सूचना का अधिकार संबंधित प्रश्न | सूचना का अधिकार अधिनियम कब लागू हुआ | सूचना का अधिकार अधिनियम का दुरुपयोग pdf

By   January 7, 2022

सूचना का अधिकार अधिनियम का दुरुपयोग pdf सूचना का अधिकार संबंधित प्रश्न | सूचना का अधिकार अधिनियम कब लागू हुआ ?

सूचना का अधिकार
(Right to Information)
’’’ (इस खंड का संबंध सिविल सेवा (मुख्य परीक्षा) के पाठ्यक्रम के प्रश्नपत्र-4 के टॉपिक-7 से है। दृष्टि द्वारा वर्गीकृत पाठ्यक्रम के 15 खंडों में से इसका संबंध भाग-13 से है।

‘सूचना का अधिकार‘ का अर्थ (Meaning of ‘Right to Information’)
सूचना के अधिकार का अर्थ है- लोगों तक सरकारी सूचना की पहुँच। अर्थात् नागरिकों और गैर सरकारी संगठनों की सरकारी कार्यों निर्णयों तथा उनके निष्पादनों से संबंधित फाइलों और दस्तावेजों तक औचित्यपूर्ण स्वतंत्र पहुँच होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, सरकारी कार्यकलापों में खुलापन और. पारदर्शिता हो। 1992 में विश्व बैंक द्वारा जारी प्रशासन एवं विकास नामक दस्तावेज में प्रशासन के सात पहलुओं में से एक पारदर्शिता एवं सूचना भी था।

सूचना के अधिकार की आवश्यकता के कारण
(Causes For Needs of Right to Information)
सूचना के अधिकार की आवश्यकता का सर्वप्रमुख आधार यह है कि यह शासन प्रक्रियाओं के बारे में लोगों की जानकारी को बढ़ाकर लोगो में सशक्तीकरण-लाता है। यह खुले शासन के लिए आवश्यक दशाओं का निर्माण करता है जो लोकतंत्र की आधारशिला है। यह नागरिको प्रक्रिया को गोपनीयता की हटाकर लोक-नीति निर्माण और प्रशासन में सह हिस्सेदार बनाता है। इससे लोकहित में समग्र शासन की गुणवत्ता में सुधार लाने में मदद मिलती है। सूचना के अधिकार से सरकार की गणवत्ता में एक परिवर्तन आया है और जनता तक खुली और पारदर्शी पहुँच के कारण जनता की आवश्यकताओं के प्रति जवाबदेही और अनूक्रियाशील सूनिश्चित हूई है। यह प्रशासन एवं जनता के बीच की दूरी को कम करता है। प्रशासनिक निर्णय निर्माण में जनहित को प्रोत्साहन प्रदान करता है एवं भ्रष्टाचार के अवसरों को घटाता है। यह प्रशासन को जनता की आवश्यकताओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। यह लोक सेवकों के द्वारा सत्ता के दुरुपयोग के अवसरों को भी कम करता है।

सूचना के अधिकार और सुशासन के मुद्दे
(Issues Related to Good Governance and Right to Information)
ऽ सूचना का अधिकार एक तो स्वयं एक अधिकार है और कई अन्य अधिकारों को भी सशक्त करता है जबकि सुशासन में मानवाधिकार और मानव विकास के विभिन्न मुद्दे हैं।
ऽ सुशासन का पारदर्शिता आयाम सीधे-सीधे सूचना के अधिकार पर निर्भर है।
ऽ सूचना के अधिकार और सुशासन से निष्पादन मूल्यांकन ज्यादा सशक्त होगा और शासन तथा प्रशासन के बारे में नागरिक तथा समाज ज्यादा सूचित होंगे, इसलिए जबावदेही बढ़ेगी।
ऽ सूचना के अधिकार से सुशासन के श्रेष्ठ अनुभवों के संबंध में तुलनाओं को बढ़ाया जा सकेगा।
ऽ सूचना के अधिकार से सुशासन के लिए लोक सेवाओं में सक्षमता-निर्माण की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
ऽ राज्य और गैर-राज्य भागीदारी बढ़ाते हुए आर्थिक विकास को साधन और मानव विकास को साध्य बनाया जाएगा।
ऽ सूचना से सहमति को सबल बनाया जा सकता है और सहमति सुशासन का अभिन्न अंग है।
ऽ इनसे मानव विकास सूचक और अन्य सूचकों के संदर्भ में गणनाएँ बेहतर बनेगी, इसलिए जवाबदेही बढ़ सकंगा (पी.सी.होता) समिति ने सशासन के संदर्भ में राज्यों में स्टेट ऑफ गवर्नेस रिपोर्ट (State of Goveniance Reporn) लाने का सुझाव दिया)
ऽ इनसे भ्रष्टाचार को रोकने में सहायता मिलती है।
ऽ सूचना के अधिकार से ई-शासन (E-Governance) को बल मिलता है जिससे कि स्मार्ट शासन (SMART&Simple] Moral] Accountable] Responsive and Transparent Governance) को बढ़ाया जा सकता है।
ऽ सूचना के अधिकार से लोकसेवा मूल्य विकसित होते हैं जो कि सुशासन के लिए जरूरी है।

विश्व में सूचना के अधिकार का इतिहास
(History of Right to Information in world)
दुनिया भर में स्वीडेन ऐसा पहला देश है जिसने शासकीय कामकाज में पारदर्शिता और सूचना के अधिकार के लिए 243 साल पहले सूचना का अधिकार लागू किया था। शासकीय कार्यों में पारदर्शिता एवं सूचना के अधिकार को लगभग 1940 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण जरूरत मान लिया गया था। 1946 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि सूचना का अधिकार मनुष्य का एक बुनियादी अधिकार है तथा यह उन सभी स्वतंत्रताओं की कसौटी है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ ने प्रतिष्ठित किया है। इसी तरह, संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1948 में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में घोषणा की कि ‘जानकारी पाने की इच्छा रखना, उसे प्राप्त करना तथा किसी माध्यम द्वारा जानकारी एवं विचारों को फैलाना मनुष्य का मौलिक अधिकार है।‘
फिनलैंड में 1951 में सरकारी दस्तावेजों की सार्वजनिक प्रकृति निर्धारित करने संबंधी कानून के रूप में पारदर्शिता लागू की गयी। कनाडा, अमेरिका, फ्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की भावनाओं के अनुरूप सूचना के अधिकार संबंधी कानून बनाये। हालाँकि इनमें कई प्रकार के निर्बधन व अपवाद भी रखे गये। इसके बावजूद पूरी दुनिया में सूचना के अधिकार को लहर चल पड़ी। ब्रिटेन ने अपने सौ वर्ष पुराने गोपनीयता कानून में संशोधन किया।
कनाडा में ‘एक्सेस टू-इनफॉरमेशन एक्ट, 1982 के जरिये सूचना का अधिकार-लागू हुआ अमेरिका के सूचना स्वातंत्रय अधिनियम, 1974 के तहत सूचना देने का दायित्व शासन पर है। फ्राँस में सरकारी दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुँच सुनिश्चित करने हेतु 1978 में कानून बना। न्यूजीलैंड ने ऑफिशियल इनफॉरमेशन एक्ट, 1982‘ बनाया।

सूचना का अधिकार लागू होने से पहले भारत और विश्व परिदृश्य
(Outlook of the world and India Before Implementation of right to information),
ब्रिटेन दुनिया में शासकीय गोपनीयता कानून बनाने वाला पहला देश है। ब्रिटेन में पहली बार 1889 में शासकीय गोपनीयता कानून बना था। जब ब्रिटेन में ऐसा कानून, लाया जा रहा हो तो भारत को उससे अलग रखने का कोई कारण नहीं था। उसी वर्ष भारत में भी ‘शासकीय गोपनीयता कानून, 1889‘ लागू कर दिया गया। कालांतर में पत्रकारिता पर अंकुश लगाने के लिए 1904 में उस कानून में संशोधन करके कुछ प्रावधानों को और कड़ा कर दिया गया। इसके तहत समस्त अपराधों को संज्ञेय एवं गैर-जमानतीय बना दिया गया। बाद में ब्रिटेन तथा भारत में इस कानून में कई परिवर्तन हुए। अंततः भारत में नया कानून ‘शासकीय गोपनीयता अधिनियम, 1923‘ बना। वह कानून आज भी देश में लागू है, भले ही सूचना के अधिकार ने उसे अप्रासंगिक कर दिया हो। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 22 में स्पष्ट लिखा गया है कि इस अधिनियम के उपबंध, शासकीय गोपनियता अधिनियम, 1923 और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से अन्यथा किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखित में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे।
शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 में श्गोपनीयताश् की कोई परिभाषा नहीं दी गयी है। इसलिए इसे काला कानून की संज्ञा दी जाती रही है। यह सरकार पर निर्भर है कि वह किस बात को गुप्त करार दे। यह कानून किसी भी सामान्य सरकारी दस्तावेज को ‘गोपनीय‘ करार देकर किसी भी व्यक्ति को जेल की हवा खिलाने के लिए पर्याप्त है। इस रूप में, इस कानून ने कार्यपालिका को असीमित, अपरिभाषित एवं निरंकुश अधिकार दे रखा है। हालाँकि इसमें न्यायालय यह तय कर सकता है कि कोई बात गोपनीय है अथवा नहीं। फिर भी, अगर कार्यपालिका चाहे तो किसी नागरिक या पत्रकार को इस कानून के सहारे आसानी से प्रताड़ित कर सकती है।
स्वधीनता के बाद कई महत्त्वपूर्ण संस्थाओं/आयोगों ने इस कानून को बदलने या इसमें व्यापक फेरबदल की सिफारिश की। प्रथम प्रेस आयोग, 1954 ने भी इस बात.को दोहराया। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग, 1968 के देशमुख अध्ययन दल ने शासकीय गोपनीयता संबंधी प्रावधानों की अतार्किक एवं अनावश्यक प्रावधानों, जिनके कारण सूचनाओं के प्रवाह में बाधा आती है, को हटाने की मांग की। भारतीय विधि आयोग ने 1971 में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ पर अपनी रिपोर्ट में शासकीय गोपनीयता कानून 1923 की धारा पाँच का उल्लेख करते हुए सुझाव दिया कि ऐसे सामान्य प्रकटीकरण पर, जिनसे राज्य-हित प्रभावित नहीं होते हों, मुकदमा चलाने नहीं देनी चाहिए। ऐसी ही सिफारिशें भारतीय प्रेस परिषद् 1981 ने ‘ऑफिशियल सीक्रेसी एंड द प्रेस‘ नामक अपनी रिपोर्ट में किया। द्वितीय प्रेस आयोग 1982 ने भी इसे निरस्त करने की मांग की।
इन सिफारिशों के बावजूद अब तक यह कानून कायम है। हालाँकि सूचना के अधिकार ने इसे अप्रासंगिक बना दिया है। वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग, 2006 ने तो इस कानून को निरस्त कर देने का सुझाव दिया है। अमेरिका के न्यायधीश बर्गर ने रोजेनब्लेट बनाम बेयर (1966, 383, यूएस 75,49-95) नामक वाद में कहा था- ‘‘जनता के सुनने का अधिकार उसके बोलने के अधिकार में अंतनिहित है। आम नागरिकों के लिए सूचना पाने का अधिकार सरकार या किसी प्रसारण लाइसेंसधारी या किसी व्यक्ति के किसी विषय पर अपने विचारों को प्रसारित करने के अधिकार से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।‘‘
हेराल्ड जे. लास्की के अनुसार- ‘‘जिन्हें भरोसेमंद और वास्तविक सूचनाएँ नहीं मिल पाती, उनकी स्वतंत्रता खतरे में है। आज नहीं तो कल उनका नष्ट होना स्वाभाविक है। सत्य किसी भी राष्ट्र की मुख्य धरोहर है और जो उसे दबाने या छिपाने करते हैं अथवा जो उसके उजागर होने से भयभीत रहते हैं, बर्बाद होना ही उनकी नियति है।‘‘

भारत में सूचना के अधिकार का इतिहास (History of Right to Information in India)
पूरी दुनिया में सूचना की आजादी के आंदोलनों से भारत में भी इसकी जरूरत महसूस हुई। हालाँकि यह माना जाता रहा है कि भारत के संविधान की धारा 19(1) (क) में जानने का अधिकार भी निहित है। इसमें सभी नागरिकों को वाक्-स्वातंत्रय एवं अभिव्यक्ति-स्वातंत्रर्य का अधिकार देने की बात है। संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का कहीं अलग से उल्लेख नहीं है। प्रत्येक नागरिक के लिए प्रदत्त इस स्वतंत्रता में ही प्रेस की स्वतंत्रता को भी अंतर्निहित माना गया है। इसी तरह, सूचना के अधिकार को भी इसका अनिवार्य अंग बताया गया है। उच्चतम न्यायालय के अनेक निर्णयों में सूचना के अधिकार के अनुकूल निर्णय दिए गए हैं जैसे कि-
ऽ इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम भारत संघ 1985 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि नागरिकों को सरकार के संचालन संबंधी सूचनाओं के विषय में जानने का अधिकार है।
ऽ हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ 1960, में कहा गया कि सामान्य हित के विषयों पर विचार और सूचना ग्रहण करने तथा पाने का अधिकार भी वाक-एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शामिल है।
ऽ हिम्मतवाला बनाम पुलिस आयुक्त अहमदाबाद 1973 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था- लोकतंत्र की मूल अवधारणा यह है कि नागरिकों की सहमति के आधार पर शासन होना चाहिए। यह सहमति स्वतंत्र और स्वाभाविक होने के साथ ही विभिन्न स्त्रोतो से प्राप्त पर्याप्त सूचनाओं और विचार-विमर्श पर आधारित हानी चाहिए।

द्वितीय प्रेस आयोग, 1981 के अनुसार ‘‘लोकतंत्र का आधार जागरूक और जानकार जनमत है, और जनता अपना मत तभी बना सकती है, जब उसे पूरी जानकारी हो। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार के पास जो भी जानकारी है, वह जनता को उपलब्ध हो।‘‘
10वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में कहा गया है कि अगर सूचना को अधिकार के तौर पर सभी नागरिकों को उपलब्ध कराया जाये तो शासन के लिए विकास योजनाओं का कार्यान्वयन आसान हो जायेगा।
भारत में सूचना के अधिकार के लिए सबसे ठोस, स्पष्ट एवं अनवरत् आंदोलन राजस्थान के किसानों ने चलाया। अरुणा राय एवं निखिल डे के नेतृत्त्व में ‘‘हमारा पैसा, हमारा हिसाब‘‘ आंदोलन भारत में सूचना के अधिकार का अगुवा बना। 1975 में आईएएस की नौकरी छोड़कर जनांदोलनों से जुड़ी अरुणा राय ने 1987 में राजस्थान के देवडूंगरी गाँव में एक संगठन की नींव रखी- ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन‘। भारत के पूर्व एयर मार्शल पी.के.डे. के पुत्र निखिल डे तथा स्थानीय कार्यकर्ता शंकर सिंह की मदद से इस संगठन ने जल्द ही अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इसके नेतृत्व में मजदूरी, आजीविका के साधन तथा जमीन के सवालों पर आंदोलन तेज हुआ।
इसी तरह, विकास योजनाओं में गबन तथा कम मजदूरी के खिलाफ 1993 में आरंभ अभियान ने धीरे-धीरे पारदर्शिता के लिए आंदोलन का रूप लिया। इसी दौरान, ‘अपना गाँव, अपना काम‘ योजना में भारी अनियमितता का भंडाफोड़ करने के लिए इससे संबंधित दस्तावेजों की मांग करते हुए 15 जून, 1994 को भीम राजसमंद में धरना दिया गया। इसी वर्ष जून महीने में पाली जिले के कोट किराना गाँव में ग्रामीणों के दबाव में बीडीओ द्वारा किये गये जाँच में फर्जीवाड़े का पता चला। इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-सुनवाई का अनूठा प्रयोग शुरू हुआ। जन-सुनवाई में दस्तावेजों को ग्रामीणों के बीच जाँच के लिए पेश करने पर भारी गड़बड़ियों का पता चला। चार जिलों में जन-सुनवाई के आधार पर मजदूर किसान शक्ति संगठन ने भ्रष्ट अधिकारियों एवं जन प्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का प्रयास किया। लेकिन इसकी अनुमति नहीं मिली। इसके बाद मजदुर किसान शक्ति संगठन ने जानने के अधिकार को लेकर आंदोलन तेज कर दिया। 1 मई, 2000 को राजस्थान विधानसभा ने सूचना का अधिकार कानून पारित किया। इसी दिन पंचायती राज अधिनियम में संशोधन करके वार्ड सभा एवं ग्राम सभा में सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य कर दिया गया। 26 जनवरी 2001 से राजस्थान में सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ। राजस्थान को सूचना का अधिकार देने वाले पहले राज्य का श्रेय भले ही न मिला हो, लेकिन यहाँ के ग्रामीणों को पूरे देश में इसकी अवधारणा और उदाहरण पेश करने का ऐतिहासिक गौरव अवश्य प्राप्त हुआ।

भारत में सूचना का अधिकार लागू होने के विविध चरण
(Various Steps of Implementation of Right to Information in India)
ऽ भारत में 1989 में प्रधानमंत्री बने श्री वीपी सिंह ने 3 दिसंबर, 1989 को देश के नाम अपने पहले संदेश में संविधान संशोधन करके सूचना का अधिकार प्रदान करने तथा शासकीय गोपनीयता कानून में संशोधन की सर्वप्रथम घोषणा की थी। हालाँकि सरकार इसे लागू नहीं कर पायी।
ऽ 1 मार्च, 1990 को केन्द्र सरकार ने शासकीय गोपनीयता कानून में संशोधन संबंधी बिंदुओं पर अर्द्धशासकीय पत्र निर्गत करके जानने का प्रयास किया कि शासकीय गतिविधियों में गोपनीयता को किस तरह कम किया जा सकता है।
ऽ अक्टूबर, 1995 में लालबहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी में सूचना के अधिकार पर कार्यशाला हुई। इसमें सूचना के अधिकार पर आंदोलनरत् प्रमुख लोगों तथा अधिकारियों ने विचार-विमर्श करके सूचना के अधिकार का एक प्रारूप तैयार किया।
ऽ 24 मई, 1997 को नयी दिल्ली में मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन हुआ। इसका विषय था-‘‘प्रभावी और उत्तरदायी सरकार के लिए कार्य-योजना का निर्माण।‘‘ इसमें सूचना का अधिकार कानून बनाने पर सहमति हुई। कार्मिक एवं लोक-शिकायत मंत्रालय ने अपनी 38वीं रिपोर्ट में भी ऐसे कानून की सिफारिश की।
ऽ 1996 में गांधी शांति प्रतिष्ठान (नयी दिल्ली) में नेशनल कैम्पेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉरमेशन (छब्च्त्प्) का गठन हुआ। एनसीपीआरआइ तथा भारतीय प्रेस परिषद् ने जस्टिस पी बी सावत के नेतृत्व में मसविदा दस्तावेज तैयार किया तथा इसे भारत सरकार को सौंपा गया।
ऽ सरकार को पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाये रखने के लिए एच.डी. शौरी की अध्यक्षता में समिति गठित की गयी। शौरी समिति ने मई 1997 में ‘सूचना स्वातंत्रय विधेयक‘ का प्रारूप प्रस्तुत किया। एच.डी. शौरी द्वारा प्रस्तुत प्रारूप पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका।
ऽ वर्ष 2001 में संसद की स्थायी समिति ने सूचना स्वातत्रंय विधेयक अनुमोदित किया।
ऽ दिसंबर, 2002 में संसद ने सूचना स्वातत्रय विधेयक पारित किया।
ऽ जनवरी, 2003 में इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। 6 जनवरी, 2003 को इसे अधिनियम संख्या 5/2003 के बतौर अधिसूचित किया गया। लेकिन इसकी मियमावली बनाने के नाम पर इसे लागू नहीं किया गया।
ऽ मई, 2004 में केन्द्र में यूपीए सरकार ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् का गठन किया। परिषद् ने सूचना के अधिकार का एक मुकम्मल दस्तावेज प्रस्तुत किया।
ऽ संसद में सूचना का अधिकार विधेयक 22 दिसम्बर, 2004 को पेश किया गया। यह विधेयक 2002 के कानून से बेहतर जरूर था, लेकिन इसमें कई खामियाँ थीं।
ऽ अंततः इसे मार्च, 2005 में संसद में पेश किया गया।
ऽ यह 11 मई, 2005 को लोकसभा में 144 संशोधनों के साथ पारित हुआ।
ऽ 12 मई को राज्यसभा ने भी इसे पारित कर दिया।
ऽ 12 जून, 2005 को राष्ट्रपति ने इसे स्वीकृति दी।
ऽ इस तरह, 12 अक्टूबर 2005 से सूचना का अधिकार कानून पूरे देश में (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) प्रभावी हो गया। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार से जुड़े निकायों के संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सूचना मांगने का अधिकार जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को भी प्राप्त है।

कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य (Some Important Facts)
ऽ सूचना के अधिकार के संदर्भ में केन्द्रीय कानून बनने से पहले देश के नौ राज्यों- तमिलनाडु (1997), गोवा (1997), राजस्थान (2000), कर्नाटक (2000), दिल्ली (2001), असम (2002), मध्य प्रदेश (2002), महाराष्ट्र (2002). जम्मू-कश्मीर (2004) में यह अधिकार लोगों को मिल चुका था।
ऽ कर्नाटक ऐसा पहला राज्य है जिसने सूचना का अधिकार लागू करने की कोशिश की। हालाँकि उसे सफलता नहीं मिली।
ऽ तमिलनाडु विधानसभा ने 17 अप्रैल, 1997 को सूचना का अधिकार विधेयक पारित किया। इस तरह, भारत में ऐसा पहला कानून बनाने का श्रेय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि को मिला। इसके तीन महीने बाद ही, जुलाई 1997 में गोवा विधानसभा ने विधेयक पारित करके ऐसा दूसरा राज्य होने का गौरव पाया।
ऽ मध्य प्रदेश सरकार ने 1996 में मध्य प्रदेश राइट टू इनफॉरमेशन बिल तैयार किया। 1997 में इसे कैबिनेट में भारी विरोध का सामना करना पड़ा। 1998 में मध्य प्रदेश विधानसभा ने इस विधेयक को पारित करके आश्चर्यजनक रूप से राज्यपाल के बदले राष्ट्रपति के पास मंजूरी हेतु भेज दिया। यह विधेयक कभी वापस नहीं लौटा। पाँच साल बाद, 2003 में मध्य प्रदेश विधानसभा ने पुनः नया विधेयक पारित करके लागू किया। (हालाँकि मध्य प्रदेश के बिलासपुर संभाग के कमिश्नर हर्ष मंदर ने 1995 से 1997 के बीच सार्वजनिक विवरण प्रणाली, परिवहन, ग्रामीण विकास योजनाओं, साक्षरता, रोजगार से जुड़े दस्तावेजों में पारदर्शिता के महत्त्वपूर्ण प्रयास किये)।
ऽ राजस्थान वह राज्य है, जहाँ सूचना के अधिकार के लिए सबसे पहले और सबसे जबरदस्त आंदोलन हुआ। भारी जनदबाव के कारण 1995 में मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने विधानसभा में आश्वासन दिया कि जल्द ही सूचना का अधिकार लागू किया जाएगा, लेकिन जनता को अगले पाँच वर्षों तक निरंतर आंदोलन करना पड़ा। मई, 2000 में राजस्थान विधानसभा ने सूचना का अधिकार विधेयक पारित किया।
ऽ महाराष्ट्र में 11 दिसंबर 2000 को सूचना का अधिकार विधेयक पारित हुआ, लेकिन यह बेहद कमजोर था। इसमें विभिन्न महत्त्वपूर्ण सूचनाओं पर पाबंदी थी। इसलिए सूचनावादियों को यह कानून बेहद अपर्याप्त लग रहा था। यही कारण था कि अन्ना हजारे ने राज्य में जोरदार आंदोलन चलाकर एक बेहतर कानून बनाने का दबाव डाला। महाराष्ट्र सरकार ने नया विधेयक बनाने के लिए 10 सितंबर, 2001 को समिति गठित की तथा अप्रैल 2002 में विधानसभा में नया विधेयक आया। साथ ही, 23 सितंबर 2002 को एक अध्यादेश लाया गया। मार्च 2003 में महाराष्ट्र विधानसभा के दोनों सदन ने विधेयक पारित कर दिया तथा 10 अगस्त, 2003 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गयी। इस अध्यादेश को 23 सितंबर 2002 से लोग माना गया।
ऽ मई, 2001 में दिल्ली में सूचना का अधिकार विधेयक पारित हुआ और उसे 02 अक्टूबर, 2001 से लागू किया गया।
ऽ उत्तर प्रदेश ने कोड ऑफ प्रैकिटस आॅन एक्सेस टू इनफाॅरमेशन, 2000 पारित किया। हालाँकि इसके प्रावधान बेहद सीमित होने के कारण इसकी खास प्रासंगिकता नही देखी गयी।
ऽ अंततः वर्ष 2005 में सुखना का केन्द्रीय कानून अपने वास्तविक रूप में सामने आया।