उरग वर्ग : रेत की छिपकली के बारे में जानकारी Sand lizard in hindi उरग का अर्थ

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Sand lizard in hindi उरग वर्ग : रेत की छिपकली के बारे में जानकारी का अर्थ क्या है ?

उरग वर्ग
रेत की छिपकली
वासस्थान गरमियों में जंगलों के किनारों पर और सूखी, धुपहली पहाड़ियों पर रेत की छिपकली (आकृति १०१) दिखाई देती है। आदमी की आहट पाते ही वह पलक झपते झपते पत्थरों या घास के बीच गायब हो जाती है।
छिपकली केवल दिन में ही इधर-उधर घूमती दिखाई देती है जब हवा काफी गरम होती है। रात के शुरू होते ही वह पत्थरों के नीचे या मांद में छिप जाती है। यहीं यह प्राणी लंबे जाड़ों के दौरान सुषुप्तावस्था में लीन रहता है। उस समय वह मांद का मुंह काई से बंद कर लेता है। छिपकली के शरीर का तापमान परिवर्तनशील होता है।
छिपकली सूखे स्थानों में रहती है और अपनी सारी जिन्दगी जमीन पर ही बिताती है। उसका लंबा-सा शरीर जमीन पर की गति के अनुकूल होता है। उसके दो जोड़े छोटी छोटी टांगें होती हैं और एक लंबी पूंछ। छिपकली के शरीर को केवल उसकी टांगों का नहीं बल्कि उसकी पूंछ का भी आधार मिलता है। धड़ और पूंछ पानी की लहर की तरह हिलते हैं और इससे छिपकली को चलने में सहायता मिलती है। छिपकली अपनी लंवी लंबी अंगुलियों के सहारे पत्थरों और टीलों पर चढ़ती है। उसके हर पैर में पांच पांच अंगुलियां होती हैं । अंगुलियों में तेज नखर होते हैं । छिपकली और उसके समान अन्य प्राणी जमीन पर जिस प्रकार अपने शरीर को सरकाते हुए चलते हैं उसके अनुसार ही उन्हें उरग ( उर के बल चलनेवाले) कहा जाता है।
छिपकली की त्वचा सूखी और शृंगीय द्रव्य की परत और शृंगीय शल्कों से आवृत होती है। ऐसी त्वचा शरीर को सूखी हवा में वाष्पीकरण से बचाने का अच्छा साधन है, पर जल-स्थलचरों की श्लेष्मिक त्वचा की तरह इसमें से ऑक्सीजन शरीर में प्रवेश नहीं कर पाता। छिपकली अपनी त्वचा के जरिये श्वसन नहीं कर सकती और उसके फुफ्फुस मेंढक की तुलना में कहीं अधिक सुपरिवर्दि्धत होते हैं।
गरमियों में कई बार छिपकली का त्वचा-निर्मोचन होता है। निर्मोचन में त्वचा की ऊपरी कठोर परत टुकड़ों टुकड़ों में उखड़ आती है। पुरानी त्वचा के नीचे नयी त्वचा के तैयार होने के बाद ही यह क्रिया होती है।
मादा रेत की छिपकली भूरे-कत्थई रंग की होती है जबकि नर हरे-से रंग का जिससे ये जमीन पर और घास में अदृश्य-से रहते हैं। वसंत में नरों का रंग चमकीला हरा हो जाता है।
पोषण छिपकली कीटों, मकड़ियों और कृमियों को खाकर जीती है। शिकार को देखते ही वह उसपर झपट पड़ती है और अपना मुंह पूरा खोलकर उसे पकड़ लेती है। एक ही आकार के बहुत-से दांत उसे अपने शिकार को पकड़ रखने में सहायता देते हैं। प्रोस-कणों का पानी या गटक लिये गये शिकार के शरीर की नमी उसकी प्यास बुझाने के लिए काफी होती है।
मछली के विपरीत छिपकली का सिर गरदन के जरिये उसके धड़ से जुड़ा – रहता है। इससे यह प्राणी अपना सिर दायें-बायें घुमाकर अपने शिकार या शत्रुओं का अंदाज ले सकता है। उसके मुंह से झटके के साथ बाहर निकलनेवाली उसकी कांटेदार जवान स्पर्शेद्रिय का काम देती है।
आत्मविखंडन अपनी चपलता और फुर्तीलेपन के कारण छिपकली को काफी भोजन मिल सकता है। इन्हीं गुणों के कारण शत्रुओं से उसका बचाव भी होता है। संकट को देखते ही छिपकली भाग निकलती है। यदि उसे पूंछ से पकड़ा जाये तो वह झटके से उसे कटवाकर चंपत हो जाती है। पूंछ खोकर छिपकली अपनी जान बचा लेती है। पूंछ फिर से निकल पाती है यद्यपि वह पहले से कुछ छोटी होती है।
जनन और परिवर्द्धन गरमियों में छिपकली रेत में या जमीन में गौरैया के अंडों के आकार के पांच-दस छोटे छोटे अंडे देती है। अंडों पर सफेद चमड़ी का सा प्रावरण होता है जो अंडे को सूख जाने से बचाता है।
अंडा दिया जाने से पहले ही उसमें भ्रूण परिवर्दि्धत होने लगता है क्योंकि मादा के शरीर में ही उसका संसेचन होता है। जमीन में उष्णता के प्रभाव से भ्रूण का परिवर्द्धन जारी रहता है।
छिपकली के बड़े अंडे में बड़ी मात्रा में पोषक पदार्थ रहते हैं। उससे निकलनेवाला छिपकली का बच्चा मछलियों या जल-स्थलचरों के डिंभों से कहीं अधिक परिवर्दि्धत होता है। वयस्क छिपकली और उसके बच्चे में अंतर इतना ही है कि बच्चे का आकार छोटा होता है।
संरचना की जटिलता छिपकली के विस्तृत अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उसकी इंद्रियों की संरचना जल-स्थलचरों की संरचना से अधिक जटिल होती है। उसकी त्वचा नंगी नहीं बल्कि शृंगीय शल्कों से ढंकी रहती है। फुफ्फुसों की संरचना अधिक जटिल होती है। मस्तिष्क में अग्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क अधिक परिवर्दि्धत होते हैं जिसके फलस्वरूप छिपकली जल-स्थलचरों की तुलना में अधिक गतिशील होती है। जनन-क्रिया में छिपकली अंड-समूह नहीं देती बल्कि बड़े अंडे देती है जिनके सेये जाने पर पूर्ण परिवर्दि्धत बच्चे निकलते हैं।
प्रश्न – १. छिपकली की कौनसी संरचनात्मक विशेषताएं उसमें स्थलचर जीवन की अनुकूलता दिखाती हैं? २. छिपकली का जनन और परिवर्द्धन कैसे होता है ? ३. जल-स्थलचरों की तुलना में छिपकली की संरचनात्मक जटिलता कैसे प्रकट होती है ?
व्यावहारिक अभ्यास – वसन्त या गरमियों में अपने सजीव प्रकृति-संग्रह में । देखो कि छिपकली कीटों को किस प्रकार पकड़ती है।