जस्ता अथवा जिंक (Zinc in hindi) , Zn , जस्ता किसे कहते हैं , जस्ते के उपयोग , इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

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(Zinc in hindi) , Zn जस्ता अथवा जिंक (Zinc in hindi) , Zn , जस्ता किसे कहते हैं , जस्ते के उपयोग , इलेक्ट्रॉनिक विन्यास , का रासायनिक सूत्र क्या होता है ?

जस्ता अथवा जिंक (Zinc) , Zn

परमाण्वीय संख्या = 30

परमाण्वीय भार = 65.38

यह प्रथम संक्रमण श्रेणी का अंतिम तत्व है एवं वर्ग 12 अथवा II B समूह का एक प्रसामान्य तत्व है। इस समूह के तत्वों (Zn , Cd , Hg) के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में (n-1)s2p6d10ns2 व्यवस्था होती है अर्थात बाह्यतम कोश में 2 इलेक्ट्रॉन है और भीतर के कोश में 18 इलेक्ट्रॉन कोर है जिसे आभासी उत्कृष्ट गैस विन्यास कहते है। जिंक का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित होता है –

Zn(30) = 1s2 2s22p6 3s23p63d10 4s2

जस्ता का इतिहास और प्राप्ति (history and occurrence of zinc)

इस धातु के बारे में बहुत पुराने समय से जानकारी रही है। इसका मिश्रधातु पीतल ईसा पूर्व 1000 वर्ष पहले से ज्ञात था। इस धातु की जानकारी संभवतया भारत और चीन ने ही आठवी शताब्दी में दी एवं संभवतया सबसे पहले इस धातु को बनाया भी भारत ने ही। 8-9 शताब्दी में भारत के रसायनज्ञ नागार्जुन ने कैलेमाइन से जिंक निष्कर्षण किया। यूरोप में इस धातु को 18 वीं शताब्दी में बनाया गया।

प्रकृति में यह कई धातुओं कॉपर , सिल्वर , लेड , प्लेटिनम आदि के साथ खनिजों में पायी जाती है। बहुत अल्प मात्रा में यह धातु साँप के विष और जानवरों की कोशिकाओं में भी पायी जाती है। जिंक ब्लेण्ड के रूप में जिंक USA मैक्सिकों और ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। थोड़ी मात्रा में यह खनिज जर्मनी , बेल्जियम , इंग्लैंड और बर्मा में भी पाया जाता है। भारत में यह राजस्थान के जावर क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। जिंक के प्रमुख खनिज निम्नलिखित है –

  1. कैलेमाइन , ZnCO3
  2. जिंक ब्लेण्ड , ZnS
  3. जिंकाइट , ZnO
  4. जिंक स्पाइनल , ZnAl2O4
  5. विलेमाइट , Zn2SiO4
  6. फ्रेंकलाइनाइट , Zn(FeO2)2

जस्ते का धातुकर्म (metallurgy of zinc)

जिंक धातु के निष्कर्षण के लिए प्रमुख अयस्क के रूप में कैलेमाइन और जिंक ब्लेण्ड का उपयोग किया जाता है।

धातु का निष्कर्षण निम्नलिखित चरणों में संपन्न होता है –

  1. सान्द्रण: सर्वप्रथम जिंक ब्लेंड अयस्क का झाग प्लवन विधि द्वारा सांद्रण करवाया जाता है। अयस्क कैलेमाइन के सांद्रण की आवश्यकता नहीं पडती है। इस विधि द्वारा अयस्क के साथ जुड़े हुए अधिक मात्रा में रेतीले और पथरीले पदार्थों आधात्री को अयस्क से पृथक कर लिया जाता है। अयस्क की बारीक पीसकर एक बड़े बर्तन में डालते है जिससे तेल और जल का मिश्रण भरा रहता है , इसमें कुछ झागकारक पदार्थ डालकर लम्बी नली द्वारा अधिक दाब पर वायु प्रवाहित करते है , जब बुलबुलों के रूप में वायु प्रवाहित होती है तो बहुत सारे झाग उत्पन्न होते है एवं वायु के बुलबुलों और झाग के साथ अयस्क के सल्फाइड कण ऊपर सतह पर आ जाते है जबकि जल के साथ गीले होकर भारी रेत और पथरी के कण आधात्री के रूप में बर्तन के पेंदे में एकत्रित हो जाते है। ऊपर सतह से सल्फाइड अयस्क को हम एकत्रित करते रहते है। इस विधि से अयस्क का 95% तक सांद्रण हो जाता है।
  2. भर्जन: उपर्युक्त विधि से सान्द्र किये हुए सल्फाइड अयस्क का भर्जन करवाया जाता है। इस प्रक्रिया में अयस्क को परावर्तनी भट्टी में वायु के आधिक्य में इतना गरम करते है कि वह पिघलने न पाए। जिंक ब्लेंड को हम 800 डिग्री सेल्सियस से कम ताप पर गरम करते है।

इस प्रक्रिया में जिंक ऑक्साइड बनता है और एक महत्वपूर्ण तथा उपयोगी सह उत्पाद बनता है – सल्फर डाइ ऑक्साइड , जिसका उपयोग सल्फ्यूरिक अम्ल के औद्योगिक उत्पादन में किया जाता है।

  1. निस्तापन: कैलेमाइन का निस्तापन किया जाता है जिसमे कैलेमाइन अयस्क को हम वायु की अनुपस्थिति में गर्म करते है तब वह भी जिंक ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है।

ZnCO3 → ZnO + CO2

  1. प्रगलन: भर्जन क्रिया में बने हुए ऑक्साइडो का अपचयन करके धातु को प्राप्त करना प्रगलन कहलाता है। उपर्युक्त विधियों से प्राप्त जिंक ऑक्साइडो को उसकी आधी मात्रा पिसे हुए चारकोल के साथ मिलाकर 1300 से 1400 डिग्री सेल्सियस तक रिटोर्टो में गर्म करते है। गरम करने के लिए प्रोड्यूसर गैस का उपयोग करते है। ये रिटोर्टो एक सिरे पर बंद होते है एवं दूसरा खुला सिरा मिट्टी की नलियों से जुड़ा रहता है जो जिंक वाष्प के लिए संघनित का कार्य करती है , रिटोर्टो भट्टी पर कुछ झुकी हुई अवस्था में टिके रहते है। ये संघनित लोहे की छिद्रयुक्त नलियों से जुड़े रहते है जहाँ कार्बन मोनोऑक्साइड भी निकलती है एवं यदि कुछ असंघनित जस्ते की वाष्प होती है तो वह भी वहां जस्त-चूर्ण के रूप में एकत्रित हो जाती है जिससे थोडा CO द्वारा ऑक्सीकृत जिंक ऑक्साइड भी होता है। इस चूर्ण से पुनः प्रगलन की क्रिया दोहरा कर जिंक धातु पर प्राप्त कर लिया जाता है।

जस्ते के प्रगलन की एक अन्य अनवरत विधि है , जिसमें सिलिकन कार्बाइड की ईंटो से बने बड़े बड़े रिटार्ड होते है। भर्जित अयस्क अर्थात जिंक ऑक्साइड को चारकोल के साथ मिलाकर उनकी ब्रिकेट्स तैयार कर ली जाती है जिनसे रिटार्ड को पैक कर दिया जाता है तथा ऊपर से अयस्क डालते जाते है। ये रिटार्ड गरम करने के चैम्बर में फिट कर दिए जाते है , गर्म गैसों से इसे गर्म रखते है। रिटार्ड में निचे से प्रोडूसर गैस भेजते है जिससे अपचयन की क्रिया संपन्न होती है एवं बने हुए जस्त वाष्प और कार्बन मोनो ऑक्साइड ऊपर से निकलते है जिन्हें संघनित में ठंडा करने से जस्ता वहां एकत्रित हो जाता है एवं कार्बन मोनोक्साइड निकल जाती है।

इस उपक्रम में –

  • CO द्वारा जस्ता का ऑक्सीकरण नही हो पाता एवं
  • लगातार प्रक्रिया चलती रहती है एवं अनवरत जिंक की प्राप्ति होती रहती है।

शुद्धिकरण : उपर्युक्त विधियों से प्राप्त किया हुआ जिंक अशुद्ध होता है और स्पेलटर कहलाता है। इसमें आर्सेनिक , तांबा , सिलिकन , कैडमियम , कार्बन और जिंक ऑक्साइड आदि की अशुद्धियाँ होती है। इस जस्ते को छोटी भट्टियों में गर्म करने से इसकी दो सतहें बन जाती है , निचे की सतह लेड की होती है , ऊपर वाली सतह में जिंक और अन्य अशुद्धियाँ होती है। ऊपर की सतह को निकालकर उसे पोटेशियम नाइट्रेट के साथ गर्म करते है तथा फिर कई बार आसवन करते है। इस प्रकार शुद्ध जिंक प्राप्त होता है।

अतिशुद्ध जिंक प्राप्त करने के लिए हम विद्युत विश्लेषण विधि का प्रयोग करते है। अशुद्ध जिंक को तनु सल्फ्यूरिक अम्ल में घोलकर उसमें एलुमिनियम का कैथोड और लेड का एनोड लगाकर विद्युत विश्लेषण करते है।

दानेदार जस्ता बनाने के लिए पिघले हुए जस्ते को पतली धार के रूप में ठण्डे जल में डाला जाता है।

जस्ते के गुण (properties of zinc)

जिंक एक नीली सी आभा लिए सफ़ेद रंग की धातु होता है जिसका गलनांक 419 डिग्री सेल्सियस और क्वथनांक 920 डिग्री सेल्सियस है। यह कठोर और चमकीला होता है। 100 से 150 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर यह मुलायम और आघातवर्ध्य होता है एवं 200 डिग्री सेल्सियस पर इतना मुलायम हो जाता है कि इसका पाउडर बनाया जा सकता है। यह ताप और विद्युत का सुचालक है और कई प्रकार के मिश्रधातु और अमलगम बना सकता है।

शुष्क वायु में यह अप्रभावी रहता है लेकिन नम वायु में इसका धीरे धीरे ऑक्सीकरण हो जाता है एवं इसके ऊपर एक सफ़ेद रंग की , कार्बोनेट और हाइड्रोक्साइड की तह बन जाती है।

ठन्डे में इसकी जल के साथ क्रिया नहीं होती परन्तु रक्त तप्त अवस्था में यह भाप से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।

Zn + H2O → ZnO + H2

यह धातु तनु अम्लों के साथ शीघ्र क्रिया करती है। नाइट्रिक अम्ल के साथ यह तनु और सान्द्र अवस्था में अलग अलग उत्पाद बनाती है।

4Zn + 10HNO3 → 4Zn(NO3)2 + 5H2O + N2O

Zn + 4HNO3 → Zn(NO3)22H2O + 2NO2

यह क्षारों में घुलकर जिंकेट बनाती है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन गैस मुक्त होती है।

Zn + 2NaOH → Na2ZnO2 + H2

कॉपर , सिल्वर और गोल्ड आदि अपने से कम धनविद्युती धातुओं को यह उनके लवणों से मुक्त करती है –

CuSO4 + Zn → ZnSO4 + Cu

यह गंधक और हैलोजनों से सीधी क्रिया करके क्रमशः सल्फाइड और हैलाइड बनाती है।

Zn + S → ZnS

Zn + X2 → ZnX2

यह एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करती है। उदाहरण के लिए , यह फेरिक लवणों को फेरस लवणों में और नाइट्रेट लवणों अमोनिया में अपचयित कर देती है।

Fe2(SO4)3 + Zn → 2FeSO4 +ZnSO4

NaNO3 + 4Zn + 7NaOH → 4Na2ZnO2 + 2H2O + NH3

जिंक अमलगम एक प्रभावी अपचायक पदार्थ के रूप में प्रयुक्त होता है।

जस्ते या जिंक के उपयोग (uses of zinc)

यह एक बहुत ही उपयोगी धातु है। इसके कुछ मुख्य उपयोग निम्नलिखित प्रकार है –

  1. लोहे की चद्दरो को जिंक की पॉलिश अर्थात जिंक की परत चढाने से उन पर जंग नहीं लगता। लोहे पर एक प्रकार से जिंक की कलई चढ़ जाती है। इसके लिए साफ़ लोहे की चद्दरों को पिघले हुए जस्ते में डुबो दिया जाता है जिससे उन पर समांग और पतली जिंक धातु की परत चढ़ जाती है। इस प्रक्रिया को गैल्वेनीकरण कहते है। गैल्वेनीकृत लोहे से चद्दरें , बाल्टियाँ , बक्से आदि बनाये जाते है।
  2. शुष्क बैटरियों में जिंक धातु को कैथोड प्लेट के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  3. युद्ध में धुंए की ओट अथवा पर्दा उत्पन्न करने में इसका उपयोग होता है।
  4. यह कई महत्वपूर्ण मिश्र धातुओं का एक अवयव है। पीतल में यह ताम्बे के साथ 20-30% तक विद्यमान रहता है। जर्मन सिल्वर में यह धातु तांबे और निकल के साथ संयुक्त होता है। इसका संघटन निम्न होता है – Cu = 50-60% , Zn = 20-30% और Ni = 20%

मुज्ज धातु में यह तांबे के साथ 40% तक उपस्थित रहता है।

  1. प्रयोगशाला में दानेदार जस्त को हाइड्रोजन गैस बनाने के काम में लिया जाता है। इसके अतिरिक्त कई रासायनिक अभिक्रियाओं में इसका उपयोग जस्त चूर्ण के रूप में एक तीव्र अपचायक की भाँती किया जाता है।