विलियम मॉरिस डेविस थ्योरी क्या हैं ? william morris davis theory in hindi in geography

By   July 8, 2021

william morris davis theory in hindi in geography विलियम मॉरिस डेविस थ्योरी क्या हैं ?

(ब) अमेरिकी सम्प्रदाय (American School)
भू आकृति विज्ञान के क्षेत्र में अमेरिकन स्कूल का योगदान सर्वाधिक माना जाता है। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम चरण और बीसवीं सदी के प्रथम दो दशक के दौरान इस विज्ञान का सर्वाधिक विकास हुआ है। वास्तव में यह काल न केवल भू-आकृति विज्ञान के अमेरिकन स्कूल का हो बल्कि समस्त विश्व में भ्वाकृतिक विचारों के ‘चरम विकास‘ का युग माना जाता है। अमेरिकन स्कूल में पावेल, गिलबर्ट तथा डटन को अग्रणी माना जाता है। इनके द्वारा दिया गया वर्णन निम्न प्रकार है।

(1) विलियम मोरिस डेविस (W.M.Davis, 1850-1934) – अमेरिका के विद्वानो मे डेविस को एक महान् परिभाषक एवं विश्लेषक माना गया है। भूआकृति विज्ञान के विकास में इनका योगदान अन्य सभी विद्वानों से अधिक माना गया है। इन्होंने भूआकृति विज्ञान में अनेक नवीन संकल्पनाओं को स्थापित किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में डेविसियन स्कूल आफ जियॉमार्कोलॉजी तथा अमेरिकन स्कूल को समानार्थी माना गया। इससे पूर्व भूआकृतिक विवरणों को केवल आनुभाविक विवरण ही प्रस्तुत किया गया लेकिन इन्होंने अनेक नवीन संकल्पनाओं के साथ भूआकृतिक विज्ञान में तथ्यात्मक स्वरूपा को स्थापित कर इसे एक नवीन स्वरुप प्रदान किया था। डेविस ने भूआकृतियों के वर्णन में उत्पत्ति मूलक विधि का प्रयोग किया। इनको ‘भ्वाकृतिक चक्र‘ (Geomorphic Cycle)की संकल्पना के लिए सदैव याद किया जायेगा। डेविस ने भूआकारों एवं दृश्यभूमियों के विकास में स्थलरूपाों का एक व्यवस्थित अनुक्रम बताया था जिसके द्वारा विकास की अवस्थाओं को आसानी से पहचाना जा सकता है। अनुक्रम को डेविस ने यूवावस्था प्रौढावस्था और वृद्धावस्था कहा था। उनका विचार था कि भू-आकारों में विस्तृत रूपा में उपस्थित विभिन्नता भूगर्भिक संरचना, भ्वाकृतिक प्रक्रमों तथा विकास की अवस्थाओं में भिन्नता के कारण मिलती है। भूवैज्ञानिक अंकेक्षण द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि पृथ्वी पर अपरदन क्रिया हो रही है तथा इसके द्वारा अवसादी शैलों का निर्माण हो रहा है। इस प्रकार अनाच्छादन क्रिया द्वारा भूपृष्ठ अवनयित होकर आधार तल को प्राप्त कर लेता है।
इसके लिए उन्होंने सर्वप्रथम सन् 1989 में पेनीप्लेन का अध्ययन प्रस्तुत किया तत्पश्चात् सन् 1899 में एक मॉडल द्वारा अपदरन चक्र की संकल्पना को प्रस्तुत किया। डेविस ने पावेल की आधार स्तर की संकल्पना को समप्राय मैदान नाम दिया तथा बताया कि भूसतह पर उत्थित भूभाग अपरदन चक्र की विभिन्न अवस्था से गुजरकर अपरदित होने पर अन्त में आधार तल प्राप्त कर लेता है जब आकृति विहीन भूसतह बनाता है जिसे डेविस ने समप्रायः मैदान कहा है। उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘Physical Geography’ सन् 1909 में प्रकाशित हुई थी। भौगोलिक लेखों में ही डेविस ने अपरदन चक्र की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की थी।
2. जे.डब्लू.पावेल (J-W-Powell , 1834-1902) – पावेल संयुक्त राज्य अमेरिका में गृह युद्ध के दौरान सेना में मेंजर के पद पर रहे तथा देश की सेवा की। उसने भूवैज्ञानिक विचारों को विकासवादो दिशा दी। पावेल ने कोलोरेडो के पठार तथा उइन्टा पर्वतों पर भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण किये। उनकी वैज्ञानिक दक्षता को देखकर 1915 में डेविस ने प्रशंसा करते हुए कहा है कि , “पावेल के जीवन से सबल एवं शक्तिशाली स्वतंत्र व्यक्तित्व झलकता है वह पूर्व में ना खोजे गये परिस्थानों की प्रेरणा द्वारा अनेक नवीन सिद्धांतों को तेजी से खोज कर लेता था। उन्होंने उइण्टा पर्वत की भूगर्भिक संरचना का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी की संरचना को भू-आकृतियों के वर्गीकरण का आधार माना जाना चाहिए। पावेल महोदय ने नदी अपरदन के परिणामों को पर्याप्त महत्व दिया तथा नदी घाटियों को संरचना के आधार पर दो भागों में विभक्त किया:
(i) चट्टानों के स्तरों एवं घाटी के मध्य संबंधों के आधार पर वर्गीकरण – ये दो प्रकार की होती है, प्रथम अनुदैर्ध्य घाटियाँ तथा द्धितीय अनुप्रस्थ घाटियाँ।
(ii) उत्पत्ति के आधार पर घाटियाँ – पूर्ववर्ती, अनुवर्ती तथा अध्योरोपित तीन प्रकार की होती है।
आधार तल : (Base lavel) : पावेल ने सन् 1875 में आधार तल की संकल्पना का प्रतिपादन किया। इसे भूवैज्ञानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण कार्य माना गया। यद्यपि अस्थायी आधार तल के बारे में इनसे पूर्व ब्रिटिश भूवैज्ञानिक जार्ज ग्रीनवुड ने भी दिया था। पावेल के अनुसार नदियों अपरदन द्वारा एक सीमा तक ही गहरा कर सकती है नदी अपरदन की इस निम्नतम सीमा को आधार तल कहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई नदी बिना किसी बाधा के अपरदन करती हुई सागर तल को प्राप्त कर लेती । तो इससे निर्मित मैदानी भाग को समप्रायः मैदान कहते हैं। इस आधार पर पेनीप्लेन के बारे में भी सर्वप्रथम पावेल ने ही बताया लेकिन डेविस ने सन् 1889 में इसे अधिक स्पष्ट कर ‘पनीप्लेन‘ शब्द दिया था पावेल महोदय ने सागर तल को अन्तिम आधार तल तथा नदियों के तलों के स्थानीय आधार तल नाम दिया इन्होंने केलिफोर्निया की कोलोरेडो नदी के ग्राण्ड केनियन को शैल संरचना में विद्यमान महान विभिन्नताओं का अध्ययन करके बताया कि इस केनियन द्वारा प्राचीन भूगर्भिक काल का स्पष्टीकरण किया जा सकता है।
(3) गिलबर्ट (Gilbert, G.K. 1843 to 1918) – गिलबर्ट को अमेरिका का प्रथम वास्तविक भू-आकृतिक विज्ञानवेत्ता माना जाता है। इन्होंने सरिता द्वारा होने वाले पाश्विक अपरदन का अधिक अध्ययन किया तथा बताया कि उपर्युक्त क्रिया द्वारा नदी अपनी घाटी का विस्तार करती है। उन्होंने नदी-बोझ तथा उसके वेग तथा ढाल प्रवणता में सम्बन्ध में सिद्धान्त स्थापित किया। नदी वेदिकाओं के विषय में उन्होंने बताया कि वे नदी अपरदन का परिणाम होती है न कि निक्षेप का। नियाग्रा प्रपात के इतिहास तथा उत्पत्ति के विषय में गिलबर्ट के विवरण अधिक दिलचस्प है। गिलबर्ट ने हेनरी पर्वत के अध्ययन के बाद बताया कि असंगत कटक के तीव्र ढाल पर प्रवाहित होने वाली सरिता मन्द ढाल पर बहने वाली सरिता की अपेक्षा अधिक अपरटन करती है। परिणामस्वरूपा जल विभाजक अधिक सक्रिय नदी को ओर से कम सक्रिय नदी की ओर खिसकता जाता है। गिलबर्ट के इस सिद्धान्त को असमान ढाल का नियम के नाम से जाना जाता है।
(4) डटन (Durton C.E. 1841-1912) : संतुलन के सिद्धान्त के क्षेत्र में डटन का योगदान महत्वपूर्ण है। इटन प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने, श्पेवेजंल शब्द का प्रयोग सबसे पहले (1880 ई.) किया था। इन्होंने अलग-अलग स्थलरूपाों का अध्ययन किया।