वाष्पोत्सर्जन क्या है , परिभाषा , प्रक्रिया , चित्र संरचना , कारक , फ्लोएम परिवहन Transpiration in hindi

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration in hindi ) : पादपों के वायवीय भागो द्वारा जल , वाष्प के रूप में बाहर निकलता है , इस क्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहते है |

वाष्पोत्सर्जन मुख्यतः पर्णरन्ध्रो द्वारा होता है |

पर्णरन्ध्र की संरचना : पत्तियों की निचली सतह पर पर्णरन्ध्र अधिक व ऊपरी सतह पर पर्णरंध्र कम संख्या में पाये जाते है | रंध्रो की संख्या 1000 – 60000 प्रति वर्ग सेमी हो सकती है | प्रत्येक पर्णरंध्र दो सेम के बीजो के आकार की द्वार कोशिकाओं से बना होता है जिनके चारों तरफ सहायक कोशिकाएँ होती है , द्वार कोशिकाओं में हरित लवक पाये जाते है |

वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया

दिन के समय द्वार कोशिकाओ में शर्करा का निर्माण होता है , जिससे द्वार कोशिकाओं में विसरण दाब न्यूनता उत्पन्न हो जाती है , इस कारण द्वार कोशिकाओं की भीतरी सतह में तनाव उत्पन्न होता है |

परिणामस्वरूप पर्णरन्ध्र खुल जाते है , रात्रि के समय द्वार कोशिकाओ में ग्लूकोज का स्तर कम हो जाता है | जिससे द्वार कोशिकाएँ श्लथ हो जाती | परिणामस्वरूप रन्ध्र बंद हो जाते है | पर्णरंध्र खुलने के दौरान ही जल वाष्प बनकर रंध्रो से बाहर निकलता है , जिसे वाष्पोत्सर्जन कहते है |

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक

  1. ताप
  2. प्रकाश
  3. आर्द्रता
  4. वायु की गति
  5. रंध्रों की संख्या व वितरण
  6. खुले रंध्रो की प्रतिशतता
  7. पौधे में पानी की उपस्थित

वाष्पोत्सर्जन एवं प्रकाश संश्लेषण : एक समझौता

  1. पौधों में जल अवशोषण एवं परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करता है |
  2. प्रकाश संश्लेषण : हेतु आवश्यक जल का संभरण में वाष्पोत्सर्जन सहायक होता है |
  3. मृदा से प्राप्त खनिजों का पौधे का सभी भागों में परिवहन करता है |
  4. पत्ती के सतह को वाष्पीकरण द्वारा 10-15 डिग्री तक ठंडा रखता है |
  5. कोशिकाओं को स्पिति रखते हुए पादपों के आकार एवं बनावट को नियंत्रित रखता है |
  6. अत: वाष्पोत्सर्जन , प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रक्रम है |

खनिज पोषक का उदग्रहण एवं संचरण

पौधे , कार्बन व ऑक्सीजन वातावरण में उपलब्ध CO2 से प्राप्त करते है , जबकि हाइड्रोजन व अन्य लवणों को मृदा व जल से प्राप्त करते है |

फ्लोएम परिवहन

उद्गम से कुंड (sink) की ओर प्रवाह पत्तियों में निर्मित कार्बनिक भोज्य पदार्थो का परिवहन फ्लोएम द्वारा होता है | पौधे के वे भाग जो भोजन का संश्लेषण करते है स्त्रोत कहलाते है |

तथा जहाँ भोजन का संचय होता है , कुंड कहलाते है , पौधे में स्त्रोत व कुंड बदलते रहते है | स्त्रोत से कुंड तक इन पदार्थो का स्थानान्तरण फ्लोएम द्वारा होता है , यदि किसी अंग में भोज्य पदार्थ की आवश्यकता होती है | तो फ्लोएम द्वारा कुण्ड से उस अंग तक पहुंचते है अत: फ्लोएम द्वारा परिवहन दिशीय होता है |

दाब प्रवाह या सामूहिक प्रवाह परिकल्पना

इस परिकल्पना का प्रतिपादन 1930 में मुंच ने किया था , इसके अनुसार खाद्धय पदार्थो का स्थानान्तरण सांद्रता प्रवणता के अनुरूप फ्लोएम द्वारा पत्तियों से उपयोग के अंगो तक होता है | प्रकाश संश्लेषण के दौरान पत्तियों में निर्मित पदार्थ शर्करा में बदलता है जिससे विलयन की सांद्रता बढ़ जाती है और परासरण दाब अधिक हो जाता है | पत्तियों की कोशिकाओं से विलयन तने में स्थित फ्लोएम की चालनी नलिकाओं से होकर जडो तक पहुंचता है , जहाँ कुछ खाद्धय पदार्थ श्वसन में व्यय हो जाता है , शेष पादप में संचित हो जाता है |

 

 

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