सिवाना का किला किसने बनाया था | who built siwana fort in hindi सिवाणा दुर्ग के उपनाम क्या है

By   March 15, 2021

सिवाना दुर्ग के उपनाम who built siwana fort in hindi सिवाना का किला किसने बनाया था ?

वास्तुशिल्प
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
उत्तर प्रारूप – यदि किसी भी दुर्ग के बारे में अतिलघुरात्मक प्रश्न पूछा जाता है तो दुर्ग का नाम, निर्माता का नाम, दुर्ग की कोटि, दुर्ग का स्थल और दुर्ग से जुड़ी कोई एक प्रसिद्ध घटना उत्तर में देनी चाहिए। यदि उत्तर लघुत्तरात्मक प्रश्न का पूछा जाता है तो उपरोक्त तथ्यों के साथ-साथ अन्य विशिष्ट तथ्य देने चाहिए। नीचे दी जा रही सारणी की सहायता से उत्तर आसानी से दिया जा सकता है।
क्र.
सं. किले का नाम
(प्रचलित प्राचीन नाम) स्थान निर्माता एवं समय किले की श्रेणी अन्य
1. चित्तैड़ का
किला (चित्रकूट) चित्तौड़गढ़ चित्रांग मौर्य गिरि दुर्ग 1303 ई. 1534 ई. एवं 1568 ई. में तीन साके।
2. कुम्भलगढ़ का किला कुम्भलगढ़ (राजसमंद) राणा कुंभा
(1448-58ई.) गिरि दुर्ग मेवाड़ की संकटकालीन राधानी रहा।
4. सिवाणा का किला
(अणखला किला) सिवाणा (बाड़मेर) वीर नारायण पंवार (दसवीं शताब्दी) गिरि दुर्ग यह किला मालदेव (1531-81 ई.) के बुरे दिनों में आश्रय स्थल रहा।
5. तारागढ़ का किला (अजयमेरू दुर्ग, गढ़ बीठली) अजमेर चैहान शासक अजयराज
(1105‘1133 ई.) गिरि दुर्ग ‘गढ़ बीठली‘ के नाम से भी विख्यात।
6. गागरोण का किला (डोडगढ़ घूलरगढ़) गागरोण (झाालावाड़) बीजलदेव द्वारा (1195 ई. के लगभग) जल दुर्ग अचलदास खींची की बीरता (1423 ई.) के लिए विख्यात। दो साके हुए।
7. जैसलमेर का किला (सोनारगढ़, सोनगढ़, त्रिकूटगढ़) जैसलमेर राव जैसल द्वारा
(1155 ई.) धान्वन दुर्ग पीले पत्थरों से निर्मित जो सूर्य-किरणों से चमकने के कारण ‘सानारगढ़‘, नाम से भी विख्यात। ‘ढ़ाई साके‘ के लिए प्रसिद्ध। उत्तरभड़ किवाड़
8. जूनागढ़ का किला
(लालगढ़, बीकानेर दुर्ग) बीकानेर महाराजा रायसिंह द्वारा (1589-94 ई.) के मध्य निर्मित। धान्वन दुर्ग (स्थल दुर्ग) किले की सूरजपोल पर रायसिंह प्रशस्ति उत्कीर्ण है।
9. नागौर का किला (नागदुर्ग, अहिच्छत्रपुर दुर्ग) नागौर चैहान शासक सोमेश्वर के सामन्त कैमास द्वारा 1154 ई. में नींव रखी गई धान्वन दुर्ग अकबर ने 1570 ई. में अपना प्रसिद्ध नागौर दरबार लगाया
10. मेहरागढ़ का किला (मयूरध्वज, चिन्तामणि)
का जोधपुर राव जोधा ने 1459 ई. में इस किले की नींव रखी। गिरि दुर्ग बलुआ पत्थरों पर नक्काशी उत्तम कार्य।

11. लोहागढ़ का किला
भरतपुर
महाराजा सूरजमल (1756-65 ई.) द्वारा 1733 ई. में निर्मित स्थल दुर्ग, पारिख किले की बाहरी प्राचीर मिट्टी की बनी है, जिस पर बारुद बेअसर रहता है।
12. भटनेर का किला (उत्तर भड़ किवाड़) हनुमानगढ़
भाटी राजा भूपत ने तीसरी शताब्दी में। धान्वन दुर्ग किले का निर्माण पकी ईंटों और चूने से हुआ था।
13. अचलगढ़ का किला माउण्ट आबू (सिरोही) महाराणा कुम्भा द्वारा 1452 ई. में। गिरि दुर्ग
14. तारागढ़ का किला बूंदी
राव बरसिंह ने चैदहवीं शताब्दी गिरि दुर्ग पर्वत की ऊँची चोटी पर स्थित होने से तारे के समान दिखाई पड़ने के कारण ‘तारागढ़‘ नाम से विख्यात।
15. जयगढ़ का किला जयपुर
मानसिंह प्रथम
(1589-1614 ई. ) द्वारा निर्मित। मिर्जा जयसिंह व सवाई जयसिंह द्वारा परिवर्धित। गिरि दुर्ग इस किले पर शत्रु ने कभी आक्रमण नहीं किया। एशिया की सबसे बड़ी जयबाण तोप यहाँ रखी हुई

16. नाहरगढ़ का किला (सुदर्शनगढ़) जयपुर
सवाई जयसिंह द्वारा 1734 ई. में गिरि दुर्ग किले में सवाई माधोसिंह की नौ पासवानों के महल।
17. भैंसरोड़गढ़
का किला चित्तौड़गढ़ भैंसाशाह नामक व्यापारी और रोड़ा चारण द्वारा। जल दुर्ग चम्बल और बामनी नदियों के जल से तीन ओर से घिरा हुआ।
18. मांडलगढ़ का किला
भीलवाड़ा
अजमेर चैहान शासकों द्वारा। गिरि दुर्ग मंडलाकृति का होने के कारण मांडलगढ़ कहलाया।
19. शेरगढ़ का
किला/कोशवर्द्धन दुर्ग बारां परमार शासकों द्वारा सातवीं शताब्दी में जल दुर्ग कोशवर्द्धन पर्वत शिखर पर स्थित, शेरशाह ने शेरगढ़ नाम दिया।
20. बाला किला, अलवर का दुर्ग, बड़ा किला
अलवर अलुघराय ने 1049 ई. में।
गिरि दुर्ग खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा का साथ देने वाला हसन खाँ मेवाती यहाँ का शासक था।
21. विजय मंदिर का किला
बयाना (भरतपुर) यादव वंशी राजा विजयपाल ने 1040 ई. में। गिरि दुर्ग
22. जालौर का किला (जाबालिपुर दुर्ग, सोनगढ़, स्वर्ण गिरि) जालौर प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने आठवीं शताब्दी में। गिरि दुर्ग सोनगिरि पहाड़ी पर स्थित होने के कारण सोनगढ़ कहलाता है।
23. माधोराजपुरा का किला जयपुर सवाई माधोसिंह प्रथम भूमि दुर्ग माधोराजपुरा कस्बा बसाया।
24. बसंतीगढ़ (सिरोही) पिंडवाडा राणा कुम्भा गिरि दुर्ग मेरों पर नियंत्रण के लिए।

25. अजबगढ़ अलवर अजबसिंह 1635 ई. गिरि दुर्ग
26. डीग दुर्ग भरतपुर बदन सिंह 1730 भूमि दुर्ग
27. फतेहपुर दुर्ग सीकर फतहखाँ कायमखानी 1453 ई.
28. खींवसर दुर्ग नागौर राव करमसजी (1523 ई.) भूमि दुर्ग
29. असीरगढ़ (भूमगढ़) टोंक ब्राह्मण भोला गिरि दुर्ग
30. मनोहरथाना दुर्ग झालावाड़ भीमसिंह जल दुर्ग
31. किलोणगढ़ दुर्ग बाड़मेर भीमोजी गिरि दुर्ग
32. नवलखां दुर्ग झालारापाटन झाला पृथ्वीसिंह
33. भोपाल गढ़ खेतड़ी ठा. भोपाल सिंह गिरि दुर्ग
34. बागौर दुर्ग क्षेतड़ी
35. काकोड़ दुर्ग टोंक
36. कोटड़ा दुर्ग शिव (बाड़मेर)
37. हापा कोट चैहटन (बाड़मेर)
38. नीमराणा दुर्ग अलवर (1464 ई.) पृथ्वीराज चैहान के वंशज द्वारा गिरि दुर्ग पंचमहल के नाम से जाना जाता है।
39. कांकणबाड़ी दुर्ग अलवर गिरि दुर्ग औरंगजेब द्वारा अपने भाई दारा शिकोह को कैद किया गया।
40. इन्द्रगढ़ बूंदी गिरि दुर्ग
41. दौसा का किला दौसा कच्छावाहा गिरि दुर्ग देवगिरि पहाड़ी पर स्थित सूप (छाजले) की आकृति
42. वल्लभगढ़ ऊंटाला का किला

3. मेले एवं पर्व
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
नोट: मेले, त्यौहार, उत्सव आदि से सम्बन्धित अतिलघुत्तरात्मक उत्तर में उसका नाम, प्रकार (धार्मिक, सांस्कृतिक, आदिवासी, देश/लोकोत्सव) स्थान, समय (हिन्दू महीना) एवं आवश्यक तथ्यों का समावेश करना चाहिए। नीचे दी गई मारणी की सहायता से उत्तर आसानी से लिखा जा सकता है।

प्रश्न: मुख्य परीक्षापयोगी (धार्मिक-सांस्कृतिक मेले)
क्र.
सं. लोक देवी-देवता का नाम स्थल आयोजन समय प्रतिवर्ष विशिष्ट तथ्य
1. महावीर मेला श्रीमहावीर जी (करौली) चैत्र शुक्ला 3 से वैशाख कृष्णा 5 तक जैन धर्म का प्रमुखतीर्थ स्थल, गुर्जर मीणा भी भाग लेते हैं साम्प्रदायिक सौहार्द का स्थल, जिनेन्द्र रथयात्रा मुख्य आकर्षण
2. कपिल मुनि का मेला कोलायत (बीकानेर) कार्तिक पूर्णिमा लाखों लोग कोलायत पवित्र झील में
स्नान करने आते हैं।
3. डिग्गी कल्याणजी मेला डिग्गी मालपुरा (टांक) वैशाख पूर्णिमा श्रावण अमावस्या, भाद्रपद एकादशी लक्खी मेला, कल्याणजी (विष्णु, भक्तों की कामनापूर्ण होने का आशीर्वाद देते हैं)

4. शिवाड़ मेला शिवाड़ (सवाई माधोपुर) शिवरात्रि फाल्गुन कृष्णा 13 द्वादश ज्योतिर्लिंग, यहाँ के घुश्मेश्वर
तालाब का जल गंगा के समान पत्रित्र
माना जाता है।
5. करणीमाता मेला देशनोक (बीकानेर) चैत्र व आश्विन की नवरात्रा करणीमाता मंदिर देश में चूहों के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध, चूहों (काबा) को पवित्र माना जाता है।
6. जीणमाता मेला रेवासा (सीकर) चैत्र व आश्विन की नवरात्रा अष्टभुजा मूर्ति, विवाह की जात देने, मुंडन करवाने, मनौती मांगने आदि के लिए
7. शीतला माता का मेला शीलडंूगरी चाकसू (जयपुर) चैत्र कृष्णा अष्टमी बास्योड़ा, पुजारी कुम्हार जाति का, मातृ (जयपुर) रक्षिका एवं शिशुरक्षक माता के रूप में।
प्रश्न: कोलायत ख्त्।ै डंपदश्े 1999,
उत्तर: बीकानेर में स्थित कोलायत में कार्तिक पूर्णिमा को कपिल मुनि का मेला भरता है। लाखों लोग कोलायत पवित्र झील में स्नान करने आते हैं।
प्रश्न: लोकोत्सव एवं प्रमुख त्यौहार
क्र.
सं. त्यौहार का नाम समय विशिष्ट तथ्य
1. घुड़ला त्यौहार चैत्रकृष्णा-अष्टमी मारवाड़ क्षेत्र का त्यौहार, सधवा एवं कुमारियां दीपक जलते हुए छिद्रित मटके सिर पर रखकर गीत गाती हुई घर लौटती है।
2. रामनवमी चैत्रशुक्ला-नवमी श्रीराम के जन्मोत्सव।
3. नागपंचमी श्रावण शुक्ल-एकादशमी सर्प पूजा, नागों का त्यौहार।
4. जलझूलनी एकादशी भाद्रशुक्ल-एकादशमी देवमूर्तियों को पालनेध्बेवाणों में रखकर स्नान करवाया जाता है।
5. रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा-एकादशमी देशभर में मनाया जाने वाला भाई-बहिन के प्रेम का प्रतीक।
6. गणेश चतुर्थी भाद्रशुक्ला-चतुर्थी देश भर में गणेश जन्मोत्सव के रूप में प्रसिद्ध।
7. दशहरा आश्विन शुक्ला-दशमी सम्पूर्ण भारत का त्यौहार, श्रीराम ने बुराई के प्रतीक रावण का वध कर विजय प्राप्त की।
8. दीपावली कार्तिक अमावस्या देश का तथा हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार, भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर असुर शक्तियों का विनाश कर घर लौटे प्रकाश का त्यौहार।
9. मकर संक्रान्ति 14 जनवरी मकर राशि पर सूर्य होने के कारण, काइट फेस्टीवल
10. बसंत पंचमी माघ शुक्ला-पंचमी ऋतुराज बसंत के आगमन पर, राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित, सरस्वती जन्मदिन।
11. शिवरात्रि फाल्गुन कृष्णा-त्रयोदशी शिवजी जन्मोत्सव, गंगा स्नान का विशेष महत्व
12. मोहर्रम मुस्लिम त्यौहार हिजरी सवंत का पहला महीना इमाम हुसैन ने सत्य व इंसाफ हेतु कर्बला में शहादत पाई। ताजिए निकाले जाते है।
13. बाराबफात मोहम्मद साहब का जन्मोत्सव।
14. ईद-उल-जुहा
पैगम्बर हजरत इब्राहीम ने अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दी।
15. ईस्टर अप्रेल का रविवार ईसा मसीह पुनर्जीवित हुए।
16. गुड फ्राइडे ईस्टर पूर्व शुक्रवार ईसा मसीह को सूली पर लटकाया।
17. बैशाखी 13 अप्रेल गुरुगोविन्द सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना, नई फसल के उपलक्ष्य में।
18. चेटीचंड चैत्र शुक्ला द्वितीया झूलेलाल जन्मोत्सव

प्रतिवर्ष पशुओं की खरीद बेचान से ₹ 40-50 करोड का लेन-देन पशुपालकों के मध्य होता है। राज्य स्तरीय 10 पशु मेले निम्न है
क्र.
सं. पशु मेला एवं स्थान गौवंश आयोजन माह
1. श्री मल्लीनाथ पशु मेला, तिलवाड़ा (बाड़मेर) थारपारकर
कांकरेज चैत्र कृष्णा 11 से चैत्र शुक्ला 11 (अप्रैल)
2. श्री बलदेव पशु मेला, मेड़ता (नागौर) नागौरी चैत्र शुक्ला 1 से पूर्णिमा तक (अप्रैल)
3. श्री तेजाजी पशु मेला, परबतसर (नागौर) नागौरी श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या (अगस्त)
4. श्री रामदेव पशुमेला, मानासर (नागौर) नागौरी मार्गशीर्ष शुक्ला 1 से माघ पूर्णिमा (फरवरी)
5. श्री गोमतीसागर पशु मेला, झालरापाटन (झालावाड़) मालवी वैशाख सुदी 13 से ज्येष्ठ बुदी 5 तक (मई)
6. चन्द्रभागा पशुमेला, झालरापाटन (झालावाड़) मालवी कार्तिक शुक्ला 11 से मार्गशीर्ष कृष्णा 5 तक (नवम्बर)
7. गोगामेड़ी पशु मेला, हनुमानगढ हरियाणवी श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद पूर्णिमा तक (अगस्त)
8. जसवंत पशु मेला, भरतपुर हरियाणवी आश्विन शुक्ला 5 से 14 तक (अक्टूबर)
9. कार्तिक पशु मेला, पुष्कर (अजमेर) गीर कार्तिक शुक्ला 8 से मार्गशीर्ष 2 तक (नवम्बर)
10. शिवरात्रि पशु मेला, करौली हरियाणवी फाल्गुन कृष्णा 13 से प्रारंभ (मार्च)

मरु प्रदेश के लोक गीत
क्र.
सं. गीत का नाम क्षेत्र गायन शैली समय प्रतीक प्रकार एवं गायन
1 कुरजां मरुप्रदेश
जोधपुर मोंड वर्षा ऋतु कुरजां पक्षी विरह गीत, पत्नी पति को भेजती है।
2 कांगा – – – कौवा विरह गीत………………….उड़-उड़ जा रे काला कागा, जै म्हारा पियाजी घर आवें।
3 पीपली शेखावटी मारवाड़ – तीज पीपल वृक्ष विरह गीत
4 पपैयो – – वर्षा ऋतु पपीहा पक्षी प्रेयसी द्वारा दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक
5 मूमल जैसलमेर – कभी भी लोद्रवा की राजकुमारी मूमल पर आधारित सुन्दरता का नख से शिख तक वर्णन (श्रृंगार गीत) म्हारी बरसाने री मूमल, ढ़ालैनी ऐ आलीजे री देख
6 केसरिया मरुप्रदेश – – विरह एवं रजवाड़ी गीत स्त्रियों द्वारा केसरिया बालम आओनी म्हारे देश
7 बालम मारवाड़ माॅड – – विरह गीत
8 रतनराणों – रतनराणों – – मिलन गीत
9 सुपणा – – – स्वप्न विरह गीत, पत्नी द्वारा
10 घूघरी – माॅड – – महिलाओं द्वारा जन्मोत्सव पर, प्रेयसी द्वारा भी
11 केवड़ा – – कभी भी केवड़ा वृक्ष प्रेयसी द्वारा
12 घुड़ला जोधपुर – चैत्र घुड़ला त्यांैहार लड़कियों द्वारा सामूहिक श्रंृगार
13 इण्डोणी
पणिहारी – कालबेलिया पानी भारते समय इण्डी, पणिहारी विरह गीत, स्त्रियों द्वारा गुम हो गई इण्डोणी।
14 कांगसियों पश्चिमी राजस्थान – – पणिहारी म्हारै छैल भंवर रो कांगसियाँ पणिहारी ले गई।
15 घूमर मारवाड़ (सम्पूर्ण राज.) गणगौर – – म्हारी घूमर छ नखराली ए मा,……………
16 गोरबंद मारवाड़, शेखावाटी – – ऊंट के गले का श्रृंगार म्हारो गोरबंद नखरालों
17 ढ़ोला मारु सिरोही ढ़ादी – – ढ़ौला-मरवण की प्रेमकथा प्रेम व रस श्रृंगार गीत
18 हिचकी अलवर-मेवात क्षेत्र कभी श्रावण महिलाओं द्वारा – म्हारा पियाजी बुलाई म्हाने आई हिचकी
19 तीज ढ़ंढाड-मारवाड़ श्रावण महिलाओं द्वारा – पंछीड़ा लाल आछी, पडी रीयारी पाछीं

लोक गीत
गीत का नाम क्षेत्र समय प्रकार एवं गायन
लांगूरिया करौली कैलादेवी के मेले पर चैत्र माह कैलादेवी की आराधनों में भक्तों द्वारा, कैला मैया के भवन में डुडवन खेले लांगूरियां……………….वीर रस
पंछीड़ा हाड़ौती व ढूंढाड़ मेले के अवसर पर अलगोजा, ढोलक, मंजीरों के साथ सामूहिक …. वीर रस गायन सामूहिक गायन
बीछूड़ो हाड़ौती किसी भी समय बिच्छू के डंक से मरणासन्न पत्नी द्वारा पति को दूसरे विवाह का संदेश देने के लिए मैं तो मरी होती राज खा गयी बैरी बीछूड़ो। को दूसरे विवाह का संदेश देने की लिए
चिरमी मालवा चिरमी पौधा प्रतीक नववधू की अपने भाई या पिता का प्रतीक्षा के समय मनोदशा का वर्णन चिरमी री डाला अचार ……
सूंवटिया मेवाड़/पर्वतीय प्रदेश कभी भी/वर्षाा ऋतु विरह गीत, भीलनी स्त्री द्वारा पति को संदेश
हमसींढों मेवाड़/पर्वतीय प्रदेश श्रावण/फाल्गुन
भीलों का युगल (स्त्री-पुरूषों द्वारा)
पटेल्या पर्वतीय प्रदेश – आदिवासियों
लालसा पर्वतीय प्रदेश – –
बिछियों पर्वतीय प्रदेश – –

जनसाधारण के लोक गीत
गीत का नाम अवसर गायन प्रकार एवं गायन
माहेरा (भात) विवाह द्वारा महिलाओं लड़के-लड़की की शादी पर मामा द्वारा भात भरे जाने पर
घोड़ी – – वर निकासी के समय घुड़चढ़ी की रस्म पर
जला – – बारात का डेरा देखने के प्रसंग में वधू पक्ष की स्त्रियों द्वारा
काजलियों – – निकासी के समय वर की आंखों में भोजाई द्वारा काजल की रस्म पर
कामण – – वर को जादू टोने से बचाने के लिए, बारात के स्वागत के लिए वधू पक्ष की स्त्रियों द्वारा सीठणे गाकर
‘ओल्यू’ विवाह महिालाओं द्वारा बेटी की विदाई पर घर की स्त्रियों द्वारा मन हल्का करने के लिए, सूर्य देव से प्रार्थना कि अधिक ताप मत देना
जच्चा/होलर पुत्र जन्मोत्सव – मंगल गीत, सामूहिक
जच्चा/होलर पुत्र जन्मोत्सव – मंगल गीत, सामूहिक
रातीजगा गीत

अन्य महत्त्वपूर्ण नृत्य

क्र.
सं. नृत्य का नाम क्षेत्र समय पुरूष वाद्ययंत्र परिधान प्रकार
1 गींदड नृत्य
ख्त्।ै डंपदश्े 2008, शेखावाटी होली पुरूषों द्वारा सामूहिक रूप से हाथों में डण्डे लेकर नगाड़ा,
बांसुरी पगड़ी
केसरिया बाण्डी स्वांग साधु शिकारी सेठ सेठानी शिव पार्वती
2 ढोल नृत्य जालौर विवाह पुरूषों द्वारा ढ़ोल सामान्य –
3 गैर नृत्य मेवाड़ होली भील पुरूषों ढ़ोल मादल सामान्य श्रृंगार रस, भक्ति रस
4 वालरा उदयपुर सिरोही होली व गणगौरी मिश्रित युगल गिरासिया बांसूरी ढ़ोल
मल अंगरखी घेरदार लंबी ओढ़नी दो अर्द्धवृत पुरूष स्त्रियों के
5 बम नृत्य भरतपुर
अलवर होली पुरूषों का ढ़ोल
नक्कारा सामान्य –

प्रश्न: अवनद्ध या तालवाद्य
उत्तर: लकडी, धातु या मिट्टी पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाने वाले वाद्य अवनद्ध कहलाते हैं। इन्हें हाथों या डंडों से बजाया जाता है। राजस्थान में प्रमुख अवनद्ध लोकवाद्य प्रमुख हैं-

क्र.
सं. लोकवाद्य का नाम क्षेत्र वादक जाति/अवसर संरचना
1 मादल (मृदंग आकृति का) आदिवासी क्षेत्र-भील, गरासिए, डांगिए यह मृदंग आकृति का छोटे-बड़े मुंह वाला वाद्य यंत्र है। भील गवरी नृत्य के समय तथा गरासिए व डॉगिए नृत्यों में काम लेते हैं। भील लोग गवरी नाट्य में बजाते हैं।
2 पखावज या मृदंग रावल, भवाई, राबिया लोग नृत्य में काम में लेते हैं यह बीजा, सवन, सुपारी व बड़ के तने के पेड़ की लकड़ी पर बकरे की खाल से बनते हैं।
3 डैंरू भील व गोगाजी के भोपों द्वारा आम की लकड़ी पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। डमरू का बड़ा रूप
4 खंजरी कामड़, कालबेलिया, भील, बलाई आदि ढपनुमा आम की लकड़ी पर मढ़कर।
5 धौंसा दुर्ग या बड़े मंदिरों में आम या फरास की लकड़ी के घेरे पर भैंसे की खाल मढ़कर बनाते हैं। लकड़ी के डण्डो से बजाते हैं।
6 तासा मुस्लिम समुदाय द्वारा (फकीर) मिट्टी या लोहे के घेरे पर बकरे की खाल मढ़कर, गले में लटकाकर दो पतली डंडियों से बजाते हैं।
7 दमामा रणभूमि का वाद्य लोहे की वृहद् कड़ाईनुमा घेरे पर भैंसे की खाल से बनाते हैं।
8 घेरा होली के अवसर पर अष्टभुजाकार डफनुमा
9 डफ होली के अवसर पर लोहे या लकड़ी के वृहद् चक्र पर खाल मढ़कर, चंग छोटा होता है।
10 ढ़ाक गुर्जर जाति द्वारा देवनारायण, हीरामन
व भौणाजी की गोठ के अवसर पर डेरूनुमा बड़ा वाद्ययंत्र जो दोनों पैरो में बांधकर बजाते हैं। हाथ की थाप व छोटे लकड़ी के डण्डे से बजाते हैं।
11 माठा पाबूजी के भोपे पाबूजी के पवाडों के समय प्रयोग करते हैं।
12 कुंडी सिरोही में गिरासिए व. मेवाड़ के
जोगी मिट्टी के छोटे बर्तन पर खाल मढ़कर मादल व थाली की संगत में बजाते हैं।
13 माटा धोरी व नायकों द्वारा पाबूजी के
पावड़े गाते समय (मारवाड़ क्षेत्र) मिट्टी के दो बर्तनों के मुंह को खाल से ढ़ककर बनाते हैं।
14 कमर अलवर-भरतपुर लोहे के चक्र पर (पतरीनुमा) खाल मढ़कर
15 नौबत महलों एवं मंदिरों में धातु की अर्द्ध अण्डाकार कुंडी पर भैंसों की खाल मढ़कर
16 अन्य:- ढोल, ढोलक, नगाड़ा, चंग, नौबत, उमरु, बंब (टाटम)

तत् वाद्य
क्र.
सं. लोकवाद्य का नाम क्षेत्र वादक जाति/अवसर संरचना
1 कामायचा (सारंगी जैसा) मुस्लिम शेख (मांगणियार) बजाते है। सारगी के समान एक डेढ़ फुट चैड़ी व गोल तावली पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। इसे बजाने के लिए 27 तार वाली गज का प्रयोग होता है।
2 रावणहत्था पाबूजी के भोपे व भील बजाते हैं नारियल के खोल पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। बांस के डांड पर नौ तारवाली खूटी लगी होती है जो घोड़े के बाल से बनी होती है।
3 सारंगी लंगा जाति के गायक बजाते हैं। यह तत् वाद्यों में श्रेष्ठ है। यह सागवान की लकड़ी से बनाई जाती है। इसके तार बकरे की आंत के बनते हैं तथा इसकी गज में घोड़े की पूंछ के बाल लगे होते हैं जिसके द्वारा बजाई जाती है।
4 गौरजा गिरासिया बजाते हैं। (गणगौर के अवसर पर नृत्य गायन के साथ) अस्थायी रूप से मिट्टी से बनाते हैं तथा बांसुरी व ढोल की संगत से बजाते हैं तथा महोत्सव खत्म होने पर नष्ट कर दिया जाता है।
5 जन्तर (वीणा का प्रारम्भिक रूप) बगड़ावतों की कथा कहने वाले गूजर भोपे बजाते है। वीणा के समान दो तुम्बों वाला यह वाद्ययंत्र गले में लटकाकर खड़े होकर बजाया जाता है।
6 चिकारा जोगियों, मेवों द्वारा अलवर में गरासियों द्वारा उदयपुर, पाली, सिरोही में बजाया जाता है। कैर की लकड़ी से बना इनका एक सिरा प्याले के आकार का होता हैं। जिसके तीन तार होते हैं। गज की सहायता से बजाया जाता है।
7 सुरिंदा लंगा जाति द्वारा सतारा व मुरला की संगत में बजाया जाता है। रोहिड़े की लकड़ी का बना होता है इसके गज में घुघरू बंधे होते है।
8 रबाव मेव क्षेत्र के भाटों द्वारा तांत के बने चार मुख्य तार होते हैं।
9 रबाज मेवाड़ के रावल, भाटी जाति के लोगों द्वारा तथा पाबूजी की लोककथा गाने पर नायक व भील जाति द्वारा कामायचे की तरह होता है। इसमें गज काम में नहीं की जाती। इसे नाखूनों की सहायता से बजाया जाता है। इसमें द्य 12 तार होते है।
10 सुरमण्डल पश्चिमी राजस्थान में दो से ढाई फुट लम्बा होता है।
11 भपंग अलवर के जोगी, मेव क्षेत्र में डमरु की आकृति वाला तुम्बे से निर्मित, जहूर खां मेवाती प्रसिद्ध भपंग वादक
12 तन्दूर/तम्बूरा/
चैतारा/वेणों मेवाड़, रावल, भाट, भील शक्ल तानपुरे के समान लेकिन छोटी होती है।
13 दुकाको मेवाड़/भील दीपावली के समय, घुटनों के बीच रखकर बजाया जाता है।
14 अन्य:- ढोल, ढोलक, नगाड़ा, चंग, नौबत, उमरु, बंब (टाटम)
सुषिर वाद्य
क्र.
सं. लोकवाद्य का नाम क्षेत्र वादक जाति/अवसर संरचना
1 अलगोजा मीणा आदिवासियों एवं अलवर, कोटा, अजमेर के गुर्जर, मेव व धाकड़ बजाते हैं इसमें चार छेदों वाली दो बांसुरी होती है। दो अलगोजे मुंह में रखकर एक साथ बजाया जाता है। दो नकसाँसी होता है।
2 पूंगी (बीन) तथा बाड़मेर में राणका फकीरों द्वारा प्रयुक्त नकसाँसी से बजाई जाती है। लोकी के तुम्बें के निचले हिस्से में दो छेद कर दो नालियाँ बनाई जाती है।
3 मशक कालबेलियों द्वारा बकरी की खाल की बनी होती है। एक तरफ हवा भरी जाती है जो दूसरी नली से निकलती है।
4 बांकियां भैरूजी के भोपे द्वारा पीतल का बना बिगुल की शक्ल जैसा जिसमें एक ओर से छोटे मुँह में फूंक मारकर बजाई जाती है।
5 भूंगल (रणभेरी) सरगड़ो द्वारा शादी-विवाह के अवसर पर पीतल की लम्बी नली का बना होता है।
6 सतारा मेवाड़ के भवाईयों द्वारा (ग्रामीण खेल/भवाई नाट्य शुरू होने से पहले) अलगोजा, बांसुरी, शहनाई का मिश्रित रूप है। इसमें अलगोजे की तरह दो लम्बी बांसुरी होती है।
7 नड़ जैसलमेर-बाड़मेर में जनजाति के लोगों तथा मेघवाल व गड़रिए तथा लंगा जाति द्वारा भी बजाया जाता है। कगौर वृक्ष की 1 मीटर लम्बी लकड़ी से बनाया जाता है। करणा भील प्रसिद्ध नड़ वाद्यकार रहा।
8 मोरचंग माता या भैरव के राजस्थानी भोपे तथा लंगा जाति द्वारा भी बजाया जाता है। जैसलमेर क्षेत्र लोहे का बना छोटा वाद्य है। इसे होठों के बीच में रखकर बजाया जाता है।
9 करणा लंगा जाति द्वारा . यह पीतल का 7-8 फीट लम्बा नोकदार वाद्य यत्र है। इसके सकड़े मुंह पर एक छेद होता है जिसम सुरनाई जैसी रेली लगी होती है।
10 तुरही प्राचीन काल में दरबारों व रणक्षेत्रों में पीतल की बनी होती है। एक मुँह छोटा, आकृति नोकदार, दूसरा मुँह चैड़ा होता है।
11 नागफणी दुर्ग एवं युद्ध स्थलों पर या विशेष अवसर पर पीतल की सर्पाकार नली जिसके पिछले हिस्से में छेद होता है।
12 सींगी जोगियों द्वारा हिरण, बारहसिंगाय भैंसे के सींगों से बना होता है।
13 सींगा साधु-सन्यासियों द्वारा धनुषाकार पीतल की नली का बना होता है। जिसके पिछले भाग में फूंक मार कर बजाया जाता है।
14 मुरला/मुरली
(दूसरी पूंगी) जैसलमेर में लंगा जाति के लोग नलीदार तुम्बे के नीचे चैड़े भाग में दो बाँस की नलियाँ फंसाकर बनाया जाता है। एक से ध्वनी तथा दूसरी से स्वर निकालते हैं।
15 घुरालियो/घोडयू,
बांस का बाजा गरासिया, कालबेलिया व घुम्मकड आदिवासियों द्वारा इसे 5-6 अँगुल की बाँस की खपच्चियों से बनाया बांस का बाजाया जाता है तथा धुंघरू बाँध दिए जाते हैं। इसे दांतों के बीच दबा होठों को दबाकर फूंक से बजाया जाता है।
16 सुरनाई ढोली व लंगा, मांगणियार जाति द्वारा विवाह व मांगलिक अवसरों पर तथा इसे जोगी नगाडची भी बजाते हैं। इसके मुंह पर खजूर, ताड़ व कगौर के वृक्ष का सरकण्डा लगा होता है। इसे गीलाकर बजाया जाता है। (शहनाई का दूसरा रूप)। पेपे खाँ मांगणियार विश्व प्रसिद्ध सुरणाई वाद्यकार हैं।
17 अन्य वाद्य:- शंख, हरनाई, टौटौ व बरगू (तुरही जैसा), बांसुरी
धन वाद्य
क्र.
सं. लोकवाद्य का नाम क्षेत्र वादक जाति/अवसर संरचना
1 झांझ शेखावाटी में कच्छी घोड़ी नृत्य के अवसर पर मंजीरे की बड़ी अनुकृति। यह बड़े ढोल व तासे के साथ भी बजाया जाता है।
2 करताल साधु-सन्तों द्वारा भजन व संगीत में तथा बाड़मेर, पाली में गैर नृत्य में प्रयुक्त दो चैकोर टुकड़ों के बीच में पीतल की छोटी-छोटी गोल तश्तरियाँ लगी रहती है।
3 भरनी लोक देवता के थान पर, सर्प द्वारा काटने पर इलाज के समय बजाया जाता है मिट्टी के मटके के संकरे मुंह पर कांसे की प्लेट ढ़ककर दो डंडियों की सहायता से बजाया जाता है।
4 गरासियों की लेजिम गरासियों की. गरासियों द्वारा नृत्य के साथ प्रयुक्त बांस का धनुषाकार टुकड़ा होता है। जिसमें लगी पीतल की छोटी-छोटी गोलाकार पत्तियां होती है।
5 घुरालिए कालबेलियों व गरासियों द्वारा पांच-छः आंगुल लम्बी बांस की खपच्ची से बांध दिया जाता है। जिसके मुख पर एक ओर छीलकर धागा बाँध दिया जाता है।
6 रमझौल होली पर गैर नृत्य करने वाले तथा भील लोग चक्राकार नृत्यों में प्रयोग करते हैं। चमड़े की पट्टी पर बहुत सारे छोटे-छोटे धुधंरू सिले होते हैं जिन्हें पैरों में बांध कर नृत्य किया जाता है।
7 खड़ताल मांगणियार गायक (स्व. सद्दीक खाँ इसका प्रमुख वादक थे) लकड़ी के चार छोटे-छोटे चिकने एवं पतले टुकड़ों से बना यह वाद्य दोनों हाथों में लेकर बजाया जाता है।
8 अन्य श्री मंडल. भैरूजी के धुंघरू, हिकेरी, झालर, थाली, घण्टा (घड़ियाल), चिमटा, घड़ा, घुघरु, चीपियाँ, कागरच्छ, तारपी आदि।

राजस्थान की अन्य महत्वपूर्ण बोलियां
क्र.
सं. बोली का नाम मुख्य बोली क्षेत्र प्रभाव/सम्मिश्रण
1 शेखावाटी पश्चिमी राजस्थानी की एक बोली शेखावाटी – सीकर, चूरू, झुंझुनू मारवाडी की उप बोली मारवाड़ी व ढूंढाड़ी का प्रभाव
2 खैराड़ी पश्चिमी राजस्थानी की एक उपबोली शाहपुरा, बूंदी के कुछ इलाके मेवाड़ी, हाड़ौती व ढंढाडी
3 देवड़ावाड़ी मारवाड़ी की उपबोली सिरोही
4 गौड़वाड़ी पश्चिमी राजस्थानी पाली, जालौर का भाग मारवाड़ की उपबोली
5 मालवी दक्षिणी राजस्थानी मालवा क्षेत्र झालावाड़, प्रतापगढ़, कोटा मारवाड़ी, ढूंढाडी का सम्मिश्रण कर्णप्रिय
6 ढूंढ़ाडी पूर्वी राजस्थानी की प्रधान बोली पूर्वी राजस्थान के मध्य पूर्वी भाग जयपुर, अजमेर, आॅक काठेड़ी, तोरावाटी, हाड़ौती आदि उपबोली
7 काठेड़ी पूर्वी राजस्थान काठेड़ क्षेत्र, जयपुर का दक्षिण भाग ढूंढ़ाड़ी की उपबोली
8 चैरासी पूर्वी राजस्थान टाॅक व जयपुर के दक्षिण पश्चिम में ढूंढ़ाड़ी की उपबोली
9 नागरचैल पूर्वी राजस्थान सवाई माधोपुर का पश्चिमी भाग, टोंक का दक्षिणी पूर्वी भाग ढूंढ़ाड़ी की उपबोली
10 राजावाटी पूर्वी राजस्थान जयपुर का पूर्वी भाग, राजगढ़ बसवा ढूंढ़ाड़ी की उपबोली
11 हाड़ौती पूर्वी राजस्थानी की प्रधान बोली हाड़ौती क्षेत्र कोटा ढूंढ़ाड़ी की उपबोली सूर्यमल्ल मिश्रण की रचनाएं इसी में है
12 अहीरवाटी उत्तरी राजस्थानी हीरवाल क्षेत्र कोटपूतली बहरोड, मण्डावर आस-पास हरियाणवी व मेवाती के बीच संधि स्थल, राठी भौ कहते हैं
13 नीमाड़ी दक्षिणी राजस्थानी मालवा-मालवी का उपक्षेत्र गुजराती भीली व खानदेशी का प्रभाव

1.

पदम पुरस्कारों से सम्मानित राजस्थान (प्रथम एवं अद्यतन)
पद्मविभूषण से सुशोभित व्यक्ति
क्र.सं. नाम वर्ष कार्यक्षेत्र
1 श्री घनश्याम दास बिड़ला 1957 प्रख्यात उद्योगपति
2 श्री माणिक्यलाल वर्मा 1965 राज्य के प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी, 1948 में गठित संयुक्त राजस्थान में प्रधानमंत्री
3 डॉ. मोहनसिंह मेहता 1969 विख्यात शिक्षा शास्त्री, सेवा मन्दिर उदयपुर और राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति
4 डॉ. नगेन्द्र सिंह 1973 विख्यात न्यायविद्, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के पूर्व अध्यक्ष
5 डॉ. दौलत सिंह कोठारी 1973 विख्यात शिक्षा शास्त्री, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष
6 डॉ. कालूलाल श्रीमाली 1976 प्रमुख शिक्षा शास्त्री, पूर्व केन्द्रीय शिक्षामंत्री
7 श्री नारायण सिंह माणकलाव 2003 राजस्थान में नशामुक्ति अभियान के प्रखर कार्यकर्ता
8 श्री कन्हैयालाल सेठिया 2004 साहित्यकार
9 श्री लक्ष्मी निवास मित्तल 2008 प्रसिद्ध स्टील किंग, उद्योगपति
पद्मभूषण से सुशोभित व्यक्ति
1 श्रीकंवर सेन 1956 विख्यात इंजीनियर-इंदिरा गाँधी नहर परियोजना
2 राव राजा हणूतसिंह 1958 प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी
3 प्रो. पावला तिरुपति राजू 1958 दर्शनशास्त्र के विद्धान-राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक
4 श्री सीताराम सेकसरिया 1962 विख्यात समाज सेवी
5 श्री हरिभाऊ उपाध्याय 1966 प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी, पूर्व अजमेर-मेरवाड़ा के मुख्यमंत्री, राजस्थान के पूर्व मंत्री
6 श्री गोकुलभाई भट्ट 1971 प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी और विख्यात सर्वोदयी नेता
7 श्रीमती रतन शास्त्री 1975 महिला शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान, वनस्थली विद्यापीठ की संस्थापक उपाधयक्ष
8 श्री भोगीलाल पंड्या 1976 प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी, आदिवासी नेता और राज्य के पूर्व मंत्री
9 श्री झाबरमल शर्मा 1981 मनीषी साहित्यकार और पत्रकार
10 प्रो. एम.बी.माथुर 1989 प्रमुख शिक्षा शास्त्री-राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति
11 श्री. टी.एन. चतुर्वेदी 1989 भा.प्र.सेवा के पूर्व अधिकारी, भारत के पूर्व महालेख नियंत्रक
12 श्रीराम नारायण शर्मा 1990 विख्यात सारंगी वादक
13 डॉ. रामनारायण अग्रवाल 2000 अग्निमिसाइल के प्रक्षेपण में प्रमुख भूमिका
14 श्री जगतसिंह मेहता 2002 उदयपुर निवासी देश के पूर्व विदेश सचिव
15 जगजीत सिंह 2003 संगीत, राजस्थान रत्न से सम्मानित
16 श्री कोमल कोठारी 2004 (जोधपुर निवासी) कलामर्मज्ञ (संगीत), राजस्थान रत्न से सम्मानित
17 प्रो. विजय शंकर व्यास 2006 प्रख्यात, कृषि अर्थशास्त्री
18 डॉ शिव कुमार सरीन 2007 चिकित्सक
19 उस्ताद असद अली 2008 कला क्षेत्र में
20 रहीम फहीमुद्दीन डागर 2008 कला क्षेत्र में
21 जसदेव सिंह 2008 प्रसिद्ध कमेन्टेटर
22 डी.आर. मेहता 2008 सेवी के पूर्व अध्यक्ष, एवं समाजसेवी
23 प. विश्वमोहन भट्ट 2008 संगीत
24 मांगी बाई आय 2008 र् सुप्रसिद्ध मांड गायिका
25 अनिल बोरदिया 2009 प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, लोक सेवक
26 सुल्तान खां 2009 संगीत वादन
27 श्रीमती चंदा कोचर 2010 व्यवसाय और बेंकिग
28 प्रो. अरविन्द पनगड़िया भीलवाड़ा 2011 साहित्य और शिक्षा, अमेरिका में अर्थशास्त्र के व्याख्याता
पद्मश्री से अलंकृत व्यक्ति
1 श्रीमती रतन शास्त्री 1955 महिला शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान
2 श्री भगवतसिंह मेहता 1961 पूर्व मुख्य सचिव व पंचायती राज के सूत्रधार
3 श्री मुनि जिन विजय 1961 राज्य के पुरातत्व विभाग के प्रथम निदेशक
4 श्री शुक देव पाण्डे 1964 शिक्षा शास्त्री, बिड़ला एजूकेशन ट्रस्ट पिलानी के पूर्व सचिव
5 श्री चण्डीदान 1967 प्रगतिशील कृषक तथा बोरूंदा के पूर्व सरपंच
6 श्री देवीलाल सामर 1968 विख्यात कलाकार-भारतीय लोक कला मण्डल उदयपुर के संस्थापक, निदेशक
7 श्री शीशराम ओला 1968 सैनिक कल्याण में योगदान
8 श्री नारायण सिंह भाटी 1970 डाकू उन्मूलन में उल्लेखनीय कार्य
9 मिस विलियम जी लूटर 1970 महिला शिक्षा में उल्लेखनीय सेवाएं, एम.जी.डी. स्कूल जयुपर की पूर्व प्राचार्य
10 श्री खेलशंकर दुलर्भजी 1971 प्रमुख रत्न व्यवसायी और समाजसेवी
11 श्री सूर्यदेव सिंह 1971 प्रगतिशील कृषक (अलवर जिला), रेणी पंचायत समिति के पूर्व प्रधान
12 श्री विजयसिंह 1972 भारत-पाक युद्ध के दौरान श्रीगंगानगर जिले के जिलाधीश के रूप में उल्लेखनीय कार्य सेवाएं
13 श्री कृपालसिंह शेखावत 1976 प्रमुख चित्रकार ब्ल्यू पॉटरी
14 श्री सीताराम लालस 1977 राजस्थानी साहित्यकार और राजस्थानी शब्दकोष के निर्माता
15 डॉ. प्रमोदकरण सेठी 1981 प्रमुख अस्थि-रोग विशेषज्ञ और जयपुर पैर के निर्माता
16 श्रीमती अल्लाह जिलाई बाई 1982 प्रमुख मॉड गायिका, राजस्थान रत्न से सम्मानित
17 श्री कोमल कोठारी 1983 राजस्थानी लोक साहित्य और लोक कलाओं के उन्नायक
18 श्री रामगोपाल विजयवर्गीय 1984 अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार
19 श्रीमती लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत 1984 राजस्थानी साहित्यकार, पूर्व सांसद व विधायिका, राजस्थान रत्न से सम्मानित
20 डॉ. शीतलराज मेहता 1985 प्रमुख चिकित्सक, सवाई मानिसिंह कॉलेज, जयपुर के पूर्व प्राचार्य
21 श्री हिसामुद्दीन उस्ताद 1986 ऊँट की खाल पर सोने की नक्काशी
22 श्री नारायणसिंह माणकलाव 1986 नशाबन्दी अभियान में उल्लेखनीय योगदान
23 सरदार कुदरत सिंह 1988 प्रमुख शिल्पी मीनाकारी में दक्ष
24 श्री मेघराज जैन 1989 पश्चिमी मरुभूमि की लोक कलाओं एवं लोक संस्कृति के उन्नयन में अमूल्य योगदान
25 श्री रामनारयण अग्रवाल 1990 देश के प्रथम लम्बी दूरी के प्रक्षेपास्त्र अग्नि के निर्माता
26 पण्डित दुर्गालाल 1990 कत्थक कलाकर (जयपुर घराना)
27 श्री चिरंजीलाल जोशी 1990 जनसेवा, बम्बई अस्पताल के मुख्य अधिशासी
28 श्री पुरूषोत्तम 1990 विख्यात पखावज वादन
29 श्री रामनारायण शर्मा 1990 विख्यात सारंगी वादक
30 श्री कैलाश सांखला 1992 विख्यात वन्यजीव विशेषज्ञ
31 डॉ. राज बोथरा 1999 औषध एवं एड्स के प्रति जागृति अभियान
32 डॉ. महेन्द्र भण्डारी 2000 किडनी प्रत्यारोपण में योगदान
33 डॉ. मंडन मिश्र 2000 संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
34 वैद्य सुरेशचन्द्र चतुर्वेदी 2000 आयुर्वेद क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान
35 पं. विश्वमोहन भट्ट 2002 मोहन वीणा वादक, राजस्थान रत्न से सम्मानित
36 रघुवीर सिंह खाटू 2002 अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त छायाकार
37 श्री कन्हैयालाल सेठिया 2004 बीकानेर मूल के (साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में) ‘पातल व पीथल‘ के रचयिता, राजस्थान रत्न से सम्मानित
38 श्री सुधीर तैलंग 2004 बीकानेर मूल के (कार्टूनिस्ट व पत्रकार)
39 श्री राज्यवर्धन सिंह 2004 निशानेबाज व ओलम्पिक खेलों में रजत पदक विजेता
40 डॉ. वीरसिंह मेहता 2005 चिकित्सा के क्षेत्र में
41 श्री लाल जोशी 2006 ख्याति प्राप्त फड़ चित्रकार
42 श्री विजयदान देथा 2007 राजस्थानी साहित्यकार, राजस्थान रत्न से सम्मानित
43 डॉ. कैलाश मानव 2008 समाज सेवा
44 डॉ. दिनेश कुमार भार्गव 2008 चिकित्सक
45 उस्ताद वशिफुद्दीन डागर 2009 कला क्षेत्र में
46 प्रो. गोविन्द चन्द्र पाण्डे 2009 शिक्षा
47 मुकुन्द लाट 2009 कला क्षेत्र में
48 अर्जुन प्रजापति 2009 कला क्षेत्र में
49 कृष्णा पूनिया 2010 ऐथलेटिक्स
50 इरफान खां 2010 अभिनेता
51 चन्द्रप्रकाश देवल 2010 साहित्यकार
52 फरीदुद्दीन डागर, उदयपुर 2011 (कला) संगीत – ध्रूवपद गायक (2012 में)
53 मोहनलाल कुम्हार 2011 (कला) टेराकोटा मूर्तिकला (2012 में)
54 साकर खान, जैसलमेर 2011 (कला) राजस्थानी लोक संगीत (2012 में)
55 देवेन्द्र झाझड़िया, चूरू 2011 (खेल), एथलेक्टिक्स पेरालिम्पिक्स (2012 में)
56 लिम्बाराम, उदयपुर 2011 (खेल) तीरदांजी प्रशिक्षक (2012 में)
57 स्वप्न गुहा, जयपुर 2011 (कला) मूर्तिकला (2012 में)
58 एस. शकीर अली, जयपुर 2012 मिनिएचर पेंटिंग (2013 में)
59 बजरंग लाल ताखर, सीकर 2012 खेल (2013 में)
60 उस्ताद मुइनुद्दीन खां 2013 कला (2014 में)
61 डॉ. अशोक पनगड़िया 2013 चिकित्सा (2014 में)
62 डॉ. राजेश कोटेचा 2014 चिकित्सा (2015 में)
63 महेश राज सोनी 2014 कला (2015 में)
64 स्व. मीठा लाल मेहता 2014 समाज सेवा (2015 में)
65 गुलाबो सपेरा 2015 लोकनृत्य (2016 में)
66 स्व. प्रकाश चंद सुराना 2015 शास्त्रीय संगीत (2016 में)
दो पदम् पुरस्कारों से सम्मानित
श्रीमती रतन शास्त्री पदमश्री, 1955 पदम्भूषण, 1975
डॉ. दौलत सिंह कोठारी पदम्भूषण, 1962 पदविभूषण, 1973
पं. रामनारायण शर्मा पदमश्री, 1974 पदम्विभूषण, 1994
कोमल कोठारी पदम्श्री , 1983 पदम्भूष, 2004
नारायणसिंह माणकलाव पदम्श्री , 1986 पदम्भूषण, 1991
प्रो. मनमोहन शर्मा पदम्भूषण, 1987 पदम्विभूषण, 2001
डॉ. रामनारायण अग्रवाल पदमश्री, 1990 पदम्विभूषण, 2000
पं. विश्वमोहन भट्ट पदम्श्री , 2002 पदम्भूषण, 2008
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता
डॉ. पी. के. सेठी 1981 जयपुर फुट के लिए, जयपुर
अरुणा राय 2000 सामुदायिक नेतृत्व के लिए (सूचना का अधिकार के तहत), अजमेर
राजेन्द्र सिंह 2001 सामुदायिक नेतृत्व के लिए (जल संरक्षण), अलवर
सैन्य पुरस्कार
सैन्य पुरस्कार इस क्रम में दिए जाते हैं- परमवीर चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, अशोक चक्र, वीरचक्र, शौर्य चक्र
परमवीर चक्र
1 हवलदार मेजर पीरू सिंह (मरणोपरान्त) 1948 झुंझुनूं
2 मेजर शैतान सिंह (मरणोपरान्त) 1962 जोधपुर
महावीर चक्र
1 कर्नल किशनसिंह राठौड़ 1948 चूरू
2 सूबेदार चूनाराम 1948 सीकर
3 रायफल मैन ढोलकसिंह (मरणोपरान्त) 1948 जोधपुर
4 ब्रिगेडियर रघुवीरसिंह 1948 टोंक
5 कर्नल उदयसिंह 1971 जोधपुर
6 ले.कर्नल हणूतसिंह 1971 बाड़मेर
7 ले. कर्नल भवानीसिंह 1971 जयपुर
8 ग्रुप कैप्टन चन्दनसिंह 1971 जोधपुर
9 नायक सुगनसिह (मरणोपरान्त) 1971 नागौर
10 नायक दिगेन्द्र कुमार 1999 सीकर
कीर्ति चक्र
1 नायक हरिसिंह 1982 झुंझनूं
2 पायनियर मूलसिंह 1968 जयुपर
3 सूबेदार कोपाराम 1992 सीकर
4 कैप्टन सज्जनसिंह मलिक (मरणोपरान्त) 2005 चूरू
5 मेजर जेम्स थामस (मरणोपरान्त) 2007 बीकानेर
6 कैप्टन सुभाष पूनिया 2008 –
अशोक चक्र
1 हवलदार शम्भूपालसिंह 1961 नागौर
2 सूबेदार लालसिंह 1962 नागौर
3 सूबेदार भागसिंह 1962 अलवर
4 कैप्टन महेन्द्रसिंह (मरणोपरान्त) 1965 सीकर
5 सेकिण्ड लेफ्टी. पी.एन.दत्त 1998 जयुपर
6 जगदीश यादव (मरणोपरान्त) 2002 सीकर
7 सूबेदार सुरेशचन्द्र यादव 2003 अलवर
वीर चक्र
1 स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा (मरणोपरान्त) 1999 कोटा
2 सूबेदार भंवरलाल 1999 नागौर
3 नायब सूबेदार मगेज सिंह 1999 नागौर
4 हवलदार शीशराव गिल 1999 झुंझनूं
5 नायब सूबेदार रामपाल सिंह 1999 जयपुर
6 रायफलमैन जयरामसिंह 1999 सीकर
शौर्य चक्र
1 मेजर दयानन्द 1999 झुंझनूं
2 मेजर भूपेश हाड़ा 1999 बूंदी
3 हवलदार वेनसिंह गुर्जर 1999 करौली
4 हवलदार सुजानसिंह 1999 भरतपुर
5 लेफ्टिनेंट अरविन्द कुमार 2002 जयपुर
6 लांस नायक पप्पूराम चैधरी (मरणोपरान्त) 2005 अलवर
7 ल. कर्नल सौरभसिंह शेखावत 2009 अलवर
8 धर्माराम जाट 2015 बाड़मेर

नोट: उपरोक्त में से किसी भी व्यक्तित्व से संबंधित अतिलघुत्तरात्मक प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं। उत्तर देते समय उसे प्रदान किए गए पदम पुरस्कार की श्रेणी, वर्ष एवं उसका क्षेत्र लिखें।