रंगमंच का अर्थ और परिभाषा क्या है ? भारतीय इतिहास में रंगमंच (रंगशाला) का महत्व theatre importance in hindi

By   June 20, 2021

theatre importance in hindi रंगमंच का अर्थ और परिभाषा क्या है ? भारतीय इतिहास में रंगमंच (रंगशाला) का महत्व ?

आधुनिक रंगशाला का निर्माण
संस्कृत नाटकों ने दसवीं शताब्दी के पश्चात अपनी दिशा खो दी थी। इसने मानव अनुभव के पीछे के सत्य को समझने के लिए प्रतीक और कत्य के माध्यम से कोई भी प्रयास नहीं किया। मध्यकालीन भारतीय साहित्य गौरवमय था, लेकिन यह भक्ति काव्य का एक युग था जो जीवन के पंथनिरपेक्ष निरूपण को मंच पर प्रस्तुत करने के संबंध में कुछ उदासीन था। मनोरंजन के इन रूपों के संबंध में इस्लामी वर्जना भी भारतीय रंगशाला में गिरावट के प्रति उत्तरदायी थी और इसीलिए नाटक गमनामी की स्थिति में पहुंच गया था तथापि लोक नाटक दर्शकों का मनोरंजन करते रहे। आधुनिक या के आगमन और पश्चिमी साहित्य के प्रभाव के परिणामस्वरूप, नाटक ने फिर करवट बदली और साहित्य के एक रूप में इसका विकास हुआ। 1850 के आसपास, पारसी रंगशाला ने भारतीय पौराणिक, इतिहास और दंतकथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन प्रारम्भ किया गया। इन्होंने अपने चल दस्तों के साथ देश के अलग-अलग भागों की यात्रा और अपने दर्शकों पर भारी प्रभाव छोड़ा। आगा हश्र (1880-1931) पारसी रंगशाला के एक महत्त्वपूर्ण नाटकार थे। लेकिन अधिकांश पारसी नाटक वाणिज्यिक और साधारण थे। वास्तव में, आधुनिक भारतीय रंगशाला ने अपने प्रारम्भिक अपरिपक्वता और सतहीपन के विरोध में प्रमुख रूप से प्रतिक्रियास्वरूप विकास किया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र (हिन्दी), गिरीश चन्द्र घोष (बांग्ला). द्विजेन्द्र लाल राय (बांग्ला), दीनबंधु मित्र (बांग्ला, 1829-74), रणछोड़भाई उदयराम (गुजराती.1837-1923), एम एम पिल्लै (तमिल), बलवन्त पांडुरंग किलासकर (मराठी) (1843-25) और रवीन्द्र नाथ टैगोर ने उपनिवेशवाद सामाजिक अन्याय और पश्चिमीकरण का विरोध करने के लिए नाटकों का सजन करने हेत हमारी लोग परम्परा की खोज की। जयशंकर प्रसाद (हिन्दी) और आद्य रगाचाय (कन्नड़) ने ऐतिहासिक और सामाजिक रचना की ताकि आदर्शवाद तथा उन अप्रिय वास्तविकताओं के बीच के संघर्ष को उजागर किया जा सके जिससे वे हुए थे। पी एस मदलियार ने तमिल मंच को और एक नई दिशा प्रदान का लोकन कुल मिला कर स्वतंत्रता से पहले भारतीय साहित्य की स्थिति नाटक की दृष्टि से अच्छी नहीं था। आधुनिक रगशाला का निर्माण 1947 में भारत द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात् ही पूर्ण हुआ।
आधुनिकता की तलाश
भारत के संदर्भ में कला की एक महान कृति वह है जो परम्परा और वास्तविकता दोनों को अभिव्यक्त प्रदान करती हो। इसके परिणामस्वरूप्, भारत के संदभ में आधुनिकता संकल्पना का विकास अलग ही रूप में हुआ। कुछ नए सृजन करने की आवश्यकता थी, यहां तक कि पश्चिमी आधुनिकतावाद की नकल भी उनकी अपनी वास्तविकताओं को समझाने की एक चुनौती के रूप में सामने आई। इस अवधि के लेखकों ने आधुनिकता के बारे में अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए अपने घोषणा-पत्र प्रस्तुत किए। एक नई भाषा का पता उनकी अपनी ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए लगाया गया था। रवीन्द्र नाथ टैगोर के पश्चात् जीवनान्द दास (1899-1954) बांग्ला के सबसे अधिक महत्वपूर्ण कवि में जिन्हें काव्य की पूरी समझ थी। ये चित्रणवादी थे और इन्होंने भाषा का प्रयोग मात्र सम्प्रेषण के लिए नहीं बल्कि वास्तविकता को समझने के लिए भी किया था। बांग्ला के कथा-साहित्य लेखक विभूति भूषण बंद्योपाध्याय (1899-1950) के नाटक ‘पथेर पांचाली‘ (सड़क का आख्यान) पर सत्यजीत रे ने फिल्म का निर्माण किया जिसे अन्तर्राष्ट्रीय अभिनन्दन मिला। इस फिल्म में गांव के उस अनगढ़ और स्नेही जीवन को दिखाया गया है जो अब लुप्त होता जा रहा है। इन्होंने मनुष्य के प्रकति के साथ दैनिक संबंध का अभिनिर्धारण करने की अपनी तलाश में स्वयं को कोई कम आधुनिक सिद्ध नहीं किया। तारा शंकर बंद्योपाध्याय (बांग्ला 1898-1971) अपने उपन्यासों में एक गांव या एक शहर में रहने वाली एक ऐसी पीढी के स्पन्दनगान जीवन को प्रस्तुत करते है जहां समाज स्वयं ही नाटक बन जाता है। क्षेत्रीय जीवन, सामाजिक परिवर्तन और मानव व्यवहार को चित्रित करने में उन्हें अपार सफलता मिली। उमाशंकर जोशी (गुजराती) ने एक नया प्रयोगात्मक काव्य प्रारम्भ किया और आज के आधुनिक विश्व के भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व की बात की अमृता प्रीतम (पंजाबी) में धरती से अपने संपर्क को गंवाए बिना ही एक आलौकिक काव्य की वैभव के बारे में एक अति व्यक्तिगत रचना की है। बी एस मढेकर (मराठी,1909-56) में मनुष्य की सीमाओं और इनसे मिलने वाली अवश्यंभावी निराशा के बारे में बताते हुए प्रतिबिम्बों की सहायता से अपने काव्य में समकालीन वास्तविकता को प्रतिनियुक्ति किया है। प्रसिद्ध आधुनिक कन्नड़ कवि गोपाल कृष्ण अडिग (1918-92) ने अपने स्वयं के मुहावरे गढ़े और रहस्यवादी बन गए। ये अपने समय की व्यथा को भी प्रदर्शित करते हैं। व्यावहारिक रूप से सभी कवि मनुष्य की समाज में और इतिहास के क्षेत्र में असहाय होने की भावना से उत्पन्न मनुष्य की निराशा को प्रतिबिम्बित करते है, भारतीय आधुनिकता की विशेषताएं पश्चिम की सीमाएं, मानदण्डों के विकार और मध्यम-वर्ग के मन में निराशा हैं तथापि मानवता की परम्परा बहुत कुछ जीवित है और बेहतर भविष्य की आशा से इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिमी शब्दावली में आधुनिकतावाद का अर्थ है स्थापित नियमों, परम्पराओं से विचलन लेकिन भारत में यह विद्यमान साहित्यिक प्रतिमानों के विकल्पों की तलाश करना है। इस आधुनिकता के किसी एकल संदर्भ बिन्दु का हम अभिनिर्धारण नहीं कर सकते, इसलिए यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भारतीय आधुनिकता एक पच्चीकारी के समान है।
स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय साहित्यिक परिदृश्य
स्वतंत्रता के पश्चात, पचास के दशक में समाज के विघटन और भारत की विगत विरासत के साथ एक खण्डित संबंध के दबाव के कारण निराशा अधिक स्पष्ट हो गई थी। 1946 में भारत में स्वतंत्र होने से कुछ समय पूर्व और देश के विभाजन के पश्चात इस उप-महाद्वीप की स्मृति का सबसे बुरा. हत्याकाण्ड देखा। उस समय भारत की राष्ट्रीयता शोक की राष्ट्रीयता बन गई थी। उस समय अधिकांश नए लेखकों ने पश्चिमी आधुनिकता के आमूलों पर आधारित एक भयानक कृत्रिम विश्व को चित्रित किया है। प्रयोगवादियों ने आन्तरिक वास्तविकता के संबंध में चिन्ता व्यक्त की है- बुद्धिवाद ने आधुनिकता के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था। भारत जैसी किसी संस्कृति में अतीत यूँही नहीं व्यतीत होता। यह वर्तमान के लिए उदाहरण उपलब्ध कराता रहता है लेकिन आधुनिकता संबंधी प्रयोगों के कारण लय खण्डित हो गई थी। अधिकांश भारतीय कवियों ने विदेशों की ओर देखा और टी.एस. इलियट, मलामें, यीट्स या बौदेलेयर को अपने स्रोत के रूप में स्वीकार किया। ऐसा करते समय इन्होंने टैगोर, भारती, कुमारन् आसन, श्री अरविंद और गांधी को नई दृष्टि से देखा। तब पचास के दशक के इन कवियों और ‘अंधकारमय आधुनिकतावाद‘ के साठ के दशक को भी अपनी पहचान क संकट से गुजरना पड़ा। पहचान का यह विशिष्ट संकट, परम्परागतं भारतीयता और पश्चिमी आधुनिकता के बीच विरोध का उस समय के भारत के प्रमुख भाषाई क्षेत्रों के लेखों में देखा जा सकता है। जो पश्चिमी आधुनिकता पर अडिग रहे उन्हान स्वयं को सामान्य जनसाधारण से और उसकी वास्तविकता से पृथक कर लिया। प्रयोग की संकल्पना कभी-कभी नए मूल्यों की तलाश और मूलभूत संस्कृतियों या मूल्य के स्रोतों की परीक्षा की तलाश करने के रूप में पश्चिमी प्रभाव से स्वतंत्र रूप से विकसित हुई। स.ही. वात्स्यायन अज्ञेय (हिन्दी), नवकान्त बरुआ (असमी) बी.एस. मकर (मराठी), हरभजन सिंह (पंजाबी), शरतचन्द्र मुक्तिबोध (मराठी) और वी के गोकाक (कन्नड़) का एक नए आन्दोलन को समृद्ध बनात हु एक विशिष्ट स्वर तथा दृष्टि के साथ आविर्भाव हुआ। इसके अतिरिक्त, सामाजिक यथार्थवाद के साहित्य की जड़ें अपना मिट्टी में थी और यह समकालिक साहित्य में एक प्रभावी प्रवृत्ति बन गई। यह तीस के दशक और चालीस के दशक के प्रगतिशील साहित्य का निर्वाहक था लेकिन इसका दृष्टिकोण निश्चित रूप से चरम केंद्रित था। मुक्तिबोध (हिन्दी), विष्णु दे (बांग्ला) या तेलुगु नग्न (दिगम्बर) कवियों ने जड़ से उखड़ी पहचान के बढ़ते हुए संकट के विरोध में कवियों के एकाकी संघर्ष को उद्घाटित किया। इन्होंने पीड़ा और संघर्ष के विषय पर राजनीतिक काव्य लिखे। यह एक नए तरह का काव्य था। डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण व आचार्य नरेंद्र देव की समाजवादी विचारधारा से भारतीय साहित्य में नई दृष्टि आयी। वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य, यू.आर. अनंतमूर्ति ने श्रेष्ठ रचनाएं दी। हिन्दी में ‘परिमल‘ साहित्यिक आंदोलन प्रारंभ हुआ। विजयदेव नारायण साही, धर्मवीर भारती, रघुवंश, केशव चंद्र वर्मा, विपिन अग्रवाल, जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी आदि ने साहित्य की धारा बदल दी। साहित्य ने अब पददलितों और शोषितों को अपना लिया था। कन्नड़ विद्रोही एक वर्ण- समाज में हिंसा के रूपों को लेकर चिन्तित थे। धमिल (हिन्दी जैसे व्यक्तियों ने सामाजिक यथाथवा शंखला दिखाई। ओ.एन.वी. कुरुप (मलयालम) ने सामाजिक अन्याय के प्रति अपने कोध की तेजी को अपनी गीतात्मक में शामिल किया। इसके पश्चात सत्तर के दशक का नक्सली आन्दोलन आया और इसके साथ की आधुनिकता के बाद की स्थिति ने भारत के साहित्यिक दृश्य में प्रवेश किया। भारत के संदर्भ में, आधुनिकता के बाद मीडिया-प्रचालित और बाजार-नियंत्रित वास्तविकता की प्रतिक्रिया के रूप में आई थी और यह स्थिति अपने साथ विरोध एवं संघर्ष भी लेकर आई।