तीसरी दुनिया किसे कहते हैं | तीसरी दुनिया के देशों की विशेषताओं | तात्पर्य , क्या अभिप्राय है अवधारणा

By   October 2, 2020

third world countries in hindi तीसरी दुनिया किसे कहते हैं | तीसरी दुनिया के देशों की विशेषताओं | तात्पर्य , क्या अभिप्राय है अवधारणा ? third world state definition.

तीसरी दुनिया के राज्यों की विशेषताएं
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
सैद्धांतिक दृष्टिकोण
उदारवादी दृष्टिकोण
माक्सवादी दृष्टिकोण
पराश्रयवादी दृष्टिकोण
राज्य की विशेषताएं
अतिविकसित राज्य
स्वायत्ता
राजधानी का नियंत्रण
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में तीसरी दुनिया के राज्यों की चर्चा की गई है। इस इकाई के अध्ययन के बाद आपः
ऽ तीसरी दुनिया का अभिप्राय समझ सकेंगे,
ऽ तीसरी दुनिया के राज्यों की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कर सकेंगे,
ऽ तीसरी दुनिया के राज्यों की अनिवार्य विशेषताओं की पहचान कर सकेंगे, और
ऽ विश्व राजनीति में तीसरी दुनिया की भूमिका का निर्धारण करने में समर्थ हो सकेंगे।

प्रस्तावना
तीसरी दुनिया जिसका उल्लेख कभी-कभी राजनीतिक सिद्धांत एवं तुलनात्मक राजनीति में उत्तर औपनिवेशिक समाज के रूप में किया गया है। इस संदर्भ में राज्य की प्रकृति के सवाल को लेकर बहस होती रही है तीसरी दुनिया में राज्य की प्रकृति की समझ बहुत जरूरी है क्योंकि तभी हम विश्व राजनीति में तीसरी दुनिया की भूमिका का निर्धारण कर सकेंगे।

तीसरी दुनिया अनेक ष्दशों का समूहश्श् है और इन देशों की कुछ खास सामान्य विशेषताएं हैं। कुछ लेखकों के अनुसार विकसित पूंजीवादी देशों का समूह प्रथम विश्व कहलाता है जबकि समाजवादी देशों का समूह द्वितीय विश्व के रूप में जाना जादा है। अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका के अल्पविकसित देश तीसरी दुनिया के रूप में जाने जाते हैं। मालूम हो, ये देश औपनिवेशिक आधिपत्य के अधीन रहे थे। कुछ लेखक महाशक्तियों को प्रथम विश्व की कोटि में रखते हैं, जबकि यू.के. जर्मनी, आस्ट्रेलिया तथा कनाडा जैसे विकसित देशों को द्वितीय विश्व की कोटि में स्वीकार करते हैं। तीसरी दुनिया की कोटि में एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के अल्पविकसित देश आते हैं।

इन देशों की परिभाषाओं में कुछ बातें सामान्य हैं। दोनों ही वर्गीकरणों में तीसरी दुनिया की विशेषताएं एक जैसी ओर समान हैं। दोनों ही वर्गीकरणों में तीसरी दुनिया को विकसित देशों की तुलना में परिभाषित किया गया है। तीसरी दनिया के देश आर्थिक रूप से निर्धन हैं और उनका एक औपनिवेशिक अतीत रहा है।

तीसरी दुनिया की आम विशेषताओं की पहचान करते समय हमें उनकी भिन्नताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। तीसरी दुनिया के कुछ देश जैसे अरब के देश, काफी समृद्ध हैं तो कुछ जैसे बांग्ला देश, बहुत ही निर्धन हैं। कुछ देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएं मौजूद हैं तो तीसरी दुनिया के कुछ देशों में सैनिक शासन भी है। तीसरी दुनिया के देशों में सामाजिक गठन के आधार पर भिन्नताएं हैं। उनमें से कुछ कबीलाई समाज हैं तो कुछ पूंजीवादी देश हैं।

इन तमाम भिन्नताओं के बावजूद, तीसरी दुनिया कोई निरर्थक कोटि नहीं है क्योंकि इसके जरिये हमें उन देशों को वर्गीकृत करने में सहायता मिलती है जिन्हें अपने अस्तित्व के लिए औपनिवेशिक आधिपत्य के खिलाफ लड़ना पड़ा था। पृष्ठभूमि की समानता के कारण इन सभी देशों को आज भी समान समस्याओं से जुझना पड़ता है और इसलिए तीसरी दुनिया का अध्ययन करते समय हमारे लिए यह उपयोगी होगा कि हम उसकी तमाम समानताओं और असमानताओं का ध्यान रखें। किंतु ऐसा करते समय हमें एक की कीमत पर दूसरे को तरजीह नहीं देनी चाहिए। तीसरी दुनिया के राज्यों में जो आम विशेषताएं देखने को मिलती हैं, वे इस वजह से हैं कि वे किसी न किसी सत्ता के उपनिवेश थे और उपनिवेशवाद के कारण उनके समाजों में बुनियादी बदलाव आए थे। राज्य को समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं।

सैद्धांतिक दृष्टिकोण
तीसरी दुनिया के राज्यों के अध्ययन के लिए कई तरह के सैद्धांतिक दृष्टिकोण उपलब्ध हैं। अधिक उदारवादी और मार्क्सवादी दृष्टिकोण उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय है।

 उदारवादी दृष्टिकोण
उदारवादियों की नजर में राज्य एक तटस्य एजेंसी है जो समाज के संघर्षरत्त समूहों के बीच मध्यस्य की भूमिका निभाता है। दूसरे शब्दों में, कह सकते हैं कि राज्य किसी भी समूह की बपौती नहीं होता है। समाज के विभिन्न समूह राजनीतिक व्यवस्था के समक्ष अपनी मांगें रखते हैं। राज्य सत्ता इन तमाम मांगों पर विचार करती है तथा समाज के व्यापक हित में अपने निर्णय लेती है। उदारवादी खेमे के अंदर ही कुछ लेखकों की सम्मति है कि राज्यसत्ता पर अभिजात वर्गों का वर्चस्व रहता है। अभिजात वर्गों के वर्चस्व के पीछे उनकी कुछ खास वैयक्तिक विशेषताओं का हाथ होता है न कि आर्थिक संसाधनों पर उनके नियंत्रण का। उदारवादी सिद्धांत की मान्यता है कि लोकतंत्र में अभिजात वर्ग सत्ता का इस्तेमाल अपने वैयक्तिक अथवा सामूहिक हित में नहीं करते हैं। चुनावी बाध्यताएं उन्हें मजबूर कर देती हैं कि वे तमाम समूहों के कल्याण के लिए कार्य करें। तीसरी दुनिया का पश्चिमपरस्त अभिजात वर्ग राज्य सत्ता का नियंत्रण करता है। वह राज्य सत्ता का इस्तेमाल कर पारंपरिक कृषक समाज को आधुनिक औद्योगिक समाज में बदलना चाहता है।

उदारवादी दृष्टिकोण की दो कमियां हैं। पहली तो यह कि यह नहीं मानता कि व्यक्तियों की राजनीतिक क्षमता का निर्धारण उनके आर्थिक संसाधनों से होता है। दूसरे यह इस बात की व्याख्या नहीं करता कि अभिजात वर्ग कैसे अपने संकीर्ण आर्थिक व सामाजिक हितों से ऊपर उठकर पूरे समाज के लिए निस्वार्थ कार्य करता है।

दूसरे शब्दों में, समाज के वर्गीय विभाजन की उपेक्षा करके की गयी राज्य की कोई भी व्याख्या सरलीकृत व्याख्या ही होगी। राज्य समाज में समाहित होता है और इसीलिए इसका अध्ययन समाज के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए।

 मार्क्सवादी दृष्टिकोण
मार्क्स और एंजल्स का मानना है कि राज्य न तो निरपेक्ष एजेंसी है और न ही साझा न्यास । इसमें समाज के शक्तिशाली वर्गों के हितों की अभिव्यक्ति होती है और यह उन्हीं के हितों की रक्षा भी करता है। दूसरे शब्दों में इसे यूं कहा जा सकता है। कि यह शक्तिशाली वर्गों के हाथ का हथियार भर है। राज्य सरकार का अनुसरण करता है न कि वह उसके पहले आता है।

इस तरह राज्य की प्रवृत्ति समाज में श्रम विभाजन के चरित्र पर निर्भर करती हैं। दुर्भाग्य से मार्क्स ने राज्य के बारे में विस्तार से चर्चा नहीं की है। उसने केवल छिटपुट टिप्पणियां ही की हैं। अलबत्ता उसके अनुयायियों ने राज्य के बारे में व्यापक ढंग से लिखा है। फिर भी अधिकांश लेखन विकसित पूंजीवादी देशों के बारे में ही है। ये व्याख्याएं तीसरी दुनिया के लिए सटीक नहीं हो सकती क्योंकि तीसरी दुनिया के देश पूंजीवादी देशों से भिन्न हैं। इन देशों का औपनिवेशिक अतीत है। अभी भी राजनीतिक आजादी हासिल करने के बावजूद ये देश पश्चिमी विकसित देशों के आर्थिक शोषण से मुक्त नहीं हो सकते हैं। तीसरी दुनिया के देशों की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन पर किसी एक वर्ग का आधिपत्य न होकर अनेक वर्गों का आधिपत्य है।

उपर्युक्त परिस्थितियों की वजह से तीसरी दुनिया की राज्य सत्ता की प्रकृत्ति विशिष्ट होती है। तीसरी दुनिया का राज्य कई नामों से जाना जाता है। कभी उसे परिधि राज्य कहा जाता है तो कभी उत्तर औपनिवेशिक राज्य तो कभी अतिविकसित राज्य के नाम से पहचानते हैं।

तीसरी दुनिया के देश औपनिवेशिक शोषण के शिकार थे। नतीजतन उनका विकास मार्ग बाधित हुआ तथा असंतुलित विकास का सूत्रपात हुआ। विऔपनिवेशीकरण के बाद भी साम्राज्यवादी ताकतों की पकड़ तीसरी दुनिया पर आज भी बनी हुई है। विकसित पश्चिमी देश व तीसरी दुनिया के संबंधों को लेकर लेखकों के बीच सहमति नहीं है।

पराश्रयवादी दृष्टिकोण
पराश्रयवादी दृष्टिकोण के कुछ प्रणेताओं का मानना है कि तीसरी दुनिया के देश आज भी राजनीतिक स्वतंत्रता से वंचित हैं तथा उन पर साम्राज्यवादी ताकतों की पकड़ आज भी बनी हुई है। इन लेखकों के अनुसार दुनिया एकल पूंजीवादी व्यवस्था में आबद्ध है।

विकसित पश्चिम देश इस विश्व व्यवस्था के केंद्र का निर्माण करते हैं। औपनिवेशिक काल में साम्राज्यवादी देशों ने तीसरी दुनिया को अपनी जरूरतों के अनुरूप ढालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस प्रक्रिया में तीसरी दुनिया की अर्थव्यवस्था संरचनात्मक रूप से विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़ गयी है और यही कारण है कि विकसित देशों पर उसकी निर्भरता आज भी बनी हुई है। विश्व पूंजीवाद से तीसरी दुनिया की हैसियत केंद्र से जुड़े अनुलग्नक जैसी है। केंद्र को महानगरध्राजधानी भी कहते हैं। तीसरी दुनिया विश्व पूंजीवाद की परिधि पर स्थित है। इसे दृष्टिकोण के अनुसार तीसरी दुनिया का राज्य केंद्रध्राजधानी के हाथ का औजार भर है।

यह मानते हुए भी कि अल्पविकसित देशों पर विकसित पूंजीवादी देशों का वर्चस्व कायम है, पराश्रयवादी सिद्धांत के आलोचकों ने उस तर्क को खारिज कर दिया जिसके अंतर्गत कहा गया था कि तीसरी दुनिया के राज्य स्वायत्त नहीं होते। इन लेखकों का मानना है कि राजनीतिक आजादी से तीसरी दुनिया को राज्य का इस्तेमाल कर अपने हितों को संवर्धित करने का मौका मिला है, भले ही यह सब उसे नवऔपनिवेशिक प्रतिबंधों के तहत करना पड़ता है।

इसी प्रकार तीसरी दुनिया के प्रभु वर्गों की प्रवृत्ति के बारे में भी तरह-तरह के विचार व्यक्त किए गए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि तीसरी दुनिया पर देसी पूंजीवादी वर्ग का वर्चस्व कायम है। किंतु प्रमुख विचार यही है कि तीसरी दुनिया में कोई सुगठित प्रभावशाली वर्ग नहीं है। वास्तव में तीसरी दुनिया में विभिन्न वर्गों का शिथिल गठबंधन ही प्रभुत्व की स्थिति में है।

तीसरी दुनिया के राज्य की व्याख्या प्रभावशाली वर्गों के साथ उसके संबंध के संदर्भ में भी की जाती है। तीसरी दुनिया के बारे में लिखने वाले अधिकांश लेखकों का मानना है कि राज्य शासक वर्गों का गुलाम न होकर स्वायत्त है और यह स्वायत्ता सामाजिक संरचना द्वारा सीमांकित की जाती है। तीसरी दुनिया के राज्यों के विशिष्ट चरित्र के पीछे कुछ खास ऐतिहासिक व्यक्तियों की मौजूदगी भी कारण रही है। उपनिवेशों पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने अतिकेंद्रित राज्य तंत्र का निर्माण किया था। इस तरह तीसरी दुनिया में राज्य तंत्र ऊपर से थोपी हुई चीज है न कि आंतरिक सामाजिक गत्यात्मकता से स्वतरू स्फूर्त चीज। और यही कारण है कि तीसरी दुनिया का राज्य अपने समाज से मेल नहीं खाता। यह अपने समाज की तुलना में काफी आगे अथवा अतिविकसित होता है।

तीसरी दुनियां पर विविध दृष्टियों से विचार करने के बाद यह कहा जा सकता है कि तीसरी दुनिया का राज्य अतिविकसित और उत्तर औपनिवेशिक राज्य है तथा यह शासक वर्गों से स्वायत्त है। दूसरे शब्दों में यह तीसरी दुनिया की जटिल सामाजिक बनावट का प्रतिफलन है।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणीः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर मिलाइए।
1. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
क) उदारवादी दृष्टिकोण
ख) मार्क्सवादी दृष्टिकोण
ग) पराश्रयवादी दृष्टिकोण

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) क) उदारवादी लोकतंत्र व कानून के शासन में विश्वास करते हैं। वे इस विचार से सहमत नहीं होते कि व्यक्ति अपने आर्थिक हितों से निर्देशित होता है।
ख) चेतना पदार्थ का ही प्रतिफल होता है, बाह्य जगत की प्रतिध्वनि होती है। राज्य के मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार, राज्य न तो निरपेक्ष होता है न ही समझा न्यास होता है। यह प्रभु के हाथों में औजार भर होता है।
ग) पराश्रयवादी सिद्धांत के अनुसार उत्तर औपनिवेशिक राज्य असल में स्वतंत्र नहीं हुए हैं, वे आज भी पूर्व औपनिवेशिक मालिकों पर आश्रित हैं।

राज्य की विशेषताएं
एक संस्था के रूप में राज्य का अस्तित्व ऐतिहासिक प्रक्रिया की देन है। तीसरी दुनिया के संदर्भ में बात करें तो राज्य सीधे तौर पर विऔपनिवेशीकरण का नतीजा है और इसी से उसका विशिष्ट चरित्र भी निर्धारित होता । है। कुछ मामलों में अगर तत्कालीन औपनिवेशिक सीमाओं में परिवर्तन कर राज्य बनाये गए तो कुछ मामलों में सर्वथा नवीन राज्यों की स्थापना की गयी। राज्य की सीमा सदैव राष्ट्र की सीमा से मेल नहीं खाती थी। अक्सर विभिन्न नृजातीय समूहों व राष्ट्रीयताओं को मिलाकर राज्य का निर्माण कर लिया जाता था। फिर औपनिवेशिक जरूरतों के हिसाब से उपनिवेशों का सीमांकन कर लिया जाता था। राज्य निर्माण में कृत्रिमता की पहचान । अफ्रीकी राज्यों के संदर्भ में आसानी से की जा सकती है। उदाहरण के लिए नाईजीरिया पूरी तरह से ब्रिटिश रचना है। तीसरी दुनिया के राज्य राष्ट्र बनने से पहले ही राज्य बन गये थे। बहुत हद तक यही उनके बीच सीमा विवाद के लिए भी जिम्मेवार है और उनकी राष्ट्रीय अखंडता की समस्या भी इसी वजह से है। उत्तर औपनिवेशिक काल में तीसरी दुनिया के ढेर सारे देशों को जातीय व अलगाववादी आंदोलनों का सामना करना पड़ रहा है। ब्रिटेन की औपनिवेशिक नीतियों तथा राष्ट्रीय आंदोलन की आंतरिक गत्यात्मकता की वजह से पाकिस्तान का निर्माण हुआ था और यही बांग्लादेश के निर्माण के भी कारण बने। तीसरी दुनिया के राज्यों में जो जटिलता दिखलाई पड़ती है वह बहुत हद तक औपनिवेशिक सीमाओं के रेखांकन में कृत्रिमता, औपनिवेशिक विरासत के प्रभाव तथा विऔपनिवेशिकरण प्रक्रिया की गतिशीलता की वजह से है। तीसरी दुनिया के राज्य की विशिष्ट विशेषताएँ निम्नांकित हैंः
1) यह एक अतिविकसित राज्य होता है।
2) यह प्रभु वर्गों से स्वतंत्र होता है।
3) यह महानगरीय पूंजीपति वर्ग के हितों का संरक्षण भी करता है।

अतिविकसित राज्य
पश्चिमी पूंजीवादी देशों में आधुनिक राष्ट्र राज्य का उदय समाज की आंतरिक गत्यात्मकता का प्रतिफल रहा है। यह तब अस्तित्व में आया था जब वहां के समाज का पूंजीवादी व्यवस्था के रूप में ऐतिहासिक संक्रमण हो रहा था। उभरते हुए पूंजीपति वर्ग ने राष्ट्र राज्य की स्थापना की पहल की थी।

तीसरी दुनिया में राजनीतिक संस्थाओं में परिवर्तन बाह्य कारणों का नतीजा था। उपनिवेश काल में तीसरी दुनिया पर पश्चिमी पूंजीवादी देशों का वर्चस्व था। औपनिवेशिक शासकों ने जान बूझकर ऐसी राजनीतिक संस्थाएं स्थापित की थी जिनसे देशी वर्गों पर उनका वर्चस्व भी कायम रह सके तथा उपनिवेशों का शोषण भी किया जा सके।

इन कार्यों को अंजाम देने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने उपनिवेशों में जटिल कानूनी संस्थागत संरचना का निर्माण किया था। उपनिवेशों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए ऐसा करना जरूरी था। औपनिवेशिक शासकों के कार्यों के प्रबंध में सेना और नौकरशाही की प्रमुख भूमिका होती थी, क्योंकि वे ही इन संस्थाओं के असल कार्यकर्ता भी थे।

आजादी के बाद भी उपनिवेशों में यही संरचना कायम रही। तीसरी दुनिया के राज्य की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं हैंः प्रथमतः यह कि इसका निर्माण स्थानीय वर्गों ने नहीं किया है, न ही यह सामाजिक परिवर्तन का नतीजा है, दूसरे राज्य पर देशी शासक वर्गों का कोई नियंत्रण नहीं होता है।

ऐसा राज्य अपने देशकाल की सीमाओं से काफी आगे होता है। यही कारण है कि तीसरी दुनिया में सेना और नौकरशाही को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। पश्चिमी पूंजीवादी देशों में नौकरशाही सहायक भूमिका अदा करती है। वहां यह प्रभुत्वशाली वर्ग के हाथों का औजार है जबकि तीसरी दुनिया में इसे केंद्रीय भूमिका प्राप्त है और यहां यह प्रभावशाली वर्ग के नियंत्रण से मुक्त भी है।

अतिविकसित राज्य लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है। तीसरी दुनिया के उन देशों में भी जहां लोकतांत्रिक संस्थाएं मौजूद हैं तथा वहां चुने हुए प्रतिनिधि राज्यसत्ता का नियंत्रण करते हैं। राज्य सत्ता पर नौकरशाही की पकड़ बनी हुई है। यह अलग बात है कि राज्यसत्ता पर नियंत्रण राजनीतिज्ञों की मिलीभगत से ही होता है।

जिन देशों में लोकतांत्रिक नियंत्रण मौजूद है, वहां राजनीतिज्ञ केंद्रीय भूमिका में हैं। समर्थन हासिल करने की गरज से राजनीतिज्ञ जनता की मांगों को मखर करते हैं। जनमांगों को परा करने के लिए वे नीतियों का निर्माण करते हैं। इस प्रक्रिया में राजनीतिज्ञ नीति संस्थाओं को वैधता प्रदान करते हैं। तथापि, वे नौकरशाही की प्रविधियां व नियंत्रण से इस सत्ता पर अंकुश लगाने का काम करते हैं। राजनीतिज्ञ राज्य व जनता के बीच दलाल बनकर रह जाते हैं।

स्वायता
पश्चिमी देशों में राज्य सत्ता पर एकल प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व रहता है। तमाम पश्चिमी देशों में पूंजीपति वर्ग ही प्रभावशाली वर्ग के रूप में स्थापित है। तीसरी दुनिया के देशों में कई कई प्रभावशाली वर्ग मौजूद हैं। तीसरी दुनिया में स्थानीय जमींदार वर्ग यानी राजधानी से संबद्ध स्थानीय पूंजीपति वर्ग ही राज्यसत्ता पर नियंत्रण करता है। इन तमाम वर्गों का गठबंधन ही राज्य का नियंता होता है। यह गठबंधन ऐतिहासिक खेमे के नाम से जाना जाता है। इस ऐतिहासिक खेमे का उदय इसलिए होता है क्योंकि तीसरी दुनिया के गठन निर्माण की प्रक्रिया में पूंजीवादी व प्राकपूंजीवादी दोनों ही तरह के सामाजिक संबंधों के तत्व शामिल होते हैं। पूंजीपति वर्ग कमजोर होता है और वह समाज के प्राकपूंजीवादी संबंधों के खिलाफ लड़ाई लड़ने में असमर्थ है।

पूंजीपति वर्ग कमजोर होता है क्योंकि आर्थिक गतिविधियों पर उसका नियंत्रण सीमित होता है। आर्थिक उत्पादन के एक बड़े हिस्से का नियंत्रण या तो राजधानी के पूंजीपति कर लेते हैं या फिर स्थानीय भूस्वामी। यहां कोई भी वर्ग राज्यसत्ता पर अकेले नियंत्रण करने में समर्थ नहीं होता।

चूंकि कोई एकल प्रभावशाली वर्ग नहीं होता, इसलिए राज्य ऐतिहासिक खेमे के विभिन्न वर्गों के हिस्सों को संचालित करने के लिए स्वायत होता है। तीसरी दुनिया का राज्य स्थानीय प्रभावशाली तथा राजधानी के पूंजीपति वर्ग के हित में अपने विपुल आर्थिक संसाधनों का दोहन कर पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली स्थापित करता है और इस तरह अपनी स्वायत्तता बनाये रखता है।

राजधानी का नियंत्रण
तीसरी दुनिया का राज्य बाह्य शक्यिों से नियंत्रित होता है। एक तो अर्थव्यवस्था अल्पविकसित प्रकृति की होती है, दूसरे स्थानीय शासक वर्गध्अभिजात वर्ग की प्रकृति ऐसी होती है कि राज्य को सदैव विदेशी सहायता और पूंजी पर निर्भर रहना पड़ता है। राज्य व विदेशी पूंजी के बीच मध्यस्थता करनेवाला शासक वर्ग भारी लाभ कमाता है। एक तरफ शासक और शासित के बीच तो दूसरी तरफ धनी और निर्धन के बीच की खाई बढ़ती जाती है। फिर भी यह कहना गलत होगा कि तीसरी दुनिया का राज्य पूरी तरह से साम्राज्यवादी शासकों के नियंत्रण में होता है।

औपनिवेशिक दासता से उपनिवेशों की मुक्ति के बाद साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग के लिए यह संभव नहीं रह गया कि वे तीसरी दुनिया के राज्य पर सीधा नियंत्रण कायम रख सकें। तो भी तीसरी दुनिया के राज्य पर उसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण तो रहता ही है। अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को मिटा कर तीसरी दुनिया का अतिविकसित राज्य विश्व बाजार को अपने घर में घुसने का मौका प्रदान करता है। प्रौद्योगिकी व पूंजीनिवेश के प्रवेश को छूट देकर राज्य तीसरी दुनिया को बाजार से जोड़ देता है। इस तरह हम देखते हैं कि तीसरी दुनिया का समाप्त गई होती है।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणीः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) स इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तरों की तुलना कीजिए।
1) तीसरी दुनिया की चारित्रिक विशेषताएं क्या हैं ?
2) पूर्व-औपनिवेशिक ताकतों का उपनिवेशों पर आज भी नियंत्रण कायम है। संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 2
1) तीसरी दुनिया के देशों का प्रधान गुण उनका आर्थिक पिछड़ापन है।
2) असमान व्यापारिक शर्तों तथाः सहायता के जरिये भूतपूर्व औपनिवेशिक देश तथा पश्चिम के दूसरे विकसित देश तीसरी दुनिया के देशों पर अपना नियंत्रण बनाये हए हैं।

 सारांश
तीसरी दुनिया के राज्य बहुत हद तक औपनिवेशिक रचनाएं हैं क्योंकि उनकी सीमाएं एवं उनके शासन का स्वरूप औपनिवेशिक नीतियों से गहरे रूप में प्रभावित हैं। उदार लोकतंत्रवादी, मार्क्सवादी और नवमार्क्सवादी दृष्टिकोणों से यह तीसरी दुनिया के राज्य का विश्लेषण किया जा सकता है। तीसरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत है। यह अर्थव्यवस्था मुक्त बाजार के सिद्धांतों पर कार्य करती है और समाज के प्रभावशाली तबकों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है।

यह सही है कि तीसरी दुनिया के प्रभावशाली वर्ग पूर्व औपनिवेशिक ताकतों पर आश्रित होते हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें किसी प्रकार की कोई स्वतंत्रता हासिल ही नहीं है। सच तो यह है कि उन्हें भी खास तरह की स्वतंत्रता हासिल है। वे राज्य व राजधानी के बीच मध्यस्थता का कार्य करते हैं। तीसरी दुनिया के राज्यों को अतिविकसित राज्य या स्वायत्ता प्राप्त राज्य या फिर पराश्रित राज्य सापेक्ष कहा जाता है।

 शब्दावली
पूंजीपति वर्ग ः वह वर्ग जिसका उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व होता है, जो श्रम का शोषण करता है तथा जो श्रम से पैदा हुए अतिरिक्त मूल्य लाभ का अधिग्रहण करता है।
लैटिन अमेरिका ः केंद्र और दक्षिण अमरीका के वे क्षेत्र, जहां की मुख्य भाषा स्पेनिश अथवा पुर्तगाली है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
हम्ला आल्बी तथा
डिमोडोर समीन (संपादित) इंटरोडक्शन टू दि सोसियोलॉजी ऑफ डवेलपिंग सोसायटीज – लांगमैन
हैरी गालबॉन, 1979 पॉलिटिक्स एण्ड दि स्टेट इन दि थर्ड वर्ल्ड, मैकमिलन
जेम्स मेनर, 1981 थर्ड वर्ल्ड पॉलिटिक्स, लांगमैन
पूल एण्ड टाइफ, 1981 थर्ड वर्ल्ड पॉलिटिक्स रू ए काम्परेटिव इंटरोडक्शन, गामोश – मैकमिलन