जल प्रदूषण क्या है , परिभाषा , water pollution in hindi कारण , उपाय कारक/प्रदूषक व प्रभाव

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water pollution, definition water pollution in hindi factor / pollutants & effects जल प्रदूषण क्या है , परिभाषा कारक / प्रदूषक व प्रभाव कारण , उपाय किसे कहते है ?

जल प्रदूषण (water pollution) :

जल के भौतिक रासायनिक तथा जैविक कारको में होने वाले अवांच्छित तथा हानिकारक परिवर्तनों को जल प्रदूषण कहते है।

जल प्रदूषण के कारण:-

1- घरेलू प्रवाहित जल

2- औद्योगिक बहिः स्त्राव

कारक/प्रदूषक(water pollution Factor / pollutant):- 

जल में अपद्रव्यों की मात्रा 0.1 प्रतिशत होती है जिसमें मुख्य निम्न है:-

1     निलंबित पदार्थ जैसे बालू, रेत, कादा, चिकनी मिट्टी आदि।

2     कोलाइडी पदार्थ जैसे मल-मूत्र, जीवाणु, कागज एवं वस्त्र के रेशे।

3     विलिन ठोस जैसे नाइट्रेट, फास्फेट, अमोनिया आदि पौषक पदार्थ एवं कैद्रमियत, पारा, ताँबा, जिंक जैसी भारी धातुएँ।

प्रभाव(water pollution effects ):-

1-    अवाँछित रोग जातकों के कारण अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते है जैसे:-     टाइफाइड, हैजा, पेचिस उल्टी, दस्त पीलियाँ आदि।

2-   जल मार्गो का अवरूद्ध होना ।

जल प्रदूषण (water pollution) : सामान्यतया समुद्र के जल को छोड़ कुल जल का तीन चौथाई भाग कृषि और अन्य उद्योग धंधो , पीने तथा घरेलू जरूरतों में काम आता है। लेकिन विश्व की जनसंख्या में लगातार विकास और औद्योगीकरण दोनों ही के कारण जल की मांग दिन प्रतिदिन बढती जा रही है एवं जिस अनुपात में इन दोनों दिशाओं में वृद्धि हो रही है , उससे कही अधिक वृद्धि जल प्रदूषण में हो रही है। यह विनाशकारी प्रभाव नगरों में विशेष रूप से दिखाई देता है। जीवन को बनाये रखने के लिए पेय जल का स्वच्छ  होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जल में कुछ पदार्थ तो प्राकृतिक रूप से मिलते है जिनकी मात्रा अधिक होने पर वे प्रदूषक की भाँती कार्य करने लगते है , ऐसे पदार्थ निम्नलिखित है –

प्रमुख जल प्रदूषक

प्राकृतिक जल प्रदूषण : यह मुख्यतया भूमिगत जल में होता है। इसमें मुख्य है जल में लौह , मैंगनीज , आर्सेनिक , फ्लोराइड , क्षार आदि अकार्बनिक तत्वों की अधिक मात्रा में उपस्थिति जो जल को रंग , गंध , अस्वाद , धुंधलापन , खारापन , धातु पदार्थ आदि प्रदान करते है। अधिक मात्रा में होने से ये तत्व मानव को क्षति पहुंचा सकते है। इसके अलावा सल्फर उपचायी जीवाणु , लौह जीवाणु , विभिन्न कृमि , प्राकृतिक रेडियोधर्मिता भी प्राकृतिक जल प्रदूषक के कारण बन सकते है।

जल में फ्लोराइड का 0.8-1.0 मिग्रा/लीटर मात्रा में होना मानव के लिए लाभदायक है लेकिन भारत के कई प्रदेशों में भूमिगत जल में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम/लीटर से अधिक है .इसका दुष्प्रभाव दांत और हड्डियों पर पड़ता है जिसे फ्लोरोसिस कहते है। भारत के 8600 से ज्यादा गाँवों में जल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है। असम के जिन स्थानों में भूमिगत जल का अधिक प्रयोग किया जाता है उन स्थानों के जल में लौह तत्व की मात्रा ज्यादा है। इसका मुख्य कारण है पानी में अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड का होना जो कि प्राकृतिक और लौह पादप से लौह के घुलन में सहायक होती है। लौह के 2 मिग्रा/ली. से अधिक होने पर पानी का रंग लाल हो जाता है और पानी में लौह भक्षी जीवाणु के कारण स्लाइम उत्पन्न होती है। जिन स्थानों में भूमिगत जल में लौह पाया जाता है वहां पर मैंगनीज भी अक्सर पाया जाता है।

आर्सेनिक द्वारा जल प्रदुषण का प्रमुख औद्योगिक अपशिष्ट अथवा आर्सेनिक युक्त कीटनाशकों का कृषि में प्रयोग है। लेकिन पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक द्वारा भूमिगत जल प्रदुषण का कारण है वहां पर जमीन के अन्दर फेरस आर्सेनिक पायराईट खनिज का होना। इसके प्रभाव से कई प्रकार के चर्म रोग , फेंफड़ो का कैंसर आदि भयानक बीमारियाँ हो जाती है।

खनन क्षेत्रों में जल प्रदूषण का प्रमुख कारण लौह जीवाणु और सल्फर जीवाणु है जो कि जल का पी.एच. (pH ) मान कम कर देते है और जल के ऊपर स्लाइम पैदा करते है।

1. लवण : जल चाहे किसी भी स्रोत से प्राप्त किया गया हो – नदी , तालाब , बावड़ी , कुआं या ट्यूबवेल से , उसमे कुछ न कुछ लवण घुले रहते है जिनमे सोडियम , पोटेशियम , कैल्शियम , मैग्नीशियम के क्लोराइड , कार्बोनेट , बाइकार्बोनेट और सल्फेट प्रमुख है। इनके अतिरिक्त लोहा , मैंगनीज , सिलिका , फ्लुओराइड , नाइट्रेट , फास्फेट आदि तत्व कम मात्रा में पाए जाते है। इनकी पारस्परिक मात्रा का अनुपात स्थानीय भू रचना और स्थितियों पर निर्भर करता है। जब इन लवणों की मात्रा एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाती है तो वे शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने लगते है जिससे स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है। यदि ऐसे पानी से सिंची गयी चारे की फसल जानवरों को खिलाई जाए तो उसको भी अनेक बीमारियाँ हो सकती है। उदाहरण के लिए फ्लुओराइड की अधिकता (10 लाख में दो अथवा तीन भाग) के कारण राजस्थान , हरियाणा तथा आंध्रप्रदेश में अनेक नर नारी फ्लुओरोसिस की बीमारी से ग्रस्त पाए गए है।

सैकड़ो गाँव ऐसे है जहाँ पर पीने का पानी फ्लुओराइड , नाइट्रेट , लौहा तथा मैंगनीज , घुलनशील ठोस और भारी धातुओं आदि के लिए निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होता। इस समस्या की भयंकरता का अनुमान देश के विभिन्न गाँवों के असंख्य कुओं से प्राप्त संदूषित पीने के पानी में रसायनों की सांद्रता से किया जा सकता है। ऐसे गाँवों में जानपदिक स्तर पर रोग फैलने तथा लगातार ऐसा प्रदूषित जल पीने से शरीर क्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव के आंकड़े उपलब्ध नहीं है।

50 के दशक में जापान में मिनामाटा विकृतियों के लिए पानी में पारे की उपस्थिति और इटाई-इटाई व्याधि के लिए कैडमियम की उपस्थिति को उत्तरदायी पाया गया है।

जल में पारा एक विशेष शैवाल द्वारा मिथाइल मर्करी में परिवर्तित कर दिया जाता है , जो कि शैवालभक्षी मछलियों में संचित होकर मछली खाने वाले लोगो के शरीर में प्रविष्ट कर जाता है। मिथाइल मर्करी द्वारा अनेक मौतों का प्रसंग जापान में मछलियों के माध्यम से काफी मिल रहा है। डाइफिनाइल मर्करी से उपचारित गेहूं के बीज के पानी में बहाए जाने के फलस्वरूप पारे द्वारा प्रदुषण ईराक में अधिकता से फ़ैल रहा है। जिससे अनेक मौतें भी हुई है तथा हो रही है।

सीसा : सीसे की सूक्ष्म मात्रा (1 मिग्रा/लीटर) से कई गंभीर बीमारियाँ उत्पन्न होती है। सीसे की यह प्रवृत्ति होती है कि वह जैविक तंतुओं में संचयित होता जाता है और एक स्थिति ऐसी आती है कि शरीर के कुछ महत्वपूर्ण अंग अपने कार्यो को सक्षमता से नहीं कर पाते और धीरे धीरे क्षीण होने लगते है। सीसा प्रमुख रूप से यकृत , गुर्दे और मस्तिष्क की कोशिकाओ को अधिक प्रभावित करता है। सीसा हड्डियों में संचित होकर उन्हें नष्ट कर देता है।

आर्सेनाइट (AsO3) के रूप में उपस्थित आर्सेनिक के सभी अकार्बनिक लवण अत्यधिक विषैले होते है। आर्सेनिक युक्त जल (0.1 से 1.0 मिलीग्राम/लीटर) के निरंतर सेवनसे मनुष्यों में गंभीर त्वचीय विकृतियाँ उत्पन्न होती है। पूर्वी भारत (पश्चिम बंगाल) , ताइवान और बांग्लादेश आदि क्षेत्रों में सामान्य पेयजल में उपस्थित आर्सेनिक की 2 से 5 मिग्रा/लीटर के निरंतर सेवन से श्याम पत्र व्याधि का विस्तृत प्रकाप उभरा है। भारत के पश्चिम बंगाल प्रान्त के लगभग 10 पूर्वी जिलों में श्याम पत्र का प्रकाप अत्यधिक मिला है। बांग्लादेश का 70 प्रतिशत से अधिक भाग आज आर्सेनिक प्रदूषण की विभषिका से जूझ रहा है। आर्सेनिक युक्त जल के सेवन से स्नायुतंत्रीय , यकृतीय , त्वचीय , आन्त्रिय विकृतियाँ उत्पन्न होती है।

विश्व की कई जानी मानी वैज्ञानिक संस्थाओं ने अनुसन्धान करके यह परिणाम दर्शाया है कि पेयजल में फ्लोराइड की उपस्थिति 1.5 मिग्रा/लीटर से अधिक होने पर अस्थि सम्बन्धी विकृतियाँ जैसे दंत फ्लोरोसिस अथवा कंकालीय फ्लोरोसिस उत्पन्न हो सकती है। हमारे देश में राजस्थान राज्य के जोधपुर , भीलवाडा , बीकानेर , जयपुर और उदयपुर जिलो में फ्लोरोसिस काफी हद तक फ़ैल चुकी है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पूरे विश्व में फ्लोराइड की वांछित मात्रा 0.5 मिग्रा/लीटर और अधिकतम मात्रा 1.5 मिग्रा/लीटर निर्धारित की गई है। पेयजल में फ्लोराइड की अधिकता से नॉक-नी सिण्ड्रोम होता है। जिसके कारण जोड़ो और घुटनों में काफी भयानक दर्द उत्पन्न होता है , जो पारालाइसिस का कारण भी हो सकता है।

कृत्रिम या मानव निर्मित जल प्रदूषण

आधुनिक समाज में बढ़ते हुए औद्योगिकरण के कारण जहाँ एक ओर मानव ने उपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया है वही दूसरी ओर जल में अपशिष्टों का निष्कासन करके पर्यावरण समस्या को भी निरंतर बढ़ा दिया है। औद्योगिक इकाइयां जो मुख्यतः जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है वे है – कपडा , चमडा , डेयरी , खाद्य सामग्री (शक्कर आदि) , रंजक निर्माण करने वाली इकाइयां , सीमेंट , रासायनिक कारखाने , तेल शोधक कारखाने , ताप बिजलीघर , परमाणु उद्योगों से निष्कासित रेडियोधर्मिता आदि। इसके अलावा अम्लीय वर्षा , कृषि उपजल , खनन उपजल , बाँध बनाने से सम्बन्धित प्रदूषण , युद्ध और तेलवाही जहाजो से रेडियोधर्मी अपशिष्टों को समुद्र में डालना आदि भी मानव मानव द्वारा जल प्रदुषण के उदाहरण है।
प्राकृतिक प्रदूषण के कारण और उदाहरण बहुत सिमित है पर मानव द्वारा किये गए जल प्रदूषण के अनेक उदाहरण है।
2. रसायन : जल प्रदुषण का दूसरा मुख्य कारण नगरों का बढ़ता हुआ औद्योगीकरण है। कल कारखानों द्वारा प्रयुक्त पानी में अनेक प्रकार के लवण , अम्ल और विभिन्न प्रकार की विषैली गैसें घुल जाती है। यह दूषित जल नगर के पास ही नदी के पानी में मिलकर उसे भी दूषित कर देता है। देश विदेश में किये गए सर्वेक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि नदी का जल नगर की सीमा में आने से पूर्व कही अच्छे गुण वाला था , आगे चलकर वही दूषित और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो गया। इसके अतिरिक्त , अनेक प्रकार की कीटनाशी तथा पीड़क नाशी फसल को नष्ट करने वाले जीवों को मारने के लिए प्रयुक्त किये जा रहे है। ये सिंचाई के पानी के साथ साथ भूमि की निचली सतहों पर चले जाते है तथा फिर वहां से पानी की मुख्य धारा में मिल जाते है। यह दूषित जल नलकूपों और हैण्ड पम्पो के द्वारा पुनः पीने के काम में लाया जाता है। ये रसायन इतने विषैले होते है कि पानी में इनका एक लाखवां अंश भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। पाश्चात्य देशो में जहाँ इन कीटाणुनाशक रसायनों का खेती में अधिक प्रयोग किया जा रहा है , उनके परिणाम अभी विवादास्पद है। हो सकता है कि जिन स्थानों पर पानी का धरातल नीचा है , वहां इन विषैले रसायनों का विनाशकारी प्रभाव अभी दृष्टिगोचर न हुआ हो लेकिन इनको बनाने वाले कारखानों से निकला हुआ पानी हानिकारक सिद्ध हुआ है।
संश्लेषित रंजक उद्योग : भारत में 300 से अधिक रंग विभिन्न उपयोगों में लाये जाते है। कपडा , चमड़ा , पेंट , प्लास्टिक साज सामान , चित्रकारी , औषधि , सौन्दर्य प्रसाधन , खाद्य , पेयजलों आदि उद्योग से निकलने वाले रंगीन द्रवों को सीधा तालाब , नदियों आदि में छोड़ दिया जाता है , जिससे सभी जीवधारी , जन्तु या पौधे प्रभावित होते है। पानी में रंग की बहुतायत होने से सूर्य किरणें जल के भीतर तक नहीं पहुँच पाती तथा जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। परिणामस्वरूप जीवधारियों का पोषण ठीक से नहीं हो पाता है।
प्रदूषण से अनेक जहरीले तथा घातक पदार्थ परम आवश्यक जल को मानव उपयोग के लिए अनुपयुक्त बना देते है। प्रदूषित जल का उपयोग अनेक रोग उत्पन्न करके जीवन समाप्त कर देता है।
3. घरेलू कचरा : बढती हुई अनियंत्रित जनसंख्या से अनेक नगरों तथा कस्बों में घरेलु कचरे के अम्बार लग जाते है। यह कचरा मुख्यतः सड़े गले खाद्य पदार्थ , मल मूत्र गोबर , कूड़ा करकट आदि से मिलकर बनता है। विभिन्न छोटी बड़ी नालियां एवं नाले अंत में स्थानीय नदियों , झीलों तथा तालाबों आदि जल स्रोतों से मिलते है तथा इनके माध्यम से घरेलू कचरा , नहाने धोने का साबुनयुक्त जल सहित प्राकृतिक जल में मिल जाता है। देश की राजधानी दिल्ली के 17 नालों द्वारा 130 टन विषैला कचरा प्रतिदिन यमुना नदी में गिरता है। इसी प्रकार विभिन्न नगरों के नाले हजारों टन टन कचरा नदियों में डालते रहते है।
कुओं को विसंक्रमित (कीटाणुरहित) करने के लिए सरल और सस्ती युक्तियाँ (विरंजक चूर्ण से युक्त मिट्टी के पात्र से रूप में) देश में ही विकसित करने के प्रयास किये गए है। यद्यपि ये युक्तियाँ तकनिकी रूप से सफल रही है , लेकिन इनके जल में क्लोरिन का स्वाद आने के कारण ग्रामीण जनता ने इन्हें स्वीकार करने में उत्साह नहीं दिखाया है।
घरेलू मल मूत्र के निपटान के लिए हमारे देश में कोई संतोषजनक व्यवस्था नहीं है। कुछ गिने चुने नगरों में इसके लिए प्राथमिक उपचार संयंत्र लगे है। कई में मात्र द्वितीयक (सेकेंडरी) या आंशिक द्वितीयक (पार्शियल सेकेंडरी) संयंत्र है। कानपुर , बैंगलोर और अहमदाबाद में तो किसी भी प्रकार का वाहितमल उपचार संयंत्र नहीं है अत: वहां घरों के व्यर्थ का निपटान प्रदूषण की समस्या को और भी बढाता है।
4. औद्योगिक कचरा : प्रत्येक विकसित नगर की पहचान वहां पर उत्पन्न औद्योगिक कचरे पर आधारित हो गई है। हजारों औद्योगिक संस्थान प्रतिदिन सैकड़ो टन विषैले पदार्थ उत्पन्न करते है। इन्हें ठिकाने लगाने का सबसे सस्ता साधन निकटवर्ती नदी अथवा झील है। अधिकांश उद्योग विषैले रासायनिक पदार्थो को नालियों के माध्यम से अथवा सीधे ही झील अथवा नदियों में मिलकर जल को विषैला बना रहे है।
चर्म शोधन , वस्त्र , ऊन और पटसन के कारखानों वाले व्यर्थ पदार्थो से कानपुर में गंगा का जल प्रदूषित होता है। इसी प्रकार चीनी मीलों , शराब , लुगदी और कागज बनाने के कारखानों , कृत्रिम रबड़ के कारखानों और कोयला धावनशालाओं से निकलने वाली बारीक़ राख और डी.डी.टी. के कारखाने से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थ गंगा नदी जल व्यवस्था के सहायक नदी नालों को प्रदूषित करते है। हाल ही में बरौनी तेल शोधक कारखाने के तेलों के कारण स्वयं गंगा बहुत दूर तक प्रदूषित हो गयी थी।
पश्चिम बंगाल में हुगली नदी पर स्थित कोलकाता नगर भी प्रदूषण का एक मुख्य केंद्र है। नदी के समुद्र में मिलने वाले भाग में जहाँ कि ज्वार भाटा आता है , नदी के दोनों ओर 159 उद्योग स्थापित है। इनमे 12 वस्त्र बनाने और कपास के , 7 चर्म शोधन के , 5 कागज और लुगदी के , 4 शराब के , 78 पटसन तथा 53 अन्य कारखाने शामिल है। लुगदी और कागज बनाने के कारखानों से सबसे अधिक प्रदूषक पदार्थ नदी में मिलते है और वस्त्र , चर्म , शराब और यीस्ट के कारखानों से प्रदुषण कमी के कारण कम ही होता है तथा प्लान्क्टन मछली के अन्डो और लार्वा के अलावा अभी इसके दुष्परिणाम देखने को नहीं मिले है।
5. खनिज तेल :  खनिज तेल मूल रूप में समुद्री तथा महासागरीय जल को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है जिससे जलीय जंतुओं का जीवन खतरे में पड़ गया है। बड़े बड़े जलपोत टनों खनिज तेल जल सतह पर छोड़ते रहते है। समय समय पर खनिज तेल के कुओं तथा तेल वाहक टैंकरों की दुर्घटना से भीषण जल प्रदूषण होता है। इनके अतिरिक्त सम्पूर्ण पृथ्वी का दूषित जल नदियों के माध्यम से समुद्र में जा मिलता है। यह सोचना एक भयंकर भूल है कि समुद्रीय या महासागरीय अथाह जलराशि को निरंतर बड़े डलावघर की तरह उपयोग किया जा सकता है। इनकी भी अपनी सीमा है , जिसका उल्लंघन होने पर जल प्रदुषण के गंभीर दुष्परिणाम मानव स्वास्थ्य तथा अर्थव्यवस्था को समाप्त कर सकते है।
तेल और पेट्रोलियम संसाधन उद्योग : बढती हुई पेट्रोलियम मांग को पूरा करने के लिए उसके उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। कच्चे तेल के उत्पादन , शोधन , वितरण से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उठ खड़ी हुई है। अनुमानत: तेल का 0.5% भाग तेल के स्थानान्तरण के समय समुद्र के पानी में गिर जाता है। इसके अलावा तेल टैंकरों के दुर्घटनाग्रस्त होने से , डीजल रेलवे इंजिन कारखानों के टैंकरों की सफाई के बाद तेल युक्त पानी को समुद्र में डालने से तेल समुद्र की सतह पर फ़ैल जाता है। इस तेल के फैलने से समुद्री जीवो की मृत्यु हो जाती है , जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है , सूर्य की किरणें पानी के भीतर नहीं जा सकती जिससे जल अन्य जल जीवों के लिए विषाक्त हो जाता है। कच्चे तेल में उत्परिवर्तन कारक कैंसरजनक और वृद्धिरोधक पदार्थ मौजूद होते है। कुछ पेट्रोलियम पदार्थों की थोड़ी मात्रा में सूक्ष्म शैवालों और अल्पवयस्क जीवधारियों को नष्ट कर देते है। इन प्रभावों के कारण खाद्य श्रृंखला असंतुलित हो जाती है।
6. कृषि जनित जल प्रदूषक : आधुनिक युग में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जा रहा है। फसल के पश्चात् बचा हुआ उर्वरक वर्षा के जल में घुलकर मिट्टी के नीचे पहुँच कर भूमिगत जल स्रोतों को प्रदूषित कर देता है। इस प्रकार खरपतवार तथा कीटनाशक रसायन भी भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहे है।
जैविक नियंत्रण अथवा औद्योगिक व्यर्थ पदार्थों के निपटान के लिए जीवनाशकों (बायोसाइड्स) का उपयोग संसार के अन्य देशो के समान हमारे देश में भी तेजी से बढ़ रहा है। इसमें खरपतवार नाशक , बैक्टीरिया नाशक , कवक नाशी तथा नाशक जीवनाशी शामिल है। इनके उपयोग से प्रत्यक्ष तथा परोक्ष , दोनों रूप से जन स्वास्थ्य और नदियों , झीलों , तालाबों के मछली आदि जलचरों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। विषैले प्रभाव का थोडा थोडा करके एकत्र होते रहना एकबारगी अत्यधिक जितना ही खतरनाक सिद्ध हो सकता है।
अकार्बनिक खाद जैसे यूरिया , अमोनिया फास्फेट आदि खेतों से बहकर नदी , तालाबों में आ जाती है जिससे इन जल स्रोतों में नाइट्रेट और फास्फेट की मात्रा अधिक हो जाती है जो कि शैवालों को बढ़ने में मददगार होती है। यदि शैवालों की मात्रा एक सीमा से अधिक हो जाती है तो जल की गुणवत्ता कम हो जाती है। ये तालाब “यूट्रिफिकेशन” प्रक्रिया की ओर अग्रसर होते है। शैवाल की मात्रा अधिक होने से जल शुद्धिकरण में भी कठिनाइयाँ आती है।
7. परमाणु उद्योगों से रेडियोधर्मिता : रेडियोधर्मिता के प्रमुख स्रोत है परमाणु ऊर्जा केंद्र , परमाणु परिक्षण केंद्र , परमाणु युद्ध , नाभिकीय पदार्थ का उत्पादन। परमाणु ऊर्जा केंद्र में अनेक रेडियोधर्मी अपशिष्ट पदार्थ पैदा होते है जिनसे निपटने के लिए उन्हें समुद्र में डालना एक हल है। इसके अलावा नाभिकीय परिक्षण , नाभिकीय पदार्थो का उत्पादन , परमाणु विस्फोटों का परिक्षण जल , थल , वायु को प्रदूषित कर रहा है। युरेनियम के विखण्डन से आयोडीन , सीजियम , स्ट्रोंशियम , कोबाल्ट आदि लगभग 30 अस्थायी समस्थानिक पैदा होते है। चूँकि ये समस्थानिक अस्थायी होते है अत: स्थायित्व प्राप्त करने के लिए इनसे रेडियोधर्मी विकिरण निकलती है जो प्राणियों के शरीर में घातक प्रभाव पैदा कर सकती है।
ताप बिजलीघर : ताप बिजलीघर उष्मीय प्रदूषण फैलाते है। प्रदूषित जल के साथ साथ यदि जल का तापमान बढ़ जाए तो जल में घुलनशील ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। तापमान बढ़ने से जल में लवणों की विलेयता बढ़ जाती है। जलीय जीवों की मेटाबोलिक क्रियाएँ तीव्र हो जाती है और जीवनकाल कम हो जाता है।
8. अम्लीय वर्षा : अम्लीय वर्षा , वायु प्रदूषण का प्रभाव है। कारखानों से धुआं उगलती चिमनियाँ निरंतर वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड , सल्फर डाईऑक्साइड और नाइट्रिक ऑक्साइड जैसी गैसे वाष्प कणों से रासायनिक क्रिया कर जल में घुलकर वर्षा करते है। इस प्रकार से पानी की अम्लता 5.6 से कम होती है। इस प्रकार के पानी से पश्चिम देशों में अनेक झीले जहरीली हो गयी है। इसका दुष्प्रभाव मछलियों और अन्य जलचर सम्पदा पर पड़ता है।
9. चमड़ा उद्योग : चमड़ा उद्योग से निकले दूषित जल को जल स्रोतों में छोड़ने से सतही और भूमिगत जल दोनों का प्रदूषण होता है। इससे जल में क्लोराइड की मात्रा 3.5% से अधिक हो जाती है। इसके अलावा पानी में खारापन , अमोनिया , सल्फाइड , टैनिन तथा तथा क्रोमियम जैसे पदार्थो की मात्रा अधिक हो जाती है तथा जल में गंध , स्वाद और रंग आ जाता है। इस तरह का जल मछलियों के लिए हानिकारक होता है। 9 टन चमड़े के निर्माण में लगभग 50 टन पानी का इस्तेमाल होता है।
10. लौह और इस्पात कारखाने : लौह बनाने के बाद बचे हुए स्लैग को अन्य स्थान पर फेंक दिया जाता है। यह स्लैग वर्षा के जल में घुलकर अन्य जल स्रोतों को प्रदूषित करता है। सतही जल और भूमिगत जल इस प्रकार प्रदूषित हो जाते है। इस्पात कारखानों से निकलने वाले रसायनों के नदी अथवा नालों में प्रवाहित होने के कारण ये जल स्रोत भी प्रदूषित हो जाते है।
11. डेयरी उद्योग : डेयरी उद्योग से निकले दूषित जल में लैक्टोस , प्रोटीन और वसा की मात्रा अधिक होती है जो जल स्रोतों में मिलकर जल की जीव रसायन ऑक्सीजन की मांग को बढ़ा देती है तथा ये जल में सूक्ष्म जीवों को पनपने में सहायक सिद्ध होती है।
शक्कर बनाने वाले कारखाने : शक्कर उद्योग से शिरा अपशिष्ट निकलता है जिसमे भारी मात्रा में शक्कर सुक्रोस आदि होते है जिससे जल का धुंधलापन बढ़ता है और जल रंगीन भी हो जाता है।
खाद्य उद्योग : खाद्य उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट जल में प्रोटीन , कार्बोहाइड्रेट , कार्बनिकल तत्वों की मात्रा अधिक होती है जो जल स्रोतों में मिलकर उनकी जीव रसायन ऑक्सीजन मांग को बढ़ा देते है।
नदियों पर बंधे बाँध से : ऊर्जा की बढती माँग को पूरा करने के लिए कई जगहों पर नदी का पानी रोककर विशाल बांध बनाकर पन-बिजली योजनायें चलाई जा रही है। पेयजल और सिंचाई जल को बाँधने के लिए कृत्रिम जलाशय बनाये गए है। इससे पानी के वेग , मात्रा और तापमान में परिवर्तन होता है। इसका प्रतिकूल असर स्वच्छन्द विचरण करने वाले जीव जंतुओं पर होता है। कृत्रिम वेग के साथ उन जीवों की बनावट और रहन सहन की स्थिति परिवर्तित होती है। जलाशय में नीची सतह से ऑक्सीजन की कमी होती है जिसके कारण मछलियाँ और अन्य छोटे जीवों के लिए संकट पैदा हो जाता है। इसके अलावा आसपास के क्षेत्र जल मग्न हो जाते है और बड़ी आबादी का स्थानान्तरण होता है।

जल प्रदूषण की रोकथाम : जल प्रदूषण रोकने के लिए औद्योगिक इकाइयों से निकले अपशिष्ट जल को प्रमुख जल स्रोतों में विसर्जन करने से रोकना चाहिए। इस जल का पुनः चक्रण करना अति आवश्यक है। भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देशों में उपचार के लिए सूक्ष्मजीवों का अधिकाधिक प्रयोग होना चाहिए। वैज्ञानिक संस्थाओं को ऐसी तकनिकी का विकास करना चाहिए जो कम खर्चीली और पर्यावरण के हित में है।

उद्योगों में नवीनीकरण कर उन्हें आधुनिक तकनीके अपनानी चाहिए जो पर्यावरण को कम प्रदूषित करें।

शक्ति संयंत्रों , उर्वरक संयंत्रों आदि से सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करके अम्लीय वर्षा को रोका जा सकता है। यह दो प्रकार से किया जा सकता है। पहले तो SO2 और NO2 के अंशो का हटाने के लिए चूने के रिसाव को फ़िल्टर किया जाना चाहिए और कोयला तापीय शक्ति स्टेशनों में कोयले के साथ चूने का उपयोग किया जाना चाहिए जो कोयले में उपस्थित सल्फर के साथ क्रिया कर कैल्शियम सल्फेट बनाता है जो एक ठोस पदार्थ है।

चमड़ा उद्योग में खाल से बाल निकालने और उसे नर्म करने की क्रिया में प्रोटियेस एंजाइम का प्रयोग करना चाहिए। इस तकनीक से कम जल की आवश्यकता होती है और सल्फेट , टैनिन , अमोनिया , क्रोमियम जैसे रसायन का कम उपयोग होता है।

कपडा और अन्य उद्योग जिसमे रंगों का प्रयोग होता है उनके रंगीन जल में रंगों का शोषण करने के लिए लिग्निन का प्रयोग करना चाहिए जो कागज के अपशिष्ट जल में बहुधा पाया जाता है। विभिन्न खाद्य सामग्री बनाने वाले उद्योगों को सौर ऊर्जा की सहायता से अपशिष्टों का उपचार करना चाहिए। इस अपशिष्ट जल से मछलीपालन और सिंगल सेल प्रोटीन का उत्पादन करना चाहिए और इससे बचे जल को सिंचाई में प्रयोग लाना चाहिए।

तेल से बने कीचड़ को बायोरेमिडीयेशन तकनीक द्वारा साफ़ करना चाहिए। कीचड़ को मिट्टी के साथ मिलाकर उसकी आद्रता , तापमान बनाये रखते हुए उसमे यूरिया और फास्फेट आदि मिलाकर उसे खाद में परिवर्तित करना चाहिए। कीटनाशकों के प्रयोग पर एकदम प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। कई देशो में यह पहले ही हो चुका है। इनके स्थान पर जैवनाशियों जैसे बैसिलस और ऐसे विषाणु का प्रयोग करना चाहिए जो सिर्फ कीटाणु का नाश करे। इसके अलावा जैव उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए जैसे राइजोबियम , एजाटोबेक्टर , माइकोराइजा आदि। इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों द्वारा तथा अनुसन्धान करने की जरुरत है।

जल संसाधन परियोजनाओं को बनाने के पूर्व उससे होने वाले पर्यावरण प्रभाव का आंकलन करना आवश्यक है। जैव प्रौद्योगिकी और जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा अनेक नयी तकनीकों का प्रयोग कर ऐसे सूक्ष्म जीवों का निर्माण करना चाहिए जो विषैले अपघटित पदार्थो को जल में अपघटित कर सके।

जल प्रदुषण को रोकने के लिए हमारी केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जल प्रदूषण निवारण के लिए बनाये गए कानूनों का सख्ती से पालन करना चाहिए। विभिन्न वैज्ञानिक संस्थाओं के माध्यम से जल प्रदूषण का उपचार करना चाहिए और आम जनता में प्रदूषण और उससे पड़ने वाले दुष्परिणाम के प्रति जागरूकता पैदा करना आवश्यक है।

जल प्रदूषण से हानियाँ या नुकसान

जल प्रदुषण से जीव जन्तुओं तथा वनस्पतियों को अनेकों हानियाँ होती है। घरेलू कचरे के प्रदूषित जल से हैजा , पीलिया , टाइफाइड , पायरिया आदि घातक बीमारियाँ फैलती है।

शुद्ध पीने के पानी को छोड़ दूसरे तरह के जल के माध्यम से जो रोग जिन कारणों से फैलते है वे निम्नलिखित है –

1. वाहितमल (sewage) द्वारा प्रदूषित जल से पकड़ी जाने वाली या उसमे इक्कठी की जाने वाली शेलफिश से टाइफाइड , पैराटाइफाइड अथवा दण्डाणुज अतिसार हो जाता है।

2. मानव उत्सर्गो (अर्थात मलमूत्र) , वाहितमल तथा अवमल के संसर्गो में आकर संदूषित हुए फलों तथा सब्जियों के माध्यम से टाइफाइड , पैराटाइफाइड , विभिन्न प्रकार के अतिसार परजीवी कीड़े अथवा संक्रामक यकृतशोथ (पीलिया) हो जाता है।

3. मानव मलमूत्र खाने वाली मक्खियों आदि द्वारा संदूषित होने वाले सभी प्रकार के खाद्यों के सेवन से मनुष्य को टाइफाइड , पैराटाइफाइड या हैजा हो जाता है।

4. मानव मल मूत्र द्वारा संदूषित मिट्टी के संसर्ग में आने पर हुकवर्म हो जाता है।

5. प्रदूषित जल में साफ़ किये गए बर्तनों में रखे गए दूध के संदूषित हो जाने पर टाइफाइड अथवा दंडाणुज अतिसार हो जाता है।

6. प्रदूषित जल में नहाने धोने आदि के कारण वाइल रोग और सिस्टोटोम बीमारी हो जाती है। जैसे राजस्थान के अस्पतालों में से निकलने वाले वाहितमल द्वारा सींचे गये चारागाहों में चरने वाली गायें इसी कारण तपेदिक से पीड़ित हो जाती है तथा उनके दूध का सेवन करने से संक्रमण की एक श्रृंखला प्रारंभ हो जाती है।

7. औद्योगिक कचरे में अनेकों विषैले रसायन तथा सूक्ष्म धातुकण होते है , जिनसे यकृत , गर्दो और मस्तिष्क सम्बन्धी अनेकों रोगों के अतिरिक्त प्राणलेवा कैंसर रोग हो रहे है , इसे समझने के लिए जापान में 1973 की एक घटना का उदाहरण पर्याप्त है। चीसू कॉर्पोरेशन नामक उद्योग की नालियों से बहता हुआ एसिटल्डीहाइड रसायन समुद्र में मिलता था। इस प्रदूषित जल में रहने वाली मछलियों को भोजन के रूप में ग्रहण करने वाले जापानी नागरिक सदैव के लिए अंधे , गूंगे तथा बहरे हो गए तथा अनेकों अकाल मृत्यु के शिकार भी हो गए।

8. कृषि के उपयोग में आने वाले उर्वरकों से बच्चो में रक्त की घातक बीमारी मीथेमोगलोबिनेमा हो जाती है , जिसमे ऑक्सीजन की कमी से बच्चा मर जाता है। टेक्सटाइल कपडा उद्योग में एजो-डाई का उपयोग होता है , जिससे कैंसर हो सकता है।

9. डी.डी.टी. तथा बी.एच.सी. जैसे कीट तथा खरपतवार नाशक प्रदूषण जल के माध्यम से गर्भवती माताओं के रक्त में पहुंचकर गर्भ धारण क्षमता को नष्ट करने के अतिरिक्त गर्भस्थ शिशु में विकृतियाँ उत्पन्न कर सकते है। यह रहस्योंदघाटन लखनऊ स्थित इंडस्ट्रीयल टोक्सीकोलोजी रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने किया है।