparent dip कहलाता है |

या

strike 90 डिग्री से अधिक या कम दिशा में होने पर नति के मान भिन्न होता है इसे भ्रान्ति नति कहा जाता है इसका अध्ययन वहाँ किया जाता है जहाँ स्पष्टतया परिलक्षित हो , उदाहरण : नाले , खड्डे आदि |

example of dip : 60′ , N 45’E it’s means beds dip at angle of 60 degree in a northeasterly direction .

example of strike : N30’E-530’W means the direction of a particular bed is 30 degree east of north

example Dip and strike
example Dip and strike

दर्पण समीकरण सूत्र स्थापना mirror equation formula in hindi दर्पण की आवर्धन क्षमता

mirror equation formula in hindi दर्पण समीकरण सूत्र स्थापना : किरण डायग्राम बनाकर हम किसी भी वस्तु के प्रतिबिम्ब के निर्माण , आकृति , स्थिति, ऊंचाई आदि के बारे सभी प्रकार की जानकारियां ज्ञात कर सकते है चाहे वस्तु दर्पण के किसी भी स्थिति पर क्यों न स्थित है।
हम यहाँ दर्पण सूत्र की स्थापना करते है जिनका उपयोग कर हम कई प्रकार की जानकारियां सीधे ज्ञात कर सकते है , हमें सिर्फ सूत्र में कुछ मानों को रखना होगा और हमें जानकारी प्राप्त हो जाएगी।

चित्रानुसार एक अवतल दर्पण के सामने कोई वस्तु YZ रखी हुई , जो दर्पण के ध्रुव से u दूरी पर रखी हुई है तथा दर्पण के ध्रुव P से v दूरी पर वस्तु का प्रतिबिम्ब Y’Z’ बनता है।
दर्पण का फोकस बिन्दु F है जिसकी ध्रुव से दूरी को f से दर्शाया गया है।
दर्पण के वक्रता केंद्र को C से दिखाया है।
दर्पण के लिए सूत्र ज्ञात करने के लिए हम त्रिभुज JPF तथा Z’Y’F पर चर्चा करते है , हम देख सकते है की दोनों त्रिभुज समरूप त्रिभुज है
अत: समरूप के नियम से

ध्यान दे यहाँ हम JP को एक सीधी रेखा के रूप में मान रहे है।
ठीक इसी प्रकार त्रिभुज YZP तथा Y’Z’P भी समरूप त्रिभुज है अत: समरूपता के नियम से

दोनों समीकरणों में देख सकते है की दोनों में एक साइड बराबर है अत: दूसरी साइड भी बराबर होगी
अत:

उक्त समीकरण को ही दर्पण समीकरण सूत्र कहते है , हमने इस सूत्र की स्थापना अवतल दर्पण का उदाहरण की सहायता से की है लेकिन उत्तल दर्पण द्वारा ज्ञात करने पर भी सूत्र यही प्राप्त होता है अर्थात इसे अवतल तथा उत्तल दोनों दर्पणों के लिए उपयोग में लाया जाता है।
अब हम किसी दर्पण के लिए वस्तु के सापेक्ष प्रतिबिम्ब के आकार की गणना करते है अर्थात आपस में वस्तु के आकार तथा प्रतिबिम्ब के आकार में क्या सम्बन्ध है यह ज्ञात करते है।
माना वस्तु की उचाई या आकार h0 है तथा प्रतिबिम्ब की ऊंचाई या आकर hहै
ऊपर ज्ञात सम्बन्ध ज्ञात किया है

यहाँ कुछ राशियाँ ऋणात्मक ली गयी है यह तो हमने चिन्ह परिपाटी में पढ़ ही लिया है
अत: इसे आगे हल करने पर हम निम्न सूत्र पाते है

निम्न सूत्र को दर्पण की आवर्धन क्षमता कहते है तथा m से दर्शाते है।

दर्पण की फोकस दूरी का सूत्र स्थापना focal length of mirror in hindi

focal length of mirror in hindi दर्पण की फोकस दूरी का सूत्र स्थापना : यहाँ किसी गोलीय दर्पण की फोकस दुरी तथा वक्रता त्रिज्या के मध्य संबंध के बारे में अध्ययन करते है तथा सूत्र को स्थापित करते है।

माना चित्रानुसार एक अवतल दर्पण MM’ है।  एक AB प्रकाश की किरण अवतल दर्पण पर आपतित हो रही है , परावर्तन के बाद यह किरण BD के रूप में फोकस से जाती है।
बिन्दु B पर एक अभिलम्ब CB है।
परावर्तन का नियम हमने पढ़ लिया है जिसमें लिखा था की आपतन कोण तथा परावर्तन का कोण बराबर होता है।
चित्र में आपतन कोण ABC है तथा परावर्तन कोण FBC है जिन्हें चित्र में आपतन कोण कोण को i तथा परावर्तन कोण को r से दर्शाया गया है
अत: परावर्तन के नियमानुसार
आपतन कोण = परावर्तन कोण
ABC = FBC
i = r
यहाँ कोण i तथा r एकान्तर कोण है
अत: त्रिभुज BCF से
FBC तथा BCF दोनों कोण आपस में बराबर होंगे।
तथा BF तथा FC भुजा आपस में बराबर होगी।
अर्थात
भुजा BF = FC
यदि अपतित किरण ध्रुव के पास आपतित हो रही हो अर्थात बिन्दु B , ध्रुव के पास स्थित हो तो BF भुजा का मान दर्पण के फोकस दूरी के बराबर होगा
अर्थात
BF = PF = f = फोकस दूरी
चित्र से , वक्रता त्रिज्या (R) का मान निकालने के लिए अर्थात PC का मान
PC = R = PF + FC
चूँकि हम ऊपर पढ़ चुके है की FC का मान BF के बराबर है
अत:
R = PF + BF
चूँकि ऊपर ज्ञात कर चुके है की PF = BF = f
दोनों के मान समीकरण में रखने पर
अत:
वक्रता त्रिज्या R = f + f
R = 2F
अत: दर्पण की फोकस दूरी
f = R/2
यह सूत्र समीकरण दर्पण की फोकस दूरी तथा वक्रता त्रिज्या में सम्बन्ध को दर्शाता है

गोलीय दर्पण से प्रतिबिम्ब निर्माण Image formation by spherical mirror in hindi

Image formation by spherical mirror in hindi गोलीय दर्पण से प्रतिबिम्ब निर्माण : किसी भी गोलीय दर्पण से प्रतिबिम्ब निर्माण के लिए तीन नियम काम में लिए जाते है या ध्यान में रखे जाते है जिनका उपयोग करके आप किसी भी गोलीय दर्पण के लिए प्रतिबिम्ब निर्माण कर सकते है चाहे वस्तु किसी भी स्थिति पर रखी हो।
आइयें इनके बारे में अध्ययन करते है।
1. गोलीय दर्पण के मुख्य अक्ष X के समान्तर आने वाली प्रकाश की किरण परावर्तन के बाद दर्पण के फोकस बिन्दु से गुजरती है या गुजरती हुई प्रतीत होती है।

चित्र में हम देख सकते है की जब अवतल दर्पण में कोई प्रकाश किरण मुख्य अक्ष के समान्तर आती है तो परावर्तित होकर फोकस से वास्तविकता में गुजरती है।
जब प्रकाश किरण उत्तल दर्पण पर मुख्य अक्ष के समान्तर आपतित होती है तो परावर्तन के बाद फोकस से गुजरती हुई प्रतीत होती है लेकिन वास्तविकता में नही गुजरती है।
2. गोलीय दर्पण के वक्रता केन्द्र से आने वाली प्रकाश की किरण परावर्तन के बाद उसी मार्ग से वापस लौट जाती है।

चित्र में देख सकते है की जब कोई प्रकाश किरण दर्पण के वक्रता केंद्र से होकर दर्पण पर आपतित होती है तो परावर्तन के बाद वक्रता केन्द्र से ही वापस लौट जाती है।
3. गोलीय दर्पण के फोकस बिन्दु से होकर आने वाली प्रकाश की किरण परावर्तन के बाद दर्पण के मुख्य अक्ष के समान्तर हो जाती है।

चित्र में दर्शाया गया है की जब कोई प्रकाश किरण फोकस से होकर दर्पण पर आपतित होती है तो दर्पण से परावर्तन के बाद यह मुख्य अक्ष के समान्तर होकर गुजरती है।
4. जब प्रकाश की किरण को किसी कोण पर ध्रुव बिन्दु पर आपतित किया जाए तो परावर्तन के बाद प्रकाश की किरण उतने ही कोण के साथ वापस लौट आती है जिस चित्र में दिखाया गया है।

समतल दर्पण से प्रतिबिम्ब का निर्माण यह भी जानें

चिन्ह परिपाटी : गोलीय दर्पण के लिए sign convention in mirror in hindi

sign convention in mirror in hindi चिन्ह परिपाटी : गोलीय दर्पण के लिए : गोलीय दर्पण से परावर्तन तथा अपवर्तन की घटना का अध्ययन करने के लिए हम एक चिन्ह परिपाटी का उपयोग करते है जिससे हमारा अध्ययन आसान हो जाता है।

आइयें इसे विस्तार से पढ़ते है।
1. मूल बिन्दु ध्रुव P को माना जाता है तथा सभी दूरियाँ ध्रुव P से ही मापी जाती है।
2. जब दूरियाँ आपतित प्रकाश की किरणों की दिशा में मापी जाती है तो इन्हें धनात्मक लिया जाता है।
3. जब दूरियाँ आपतित किरणों की दिशा के विपिरित दिशा में मापी जाती है तो उनको ऋणात्मक लिया जाता है।
4. मुख्य अक्ष X के लम्बवत ऊपर की दिशा में दूरियाँ धनात्मक ली जाती है तथा मुख्य अक्ष के लम्बवत निचे की दिशा में दूरी ऋणात्मक मापी जाती है।
5. ध्रुव से वस्तु की दूरी को U से , प्रतिबिम्ब की दूरी को v से दर्शाते है।
6. अत: ध्रुव से वस्तु की दूरी U को ऋणात्मक लिया जाता है।
7. यदि प्रतिबिम्ब आभासी बन रहा है तो ध्रुव से प्रतिबिम्ब की दूरी v को धनात्मक लिया जाता है तथा जब प्रतिबिम्ब वास्तविक बनता है तो ध्रुव से प्रतिबिम्ब की दूरी v को ऋणात्मक माना जाता है।
8. फोकस दूरी को f से दर्शाया जाता है , अवतल दर्पण के लिए फोकस दूरी ऋणात्मक ली जाती है तथा उत्तल दर्पण के लिए फोकस दूरी को धनात्मक माना जाता है।

 

दोनों दर्पणों (उत्तल एवं अवतल) के लिए चिन्ह परिपाटी को चित्र में दर्शाया गया है।

वक्रता केंद्र , त्रिज्या , मुख्य अक्ष , फोकस , दूरी , ध्रुव , द्वारक definitions in spherical mirror in hindi

definitions in spherical mirror in hindi गोलीय दर्पण से सम्बंधित कुछ परिभाषा : यहाँ हम गोलीय दर्पणों से सम्बंधित कुछ राशियों तथा परिभाषाओ के बारे में अध्ययन करते है।

1. वक्रता केंद्र : गोलीय दर्पण को जिस खोखले गोले का कटा हुआ भाग माना जाता है उस खोखले गोले के केन्द्र को वक्रता केन्द्र कहा जाता है इसे C से दर्शाया जाता है।
2. वक्रता त्रिज्या : गोलीय दर्पण को जिस गोले का कटा हुआ भाग माना जाता है उस गोले की त्रिज्या को वक्रता त्रिज्या कहते है
या
वक्रता केंद्र तथा ध्रुव के मध्य की दूरी को वक्रता त्रिज्या कहा जाता है।
इसे चित्र में R से दर्शाया गया है जिसे CP के मध्य की दूरी भी कह सकते है।
3. ध्रुव : गोलीय दर्पण की प्रष्ठ सतह का मध्य बिन्दु ध्रुव कहलाता है , इसे यहाँ चित्र में P बिन्दु से दर्शाया गया है।
4. द्वारक : किसी भी दर्पण के वृत्ताकार चाप को उस दर्पण का द्वारक कहा जाता है , इसे चित्र में MM’ से दर्शाया गया है।
4. मुख्य अक्ष : दर्पण के ध्रुव P तथा वक्रता केंद्र C को मिलाने वाली रेखा या इन दोनों से गुजरने वाली रेखा को दर्पण की मुख्य अक्ष कहते है। यहाँ चित्र में इसे principle axis नाम से दिखाया गया है।
5. मुख्य फोकस : दर्पण की मुख्य अक्ष (principle axis) के समान्तर दर्पण पर आपतित होने वाली प्रकाश की किरण परावर्तन के बाद जिस बिन्दु पर मिलती है या मिलती हुई प्रतीत होती है तो उस बिन्दु को दर्पण का मुख्य फोकस कहते है।
इसे F से दर्शाया गया है।  अवतल दर्पण के लिए मुख्य फोकस F दर्पण के सामने बनता है जबकि उत्तल दर्पण के लिए F दर्पण के पीछे बनता है।
अवतल दर्पण में किरणें वास्तविकता में मिलती है इसलिए यहाँ फोकस वास्तविक होता है जबकि उत्तल दर्पण में किरणें मिलती हुई प्रतीत होती है इसलिए इसमें फोकस आभासी बनता है।
6. फोकस दूरी : किसी भी दर्पण के ध्रुव P से मुख्य फोकस के मध्य की दूरी को फोकस दूरी कहते है इसे प्राय: f से व्यक्त करते है।
उत्तल दर्पण के लिए फोकस दूरी को धनात्मक लिया जाता है तथा अवतल दर्पण के लिए फोकस दूरी को ऋणात्मक माना जाता है।
माना किसी गोलीय दर्पण की वक्रता त्रिज्या R हो तो , फोकस दूरी f  तथा वक्रता त्रिज्या R में निम्न सम्बन्ध होगा
f = R/2

गोलीय दर्पण , परिभाषा , क्या है , उत्तल , अवतल दर्पण spherical mirror in hindi

(spherical mirror in hindi) गोलीय दर्पण : जब किसी कांच के खोखले गोले को काटा जाता है तो गोलीय दर्पण का निर्माण होता है , अर्थात गोलीय दर्पण गोलीय खोखले कांच के गोले का कटा हुआ भाग माना जाता है।

जिसके एक तरफ रजत पदार्थ का लेप लगा हुआ होता है तथा दूसरा पृष्ठ परावर्तक का कार्य करता है।
गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते है
1. उत्तल दर्पण (Convex mirror)
2. अवतल दर्पण (Concave mirror)

1. उत्तल दर्पण (Convex mirror)

जब दर्पण के उभरी हुई सतह से परावर्तन होता है अर्थात उभरी हुई सतह परावर्तक का कार्य करता है तथा धंसा हुई भाग रजित होता है तो इस प्रकार के दर्पण को उत्तल दर्पण कहते है।

इस प्रकार के दर्पणों का उपयोग वाहनों के साइड में लगे कांच में , सडक के साइड में लगे लम्पो में इत्यादि में किया जाता है।

2. अवतल दर्पण (Concave mirror )

जब किसी गोलीय दर्पण के धंसी हुई सतह से परावर्तन होता है अर्थात जब गोलीय दर्पण का अंतर धंसा हुआ भाग परावर्तक का कार्य करता है तथा उभरे हुए भाग रजत परत का लेप लगा होता है तो इसको अवतल दर्पण कहते है।
यह दर्पण किरणों को अभिसारित करता है अर्थात इकठ्ठा करता है।
इसका उपयोग दूरदर्शी में , सिनेमा प्रोजेक्टर में इत्यादि में किया जाता है।

 

समतल दर्पण से प्रतिबिम्ब का निर्माण Formation of image by plane mirror in hindi

Formation of image by plane mirror in hindi समतल दर्पण से प्रतिबिम्ब का निर्माण : जब  किसी समतल दर्पण के समाने कोई वस्तु रखी हो तो उसका प्रतिबिम्ब कैसे बनता है इसके बारे में हम यहाँ अध्ययन करते है।

माना एक वस्तु O किसी समतल दर्पण PQ के सामने रखी हुई है जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
वस्तु से कई प्रकाश की किरण चलती है लेकिन हम प्रतिबिम्ब निर्माण को समझने के लिए दो किरणों पर अध्ययन करते है और यह ज्ञात करते है।
माना वस्तु O से दो किरणें OA तथा OC समतल दर्पण की तरफ गमन करती है , दोनों किरणें दर्पण से टकराकर परावर्तित हो जाती है तथा परावर्तन के बाद किरणें AB तथा CD के रूप में मनुष्य की आँखों (E) की तरफ गति करती है।
अगर दर्पण पर जहाँ वस्तु से चलने वाली किरणें परावर्तित होती है , दोनों किरणों को दर्पण के पीछे बढ़ाने पर ये दोनों किरणें मिलती हुई प्रतीत होती है , जहाँ ये दोनों किरणें मिलती हुई प्रतीत होती है वहाँ ही वस्तु का प्रतिबिम्ब बनता है जिसे चित्र में I से व्यक्त किया गया है।
या
समतल दर्पण के पीछे जहाँ किरणें मिलती हुई प्रतीत होती है वहाँ वस्तु O का प्रतिबिम्ब I बनता है।

प्रकाश का परावर्तन , परिभाषा , क्या है reflection of light in hindi

reflection of light in hindi प्रकाश का परावर्तन , परिभाषा , क्या है : जब प्रकाश की किरण किसी एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है तो दोनों माध्यमों को पृथक करने वाली सीमा से टकराकर प्रकाश किरण वापस उसी माध्यम में लौट आती है जिस माध्यम से वह शुरू हुई थी प्रकाश की इस घटना को प्रकाश का परावर्तन कहते है।

प्रकाश के परावर्तन की घटना को समझने के लिए हम दो माध्यम लेते है , पहले माध्यम को हमने माध्यम 1 नाम दिया तथा दूसरे माध्यम को हमने माध्यम 2 नाम दिया जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
यहाँ दोनों माध्यमों को पृथक करने वाली परिसीमा को हमने सीमा नाम से व्यक्त किया है।
जब प्रकाश की कोई किरण माध्यम 1 से दूसरे माध्यम की ओर गति करती है तो दोनों माध्यमों को प्रथक करने वाली सीमा से यह मुड़ जाती है पुन: माध्यम 1 की ओर गति करने लगती है इसी घटना को ही हम प्रकाश का परावर्तन कहते है।
जब प्रकाश की किरण पूर्ण रूप से परावर्तित हो जाती है तो इसे पूर्ण परावर्तन तथा जब किरण आंशिक रूप से परावर्तित होती है तो इसे प्रकाश का आंशिक परावर्तन कहते है।

प्रकाश के परावर्तन के नियम

1. प्रकाश की किरण जिस कोण से प्रष्ट पर आपतित होती है उसी कोण से परावर्तित होती है अर्थात
आपतन कोण = परावर्तन कोण
चित्र में हमने आपतन कोण को i से दर्शाया है तथा परावर्तन कोण को r से दर्शाया है अत:
i = r
2. चित्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है की यहाँ आपतित किरण (A) , परावर्तित किरण (B) तथा अभिलम्ब (N) तीनो एक ही तल में स्थित होते है इस तल को आपतन तल कहा जाता है
3. परावर्तित किरण की आवृति , तरंग दैर्ध्य एवं चाल वही रहती है तो आपतित किरण की है अर्थात इनमे कोई परिवर्तन नहीं होता है।

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