संदर्भ समूह परिभाषा क्या है ? मटर के संदर्भ समूह की अवधारणा किसने दी है reference group in sociology in hindi

By   November 5, 2020

reference group in sociology in hindi संदर्भ समूह परिभाषा क्या है ? मटर के संदर्भ समूह की अवधारणा किसने दी है ?

संदर्भ समूह की अवधारणा
यह कहना आवश्यक नहीं कि सभी लोग समूहों में रहते हैं। आप सामाजिक प्राणी हैं और समाज में रहने के लिए आपको कुछ संबंधों के बीच रहना पड़ता है। फिर एक समूह है क्या? संबं का ताना-बाना ही तो समूह है।

उदाहरण के लिए, हर विद्यार्थी अन्य विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ा होता है, जिनके साथ उसका सतत रूप से सक्रिय संपर्क रहता है। आपको पता है कि आपको अपने समूह के सदस्यों से किस प्रकार के संबंधों की अपेक्षा होती हैं। आपको यह भी मालूम है कि दूसरे विद्यार्थियों की आपसे क्या आशाएं हैं। दूसरे शब्दों में आपका आचरण, व्यवहार, संबंध रखना आदि सदैव उस समूह से निर्देशित होता है, जिससे आप संबंधित हैं। जब तक आपका व्यवहार विद्यार्थियों के समूह की अनुकृत अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं ढलता तब तक आपकी विद्यार्थी के रूप में पहचान नहीं बनती।

इसी प्रकार, आप एक परिवार के सदस्य/सदस्या हैं। आपको मालूम है कि परिवार एक महत्वपूर्ण प्राथमिक समूह है, जो हमेशा आपके व्यवहार और अपेक्षाओं को आकार देता है। यदि आप पूरी तरह ही जड़हीन नहीं हैं तो आपके लिए अपने माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, दोस्त आदि के साथ अनेक तरह के संबंध के बगैर संभवतः अपने अस्तित्व की कल्पना तक करना संभव न होगा।

अतः आपको यह समझना चाहिए कि किसी के लिए भी अलग-थलग रहकर सामान्य जीवन संभव नहीं होता। व्यक्ति कुछ संबंधों के बीच रहते हैं और जिस समूह से वे संबंधित हैं, उनकी अपेक्षाओं को उनकी सहमति प्राप्त होती है। सच्चाई यह है कि जिस समूह से वे जुड़े हैं, वह उनके संदर्भ समूह की भांति काम करता है।

इस प्रकार, यह समझा जा सकता है कि संदर्भ समूह क्या है। संदर्भ समूह वह समूह है, जिसके आधार पर हर व्यक्ति के लिए अपनी उपलब्धियों, व्यवहार भूमिका, आकांक्षाओं आदि का मूल्यांकन करना संभव होता है। संदर्भ समूह ही व्यक्ति को बताता है कि उसका काम गलत है अथवा सही। इससे यह तथ्य भी सामने आता है कि उसका सदस्यता समूह, अर्थात् जिससे वह जुड़ा है, वही उसका संदर्भ समूह है।

परन्तु समस्या यहीं समाप्त नहीं हो जाती। जीवन इससे भी अधिक जटिल है। जिनसे आप संबंधित नहीं हैं, वे गैर-सदस्यता समूह भी संदर्भ समूह की तरह काम कर सकते हैं। यह आश्चर्यजनक नहीं है। जीवन अत्यंत गतिशील है, इसलिए समय-समय पर आपको उन लोगों के बारे में भी जानकारी मिलती रहती है, जो आपके समूह से संबंधित नहीं है। और कभी-कभी आपको हैरान होकर अपने आप से प्रश्न करना पड़ता है कि दूसरे लोग आपसे अधिक शक्तिशाली एवं प्रतिष्ठित हैं। परिणाम यह होता है कि इस स्थिति में व्यक्ति के लिए वह अपनी उपलब्धियों और काम का मूल्यांकन गैर-सदस्यता समूह के आधार पर करना संभव हो जाता है।

उदाहरण के लिए, एक युवा विद्यार्थी को लीजिए। उस पर उसकी पाठ्य-सामग्री के अध्ययन तथा परीक्षा आदि का बोझ होता है। सचमुच कठोर परिश्रम करने से उसके पास आराम करने तक की फुर्सत नहीं है। तभी उसको एक अलग तरह के समूह (क्रिकेट खिलाड़ियों के समूह) का पता चलता है जो उसकी ही भांति युवा तथा शिक्षित हैं। वे लोग क्रिकेट खेलते हैं, विदेशों में जाते हैं, जीवन का आनंद लेते हैं, धन कमाते हैं और अखबारों में उनके बारे में खूब लिखा जाता है। क्रिकेट खिलाड़ियों के समूह की सफलता की कहानी से अति प्रभावित होने की स्थिति में उसको लगता है कि एक विद्यार्थी के रूप में वह वंचित और उपेक्षित है। इस प्रकार, क्रिकेट खिलाड़ी उसके संदर्भ समूह की तरह काम करना शुरू कर देते हैं। इस एहसास के फलस्वरूप पढ़ाई की बजाए क्रिकेट खेलने में उसका अधिक समय लगने लगता है और उसे आशा होती है कि एक न एक दिन क्रिकेट खिलाड़ी बनकर उनकी तरह जीवन बिताना उसके लिए संभव हो पाएगा।

सच्चाई यह है कि केवल सदस्यता समूह ही नहीं बल्कि गैर-सदस्यता समूह भी संदर्भ समूह की तरह काम करते हैं। केवल अपने समूह के सदस्यों की दृष्टि से नहीं बल्कि दूसरे समूहों के लोगों की दृष्टि से भी स्वयं को परखा जाता है।

यह सब जान लेने के बाद आपको यह समझने में कठिनाई नहीं होगी कि मर्टन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक सोशल थ्योरी एंड सोशल स्ट्रक्चर (1949) में संदर्भ समूह के सिद्धांत को किस प्रकार विकसित किया है।

 प्रस्तावना
पिछली इकाई में आपने प्रकार्यात्मक विश्लेषण के क्षेत्र में मर्टन के योगदान के बारे में पढ़ा। इस इकाई में आपको संदर्भ समूह के आचरण के सिद्धांत का परिचय देने का प्रयास किया गया है। विशेषकर यह बताया जा रहा है कि अमरीका के समाजशास्त्री रॉबर्ट मर्टन ने किस प्रकार अपनी प्रसिद्ध पुस्तक सोशल थ्योरी एण्ड सोशल स्ट्रक्चर (1949) में इस सिद्धांत को विस्तार से समझाया और सिद्ध किया है।

प्रारंभ में, भाग 30.2 में संदर्भ समूह की अवधारणा और उसके विभिन्न प्रकारों को समझाने की चेष्टा की गई है।

इसके पश्चात् भाग 30.3 में हमने निर्धारक तत्वों वाले संरचनात्मक, संस्थागत, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक कारकों की चर्चा की है, जिनसे प्रेरित होकर विभिन्न संदर्भ समूहों, सदस्यता समूहों तथा गैर-सदस्यता समूहों का चयन किया जाता है।
और अंत में आपको संदर्भ समूह के आचरण के संरचनात्मक तत्वों अर्थात् समूह के सदस्यों के प्रतिमानों, मूल्यों तथा भूमिका निर्वाहन की प्रेक्षणीयता तथा दृश्यमानता की संभावना, अननुकूलता के प्रभाव और भूमिका पटल एवं प्रस्थिति पटलं की गतिकी के संबंध में जानकारी दी गई है।

संदर्भ समूह का सिद्धांत – मर्टन
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
संदर्भ समूह की अवधारणा
तुलनात्मक वंचन की अवधारणा
समूह और समूह सदस्यता की अवधारणा
गैर-सदस्यता की अवधारणा
प्रत्याशी समाजीकरण
सकारात्मक और नकारात्मक संदर्भ समूह
संदर्भ समूह के निर्धारक तत्व
संदर्भ व्यक्ति
सदस्यता समूहों में से संदर्भ समूहों का चयन
गैर-सदस्यता समूहों का चयन
मूल्यों तथा प्रतिमानों को परिभाषित करने के लिए संदर्भ समूहों की भिन्नता
निरंतर सक्रिय संपर्क वाले उपसमूहों अथवा प्रस्थिति-श्रेणियों में से संदर्भ समूहों का चयन
संदर्भ समूहों के संरचनात्मक तत्व
प्रेक्षणीयता और दृश्यमानतारू प्रतिमानों, मूल्यों और भूमिका-निवार्हन की जानकारी के अनुकृत
अनुरूपता का अभावः संदर्भ समूह आचरण का एक प्रकार
भूमिका पटल, प्रस्थिति पटल और प्रस्थिति क्रम
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

 उद्देश्य
इस इकाई का अध्ययन करने के पश्चात् आपके लिए संभव होगा
ऽ संदर्भ समूह की अवधारणा को समझना
ऽ यह बताना कि लोग अपनी भूमिका निर्वाहन तथा उपलब्धियों का मूल्यांकन करने के लिए अलग-अलग संदर्भ समूहों-सदस्यता समूहों तथा गैर-सदस्यता समूहों का चयन क्यों करते हैं
ऽ विभिन्न संदर्भ समूहों के प्रति लोगों के झुकाव के कारण तुलनात्मक वंचन की अनुभूति की निरंतर संभावना की विवेचना करना ।
ऽ अपने जीवन पर रचनात्मक तथा आलोचनात्मक ढंग से दृष्टिपात करके यह पता लगाना कि किस प्रकार आपके द्वारा अपने संदर्भ व्यक्तियों एवं संदर्भ समूहों का चयन किया जाता है तथा उसी के अनुरूप अपनी जीवन-शैली, दृष्टिकोण तथा आचरण का निर्धारण होता है।