आयनिक बन्ध , सहसंयोजी बंध , धात्विक बन्ध , वाण्डरवाल , हाइड्रोजन बन्ध , types of bonds in crystals

By  
Ionic bond in hindi , आयनिक बन्ध , सहसंयोजी बंध , धात्विक बन्ध , वाण्डरवाल , हाइड्रोजन बन्ध क्या है , परिभाषा , उदाहरण , गुण आदि |
क्रिस्टलों में बन्धों के प्रकार बताइयें (types of bonds in crystals) : जैसा कि हमने ठोस पदार्थों के अध्ययन के समय पढ़ा था कि ठोसों के गुण इनमें पाए जाने वाले कणों जैसे परमाणु अथवा अणु आदि के मध्य लगने वाले बलों की प्रकृति पर मुख्यतः निर्भर करता है। यहाँ क्रिस्टल में पाए जा सकने वाले सभी प्रकार के बंधों के बारे में अध्ययन करने वाले है , क्रिस्टल में बन्धों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया गया है –

1. आयनिक बन्ध (Ionic bond) : जब क्रिस्टल के परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन का स्थानान्तरण होता है तो , परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन के स्थानान्तरण के कारण आयनिक बन्ध बनता है।

अर्थात जब इलेक्ट्रॉन किसी एक परमाणु या अणु से दुसरे परमाणु या अणु पर स्थानांतरित हो जाता है जिससे एक परमाणु ऋणात्मक आयन हो जाता है और दूसरा धनात्मक आयन ।
स्थिरविद्युत आकर्षण बल के कारण ये दोनों परमाणु एक दुसरे को आकर्षित करके रखते है और बांधे रखते है , इस बन्ध को आयनिक बंध कहते है , इस प्रकार किसी क्रिस्टल के परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन के स्थानान्तरण से आयनिक बंध बनता है।
इस प्रकार के क्रिस्टल कठोर , भंगुर प्रकृति के होते है तथा इनका गलनांक उच्च और क्वथनांक भी उच्च होता है। इस प्रकार के क्रिस्टल विद्युत के कुचालक होते है।
उदाहरण : NaCl , CsCl आदि।
  • NaCl क्रिस्टल के अंतर Na और Cl के परमाणु पाए जाते है , इसमें Na परमाणु से इलेक्ट्रॉन क्लोरिन (Cl) पर स्थानान्तरित हो जाता है जिससे Na धन आयन में परिवर्तित हो जाता है और Cl ऋण आयन में और विपरीत आयन होने के कारण इनके मध्य स्थिरविद्युत आकर्षण बल कार्य करता है अर्थात एक बंध बन जाता है जिसे आयनिक बन्ध कहते है।

2. सहसंयोजी बन्ध (Covalent bond)

इस प्रकार के बंध क्रिस्टल के दो परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉनों के साँझे से बनता है अर्थात जब किसी क्रिस्टल के दो परमाणु आपस में विपरीत चक्रण के इलेक्ट्रॉनों का सांझा करते है (sharing of electrons) तो यह सहसंयोजी बंध बनता है।
यह बंध तब बनता है जब एक ही तत्व के दो परमाणु हो या आवर्त सारणी में एक दुसरे से बहुत निकट हो।
यह बंध अधिकतर अधातुओं में देखने को मिलता है हालांकि यह धातु और अधातु दोनों में पाया जा सकता है।
जिन क्रिस्टल में ऐसा बन्ध पाया जाता है उनमें ताप का मान बढ़ाने पर उनमें चालकता का मान बढ़ता है तथा इन ठोसों में गलनांक का मान उच्च होता है।
सहसंयोजी बन्ध के उदाहरण : H2
, Cl
2 , Ge , Si , हीरा , क्वार्टज़ आदि के अणुओं के मध्य सहसंयोजी बन्ध पाए जाते है।

3. धात्विक बन्ध (metallic bond)

धात्विक बंध धातुओं के परमाणुओं के मध्य पाया जाता है , यह बंध धनावेशित आयन और संयोजी या मुक्त इलेक्ट्रॉन के मध्य आकर्षण बल के कारण  बनता है , यह ऐसा भी हो सकता है कि किसी परमाणु के धनावेशित नाभिक (धनायन) और मुक्त इलेक्ट्रॉन या संयोजी इलेक्ट्रॉन के मध्य पाया जाने वाला आकर्षण बल।
जिन क्रिस्टल में धात्विक बन्ध पाया जाता है उनका ताप बढाने पर चालकता कम होती है ,
उदाहरण : Na , Li , K , Cs आदि।

4. वाण्डरवाल बल (van der waals Bond)

ये बल प्रकृति में बहुत कमजोर होते है , इन बलों के कारण क्रिस्टल में उदासीन अणु या परमाणु बहुत कमजोर या क्षीण बल द्वारा आपस में बन्धे रहते है , उदासीन परमाणुओं के मध्य क्षीण इस आकर्षण बल को वाण्डरवाल बल कहते है।
इन क्रिस्टल का गलनांक निम्न होता है , ये क्रिस्टल कुचालक होते है और आसानी से संपीडित हो जाते है।
वाण्डरवाल बल के उदाहरण : ठोस कार्बन डाई ऑक्साइड , मीथेन , पैराफिन , बर्फ आदि।

5. हाइड्रोजन बन्ध (hydrogen bond)

ये बल वाण्डरवाल बल से अधिक प्रबल होते है लेकिन आयनिक और सहसंयोजी बलों की तुलना में कमजोर होते है। स्थायी द्विध्रुवों में अन्योन्य क्रिया के कारण हाइड्रोजन बंध बनता है। इन क्रिस्टल का गलनांक निम्न होता है।
हाइड्रोजन बंध के उदाहरण : HF , H2O आदि।