सर्वोदय योजना क्या है , The Sarvodaya Plan in hindi , 1950 प्रारंभ किसने किया रूपरेखा कब और किसने तैयार की थी

By   March 21, 2022
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The People’s Plan in hindi , सर्वोदय योजना क्या है 1950 प्रारंभ किसने किया रूपरेखा कब और किसने तैयार की थी ?

जन योजना (The People’s Plan)
1945 में एक और योजना सामने आई जिसका सूत्रण रैडिकल ह्युमनिस्ट नेता एम.एन. राय ने किया जो कि युद्धोत्तर पुनर्निर्माण समिति (इंडियन टेªड यूनियन से सम्बद्ध) के अध्यक्ष थे। यह योजना माक्र्सवादी समाजवाद पर आधारित थी, जिसने लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जरूरत की वकालत की। इस योजना में कृषि एवं उद्योग क्षेत्र दोनों को प्रमुखता दी
गई। अनेक अर्थशास्त्रियों का मत है कि भारतीय योजनाकरण में जो समाजवादी रुझान है, उसके पीछे यही योजना है। 1990 के दशक के यूनाइटेड फ्रंट सरकार तथा 2004 के यूनाइटेड प्रोगेसिव एलाएंस (यूपीए) के न्यूनतम साझा कार्यक्रम की प्रेरणा यही योजना रही, ऐसा माना जाता है। ‘मानवीय चेहरे के साथ आर्थिक सुधार’ का नारा जिसके साथ 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई, उसमें इसी जन-योजना को प्रतिध्वनि थी।
सर्वोदय योजना (The Sarvodaya Plan)
एनसीपी की रिपोर्ट प्रकाशित होने के पश्चात जबकि सरकार पंचवर्षीय योजनाओं को लागू करने की तैयारी कर रही थी, भारत के नियोजित विकास का एक खाका प्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने 1950 में प्रस्तुत किया जिसे ‘सर्वोदय योजना’ के नाम से जाना जाता है। इस योजना की मूल प्रेरणा गाँधीवादी पद्धति का सामुदायिक रचनात्मक कार्य तथा ट्रस्टीशिप था, साथ ही सर्वोदय नेता विनोबा भावे की सर्वोदय का विचार भी इसमें समाविष्ट था। इस योजना में विन्यस्त प्रमुख विचार गाँधीवादी योजना से बहुत मिलते-जुलते थे, जैसे कि कृषि, कृषि आधारित
लघु एवं कुटीर उद्योगों पर बल, आत्मनिर्भरता तथा विदेशी पूँजी तथा तकनीक पर प्रायः नगण्य निर्भरता, भूमि सुधार, आत्मनिर्भर गाँव, तथा योजना को विकेन्द्रीकृत सहभागी प्रकार आदि। इस योजना की कुछ स्वीकार्य विचारों को भारत सरकार द्वारा शुरू की गई पंचवर्षीय योजनाओं में उचित महत्व प्राप्त हुआ।
1960 के दशक की शुरुआत तक जयप्रकाश नारायण भारतीय नियोजन प्रक्रिया के कटु आलोचक बन गए थे, विशेषकर इसकी केन्द्रीकरण की बढ़ती प्रकृति तथा इसमें जन-सहभागिता की अनुपस्थिति को लेकर। वास्तव में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का विचार तत्कालीन स्थापित शक्ति संरचना-विधायकों/सांसदों, नौकरशाहों तथा राज्यस्तरीय राजनीतिक नेताओं को बिल्कुल रास नहीं आता था। इसी कारण जयप्रकाश नारायण कमिटी ;1961द्ध भारतीय योजना पद्धति के विरुद्ध हो गई। कमिटी ने यह बात सामने रखी कि एक बार पंचायती राज को योजना निर्माण एवं योजना कार्यान्वयन की ऐजेंसी के लिए जिम्मेदार मानने के बाद ‘‘विषयवार वैयक्तिक आवंटन को एक मार्गदर्शक के रूप में भी मानने का कोई वैध कारण नहीं रह जाता।’’
कमेटी के विनम्र सुझावों को दरकिनार कर कई केन्द्रीय योजनाएँ, जैसे-लघु कृषक विकास ऐजेंसी (Small farmers Development Agency, SFDA), सूखाग्रस्त क्षेत्र कार्यक्रम (äought from Area Programme, DPAP), जनजातीय विकास कार्यक्रम (Intensive tribal Development Programme, ITDP), सघन कृषि जिला कार्यक्रम (Intensive Agricultural District Programme, IADP), आदि सरकार द्वारा शुरू की गईं और इन्हें पंचायत के विषय-क्षेत्र से एकदम बाहर रखा।
यह तो 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों ;1992द्ध के पश्चात् ही संभव हुआ कि स्थानीय निकायों की भूमिका एवं नियोजित विकास में उनका महत्व स्वीकार किया गया और अंततः जयप्रकाश नारायण के विचारों को ही मानना पड़ा।
कुछ क्षेत्रवार रिपोर्ट (Some Areawise Reports)
1940 के दशक तक भारत में नियोजित विकास की जरुरत को अधिकाधिक मान्यता मिल गई थी। लोकप्रिय जनमत के दबाव में सरकार ने इस दिशा में कुछ नियोजित कार्यवाहियाँ करनी शुरू कीं। 1940 के दशक में हम अनेक
क्षेत्र-विशिष्ट रिपोर्टें प्रकाशित होते देखते हैंः
;पद्ध कृषि ऋण पर गाडगिल रिपोर्ट
;पपद्ध कृषि विकास पर खेरागत रिपोर्ट
;पपपद्ध कृषि मूल्य पर कृष्णाभाचारी रिपोर्ट
;पअद्ध सहकारी समितियों पर सरैया रिपोर्ट
;अद्ध सिंचाई पर अनेक रिपोर्टों की शृंखला (सतह जल, नहर आदि)
इन सब रिपोर्टों को सावधानीपूर्वक एवं पर्याप्त विद्धता एवं दक्षता के साथ तैयार किया गया था, लेकिन सरकार इनके निष्कर्षों को लागू करने के प्रति तनिक भी उत्साहित नहीं दिखी। लेकिन स्वतंत्र भारत में इन रिपोर्टों का बहुत लाभ उठाया गया जबकि नियोजन की शुरुआत इन सभी क्षेत्रों को समावेशित कर दी गई।
इस निष्कर्ष तक पहुँचने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि स्वतंत्रत-पूर्व सेक्रेटरी आॅफ स्टेट, भारत सरकार तथा भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस, प्रमुख उद्योगपतियों एवं अन्य के बीच निम्नलिखित सिद्धांतों के प्रति पर्याप्त महत्वपूर्ण स्तर तक एक सहमति बन गई थीः
i. एक केन्द्रीय योजना निर्माण होना चाहिए जिसमें राज्य एक सक्रिय भूमिका अदा करे जिससे कि सामाजिक, आर्थिक विकास हो तथा जीवन स्तर में एक तीव्र उठान आए;
ii. नियंत्रण एवं लाइसेंसीकरण व्यवस्थित रूप से हो, जिससे कि निवेश को वांछनीय चैनलों में निर्देशित किया जा सके तथा समत्वपूर्ण वितरण सुनिश्चित किया जा सके
iii. जबकि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में संतुलित विकास होना चाहिए, मूलभूत उद्योगों की स्थापना विशेष रूप से जरूरी एवं महत्वपूर्ण है। इसमें राज्य के स्वामित्व वाले एवं राज्य नियंत्रित उद्यमों की एक विशेष भूमिका है। हालाँकि सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों को अलग-अलग क्षेत्रों को आवंटित करने के मुद्दे पर दृष्टिकोणों में अंतर था।
यह भी कम रोचक विषय नहीं है कि उपरोक्त सभी समझौतों और सहमतियों तक स्वतंत्रत-पूर्व के दो दशकों के दौरान एक उद्विकासात्मक प्रक्रिया के अंतर्गत ही पहुँचा जा सका जबकि देश में नियोजित विकास की जरूरत पर लगातार हुई चर्चाओं एवं कार्यवाहियों को अंजाम दिया गया।
‘‘भारत सरकार द्वारा तैयार योजना, बाॅम्बे प्लान एवं अन्य योजनाओं, जिनकी ऊपर चर्चा की गई (एनसीपी तथा सर्वोदय प्लान को छोड़कर) की गंभीर सीमाएँ भी थीं। जब उन्हें तैयार किया गया तब तक यह मालूम हो
चुका था कि सत्ता के हस्तांतरण में अब विलंब नहीं है, लेकिन सरकार के स्वरूप के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, न अनुभव था। योजनाएँ अधिकतर विशेषज्ञों के द्वारा तैयार की गई थीं और इनमें कोई आपसी समन्वय नहीं था। उनके पीछे कोई सामाजिक दर्शन नहीं था। स्वतंत्रत के आने तक, वे अपर्याप्त सिद्ध हुई, हालाँकि नियोजन तथा इसके तरीके पर जो चिंतन-मनन हुआ वह भविष्य के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ।’’
योजना के प्रमुख उद्देश्य (Major Objectives of Planning)
भारत में नियोजन जनाकांक्षाओं तथा भविष्य के सपनों को साकार करने का एक उपकरण था। हम जानते हैं कि भविष्य के भारत की नींव एक दिन में नहीं पड़ी। सपनों का भारत बनाने की प्रक्रिया समूचे स्वतंत्रत आंदोलन काल
के दौरान चलती रही। इन आकांक्षाओं और लक्ष्यों को राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) की रिपोर्टों, संविधान सभा की चर्चाओं, तथा अंततः संविधान में समुचित महत्व व स्थान मिला। स्वतंत्रत आंदोलन के उठान के दौर, साथ
ही सोवियत संघ तथा फ्रांस की नियोजन शैलियों से प्रभाव ग्रहण कर एनपीसी ने भारत में नियोजन के उद्देश्यों की रूपरेखा निर्धारित की। भारत की नियोजन प्रक्रिया में राष्ट्रीय आंदोलन की आकांक्षाओं तथा भावी पीढ़ियों की जरूरतों एवं अपेक्षाओं को शामिल किया गया। हालाँकि ऐसा करना यह भारत में नियोजन के उद्देश्यों पर एक अत्यंत सामान्य टिप्पणी माना जाएगा। हमें इस विषय में चर्चा आगे बढ़ाने के लिए भारत में नियोजन के विशिष्ट एवं वस्तुनिष्ठ लक्ष्यों पर गौर करना होगा। नियोजन के विषय में चली चर्चाएँ
एवं कुछ ऐतिहासिक विमर्श इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैंः
i. सारी परिस्थितियों एवं दशकों में निर्मित सामाजिक दर्शन के आलोक में समीक्षा करते हुए संविधान सभा इस निष्कर्ष पर पहुँची कि इस ‘बढ़ती आकांक्षाओं की क्रांति’ को रचनात्मक दिशा में मोड़ने के लिए भारत को सावधानी से सुनियोजित दीर्घकालीन सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए दृढ़संकल्पित प्रयास करना चाहिए, साथ ही आधुनिक वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय प्रगति का उपयोग कर जीवन स्तर में दु्रत एवं प्रशंसनीय सुधार करना चाहिए और इस प्रक्रिया में अधिकतम सामाजिक न्याय को सुलभ बनाना चाहिए। कुल मिलाकर यह भारत को एक ‘कल्याण राज्य’ (Welfare State) बनाने का आह्नान था। इन महत्वपूर्ण चर्चाओं में न केवल देश में नियोजन की अनिवार्यता पैदा कर दी बल्कि नियोजन के प्रमुख उद्देश्यों को भी रेखांकित कर दिया।
ii. भारत में नियोजन के उद्देश्यों से संबंधित तीन महत्वपूर्ण विशेषताएँ संवैधानिक प्रावधानों में जोड़ी गईः
(a) आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन एक समवर्ती विषय है। ‘केन्द्र’, ‘राज्य’ अथवा ‘समवर्ती’ सूची तथा इनके लिए विषयों का निर्धारण करते हुए संविधान केन्द्र को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह महत्वपूर्ण क्षेत्र की गतिविधियों में समन्वित विकास सुनिश्चित करे तथा राज्य को उनके लिए निर्धारित विषयों में पहल तथा प्राधिकार संरक्षित करने के उपाय करे।
(b) संविधान में केन्द्र तथा राज्यों तथा राज्यों के समूहों के बीच स्वैच्छिक आधार पर सहयोग बढ़ाने, साझे हितों के विषयों पर विधायी प्रक्रियाओं एवं प्रशासन में अनुसंधान करने और इस प्रकार संघीय संविधान (अनुच्छेद 249, 252, 257, 258, 258-ए तथा 312) में अन्तर्निहित कठोरताओं की उपेक्षा के
प्रावधान मौजूद हैं।
c. संविधान कल्याण राज्य के स्वरूप के अलावा उन मौलिक सिद्धांतों के स्वरूप को भी रेखांकित करता है जिन पर वह आधारित होना चाहिए।
ये नियोजन तथा उसके उद्देश्यों की प्रमुख आधारशिलाएँ हैं जो संविधान में सन्निहित हैं और यह आने वाले दशकों में केन्द्र-राज्यों के बीच रस्साकशी का कारण बनेगा और सरकार को ‘मानवीय चेहरा के साथ सुधार’ का जुमला अपनाने को बाध्य करेगा। हम देखते हैं कि किस प्रकार 1990 के दशकों में आर्थिक सुधारों के युग में नियोजन ने उल्टी दिशा पकड़ी।
iii. सरकार ने संविधान के सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों के संवैधानिक प्रावधानों का संदर्भ लेते हुए मार्च 1950 में योजना आयोग के गठन की घोषणा एवं संकल्प के द्वारा व्यक्त की। मौलिक अधिकार तथा नीति-निदेशक सिद्धंात प्रत्येक नागरिक के लिए आय के अलावा आजीविका का पर्याप्त साधन, रोजगार के लिए अवसर तथा न्याय एवं समता पर आधारित एक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं। इस प्रकार, नियोजन के मूलभूत उद्देश्य भारत के संविधान के प्रावधानों में ही उल्लिखित है। इनका उल्लेख पहली पंचवर्षीय योजना (1951-56) में इन शब्दों में किया गयाः
‘‘वर्तमान परिस्थितियों में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की जरूरत निर्धनता तथा आय, धन तथा अवसर में असमानता की यथार्थ परिस्थितियों से बनती है। स्पष्ट है कि निर्धनता को केवल धन के पुनर्वितरण से समाप्त नहीं किया जा सकता। न ही उत्पादन बढ़ाने को लक्षित कोई एक कार्यक्रम वर्तमान असमानताओं को दूर कर सकता है। इन दोनों पर एक साथ विचार करना होगा।’’
iv. नियोजन के उपरोक्त उद्देश्य किसी-न-किसी रूप में आने वाले समय में भी प्रमुखता पाते रहे। जैसा कि दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) कहती हैः
‘‘इस योजना को प्रथम योजना अवधि में शुरू की गई प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। इसके द्वारा उत्पादन, विनिवेश तथा रोजगार में व्यापक वृद्धि प्रदान करनी है। साथ ही साथ अर्थव्यवस्था को उसके आर्थिक ही नहीं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति की दृष्टि से भी गतिशीलता प्रदान करने के लिए जरूरी संस्थागत परिवर्तनों की गति को तेज करना होगा।’’
v. यही उद्देश्य छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) में भी निम्न शब्दों में दोहराए गएः
‘‘भारत में आर्थिक नियोजन का मूलभूत कार्य अर्थव्यवस्था में ढाँचागत परिवर्तन लाना है जिससे उच्च एवं स्थिर वृद्धि दर हासिल की जा सके, लोगों के जीवन-स्तर में उत्तरोत्तर सुधार हो और गरीबी तथा बेकारी उन्मूलन हो और अंततः एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का मौलिक आधार बने।’’
vi. यह जानना बहुत जरूरी होगा कि 1991-92 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के समय नियोजन के उद्देश्य क्या रखे गए थे, क्योंकि इस नई आर्थिक नीति ने विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के समक्ष देश में नियोजन के उद्देश्यों को लेकर प्रश्नजनक चीजों के बारे में निष्कर्ष निकालने पर विवश कर दियाः
a. वेतन से हटाकर स्वरोजगार पर निर्भरता की जरूरत
b. सरकार पीछे हट रही है और अर्थव्यवस्था निजी-समर्थक होती जा रही है तथा क्षेत्रवार विचार करें तो परियोजना के सामाजिक उद्देश्य गौण होते जाएँगे।
c. अब तक रेखांकित किए गए नियोजन के उद्देश्य धुँधले बना दिए गए हैं।
;d. विदेशी निवेश को बढ़ावा से अर्थव्यवस्था नव-उपनिवेशवाद के चंगुल में फँस जाएगी, आदि।
लेकिन उपरोक्त सभी शंकाएँ आने वाली योजनाओं में स्पष्ट शब्दों में निर्मूल सिद्ध हुईं। परवर्ती योजनाओं से हम इस प्रकार उद्धृत कर सकते हैंः
ऽ ‘‘भविष्य मंे आथिर्क विकास के लिए, अर्थव्यवस्था निजी सहभागिता पर अधिक निर्भर रहेगी तथा हालाँकि मोटे उद्देश्य वही रहेंगे, लेकिन नियोजन की प्रकृति अधिक प्रतीकात्मक हो जाएगी।’’ यह घोषणा आर्थिक सुधारों को लागू करते समय (23 जुलाई, 1991) में की गई थी, तभी आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) की शुरुआत भी हुई थी। ‘‘नियोजन के मूल उद्देश्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया जबकि नीतियों के उपकरणों में परिवर्तन किया गया।’’-यह घोषणा आर्थिक सुधारों को लागू करते समय सरकार ने की (1991)।
ऽ 9वीं येाजना (1997-2002) की शुरुआत करते यह घोषणा की गई-‘‘पंडितजी द्वारा स्थापित भारत में नियोजन के उद्देश्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। 9वीं योजना में किसी नयी खोज में प्रवृत होने की मंशा नहीं है। लेकिन यह योजना जिन लक्ष्यों व उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहती है वे पिछले अनुभवों की सीख पर आधारित है जिनमें आठवीं योजना भी शामिल है। ये आज की समस्याओं तथा चुनौतियों को संबोधित हैं तथा कल के लिए देश को तैयार करने की कोशिश भी करते हैं।’’
अंत में नियोजन प्रक्रिया तथा भारत में नियोजन के छह प्रमुख उद्देश्यों पर एक व्यापक सहमति बनती दिखती है। ये छह उद्देश्य निम्नलिखित हैंः
i.आर्थिक वृद्धिः भारत मंे नियोजन के सर्वोच्च लक्ष्यों में शामिल रहा है-अर्थव्यवस्था में उत्पादन स्तर में स्थिर वृद्धि, जो आज के लिए भी सच है और भविष्य के लिए भी, बिना किसी संदेह के।
ii. गरीबी उन्मूलनः गरीबी उन्मूलन वह सर्वप्रमुख विषय था जिसने एनसीपी सदस्यों के साथ ही संविधान सभा में भी सदस्यों का धु्रवीकरण कर दिया, इस हद तक कि नियोजित अर्थव्यवस्था के पक्ष में आजादी के पहले ही निर्णय ले लिया गया। गरीबी उन्मूलन को लक्षित अनेक कार्यक्रम देश में सभी सरकारों द्वारा चलाए गए और यह आज भी जारी है कहीं अधिक गंभीरता के साथ (जैसे-एन.आर.जी.ई.पी.-जिसे यूपीए सरकार ने 2006 में शुरू किया वह भी एक अधिनियम बनाकर; यह विषय ने उच्च राजनीतिक स्तर पर ध्यान खींचा)।
iii. रोजगार सृजनः गरीबों को रोजगार प्रदान करना गरीबी उन्मूलन के लिए अर्थशास्त्र का सर्वोत्तम औजार रहा है। इस प्रकार भारत में नियोजन का यह स्वाभाविक उद्देश्य बन जाता है जब इसे गरीबी उन्मूलन के लिए अपनाया जाता है। भारत में रोजगार सृजन इसीलिए गरीबी उन्मूलन के उद्देश्य का हिस्सा रहा है। कई सामान्य कार्यक्रम एवं योजनाएँ इस दिशा में समय-समय पर सरकार द्वारा शुरू की जाती रही हैं, उनमें वेतन रोजगार पर आधारित कुछ कार्यक्रम अभी भी अस्तित्व में हैं, अन्य स्वरोजगार पर आधारित कार्यक्रम हैं।
iv. आर्थिक असमानता पर नियंत्रणः भारत मंे अंतर-वैयक्तिक ;प्दजमत.चमतेवदंसद्ध तथा अंतःवैयक्तिक ;प्दजतं.चमतेवदंसद्ध स्तर पर आर्थिक गैर-बराबरी स्पष्ट रूप से द्रष्टव्य थी। सभी प्रकार की आर्थिक असमानताओं को रोकने के लिए आर्थिक नियोजन भारत में नियोजन की शुरुआत तक एक औजार के रूप में स्वीकार्य हो चुका था। नियोजन के इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न सरकारों ने तरह-तरह की नवाचारी नीतियों को लागू किया, यहाँ तक कि कभी-कभी संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से भी इनके टकराव की स्थिति बनी।
हालाँकि भारतीय नियोजन को कुछ सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य पूरे करने हैं, मात्रा आर्थिक नियोजन को ही नियोजन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया (तकनीकी रूप से) और सामाजिक नियोजन (सामाजिक अभियंत्राण कहना बेहतर होगा) राजनीतिक प्रक्रिया के ऊपर छोड़ दिया गया। यही कारण है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रीमियर शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण, भूमि सुधार, अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन आदि विषय योजना आयोग के दायरे में नहीं आते।
v. आत्मनिर्भरताः 1930 तथा 1940 के दशकों के दौरान राष्ट्रवादियों, पूँजीपतियों एवं एनसीपी की यह अभिलाषा थी कि आर्थिक गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरबने। आत्मनिर्भरता को विश्व अर्थव्यवस्था में एक अधीनस्थ स्थिति को दूर करने के लिए भी इसकी जरूरत अनुभव की गई। जैसा कि जवाहरलाल नेहरू ने विचार व्यक्त किया था-आत्मनिर्भरता का अर्थ ‘‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को छोड़ देना नहीं है, उसे बढ़ावा देना चाहिए लेकिन इस दृष्टिकोण से कि आर्थिक साम्राज्यवाद का निषेध किया जाए।’’ भारत अभी भी अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर विश्व व्यापार संगठन के पश्चात के भूमंडलीकृत दुनिया में उच्चतर परस्पर निर्भरता की वास्तविकताओं से भी जूझ रहा है।
vi. आधुनिकीकरण ;डवकमतदपेंजपवदद्धरू पारम्परिक अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण को नियोजन का सर्वोच्च उद्देश्य माना गया था। विशेषकर कृषि क्षेत्र को तत्काल खेती एवं दुग्ध उत्पादन आदि में आधुनिक पद्धतियों एवं तकनीक के समावेश की जरूरत थी। उसी प्रकार शिक्षा में भी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को अपनाए जाने की जरुरत है।
भारत ने आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व को स्वीकार किया। चूँकि अर्थव्यवस्था के प्रमुख चालक शक्ति ;च्डथ्द्ध के रूप में उद्योग को अपनाया गया था, इसलिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बदलते आयामों को अपनाना आवश्यक था।
भारत में नियोजन के प्रमुख उद्देश्य न केवल व्यापक हैं बल्कि खुले हुए भी हैं। यही कारण है कि समय बीतने के साथ-साथ इन उद्देश्यों में परिवर्तन की जरूरत कभी नहीं पड़ी। इसका अर्थ यह कि एक योजना के सम्पन्न होते ही दूसरी योजना के उद्देश्य स्वतः निर्धारित हो जाते हैं। जहाँ तक उद्देश्यों की बनावट का प्रश्न है, हम विश्वासपूर्वक इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि संविधान की प्रस्तावना, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, मौलिक अधिकारों एवं मौलिक कर्तव्यों में व्यक्त समस्त आकांक्षाएँ इसमें समाहित हैं। सभी राष्ट्रवादियों एवं स्वतंत्रत सेनानियों की अभिलाषाएँ हमारी भारतीय नियोजन व्यवस्था की आत्मा में गूँज रही हैं।
आर्थिक नियोजन के उपरोक्त उद्देश्य योजना आयोग के साथ ही निरस्त हो चुके हैं। योजना आयोग की जगह नीति आयोग की स्थापना की गई है तथा साथ-साथ नियोजन के उद्देश्यों को संघीय समावेशी एवं साकल्यवादी/संपूर्ण ;ीवसपेजपबद्ध बनाने की घोषणा की गयी है (इसकी चर्चा इसी अध्याय में ‘नीति आयोग’ उप-खण्ड में की गयी है)।