सब्सक्राइब करे youtube चैनल

economic growth in hindi of india आर्थिक संवृद्धि दर क्या है , भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर का अभिप्राय ?

समावेशी विकास की ओर (संवृद्धि एवं विकास)

भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर
अब आप “संवृद्धि दर धीमी हो रही है‘‘ के कथानक पर विचार करें। इस वाक्यांश का मूल आशय यह है कि अर्थव्यवस्था का उत्पाद बढ़ तो रहा है, परंतु पिछली तिमाही/छमाही/वार्षिक अवधि की तुलना में (जो भी संदर्भित अवधि हो) धीमी गति से। यदि इसी संदर्भित अवधि में उत्पाद भी नीचे गिरा है तब इसे ‘‘उत्पाद का सिकुड़ना (संकुचन)‘‘ (contraction) कहते हैं। लगातार दो तिमाही में यदि सिकुड़ने की गति बराबर रहे तो उसे घटाव या मंदी के नाम से जाना जाता है और लगातार मंदी की स्थिति को ‘‘निराशा‘‘ (oppression) कहते हैं।
अभी तक विश्व की अर्थव्यवस्था में 1929-33 के दौरान महान् निराशा की अवधारणा का अनुभव किया गया है (इसके बारे में आगे चलकर ‘वैश्विक दृष्टिकोण‘ अध्याय में कुछ और विस्तार से चर्चा की जायेगी)।
जैसा कि हम लोग पहले बात कर चुके हैं, किसी भी अर्थव्यवस्था में संवृद्धि (Growth) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हमने देखा है कि बढ़ी हुई संवृद्धि का आशय अर्थव्यवस्था में बढ़े उत्पाद और बढ़ी आय से है। आय से उत्पाद के कारकों में भी वृद्धि होती है इससे और भी अधिक आय के चक्र का निर्माण इस प्रकार दिखाई देता है –
इस प्रकार अर्थव्यवस्था में संवृद्धि उसके स्वास्थ्य का सूचक है। इससे रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, आय में वृद्धि होती है और परिणामस्वरूप पूरी अर्थव्यवस्था में संपूर्ण रूप में धन की वृद्धि होती है। इसी कारण से सभी अर्थव्यवस्थाओं का प्रयास रहता है कि उनके यहां संपूर्ण रूप से वृद्धि हो सके। भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत के समय तक माना जाता था कि यहां की अर्थव्यवस्था ‘‘धीमी गति से वद्धि‘‘ के चक्र में फंसी हुई थी जिसके कारण आय का स्तर कम था, इसके परिणामस्वरूप् कम बचत और कम निवेश की समस्या थी। अंततः फिर से कम आय-कम बचत का चक्र पड़ता था, जिसे धीमी वृद्धि का चक्र कहते हैं।
उन दिनों यह भी कहा जाता था कि भारत “हिंदू संवृद्धि दर‘‘ के जाल को भेदकर बाहर नहीं निकल पा रहा है। उस समय की वृद्धि दर 3.5 प्रतिशत थी (इस शब्दावली के जनक प्रमुख भारतीय अर्थशास्त्री प्रो. राज कृष्णा थे)। कम आय और बढ़ती जनसंख्या के दबाव से देश में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही थी। देश के अंदर बढ़ते क्षेत्रीय एवं अंतक्र्षत्रीय असंतुलन के कारण आय की असमानताएं भी बढ़ रही थीं।
एक अर्थव्यवस्था द्वारा अपने वृद्धि दर को बढ़ाने की असफलता का कारण मात्र कम बचत और कम निवेश ही नहीं है, बल्कि संसाधनों का अभाव, तकनीकी और आधारभूत संरचना में कमी भी है। ये सभी कारक पहले वृद्धि में बाधक, थे, परंतु 21 सदी में आमूल-चूल बदलाव आया है।
21वीं सदी का प्रारंभ भारत के लिए अच्छा सिद्ध हुआ है, जहां संवृद्धि-दर ऊपर की ओर बढ़ रही है और देश संभवतः पहली बार दो अंकों की वृद्धि दर की ओर बढ़ रहा है (1980 का संक्षिप्त समय इस कथन का अपवाद है)। यद्यपि संवृद्धि दर में वृद्धि हुई है, परंतु इसका परिलक्षित प्रभाव गरीबी, बेरोजगारी, अंतर क्षेत्रीय आय असंतुलन आदि पर होता नहीं दिखाई दे रहा है। अच्छी संवृद्धि दर हासिल करने के बावजूद इच्छित परिणाम की प्राप्ति नहीं हो सकी है। 2010 से वृद्धि दर गति में स्पष्ट कमी दिखायी दे रही है और बीच में तो यह इस दशक के सबसे न्यूनतम स्तर 4.4% पर पहुँच गयी थी। किन्त, बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि उच्च वृद्धि दर रिकॉर्ड करने के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था को ठोस लाभ नहीं प्राप्त हुए हैं।
यह स्थिति हमें विकास की एक नयी अवधारणा की ओर ले चलती है। वृद्धि एवं विकास आपस में एक-दूसरे से किस प्रकार अलग हैं?

 विकास-समावेशी (संयुक्त) संवृद्धि
विकास की अवधारणा गुणात्मक (qualitative) परिमाणात्मक (quantitative) है। संवृद्धि, अंकगणित के नम्बरों के माध्यम से किसी अर्थव्यवस्था में उत्पाद-वृद्धि को दर्शाता है जबकि विकास की अवधारणा में उत्पाद वृद्धि से हुए लाभ को समाज के सबसे निचले स्तर पहुँचाना होता है। विकास का आशय अर्थव्यवस्था में समान वितरण से भी है।
पहले ऐसा विश्वास किया जाता था कि प्रारंभ में वृद्धि में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए और तत्पश्चात् विकास ‘‘नीचे रिसने वाले सिद्धांत‘‘ (Trickle down Theory) के तहत् होगा। इसका आशय यह है कि वृद्धि में बढ़ोत्तरी का लाभ नीचे छनते हुए समाज के सबसे निचले स्तर तक पहुंचेगा और समान-वितरण सुनिश्चित होगा। ‘‘संवृद्धि और विकास‘‘ का यही महत्त्व है।
शुरुआती वर्षों में हमारी समस्या थी- वृद्धि से दर को बढ़ाने में हमारी अयोग्यता और इस बात पर ज़ोर था कि वृद्धि को बढ़ाया जाय, ताकि ‘नीचे रिसने वाला सिद्धांत‘ विकास का अपना काम कर सके और समाज के निचले स्तर तक समान-वितरण हो सके। परंतु, भारत के संदर्भ में 1991 और 2005 में हुए आर्थिक सुधारों के बाद यह कहानी कुछ अलग बयान करती है। भारत न सिर्फ कम-वृद्धि-चक्र से बाहर निकल आया है, बल्कि चीन के बाद आज सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
भारत में 2005 से ऊँची वृद्धि दर प्राप्त होते हुए भी उसका लाभ ‘नीचे रिसने वाला सिद्धांत‘ के आधार पर समाज के सबसे निचले स्तर तक नहीं पहुंच पाया है और इसलिए इस सिद्धांत की सत्यता पर संदेह उठ खड़ा होता है। इस सिद्धांत के बावजूद अत्यंत गरीबी का स्तर अप्रभावित रहा, बेरोजगारी थी, यथावत रही और क्षेत्रीय विषमताएं भी जस-तस की बनी रहीं (बल्कि और भी ज्यादा परिलक्षित हुई है)। नीचे रिसने वाले सिद्धांत के, भारत के परिप्रेक्ष्य में सफल न होने के कई कारण हैं। सर्वप्रथम भारतीय अर्थव्यवस्था की एक ढाँचागत समस्या यह है कि यहाँ की आर्थिक निर्भरता अत्यधिक रूप से कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। लगभग 65ः जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। सकल घरेलू उत्पाद (ळक्च्) में, कृषि से कर का योगदान मात्र 18ः है। लगभग 55ः का सबसे बड़ा योगदान प्रदत्त सेवाओं का है। शेष 27ः अनुपूरक क्षेत्र (Secondary Sector) का है जिसमें 14% ही औद्योगिक क्षेत्र का है। जो क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में, सबसे कम योगदान करता है, इसके उलट उसपर सबसे ज्यादा निर्भरता है (कृषि) और सर्वाधिक योगदान वाले क्षेत्र (प्रदत्त सेवाएं) पर सबसे कम निर्भरता है।
दूसरा कारण भारत की संवृद्धि प्रक्रिया में एक कड़ी गायब है; और वह है, देश में प्रदत्त सेवाओं का क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र से तुलनात्मक रूप से पहले परिपक्व हो गया। आदर्श परिस्थितियों में औद्योगिक क्षेत्र की परिपक्वता पहले आनी चाहिए थी या कम-से-कम प्रदत्त-सेवा क्षेत्र के बराबर अवधि में होना चाहिए था। यह एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है कि औद्योगिक क्षेत्र एवं कृषि क्षेत्र में एक जुड़ाव होता है. चाहे वह कच्चे माल के जरिये हो या औद्योगिक उत्पादनों के माध्यम से हो। साथ ही, रोजगार अवसर भी जोड़ने की कड़ी का काम करते हैं। कुल मिलाकर इनसे अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक वृद्धि होती है।
इस प्रकार हाल के वर्षों में बढ़ी हुई संवृद्धि का लाभ, प्रदत्त सेवा क्षेत्र को ज्यादा मिला है और तुलनात्मक रूप से औद्योगिक क्षेत्र को काफी कम और कृषि क्षेत्र को तो बिल्कुल ही नहीं मिला है; जहां हमारी अधिकांश जनसंख्या निवास करती है। भारत में प्रदत्त-सेवा क्षेत्र के जल्दी परिपक्व होने का एक कारण BPOs और KPOS में वृद्धि है, साथ ही बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की एक आवश्यकता मूल्यवर्धित सेवाओं (Value added services) की है और भारत में उपलब्ध और नौकरी का इच्छुक होने के कारण इन बड़ी कंपनियों ने देश में अपना आधार स्थापित कर लिया है। इससे भी देश में प्रदत्त-सेवा क्षेत्र को परिपक्व होने में सहायता मिली है। फिर भी एक प्रश्न कि भारत के कृषि क्षेत्र पर इतनी निर्भरता क्यों है; अनुत्तरित है। भारत की बहुसंख्यक आबादी गाँवों में निवास करती है। रोजगार के अवसरों का औद्योगिक क्षेत्र में अभाव, शिक्षा का अभाव, कौशल में कमी, कृषि आधारित उद्योगों का कम विकास, परंपरागत सोच एवं अत्यंत दयनीय निर्धनता आदि अनेक कारणों में कुछ-एक कारण हो सकते हैं।
कुछ हद तक कृषि क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता के पीछे कम सरकारी प्रयास भी जिम्मेदार है। जैसे सरकार गाँवों के इर्द-गिर्द मूलभूत, कारगर, संरचनात्मक ढांचा तैयार कर सकती है और सड़क, रेल मार्ग को आपस में जोड़ सकती है। उद्देश्य होना चाहिए कि अखिल-भारतीय (Pan India) सड़क एवं रेल यातायात सुगम हो। इससे एक तो आसानी से हर जगह पहुंचा जा सकेगा और साथ ही श्रमिकों की गतिशीलता भी बढ़ जायेगी।
इतिहास साक्षी है कि जर्मनी-अमेरिका एवं हाल ही में चीन में सड़क यातायात में उन्नति से विकास के द्वार खुले। भारत में इस वास्तविकता की जागृति अभी हाल में ही आयी है और अब सड़क निर्माण को उचित महत्त्व दिया जा रहा है। इसलिए भारत में कई महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं का क्रियान्वयन हो रहा है; जैसे स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, (देश के चार महानगरों व मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नई को जोड़ने के लिए), उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर (श्रीनगर-कन्याकुमारी) और पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर (झिल्चर-पोरबंदर)। इसके अतिरिक्त टीयर-2 और 3 शहरों को जोड़ने का भी प्रयास चल रहा है। गांवों को प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत शहरों से या मुख्य मार्गों से जोड़ा जा रहा है।
वृद्धि में बढ़ोतरी के फायदों को संपादित कर चुकने के बाद भारत सरकार आम लोगों तक फिर भा नहीं पहुंच पा रही थी और इसलिए ‘‘विकास‘‘ की शब्दावली को हटाकर ‘‘संयुक्त (समावेशी) संवृद्धि (Inclusive Growth) का नाम दिया है।
यह कोई नयी अवधारणा नहीं है, परंतु इससे यह इंगित होता है कि सरकार विकास को किस दृष्टि से देख रही है। पहले यह विश्वास किया जाता था कि विकास के लिए वृद्धि एक आवश्यक आवश्यकता है। संयुक्त संवृद्धि के परिवर्तित अभिप्राय से यह भावना प्रगट होती है कि किसी भी प्रकार की वृद्धि होने वाला लाभ आम जनता तक पहुंचे, इसका आधार बड़ा हो और इस बढ़ोतरी की उन्मुखता आम जन (डंेबमे) की ओर हो न कि केवल विशिष्ट वर्ग (Classes) की ओर। इस प्रकार संयुक्त-विकास में संवृद्धि और विकास दोनों ही तत्व समाहित हैं और इनको अलग-अलग न देखकर, वर्तमान सहित भविष्य के एक रूप में देखना चाहिए।
यहां संयुक्तता (Inclusivity) से आशय ऊँची संवृद्धि से प्राप्त लाभ का ज्यादा से ज्यादा न्याय-संगत वितरण (equitable) से हैं, परंतु न्यायसंगत वितरण एक अर्थव्यवस्था में अंकगणितीय आधार पर समान वितरण नहीं है। यह सिर्फ सैद्धांतिक रूप से संभव है। न्यायसंगत वितरण से आशय ‘‘ईमानदार और न्याययुक्त‘‘ वितरण को आम जनता, विशेषकर गरीबों, के लिए सुनिश्चित करना है। इसके अंतर्गत धनी लोग और भी धनी हो जाएं, ऐसा नहीं होना चाहिए, बल्कि निर्धन की भी आय और उसके कल्याण में कुछ बढोतरी हो; यद्यपि इसमें धनी, उच्च वर्ग और निर्धन की बढ़ोतरी भले ही उचित अनुपात में नहीं हो पाये।
अगर अर्थव्यवस्था के दोनों ही उपभाग (धनी और निर्धन) वृद्धि की एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं, उनके जीवन-यापन के साधन उपलब्ध हैं, उनकी जीवन शैली आर्थिक रूप से बेहतर है और उनकी मलभूत आवश्यकताएँ पूरी हो रही हैं, तब न्याय संगत वितरण का उद्येश्य पूरा होता माना जायेगा। इसके विपरीत असमान वितरण (पदमुनपजंइसम कपेजतपइनजपवद) का आशय होगा कि धनी लोग और भी धनाढ्य हो जायेंगे जबकि निर्धन अपनी जगह पर गरीब ही रहेंगे या इससे भी खराब स्थिति में चले जाएंगे।
हम देख चुके हैं कि ‘संयुक्त संवृद्धि‘ आम जनता की ओर उन्नमुख है, तब यह जानना जरूरी है कि संयुक्त संवृद्धि से क्या-क्या मिलना चाहिए? अथवा यह कब कहा जा सकता है कि संवृद्धि अब संयुक्त हो गयी है और इसके परिणाम आने शुरू हो गये हैं? संयुक्त-संवृद्धि से निम्न दशाएं प्राप्त होनी चाहिए –
1. प्रारंभिक स्तर (Entry level) पर आम जन के लिए रोजगार के अवसर, जीवन-यापन की सुविधाएँ, बढ़ोतरी और उनके कल्याण में वृद्धि। इन सभी के सम्मिलित योगदान से अत्यंत निर्धन वर्ग में कमी आयेगी।
2. क्षेत्रीय असंतुलन में कमी।
3. कौशल-विकास के अवसर पैदा करना।
4. उद्योगों का देश में बेहतर विस्तार।
5. कृषि आधारित उद्योगों में बढ़ोतरी।
6. धीरे-धीरे कृषि क्षेत्र आधारित, आर्थिक आय की अत्यधिक निर्भरता को कम करना और रोजगार संचालित कृषि आधारित जनसंख्या का आशावादी स्थानान्तरण (Positive migration) सुनिश्चित करना।
7. व्यवसायपरक रोजगार में वृद्धि (बढ़ईगीरी, कार मैकेनिक, स्कूटर, टी. वी, मोबाइल, बागवानी इत्यादि)।
सयुक्त-संवृद्धि की एक और आवश्यकता है कि केंद्र व राज्य सरकारें अपनी सोच-समझ में बदलाव लायें, साथ मिल कर ऐसा ‘‘योग्य बनाने वाला वातावरण‘‘ (enabling environment) पैदा करें कि उपरोक्त सुविधाएं समाज में उपलब्ध हो सकें।
इस प्रकार के वातावरण निर्माण में निम्न आवश्यकताओं का पूरा होना आवश्यक है –
1. पूरे देश में रेल-सड़क का जाल बिछाना ताकि हर स्थान के लिए सुगम यातायात के साधन उपल हो सकें और यात्रियों और माल की ढुलाई तेजी से हो सके।
2. जन-सेवाओं को सबके लिए उपलब्धि (जैसे प्राथमिक चिकित्सा सुविधा, शिक्षा-सुलभता), जन उपयोगी सविधाएं (बिजली, पानी और स्वच्छता), जन-केंद्र (सामाजिक उपयोग वाली सुविधाएं जैसे सामुदायिक केंद्र इत्यादि)।
3. कौशल-विकास के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को पुनः स्फूर्तिमान बनाना।
4. निजी क्षेत्र द्वारा पूंजी निवेश के लिए उदार नीतिगत परिवर्तन (उदाहरणस्वरूप टाटा कंपनी को नैनो गाड़ी बनाने के लिए गुजरात जाना)।
5. सीधे रोजगार पहुंचाने के अवसर के लिए केंद्र बिंदु बनाना। भारत सरकार ने इस दिशा में काम करते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (MNREGA) योजना शुरू की है जिसके अंतर्गत हर जिले के निर्धन ग्रामीण परिवार के कम-से-कम एक सदस्य को 100 दिन काम दिये जाने का प्रावधान है।
भारत को भविष्य में संयुक्त-संवृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सक्षम बनाने वाले वातावरण का निर्माण पहली आवश्यकता है। बढ़ोतरी एवं विकास अथवा संयुक्त-संवृद्धि, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हर सरकार का स्वीकृत लक्ष्य रहा है। इस उद्देश्य में आज भी कोई संदेह नहीं है, परंतु इसके लक्ष्य की प्राप्ति के तौर-तरीकों में अंतर परिलक्षित है।
पूर्व की सरकारों ने वृद्धि को बढ़ाने और न्याय-संगत वितरण दोनों की जिम्मेदारी खुद पर ले रखी। थी। इस कारण उपलब्ध संसाधन दोनों ही क्षेत्रों में बंट गये और सारा प्रयास कमजोर पड़ गया। इससे न तो वांछित संवृद्धि प्राप्त हो सकी और न ही न्यायसंगत वितरण निश्चित किया जा सका।
1991 में किये गये आर्थिक सुधारों में महत्त्वपूर्ण बदलाव यह लाया गया कि निजी क्षेत्र को निवेश और संवृद्धि की बड़ी भूमिका अदा करने का प्रावधान किया गया। सरकार ने अपनी भूमिका कल्याणकारी कार्यक्रमों और सक्षम बनाने वाले वातावरण के निर्माण तक सीमित कर दी, ताकि अर्थव्यवस्था में भविष्य में संयुक्त-संवृद्धि के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके। ऐसा इस अवधारणा पर भी आधारित है कि निजी क्षेत्र आधारित संवृद्धि में बड़ी भगीदारी से ज्यादा-से-ज्यादा टैक्स प्राप्त होगा और सरकार का सामाजिक क्षेत्र में दखल का दायरा बढ़ेगा और इस प्रकार लाभ को आवश्यक जगहों पर पुनर्वितरित किया जा सकेगा।
संयुक्त-संवृद्धि कोई नयी विचारधारा नहीं है, बल्कि पहले कही जाने वाली वृद्धि, विकास और न्याय-संगत वितरण का सम्मिलित स्वरूप है, जिसे आज संयुक्त-संवृद्धि की संज्ञा दी, गयी है। यह विशिष्ट रूप तथा अवधारणा स्वयं में अकेली है, जो भारत ने अपने लिए अपनायी है। भविष्य में चुनौती मात्र उच्चतर संवृद्धि दर प्राप्त करने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि कैसे संयुक्तता का दायरा बढ़ा कर उसका आधार और भी बड़ा बनाया जाय जो आम जन के लिए लाभप्रद हो। संयुक्त-संवृद्धि 11वीं पंचवर्षीय योजना में एक चुनौतीस्वरूप रखी गयी थी और इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए 12वीं पंचवर्षीय योजना में इसे और भी बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया गया है।