तृण सर्प या वाइपर सांप के बारे में जानकारी दीजिये | वाइपर सांप के काटने पर क्या करे

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वाइपर सांप के काटने पर क्या करे तृण सर्प या वाइपर सांप के बारे में जानकारी दीजिये ?

सांप
तृण-सर्प सोवियत संघ में तृण-सर्प और वाइपर (रंगीन चित्र ६) सांपों की विशेष परिचित जातियां हैं।
तृण-सर्प ताल-तलैयों और नदियों के आसपास रहता है जहां उसे अपना भोजन – मेंढ़क और मछली – मिलता है। इस प्राणी के लंबा शरीर होता है जिसमें कोई अंग नहीं होते । यह सभी सांपों की विशेषता है । तृण-सर्प विषहीन सांपों की जाति में आता है। इसे हाथ में उठा लेने में भी कोई खतरा नहीं।
सभी उरगों की तरह तृण-सर्प की त्वचा पर भी शृंगीय आवरण होता है। पीठ और बगलों पर छोटे छोटे शल्क होते हैं जबकि उदर वड़ी और आड़ी कवचपट्टियों से ढंका रहता है। निर्मोचन के समय तृण-सर्प पूरा शृंगीय आवरण (केंचुल ) उतार देता है, छिपकली की तरह उसके हिस्से नहीं। मिट्टी या पत्थरों से रगड़ाकर वह उसे मुंह के पास कटवा लेता है और फिर किसी संकरी दरार में से गुजरने लगता है। इससे मृत त्वचा मोजे की तरह उल्टी होकर निकल आती है।
ऊपर की ओर से तृण-सर्प काले रंग का (भूरे-कत्थई से लेकर काले तक) होता है और नीचे की ओर से हल्के पीले रंग का। वाइपर में और तृण-सर्प में एक विशेष भिन्नता यह है कि तृण-सर्प के सिर के दोनों ओर दो नारंगी-पीले ( कभी कभी सफेद-से ) ठप्पे होते हैं ।
अपने शरीर को मोड़ते और सीधा करते हुए तृण-सर्प तेज रफ्तार से जमीन पर चलता है। पानी में वह उतनी ही आजादी से और तेज रफ्तार से तैरता है।
जमीन पर रेंग सकने में कुछ सुविधाएं हैं। इससे तृण-सर्प न अपने शिकार को दिखाई देता है और न उन प्राणियों को ही जो उसके दुश्मन हैं और उसका पीछा करते हैं ( साही, लोमड़ी, बगुला )। टांगों के अभाव में तृण-सर्प ईंधन के ढेरों, पत्थरों या झुरमुटों के तनों के बीच की छोटी छोटी दरारों में से रेंगकर गुजर सकता है।
पिथोन जैसे कुछ सांपों में पश्चांगों के कुछ अवशेष मिलते हैं जो त्वचा के नीचे से उभड़े न उभड़े-से दिखाई देते हैं। इससे सूचित होता है कि अन्य सभी रीढ़धारियों की तरह सांपों के पुरखों के भी सयुग्म अंग हुआ करते थे।
तृण-सर्प अपना भोजन – मुख्यतया मेंढ़क – जमीन पर और पानी में ढूंढ लेता है। मेढ़क के पास पहुंचकर वह उसे अपने चैड़े मुंह में धर दबाता है। तेज, अंदर को झुके हुए दांत चिकने शिकार को पकड़ रखते हैं और तृण-सर्प उसे जिंदा निगल जाता है। पूरा का पूरा मेंढक मुंह और गले में से अंदर ढकेला जाता है। जबड़े की हड्डियों की चल संधियों से यह संभव होता है। प्रांत में ऐसे बड़े शिकार के पाचन में काफी समय लगता है। सजीव प्रकृति-संग्रह में तृण-सर्प को आम तौर पर महीने में दो बार खिलाते हैं।
तृण-सर्प की आंखों की पलकें आपस में मिली हुई और पारदर्शी होती हैं। वातावरण से संपर्क रखने में कांटेदार जबान महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। घास में से गुजरते हुए तृण-सर्प जवान को वाहर झटकाकर आसपास की चीजों का स्पर्श करता है। सांप की जवान को कभी कभी डंक कहते हैं लेकिन यह गलत है।
गरमियों में तृण-सर्प की मादा लगभग २० बड़े और लंबाकार अंडे देती है। अंडों पर सफेद चमड़ी का सा आवरण होता है। अंडे कूड़े-करकट या लकड़ी में रखे जाते हैं। इन चीजों के सड़ने पर उष्णता उत्पन्न होती है। अंडों में से नन्हे नन्हे तृण-सर्प निकल आते हैं।
वाइपर तृण-सर्प के विपरीत वाइपर एक विषैला सांप है। इसके रंग भिन्न भिन्न हो सकते हैं दृ कत्थई , भूरा-सा , कालासा। पर उसे आसानी से तृण-सर्प से अलग पहचाना जा सकता है क्योंकि इसके सिर पर पीले ठप्पे नहीं होते और पीठ पर काली सर्पिल रेखा फैली हुई होती है। यह रेखा सिर तक पहुंचती है और वहां काट का चिह्न बनाती है (रंगीन चित्र ६)।
दिन में वाइपर आम तौर पर धूप सेंकता हुआ या घास और पत्थरों में छिपा हुआ चुपचाप पड़ा रहता है। रात में वह चूहों और दूसरे छोटे छोटे प्राणियों के शिकार पर निकलता है।
वाइपर अपने शिकार को पकड़कर अपने विषैले दांतों से काटकर मार डालता है। एक एक ऐसा दांत ऊपर के जबड़े में दोनों ओर होता है। सांप का मुंह खोलने पर ये दांत साफ साफ नजर आते हैं (आकृति १०२)। विषैले दांत में एक संकरी नाली होती है जो दांत के सिरे में खुलती है। विष-ग्रंथि की वाहिनी नाली के आरंभ से जुड़ी रहती है। इन ग्रंथियों का एक जोड़ा सांप के सिर में होता है। इसी कारण वाइपर का सिर अन्य विषैले सांपों की तरह पीछे की ओर चैडा और धड़ से एकदम अलग-सा नजर आता है।
वाइपर के तेज विषैले दांत पीछे की ओर झुके हुए और तालु पर दबे हुए रहते हैं। जब मुंह खुलता है तो वे नीचे की ओर सरकते हैं । वाइपर जिन्हें खाता है वे प्राणी उनके घाव में विष के फैल जाते ही फौरन मर जाते हैं। घबड़ाया हुआ वाइपर बड़े प्राणियों को, यहां तक कि आदमी को भी काट लेता है। मनुष्य पर उसके विष का परिणाम भिन्न भिन्न प्रकार से हो सकता है। यह घाव में गिरे हुए विष की मात्रा और काटने की जगह पर निर्भर करता है (यह जगह जितनी मनुष्य के सिर के नजदीक , उतना ही परिणाम अधिक भयानक)। विष के प्रभाव से आदमी बीमार पड़ता है और कभी कभी मर भी जाता है।
वाइपर से काटे जाते ही, चिकित्सा सहायता मिलने तक , फौरन विशेष उपाय किये जाने चाहिए , जैसे – (१) घाव को खोलकर उसमें से रक्त निकाल लेना य (२) पोटेशियम परमैंगनेट के एक प्रतिशतवाले घोल से घाव धो डालना। यह घोल विष को प्रभावहीन कर देता है।
विभिन्न प्राणियों पर वाइपर का विष अलग अलग प्रभाव डालता है। उदाहरणार्थ , साही , जो सांपों को खाती है, उसके डंक को किसी विशेष तकलीफ के बिना सह लेती है।
वाइपर का जनन अंडों के जरिये होता है। अंडे दिये जाने से पहले ही भ्रूण का परिवर्द्धन होता है। अंडों से नन्हे नन्हे चल सांप निकलते हैं। इस प्रकार के जनन के कारण सांप उत्तर की ओर के प्रदेशों में भी रह सकता है जहां मौसम अधिक नम और ठंडा होता है और गरमियां छोटी होती हैं। वहां अंडों के परिवर्द्धन के लिए स्थिति – अनुकूल नहीं होती।
उरग वर्ग की विशेषताएं उरग वर्ग ऐसे रीढ़धारी प्राणियों का वर्ग है जो जमीन पर जीवन बिता सकते हैं। उनके शरीर पर शृंगीय आवरण होता है जो उसे सूख जाने से बचाता है। उरग अपने फुफ्फुसों द्वारा वायुमंडलीय हवा में सांस करते हैं। जमीन पर उनका जनन होता है। वे बड़े अंडे देते हैं जिनपर एक मोटा आवरण होता है।
उरग वर्ग में छिपकलियों और सांपों के अलावा कछुए और मगर शामिल हैं। इस समय उरगों के लगभग ४,५०० भिन्न भिन्न प्रकार ज्ञात हैं।
प्रश्न- १. सांप की विशेषताएं बतायो। २. तृण-सर्प को वाइपर से अलग कैसे पहचाना जा सकता है ? ३. वाइपर से काटे जाने पर क्या उपाय करने चाहिए? ४. उरग वर्ग की विशेषताएं बताओ।