इरावती कर्वे कौन थी | iravati karve contribution to sociology in hindi इरावती कर्वे के बारे में जानकारी

By   February 13, 2021

इरावती कर्वे के बारे में जानकारी iravati karve contribution to sociology in hindi इरावती कर्वे कौन थी ?

इडावती कर्वे
इडावती कर्वे एक प्रबुद्ध परिवार की बेटी थीं तथा वे महर्षि कड़वे के परिवार की वधू बनीं। उनके परिवार ने ब्राह्मण समाज में सुधार लाने के लिये विधवा विवाह का समर्थन किया।

इडावर्ती कर्वे की प्रारंभिक रचना महाराष्ट्र के विभिन्न समूहों में मानवमितीय मापों (anthropometric measurements) पर थी। इस रचना में उन्होंने सामाजिक समूहों को भाषा के आधार पर विभाजित किया तथा इन सामाजिक समूहों के समान व्यवसाय (कुम्हार आदि) के आधार पर उनके उद्गम का पता लगाया। कर्वे ने पाया कि कुछ समूह बहिर्विवाही थे तथा इन्होंने ष्जातिष् का रूप ले लिया था, दूसरी तरफ व्यवसाय के आधार पर बसी जातियां इकट्ठी होकर एक ग्रामीण समुदाय बन गई थीं।

अपनी मुख्य कृति, किनशिप आर्गनाईजेशन इन इंडिया (1953), में उन्होंने भारत को चार मुख्य क्षेत्रों में बांटा और उनका तुलनात्मक अध्ययन किया। इस कृति की शुरुआत महाभारत के विभिन्न पात्रों की वंशावली से होती है साथ ही उन्होंने भारत के विभिन्न भागों से एकत्रित की गई जानकारियों का भी उपयोग किया। उन्होंने हिन्दू धर्म की नए प्रकार से व्याख्या की। उनके लेखन में भारतशास्त्र और सामाजिक सर्वेक्षण का समन्वय है।

महाभारत पर मराठी में लिखी गई रचना, युगांतर, के लिए उन्हें विशिष्ट रूप से पुरस्कृत किया गया। उनकी कुछ साहित्यिक कृतियों को मराठी स्कूलों की पुस्तकों में समाविष्ट किया गया। वैसे तो महाराष्ट्र के स्कूलों में उन्हें साहित्यकार के रूप में ही जाना जाता था, किन्तु बाद में समाजशास्त्रियों द्वारा उन्हें एक समाजशास्त्री के रूप में भी मान्यता मिली।

उन्होंने पुणे के दक्कन कालेज में समाजशास्त्र और नृशास्त्र की नींव डाली। वहां प्राक-इतिहास (prehistory) के एच. डी. संकालिया, अर्थशास्त्र के डी. आर. गाडगिल आदि महान बुद्धिजीवी उनके समकालीन थे। इस विद्वतापूर्ण वातावरण में ही पुणे विश्वविद्यालय का विकास हुआ।

इडावती कर्वे एक आकर्षक वक्ता थीं। वे अपने विषय की उत्तम शिक्षिका थीं और साथ ही वे भारतीय समाजशास्त्र के क्षेत्र में पहली महत्वपूर्ण महिलाओं में से एक थीं। भारत में महिलावाद का अध्ययन करने वालों में उनका नाम सबसे पहले लिया जाता है (देखें उबेरॉय 1993ः46 और जैन 1994)।

इडावती कर्वे ने अपनी समाजशास्त्रीय कृतियों में भारतशास्त्र के साहित्य का उपयोग किया है। इडावती कर्वे मुंबई में जी.एस. घुर्ये की शिष्या थीं।

1930 के दशक में अंतिम वर्षों में पुणे में समाजशास्त्र एवं नृशास्त्र दोनों को मिलाकर संयुक्त विभाग का आरम्भ हुआ। इड़ावती कर्वे इस विभाग की अध्यक्ष बनीं। उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में विस्तार से क्षेत्रीय कार्य (fieldwork) किया। संस्कृत के ज्ञान ने उन्हें प्राचीन शास्त्रों जैसे धर्मग्रंथ, न्याय पुस्तकें और महाकाव्यों के अध्ययन में काफी मदद की। उन्होंने इस जानकारी का उपयोग भारत में नातेदारी व्यवस्था को समझने के लिये किया। उनकी पुस्तक, किनशिप आर्गनाइजेशन इन इंडिया (1952), भारत की नातेदारी व्यवस्था पर श्रेष्ठतम पुस्तकों में से एक है (श्रीनिवास एवं पाणिनी 1986ः30)।

आज भी प्राचीन भारतीय ग्रंथ भारत के धर्म और समाज के विभिन्न पहलुओं को व्यक्त करते हैं। वर्तमान समय में भी बहुत से समाजशास्त्री साहित्य और कला के द्वारा भारतीय समाज को समझने का प्रयास कर रहे हैं।

बोध प्रश्न 3
प) उन तीन ब्रिटिश प्रेसिडेंसियों के नाम बताइए जहां उन्नीसवीं शताब्दी में विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई थी। दो पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
पप) कलकत्ता विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का आरंभ किसने किया? समाजशास्त्र में उनके योगदान को दस पंक्तियों में लिखिए।
पपप) भारतशास्त्र (Indology) क्या है? कुछ भारतविदों के नाम बताइए। पाँच पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

भारत में समाजशास्त्रीय चिंतन की सामाजिक पृष्ठभूमि
भारतवर्ष का इतिहास चार सहस्राब्दियों से भी लंबा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में संस्कृत, प्राकृत और पाली जैसी भाषाओं में लिखे गए धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ भरे हुए हैं, इसके अलावा मध्ययुग में, अवधी, बृज, मैथिली, बंगला, असमी, मराठी, कन्नड, तेलुगु, मलयालम आदि क्षेत्रीय भाषाओं में भक्ति साहित्य का भंडार भरा पड़ा है।

 अंग्रेजी राज से पूर्व सामाजिक विचारधारा
साहित्यिक परंपराओं की दृष्टि से भारत की सभ्यता अपेक्षाकत संश्लिष्ट या मिश्रित किस्म की रही है। भारतीय दर्शन में योग, सांख्य, न्याय, वैशेषिक वेदांत और मीमांसा नामक छह प्रकार की विभिन्न विचारधाराएं हैं। भारतीय चिंतनधारा का यह एक महत्वपूर्ण स्रोत है। तेरह प्रमुख उपनिषदों में मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन और उसके चरम लक्ष्य से संबंधित दार्शनिक अन्वेषण हैं। इनके अलावा भारत में बौद्ध और जैन धर्मों की दार्शनिक कृतियां भी हैं। सामान्यतः ये सभी विचारधाराएं मानवमात्र के क्रमिक विकास से सम्बद्ध हैं। इन में से अधिकांश मोक्ष, अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्त के लक्ष्य से जुड़ी हैं। भारतीय समाज नवीन परिस्थितियों के अनुरूप बदलता रहा है। आधुनिक काल से पूर्व भारत की सामाजिक विचारधारा एक बहुविध नृजातीय समाज की अभिव्यक्ति थी। इस्लामी पंरपरा के प्रभाव से सूफी संप्रदाय का उदय हुआ जिसने विशेषरूप से उत्तर भारत में लोगों के रहन-सहन और मूल्यों को व्यापक रूप से प्रभावित किया। हिंदू और मुस्लिम विचारधारा के समन्वय का एक अच्छा उदाहरण सिख धर्म है। भारत में अलग-अलग विचारों को पनपने की स्वतंत्रता रही है। मतों व विश्वासों के आधार पर किसी विशेष वर्ग पर अत्याचार नहीं किया गया था। इसीलिए भारत के सामाजिक वर्गों के बीच एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता की भावना बनी रही। भारत में धर्म तो जनसाधारण के बीच फला-फूला किंतु दर्शन की औपचारिक विचारधाराएं मुख्यतरू पढ़े-लिखे शहरी लोगों के बीच ही पनपी ।

 अंग्रेजी राज का प्रभाव
भारत में अंग्रेजों का आगमन एक ऐसी घटना थी जिसका भारतीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। नई सामाजिक और आर्थिक शक्तियों ने पुरानी परंपराओं को तोड़ा। संस्कृत और फारसी जैसी प्रतिष्ठित भाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी राजभाषा हो गई। भारत के ग्रामीण हस्तकला उद्योग की वस्तुएं मैनचेस्टर, लंकाशायर, शेफील्ड और लंदन से आयी मशीनों के बने कपड़ों और अन्य वस्तुओं के सामने बाजार में नहीं टिक पाईं। इसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे ग्रामीण हस्तकला उद्योग नष्ट हो गए। उपनिवेशी शासन में भारतीय गांव एक स्वावलंबी इकाई नहीं थे। अंग्रेजों ने भारत में रेल, डाक व तार द्वारा संपर्क व्यवस्था को आसान बनाकर भारतीय समाज में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन के मार्ग खोल दिये। इसके अलावा उप महाद्वीप के अनेक भागों में प्रशासनिक और न्यायिक सेवाओं की व्यवस्था भी की गई। इस विकास के द्वारा भारत ने आधुनिक युग में प्रवेश किया। अंग्रेज शासकों ने भारत में स्कूल कॉलेज और विश्वविद्यालयों की स्थापना की। मिशनरी और भारतीय स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये प्रयास किये।

 मध्यमवर्ग का उदय
पुराने सामंती वर्ग जैसे राजा, महाराजा, जमींदार, तालुकदार आदि अब उतने महत्वपूर्ण नहीं रह गए थे। वास्तव में जिस मध्यमवर्ग का उदय अंग्रेजी राज में हुआ उसने भारतीय समाज के लगभग हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। इस इकाई में जिन सामाजिक विचारकों की चर्चा की जाएगी वे सभी इसी मध्यमवर्ग के हैं। हालांकि धार्मिक अनुष्ठानों और पारिवारिक मामलों में जाति का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन व्यवसाय, रोजगार और जनजीवन के क्षेत्रों में वर्ग महत्वपूर्ण हो गये हैं। यहां पर हमने मध्यमवर्ग शब्द का प्रयोग सिर्फ आर्थिक रूप में नहीं किया है। मध्यमवर्ग के उदय में आर्थिक तथा सांस्कृतिक तत्वों का योगदान था। मध्यमवर्ग के लोगों का न केवल आर्थिक जीवन बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन भी समान होता है।

सुधार हेतु सामाजिक-धार्मिक एवं अन्य आंदोलन
उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के आरंभ में मध्यमवर्ग ने भारतीय समाज में सुधार और आधुनिकीकरण की ओर प्रयास शुरू किया। इन सुधारवादी प्रयासों में सामाजिक तथा धार्मिक सुधार दोनों थे। बीसवीं सदी का उत्तरार्ध आने तक अनेक अन्य आंदोलन भी प्रकट हुए।

सुधारवादी आंदोलन
उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारकों में से एक प्रमुख सुधारक बंगाल के राजा राममोहन रॉय (1772-1833) थे जिनका सुझाव था कि यदि भारत के लोग सती प्रथा, बालहत्या आदि जैसे अंधविश्वासों और बुराइयों को त्याग दें तो वे प्रगतिशील बन सकते हैं। उन्होंने एक नए प्रकार के धर्म का प्रचार किया जिसमें वेदों के साथ ईसाई धर्म की शिक्षाओं का भी समावेश था। उन्होंने ब्रह्मो समाज की स्थापना की जो कि एक आध्यात्मिक मंच था। इस समाज के सदस्य जाति तथा अंधविश्वास से कोई मतलब नहीं रखते थे। इस समाज में मूर्तिपूजा का विरोध किया गया था और एक ही ईश्वर को पूजा जाता था।

राजा राममोहन रॉय का प्रभाव मुख्यतः बंगाल के शहरी और सुशिक्षित वर्ग तक ही सीमित था। इसी शताब्दी में महाराष्ट्र के एक न्यायाधीश महादेव गोविंद रानाडे ने मुंबई में प्रार्थना समाज की स्थापना की जो मोटे तौर पर बंगाल के ब्रह्मो समाज पर आधारित था। इन दो आंदोलनों के प्रति सामाजिक प्रतिक्रियाएं काफी भिन्न थीं। ब्रह्मो समाज द्वारा पाश्चात्य उदारवादी दृष्टिकोण पर जोर दिए जाने के कारण समाज के रूढ़िवादी हिंदुओं ने राजा राममोहन रॉय के सुधारों का विरोध किया। यहां रूढ़िवादी परंपराओं और आधुनिकता के बीच एक द्वंद्व खड़ा हो गया। इसके विपरीत प्रार्थना समाज द्वारा शुरू की गयी उदारवादी प्रवृतियों ने परंपरा और आधुनिकता के बीच तनाव नहीं आने दिया। ब्रह्मो समाज की तरह इसके सदस्यों ने स्पष्टतया गैर परंपरावादी रहन-सहन नहीं अपनाया। इसलिए समाज द्वारा इनका उतना कड़ा प्रतिरोध नहीं हुआ।

पुनर्जागरण आंदोलन
हमारी चर्चा में पुनर्जागरण आंदोलनों का उल्लेख काफी महत्व है। दयानंद सरस्वती (1824-1883) ने आर्य समाज की स्थापना की। इसके द्वारा उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे हिंदु धर्म की हानिकारक परंपराओं (जैसे जातिवाद की संकीर्णता अंधविश्वासों और अनुष्ठानों आदि) को त्याग कर फिर से वेदों की पुरातन शुद्धता को अपनाएं। आर्य समाज ने ऐसी शिक्षा का समर्थन किया जिसमें परंपरा और आधुनिकता दोनों का समावेश था। दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेजों (डी ए. वी.) ने उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया। विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के दो प्रमुख उद्देश्य थे – पहला यह कि शिक्षित भारतवासियों को समाज के कमजोर वर्गों के प्रति जिम्मेदारी का अहसास दिलाएं, इसके साथ ही वे गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन को हटाने का प्रयास करें। दूसरे यह कि वे पश्चिमी देशों में भारतीय वेदों का प्रचार-प्रसार करें। पहले उद्देश्य की पूर्ति के लिए शहरी, ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में कई स्कूल और छात्रावास स्थापित किए गए, जिससे सामान्य लोगों के लिए शिक्षा और रोजगार की संभावनाएं बढ़ी। दूसरे उद्देश्य के लिए बहुत से पश्चिमी देशों में आध्यात्मिक जागरण के उद्देश्य से कई अद्वैत केंद्रों की स्थापना की गई।

 अन्य आंदोलन
जिस प्रकार सुधारवादी तथा पुनर्जागरण आंदोलनों ने भारत में सामाजिक सुधार की लहर पैदा की और भारतीय समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक जागरूकता से जुड़ी बौद्धिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला, उसी तरह स्वतंत्रता के बाद के काल में पर्यावरण हास और गलत ढंग के विकास के विरोध में उपजे आंदोलनों ने भी बौद्धिक कार्यकलापों को प्रभावित किया। फलस्वरूप अनेक समाजशास्त्रियों ने ऐसी समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया जो विकास प्रक्रिया (जैन 1995इ, 2001ं, 2001इ, 2001ब तथा 2003), निर्वनीकरण (जैन 1984ं, 1984इ, 1994, 1995ं तथा 1998-99), विस्थापन (फर्नान्डेस 2000) और भारत में महिला-पुरुष की जनसंख्या के अनुपात में विषमता (पटेल 1994) जैसे विषयों से जुड़े हैं। ये सारे मुद्दे देश के विभिन्न भागों में उपजे अनेक आंदोलनों के माध्यम से सामने आए तथा विद्वानों ने तब इन पर अध्ययन किये। इस इकाई में हमने इन प्रवृत्तियों का नाम भर ही लिया है। इनके विस्तार में न जाते हुए आपको बता दें कि समाजशास्त्र में आए विकास के इन चरणों से जुड़े विषयों को समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री के पाठ्यक्रमों में शामिल करने के पूरे प्रयास होंगे।

बोध प्रश्न 1
प) भारतीय दर्शन की छः विचारधाराओं के नाम लिखिए। तीन पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
पप) अंग्रेजी शासन के द्वारा भारतीय समाज में होने वाले तीन महत्वपूर्ण परिवर्तनों के बारे में लिखिए। दस पंक्तियों में उत्तर लिखिए।
पपप) ब्रह्मो समाज की स्थापना किसने की? इसके क्या उद्देश्य थे? सात पंक्तियों में उत्तर दीजिए।