अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था में क्या अंतर है what are difference between economics and economy in hindi

By   September 14, 2021

what are difference between economics and economy in hindi अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था में क्या अंतर है ?

अर्थशास्त्र-विषय
(Economics–The Discipline)
किसी भी विषय का अध्ययन उसे परिभाषित करने की प्रक्रिया से शुरू होता है। अर्थशास्त्र भी इसका अपवाद नहीं है। किसी भी विषय की परिभाषा तय करने की प्रक्रिया आसान नहीं होती। आखिर में, हमें उसे परिभाषा को स्वीकार कर लेना होता है, जिसे हम आंशिक परिभाषा मान सकते हैं। अलग-अलग अर्थशास्त्री विषय को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। ऐसे में इगकी परिभाषाएं भी अलग-अलग होती हैं लेकिन एक कार्यकारी परिभाषा तय करने के लिए अलग-अलग परिभाषाओं के अंतर को कम करने की कोशिश की जाती है।
कार्यकारी परिभाषा पर पहुंचने से पहले, इस दिशा में की गयी दो अंतर्राष्ट्रीय रूप से मान्य कोशिशों का उल्लेख जरूरी हैः
1. अर्थशास्त्र उस अवधारणा का अध्ययन है जो बताता है कि समाज किस तरह से दुर्लभ संसाधनों की मदद से मूल्यवान उत्पाद तैयार करता है और उसे विभिन्नलोगों के बीच वितरित करता है।
इस परिभाषा के नजरिए से देखें तो दो बातें अहम हैं। उत्पाद दुर्लभ हैं, और समाज को संसाधनों का इस्तेमाल प्रभावी ढंग से करना चाहिए। जाहिर है, अर्थशास्त्र एक महत्वपूर्ण विषय है जो संसाधनों की दुर्लभता और प्रभावी उपयोग की मांग का अध्ययन करता है।
पिछली आधी शताब्दी के दौरान अर्थशास्त्र के अध्ययन में विभिन्न विषयों को शामिल किया गया है जो यह अलग-अलग छात्रों के विविध उद्देश्यों को पूरा करते हैं। कुछ पैसा बनाने के लिए अर्थशास्त्र पढ़ते हैं (विकसित देशों के ज्यादातर छात्र खुद को अमीर बनाने के लिए ही अर्थशास्त्र पढ़ते हैं। लेकिन यह विकासशील देशों के लिए सही नहीं है। अगर सामान्य तौर पर कहें तो विकासशील देशों में अर्थशास्त्र केवल पढ़ा और पढ़ाया जाता है, उसका प्रयोग नहीं होता)। गरीबी, बेरोजगरी, मानव संसाधन विकास, शेयर, भांश, बैंकिंग शब्दावली, मूल्य और उसमें आगे वा बदलाव, ई.काॅमर्स, इत्यादि के बारे में जागने के लिए भी कुछलोग अर्थशास्त्र पढ़ते हैं। कुछ अन्यलोग अपनी जागकारी को बढ़ाने के लिए भी अर्थशास्त्र पढ़ते हैं।
2. व्यक्ति, फर्म, सरकार एवं अन्य संस्थाएं समाज में अपने विकल्पों का चयन कैसे करते हैं और यह चयन संसाधनों के उपयोग में समाज को किस तरह से प्रभावित करता है इसका अध्ययन ही अर्थशास्त्र कहता है।
मानव जीवन पृथ्वी पर मौजूद संसाधनों से बनाए गए कई तरह के उत्पादों के उपयोग पर निर्भर करता है। मानवों की चाहत की कोई सीमा नहीं है। हमारी जरूरतों और चाहतों को पूरा करने के लिए हमें असीमित संसाधनों की जरूरत है। लेकिन संसाधन सीमित हैं! ऐसी स्थिति में व्यक्ति एवं मानव समाज सीमित संसाधनों से अपनी प्रतिस्पद्र्धी आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे करता है इन्हें ही सोचना है। इसका मतलब यह है कि दुर्लभ संसाधनों के उपयोग से पहले हमें अपनी जरूरतों को प्राथमिकता के हिसाब से तय करने की जरूरत है। इस प्रक्रिया के चलते, कुछलोगों की जरूरत कभी पूरी नहीं हो पाएगी। इस दौरान यह भी सही है कि कुछ लोगों की कुछ जरूरतें सीमित संसाधनों के बावजूद कई बार पूरी हो सकती है।
बहरहाल, अर्थशास्त्र वह विषय है जिसके तहत यह अध्ययन किया जाता है कि व्यक्ति, समाज और सरकार किस तरह से अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से संसाधनों का इस्तेमाल अपनी आवश्यकतानुसार करते हैं। ऐसे विकल्प का चयन क भी है और विज्ञान भी। मानव समाज द्वारा चुने गए विकल्प जो समय और स्थान के साथ बदलते रहते हैं, के अध्ययन को ही अर्थशास्त्र कहते हैं। यह मानव जीवन के अध्ययन से जुड़ा बेहतरीन विषय है।
कार्यकारी परिभाषा (A Working Definition)
किसी भी विषय को पढ़ने के लिए उसे महसूस करना भी जरूरी है। इसकी शुरुआत विषय की परिभाषा से ही होती है। लेकिन परिभाषाओं के साथ मुश्किल यह है कि ज्यादातर समय में परिभाषाएं काफी उलझाने वाली और तकनीकी शब्दों से भरी होती हैं। कई बार तो यह आमलोगों की समझ से बाहर की बात होती है। अर्थशास्त्रों के छात्रों को भी कई बार परिभाषाएं समझ में नहीं आती हैं। यही वजह है कि परिभाषा को बेहद सहज और सर्वसुलभ बनाने की जरूरत है।
मानव अपने रोजमर्रा के जीवन में कई तरह की गतिविधियों में शामिल होते हैं। इन गतिविधियों को आप विभिन्न वर्गें में बांट सकते हैं-सामाजिक, राजनैतिक, आदि।
अर्थव्यवस्था मानव समाज की आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन है। ठीक इसी तरह से राजनीतिक गतिविधियों का अध्ययन राजनीतिक विज्ञानए सामाजिक गतिविधियों का अध्ययन सामाजिक विज्ञान और प्रशासगिक गतिविधियों का अध्ययन लोक प्रशासन कहता है। चूंकि यह सब मानव गतिविधियों का अध्ययन है, लिहाजा इसे मानविकी कहते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आर्थिक गतिविधियां क्या हैं? लाभ, हानि, आजीविका, पेशा, मजदूरी, रोजगर इत्यादि आर्थिक गतिविधियां कहती हैं। इन सब गतिविधियों का अध्ययन अर्थशास्त्र में होता है। वर्तमान समय में अर्थशास्त्र की कई शाखाएं हैं और उगके तहत आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन ग्ेबल, मैक्रो और माइक्रो स्तर पर होता है।
कभी आपने सोचा है, कुछलोग किफायती कार का इस्तेमाल क्यों करते हैं और कुछ लोग ईंधन फूंकने वाली स्पोर्ट्स कार का इस्तेमाल क्यों करते हैं? गरीबलोग गरीब क्यों हैं? क्या पूंजीवाद आर्थिक असमानता को बढ़ाता है? क्या भूमंडलीकरण से अमीर और गरीब के बीच की खाई कम हुई है? ऐसे ही ढेरों सवाल अर्थशास्त्र के दायरे में आते हैं। आज के समय में सूचना प्रौद्योगिकी ने भी अर्थशास्त्र को नया आयाम दिया है।
अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था
(Economics and The Economy)
अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध सामान्य रूप में सिद्धांत और अभ्यास के रूप में देखा जा सकता है। अर्थशास्त्र बाजार के सिद्धांतों, रोजगर इत्यादि की बात करता है जबकि अर्थव्यवस्था खास क्षेत्रों में सिद्धांतों को अपनाने के बाद की वास्तविक तस्वीर होती है।
इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है-अर्थव्यवस्था किसी खास इके का अर्थशास्त्र होता है। वर्तमान में खास इके को आप देश के तौर पर देख सकते हैं-भारतीय अर्थव्यवस्था, रूसी अर्थव्यवस्था, फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था, इत्यादि। यानी अपने आप में अर्थव्यवस्था का कुछ मतलब नहीं होता, लेकिन जैसे ही किसी देश, किसी क्षेत्र या किसी खास ब्लाक का नाम इससे जोड़ देते हैं, इसका मतलब स्पष्ट हो जाता है। जब हम विकसित अर्थव्यवस्था की बात करते हैं तो इसका मतलब विकसित देशों की अर्थव्यवस्था है।
दुनिया के कुछ देश एकसमान आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ठीक उसी समय उगकी कुछ विशिष्ट समस्याएं भी होती हैं। अर्थशास्त्री इन समस्याओं के समाधान के लिए कुछ सिद्धांतों को अपनाने की सह देते हैं। अब यह उस खास देश पर निर्भर है कि वह किन अर्थशास्त्रियों के सिद्धांतों को अपनाता है। ऐसे में कई देश एक तरह की समस्याओं के निदान के लिए एक ही तरह के सिद्धांत को अपनाते हैं जबकि दूसरी ओर एक जैसी समस्या के लिए दो देश अलग-अलग सिद्धांत भी अपना सकते हैं। दोनों ही सूरत में नतीजा एक जैसा भी हो सकता है और काफी अलग भी हो सकता है। ऐसा क्यों होता है?
मूल रूप से आर्थिक सिद्धांत मानव समाज की आर्थिक गतिविधियों के व्यवहार और उगकी उम्मीदों पर आधारित होता है। मानव व्यवहार काफी आंतरिक और बाहरी कारकों पर निर्भर होता है और इनमें विविधता भी हो सकती है। प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता का स्तर, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, मानव संसाधनों की मानसिकता, इन सबका असर व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर होता है। ऐसे में अर्थशास्त्रियों के लिए किसी आर्थिक नीति के असर के बारे में अनुमान लगना काफी मुश्किल काम है। वैसे भी नीतियों को गू करने की प्रक्रिया और आपूर्ति व्यवस्था की भी आर्थिक चुनौतियों के हल में अहम भूमिका होती है। यही वजह है कि आपको अर्थशास्त्र में उतनी विवधता नहीं मिलेगी जितनी अर्थव्यवस्था से जाहिर होगी। यह कहना अतिरेक नहीं है
कि दुनिया की दो अर्थव्यवस्थाएं कभी एक समान नहीं हो सकतीं। हांकि उन्हें विस्तृत दायरे में विकसित या विकासशील या फिरकृषि आधारित या उद्योग आधारित अर्थव्यवस्थाएं कहा जा सकता है।
वैसे ऐसी ही विविधताएं अर्थशास्त्र को दिलचस्प विषय बनाती हैं। अर्थव्यवस्थाओं की विविधता के चलते अर्थशास्त्री सिद्धांतों और विचारों में भी सुधार करते रहते हैं। यह कहना ज्यादा सही होग कि अर्थशास्त्र भी वास्तविक चलगी से विकसित होता रहता है। व्यावहारिक चलगी में नए आयाम जुड़ते हैं तो अर्थशास्त्र के सिद्धांतों में भी नयापन आता जाता है।
अर्थशास्त्र का केंद्र (Focus of Economics)
अर्थशास्त्र के अध्ययन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? अर्थशास्त्री और अर्थशास्त्र का अंतिम लक्ष्य क्या है? अब तक का अर्थशास्त्रीय विकास किस दिशा में किए गए प्रयासों का प्रतिफल रहा है?
हालाँकि अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु का आकार आज काफी वृहद् है, लेकिन अगर हम इसके अब तक के विकास का सार गिकालें तो इसके केंद्र में ‘पृथ्वी पर मानव जीवन की बेहतरी’ रहा है। मानव जीवन में सुधार और मानव जगत् के जीवन स्तर में सुधार अर्थशास्त्र का केंद्र रहा है। कोई देश या अर्थव्यवस्था किन विधियों के द्वारा अपनी क्षमताओं का अधिकतम जनसंख्या की खुशहाली के लिए उपयोग करें, अर्थशास्त्र इस दिशा में प्रयासरत रहा है। इस प्रक्रिया में अन्यान्य अवधारणाओं और सिद्धांतों का विकास हुआ। इस दिशा में सबसे पह सशक्त प्रयास स्काॅटलैंड के प्रख्यात दार्शगिक अर्थशास्त्री एडम स्मिथ द्वारा किया गया, जब उगकी फस्तक द वेल्थ आॅफ नेशन्स (1776) का प्रकाशन हुआ।इस फस्तक से ही शास्त्रीय अर्थशास्त्र (classical economics) का उद्गम माना जाता है। इसी प्रकार, आगे वाले काल में, अनेक अर्थविदों द्वारा एक-से-एक बेहतर और विविध फस्तकें लिखीं गयीं, जिन सबका एक ही उद्देश्य था-मानव की आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन तथा उन गतिविधियों की सर्वोच्च क्षमता का विकास ताकि मानव जीवन को बेहतर-से-बेहतर बनाया जा सके। मानव जीवन की बेहतरी की दिशा में अर्थशास्त्र का यह दौर आज भी जारी है।
अर्थव्यवस्थाओं की मुख्य चुनौतियां
(Main Challenges of Economies)
चाहे काल खण्ड कुछ भी रहा हो अर्थव्यवस्थाओं की मूल चुनौती रही है-अपनी जनसंख्या को आवश्यकता की वस्तुओं और सेवाओं (हववके ंदक ेमतअपबमे) को उपलब्ध कराना। वस्तुओं की श्रेणी में आवश्यक मदें, यथा-भोजन, आवास, वस्त्र इत्यादि से लेकर गैर-आवश्यक मदें, यथा-रेफ्रीजरेटर, टी.वी., कार इत्यादि हो सकती हैं। इसी प्रकार, जनसंख्या को जिन सेवाओं की आवश्यकता होती है, वे स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल से लेकर उच्चतर प्रकार की सेवाएँ, जैसे-बैंकिंग, बीमा, वायु परिवहन, टेलीफोन, इंटरनेट इत्यादि तक हो सकती हैं। कोई अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे विकास की ओर अग्रसर होती है उसकी वस्तुओं एवं सेवाओं की मात्रा और प्रकार दोनों बढ़ती जाती हैं। सीमित संसाधनों का ईष्टतम् (Optimum) दोहन करके अपने समसामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना प्रत्येक अर्थव्यवस्था की चुनौती रही है। कोई भी अर्थव्यवस्था जैसे ही एक श्रेणी की वस्तुओं और सेवाओं को उपलब्ध कराने में सफल होने की स्थिति में आती है विकास के नये स्तर में उच्चतर श्रेणी की वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग प्रारंभ हो जाती है। इस प्रकार अपनी जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने का यह दौर प्रत्येक अर्थव्यवस्था में अनवरत चलता रहता है और यह प्रक्रिया कभी नहीं खत्म होने वाली है।
इस चुनौती के दो आयाम हैं-प्रथम, अपने उपलब्ध संसाधनों के दोहन के द्वारा उन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन जिगकी उस समय जनसंख्या को आवश्यकता होती है। अपनी उत्पादन प्रक्रिया का यह स्तर प्राप्त करना आवश्यक होता है। उत्पादन के इस स्तर को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त मात्रा के निवेश की आवश्यकता होती है। यह निवेश वहाँ की सरकार, निजी क्षेत्र (देशी और/या विदेशी) या फिर सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त प्रयास से जुटाया जा सकता है। वस्तुओं और सेवाओं के उचित स्तर के उत्पादन के बाद द्वितीय चुनौती है, वितरण की। उत्पादित वस्तु को जनसंख्या तक वितरण (distribution) की किस प्रणाली द्वारा पहुंचाना उचित होग, यह दूसरी चुनौती होती है।
वितरण तंत्र माॅडल
(Distribution Network Models)
वितरण तंत्र के क्षेत्र में तीन माॅडल ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में हैं-राज्य, बाजार तथा राज्य-बाजार का मिला-जुला माॅडल। पहले प्रकार की वितरण प्रणाली में राज्य (अर्थात् सरकार) वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति का पूरा जिम्मा लेता है, जिसके लिए उपभोक्ता को कोई भुगतान नहीं करना पड़ता है। इस प्रणाली के सर्वोत्तम उदाहरण हैं-पूर्व सोवियत संघ और चीन। दूसरे प्रकार की प्रणाली बाजार आधरित है जो कि मूल्य प्रणाली (pricemechanism) के अनुसारकार्य करती है। इस प्रणाली में वस्तुओं एवं सेवाओं की बाजार में उपलब्धता उगकी माँग एवं आपूर्ति के आधार पर होती है, उगका मूल्य खुले बाजार में निर्धारित होता है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं की यही वितरण प्रणाली थी (सन् 1929 की महान मंदी तक यूरो-अमेरिकी देशों में)। तीसरी और सर्वाधिक प्रचलित वितरण प्रणाली अन्य दोनों प्रणालियों के अनुभवों से उपजी जो कि राज्य-बाजार का मिरण है। इस प्रणाली में कतिपय वस्तुओं और सेवाओं कोलोगों के बीच राज्य द्वारा मुफ्रत याछूट (Subsidy) पर उपलब्ध कराया जाता है, जबकि कुछ अन्यवस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति सीधो बाजार करता है जिसके लिए उपभोक्ताओं को बाजार-आधरित मूल्य चुकाना पड़ता है। दुनिया की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएँ इन्हीं में से एक या अन्य प्रकार की वितरण प्रणालियों का अनुसरण करती हैं। जनसंख्या की सामाजिक-आर्थिक रचना में परिवर्तन के अनुरूप अर्थव्यवस्थाओं में राज्य एवं बाजार द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं की पूर्ति के मिरण की फनर्परिभाषा की जाती है।