भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएं क्या है | भारत समाज और संस्कृति की मुख्य विशेषता के तत्वों की विवेचना कीजिए

By   February 3, 2022
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भारत समाज और संस्कृति की मुख्य विशेषता के तत्वों की विवेचना कीजिए भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएं क्या है |

भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ और भारत की विविधता
(Salient features of Indian Society and Diversity of India)
भारतीय समाज एवं इसकी मुख्य विशेषताओं को ठीक ढंग से समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि समाज क्या है? समाज एक से अधिक लोगों का समूह (Group) है जिसमें सभी मानवीय क्रियाकलाप संपन्न होते हैं। मानवीय क्रियाकलापों से आशय आचरण, सामाजिक सुरक्षा, निर्वाह आदि क्रियाओं से है। दूसरे शब्दों में, समाज मानवीय अंतःक्रियाओं (Interaction) के प्रक्रम की एक प्रणाली है।
मानव की कुछ नैसर्गिक तथा अर्जित आवश्यकताएँ, जैसे-काम, क्षुधा, सुरक्षा आदि होती हैं पर वह इनकी पूर्ति स्वयं करने में सक्षम नहीं होता। इन आवश्यकताओं को सम्यक् संतुष्टि के लिए लंबे समय में मनुष्य ने एक समष्टिगत व्यवस्था (Holistic System) को विकसित किया है जिसे समाज कहा गया है। यह व्यक्तियों का ऐसा संकलन है जिसमें वे निश्चित संबंध और विशिष्ट व्यवहार द्वारा एक-दूसरे से बंधे होते हैं। समाज व्यक्तियों की वह संगठित व्यवस्था भी है, जहाँ विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न मानदंडों (Norms) को विकसित किए जाते है और कुछ व्यवहारों को जो कार्य और कुछ को निषिद्ध किया जाता है।
समाज में विभिन्न कर्ताओं का समावेश होता है जिनमें परस्परा अंतःक्रिया (Interaction) होती है। प्रत्येक कर्ता अधिकतम संतुष्टि की और उन्मुख होता है। इसी अतःक्रिया की मदद से समाज के अस्तित्व् को अक्षुप्रण बनाया जाता है। अतःक्रिया की प्रक्रिया को संयोजक तत्व संतुलित करते हैं तथा वियोजक तत्व सामाजिक संतुलन में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। वियोजक तत्वों के नियंत्रण हेतु संस्थाकरण द्वारा कर्ताओं के संबंधों तथा क्रियाओं का समायोजन होता है जिससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होती है और अंतर्विरोधों का शमन होता है। सामाजिक प्रणाली में व्यक्ति को कार्य और पद तथा दंड और पुरस्कार, सामान्य नियमों और स्वीकृत मानदंडों के आधार पर प्रदान किऐ जाते है। समाजिक दंड के इसी भय से सामान्यतः व्यक्ति समाज में प्रचलित मान्य परंपराओं की उपेक्षा नहीं कर पाता और वह उनसे समायोजन का हर संभव प्रयास करता है।
चूँकि समाज व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों की एक व्यवस्था है इसलिए इसका कोई मूर्त स्वरूप नहीं होता। इसकी अवधारणा अनुभूतिमूलक है। समाज में पारस्परिक सहयोग एवं संबंधो का आधार सामूहिक आचरण है जो समाज द्वारा निर्धारित और निर्देशित होता है। समाज में सामाजिक मान्यताओं के संबंध में सहमति अनिवार्य होती है। यह सहमति पारस्परिक विमर्श तथा सामाजिक प्रतीको को स्वीकारने पर आधारित होती है। असहमति की स्थिति संघर्षों को जन्म देती है जो समाज के विघटन का कारण बनती हैं। यह असहमति उस स्थिति में पैदा होता है जब व्यक्ति सामूहिकता के साथ पहचान बनाने में असफल रहता है। समाज और उसके सामाजिक संगठन का स्वरूप कभी शाश्वत नही बना रहती। मानव मन और समूह मन को गतिशीलता उसे निरंतर प्रभावित करती रहती है जिसके परिणामस्वरूप समाज परिवर्तनशील होता है। उसकी यह गतिशीलता ही उसके विकास का मूल है। सामाजिक विकास परिवर्तन की एक चिरंतन प्रक्रिया है जो सदस्यों की आकांक्षाओं और पुनर्निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में उन्मुख रहती है।

भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ (Salient Features of Indian Society)
समाज कई प्रकार के हो सकते हैं। अलग-अलग आधारों पर अलग-अलग समाजों का निर्माण हुआ है, जैसे- ग्रामीण समाज, शहरी समाज, पशुचारण समाज, कृषक समाज, आधुनिक समाज, उत्तर आधुनिक समाज. अमेरिकी समाज, ब्रिटिश समाज, यूरोपीय समाज, हिन्दू समाज पारसी समाज, आदि। इन सभी समाजों की अपनी विशेषताएँ होती हैं जिसके आधार पर हम उसे अन्य समाजों से अलग कर सकते हैं। हर समाज की तरह भारतीय समाज की भी कुछ विशेषताएँ हैं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैः

प्राचीनता एवं स्थायित्व (Ancientness and Stability)
भारतीय समाज प्राचीनतम समाजों में से एक है। विश्व की अन्य प्राचीन संस्कृतियाँ, जैसे- मिस्र, सीरिया, बेबीलोन, रोम, आदि विनष्ट हो गई लेकिन भारतीय संस्कृति व समाज-व्यवस्था आज भी कायम है। आ भी हमारे यहाँ वैदिक धर्मों को मानने की परम्परा है। गीता, महावीर और गौतम बुद्ध के उपदेश आज भी देश में जीवंत बने हुए हैं। भारतीय जन-जीवन का मौलिक आधार आज भी वही है जो प्राचीन भारत में विद्यमान था।

सहिष्णुता (Tolerance)
सहिष्णुता भारतीय समाज की एक अद्भुत विशेषता है। यहाँ सभी धर्मों, जातियों, प्रजातियों एवं संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता एवं प्रेम का भाव पाया जाता है। भारत में समय-समय पर अनेक विदेशी संस्कृतियों का आगमन हुआ और सभी को विकसित होने का अक्सर प्राप्त हुआ। इनमें से किसी भी संस्कृति का दमन नहीं किया गया और न ही किसी समूह पर कोई संस्कृति थोपी गई। यहाँ आज भी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन सभी अपनी-अपनी विशेषताएँ बनाए हुए हैं।
समन्वय (Coordination)
भारतीय समाज के सहिष्णु स्वभाव के कारण ही इसमें भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का समन्वय हो पाया है। यदि विभिन्न संस्कृतियों को नदियाँ मान लिया जाए तो भारतीय संस्कृति वह सागर है जहाँ सभी नदियाँ आकर मिलती हैं। विभिन्न संस्कृतियों, जैसे-जनजातीय, हिन्दू, मुस्लिम, शक, हूण, सिथियन, ईसाई आदि से भारतीय संस्कृति नष्ट नहीं हुई वरन् इन संस्कृतियों ने भारतीय समाज में समन्वय एवं एकता ही स्थापित की है।

आध्यात्मवाद (Spiritualim)
आध्यात्मवाद भी भारतीय समाज की एक अनूठी विशेषता है। यहाँ भौतिक सुख और भोग-विलास को कभी भी जीवन का उद्देश्य नही माना गया। आत्मा और ईश्वर के महत्व को स्वीकार किया गया है और भौतिक सुख के स्थान पर मानसिक एवं आध्यात्मिक सुख को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। धर्म और आध्यात्मिकता भारतीय समाज में आत्मा की तरह बसा हुआ है। भारतीय समाज में सहिष्णु प्रवृत्ति का उदय आध्यात्मवाद के कारण ही हुआ है।

धर्म की प्रधानता (Dominance of Religion)
भारतीय समाज एक धर्म प्रधान समाज है। यहाँ मानव जीवन के प्रत्येक व्यवहार को धर्म के द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है। प्रत्येक भारतीय अपने जीवन काल में अनेक धार्मिक कार्यो व अनुष्ठानों का आयोजन करते है। यह धर्म संकुचित धर्म नही बल्कि मानवतावादी धर्म है जो सभी जीवों के प्रति दया और कल्याण की भाव रखता है। इस प्रकार भारतीय समाज व संस्कृति के विभिन्न अंगो पर धर्म की स्पष्ट छाप दिखाई देती हैैैैैैैैैैैैैैैैैैैै।

अनुकूलनशीलता (Adaptability)
भारतीय समाज के अनुकूलनशील प्रकृति होने के कारण हों यह आज भी कायम है। भारतीय समाज में समय के साथ परिवर्तित होने की विशिष्ट क्षमता है। यहां के परिवार-जाति धर्म एवं संस्थाओं ने समय के साथ-साथ स्वंय को अनुकूलित किया है। यही कारण है कि भारतीय समाज एवं संस्कृति का विघटन के स्थान पर परिवर्तन होता रहा और यह स्वंय को नष्ट होने से बचाने में कामयाब रहा।

वर्णाश्रत व्यवस्था (Class System)
वर्ण एवं आश्रमों की व्यवस्था भी भारतीय समाज की एक विशेषता है। यहाँ समाज में श्रम विभाजन के लिए चार वर्णो – ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र की रचना की गयी। इनमें ब्राह्मणों को सबसे ऊपर रखा गया और उन्हें बुद्धि और शिक्षा के प्रतीक के रूप में माना गया। उसके बाद क्षत्रिय का स्थान है जिन्हें शक्ति के प्रतीक के रूप में माना गया। तीसरे पदानुक्रम पर वैश्यों को रखा गया जो भरण-पोषण एवं अर्थव्यवस्था का संचालन करते हैं तथा शूद्र जिन्हें चैथे एवं अन्तिम पायदान पर रखा गया, अन्य सभी वर्णो की सेवा करते हैं।
प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के लिए चार आश्रमों-ब्रहाचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की व्यवस्था की। जहाँ वर्ण मनुष्यों के बीच कार्य विभाजन को इंगित करते हैं वहीं आश्रम उनके मानसिक और आध्यात्मिक विकास को प्रकट करते हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था मानव जीवन की समस्याओं व जीवन दर्शन पर निर्भर है। भारतीय समाज की यह व्यवस्था संसार को एक अनुपम भेंट है।

जाति-व्यवस्था (Caste System)
जाति-व्यवस्था के आधार पर भारतीय समाज को कई भागों व उपभागों में बाँटा गया है। जन्म से ही जाति की सदस्यता प्राप्त होती है तथा प्रत्येक जाति का समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान होता है। इनके खान-पान एवं सामाजिक गतिविधियों के नियम हैं तथा इनमें एक परम्परागत व्यवसाय भी पाया जाता है। प्राचीन काल के चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ही कालान्तर में जाति के रूप में विकसित हो गये। जाति व्यवस्था भारतीय समाज को अनेक ढंग से प्रभावित करती रही है।

कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त (Doctrine of Karna and Reincarnation)
भारतीय समाज में कर्म को काफी महत्त्व दिया गया है। ऐसी मान्यता है कि अच्छे कर्मों का अच्छां जबंकि बुरे कर्मों का बुरा फल प्राप्त होता है। मृत्यु के बाद पुनः वह किस योनि में जन्म लेगा यह उसके पिछले जन्म के कर्म पर निर्भर करता है। अच्छे कर्म करने वालों को उच्च योनि में जबकि बुरे कर्म करने वालों को निम्न योनि में जन्म लेना होता है। उच्च योनि में जन्म लेने वाले सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं जबकि निम्न योनि में जन्म लेने वालों को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। इस विशेषता के कारण ही हमें हमेशा अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।

सर्वांगीणता (Completeness)
भारतीय समाज का निर्माण किसी एक जाति, वर्ग, धर्म या व्यक्ति विशेष से नहीं हुआ है बल्कि इसके निर्माण में विभिन्न धर्मों, वर्गों, जातियों एवं अनेक महापुरुषों का योगदान रहा है। यही कारण है कि भारतीय समाज में सभी के कल्याण की बात कही गयी है। ‘सवंे भवन्तु सुखिनः‘ भारतीय संस्कृति का सार है अर्थात् यहाँ सभी के सुख की कामना की गई है।

संयुक्त परिवार (Joint Family)
अति प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में संयुक्त परिवार प्रथा का प्रचलन रहा है। इसमें सामान्यतः दो या तीन या अधिक पीढ़ियों को सदस्य एक साथ निवास करते हैं। सभी सदस्य परिवार के मुखिया के अधीन होते हैं तथा सभी सदस्यों का संपत्ति पर स्वामित्व होता है। इस प्रथा को जन्म देने में भारतीय कृषि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

पुरुषार्थ की अवधारणा (Concept of Purushartha)
भारतीय परम्परा में जीवन का ध्येय पुरुषार्थ को माना गया है। पुरुषार्थ की संख्या चार बताई गयी हैः ‘धर्म-(Religion or Righteousness) अर्थ (Wealth), काम (Work, Desire and Sex) और मोक्ष (;Salvation or Liberation) |  इसमें धर्म से आशय अपने कर्तव्यों का पालन करने से है। हर मनुष्य के लिए कुछ कर्तव्यों का निर्धारण किया गया है और उसे इनका पालन करना चाहिऐ। वही उसके धर्म का पालन भी है। अर्थ से तात्पर्य है जिसके द्वारा भौतिक सुख-समृद्धि की सिद्धि होती हो। ऐसे कर्म हो जिससे अर्थोपार्जन हो। अर्थोपार्जन से ही काम साधा जाता है। काम की अवधारणा में संसार के सुखों को शामिल किया गया है। जिन व्यक्तिगत सुखों से परिवार और समाज को हानि होती है ऐसे सुखों को वर्जित माना गया है। मोक्ष का अर्थ है-जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और संसार में आवागमन से मुक्ति। मोक्ष भारतीय समाज की चरम लक्ष्य समझा गया है। माना गया है कि प्रत्येक प्राणी को मोक्ष प्राप्त करने की दिशा में प्रयास करना चाहिऐं। कुछ अपवादों को छोड़कर समूचे भारतीय दर्शन में मोक्ष को सर्वोच्च आदर्श माना गया है।

संस्कार (Sanskara)
संस्कार से तात्पर्य शुद्धिकरण की प्रक्रिया से है। भारतीय समाज में व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और नैतिक शुद्धि आवश्यक माना गया है और इसके लिए कई संस्कारों की व्यवस्था की गई है, जैसे- जातकर्म, नामकरण, विद्यारम्भ, निष्क्रमण सीमन्तोन्नयने, उपनयन, अन्नप्राशन, गर्भाधान, पुंसवन, चूड़ाकरण, कर्णवेध, समावर्तन, विवाह एवं अन्त्येष्टि आदि। इन संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति को उसकी विशेष स्थिति और आयु में उसके सामाजिक कर्तव्यों का अवबोध कराना है।

विविधता में एकता (Unity in Diversity)
विविधता में एकता भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यहाँ प्रजाति, जनजाति, जाति, भाषा, धर्म, पर्यावरण आदि आधार पर व्यापक विविधताएँ विद्यमान हैं लेकिन इसके बावजूः उनमें अद्भुत एकता पायी जाती है।
उपरोक्त आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में कुछ ऐसी विशेषताएँ पायी जाती हैं जिससे उनकी अपनी एक अलग पहचान है और पूरा विश्व उसे आदर और सम्मान की दृष्टि से देखता है।