गांधीवादी विकास योजना से आप क्या समझते हैं Gandhian Plan in hindi , कब की शुरुआत किसने की थी

By   March 21, 2022
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कब की शुरुआत किसने की थी गांधीवादी विकास योजना से आप क्या समझते हैं Gandhian Plan in hindi अर्थव्यवस्था में उत्पादन का स्वरूप किसके द्वारा निर्धारित होता है ?

गाँधीवादी योजना (Gandhian Plan)
गाँधीवादी आर्थिक चिंतन की मूल भावना का समावेश करते हुए श्रीमान् नारायण अग्रवाल ने 1944 मंे इस योजना का सूत्रण किया। इस योजना में कृषि पर अधिक जोर दिया गया था। यहाँ तक कि अगर उन्होंने औद्योगीकरण का भी पक्ष लिया हो कुटीर एवं ग्रामोद्योग के स्तर तक ही, न
कि एनपीसी तथा बाॅम्बे प्लान की तरह बड़े एवं भारी उद्योगों का समर्थन किया। इस योजना ने भारत के लिए एक ‘विकेन्द्रित आर्थिक संरचना’ की रूपरेखा प्रस्तुत की जिसमें ‘आत्मनिर्भर गाँवों’ की व्यवस्था होगी।
यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि गाँधीवादी एनसीपी अथवा बाॅम्बे प्लान के केन्द्रीकृत नियोजन, राज्य की अर्थव्यवस्था में प्रभावी भूमिका तथा औद्योगीकरण पर बल देने जैसे विचारों से सहमत नहीं थे। गाँधीजी के
लिए मशीनें, वाणिज्यीकरण तथा केन्द्रीकृत राज्य शक्ति आधुनिक सभ्यता के अभिशाप की तरह थे जिन्हें यूरोपीय उपनिवेशवाद ने भारतीय लोगों पर थोपा था। गाँधीजी के अनुसार उद्योगवाद, न कि उद्योग लगाने की अक्षमता, भारत की गरीबी का मूल कारण था। बाद में 1940 के दशक में काँग्रेस ने इसी आधार पर उपनिवेशी शासन के विरुद्ध बड़ा जनांदोलन खड़ा किया। लेकिन एनसीपी में काँग्रेस ने इन मुद्दों पर अलग राय कायम की और एक तरह से गाँधीजी के मत को छोड़ दिया। एनपीसी के पहले ही सत्र में 15 सदस्यीय एनपीसी के एकमात्र गाँधीवादी सदस्य जेसी. कुमारप्पा ने यह कहकर गतिरोध पैदा कर दिया कि एनसीपी को औद्योगीकरण की योजना पर विचार करने का क्या अधिकार है। उन्होंने कहा कि काँग्रेस की प्राथमिकता है आधुनिक उद्योगवाद को सीमित करना, उसे समाप्त करना।
बाद में नेहरू जी ने हस्तक्षेप कर घोषणा की कि एनपीसी ज्यादातर सदस्य यह अनुभव करते हैं कि बड़े उद्योगों को उस सीमा तक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जहाँ तक कि वे कुटीर उद्योगों के लिए संकट न पैदा कर दें। यह एक लम्बा वैचारिक गतिरोध चला जिसने इस योजना के माध्यम से नियोजन अथवा योजना के बारे में गाँधीवादी मत को रखने की अनिवार्यता पैदा की।

’ योजना आयोग, ‘एन ओवरव्यू आॅपफ प्लैनिंग इन इंडिया’, भारत सरकार, नई दिल्ली, 2013
भारत में नियोजन

परिचय (Introduction)
सोवियत संघ ने पहली बार राष्ट्रीय नियोजन का विचार सामने रखा और इसे अपनाया। काफी समय तक लम्बी चर्चा एवं विमर्श के पश्चात् पहली सोवियत योजना (नियोजन) 1928 में पाँच वर्षों की अवधि के लिए शुरू की गई। हालाँकि सोवियत संघ के बाहर दुनिया को 1930 तक विकास योजना के तौर-तरीकों के बारे में मालूम नहीं था। 1920 तथा 1930 के दशक में पूर्वी यूरोपीय देशों के अर्थशास्त्रियों के ब्रिटेन तथा अमेरिका में पलायन के पश्चात दुनिया को आर्थिक/राष्ट्रीय नियोजन के बारे में जानकारी मिल सकी। तब तो पूरा औपनिवेशिक विश्व तथा तत्कालीन लोकतांत्रिक देश आर्थिक प्रगति में नियोजन को औजार के रूप में प्रयुक्त करने के विचार से अत्यन्त प्रभावित हुए। पूर्व के ब्रिटिश उपनिवेशों के समाजवादी रुझान वाले राष्ट्रीय नेता आर्थिक नियोजन के विचार से कहीं अधिक प्रभावित हुए। 1930 का लगभग पूरा दशक इस बात का साक्षी रहा जबकि राष्ट्रवादी, पूँजीवादी, समाजवादी, लोकतंत्रवादी तथा अकादमिक समुदाय के लोग भारत में किसी न किसी समय आर्थिक नियोजन की जरूरत की वकालत करते नजर आए।
इस प्रकार स्वतंत्र भारत एक नियोजित अर्थव्यवस्था वाला देश होगा यह निश्चित हो गया। भारत का आर्थिक इतिहास वास्तव में नियोजन का इतिहास है। तब भी जबकि 1991-92 में तथाकथित आर्थिक सुधारों की शुरुआत की गई। सुधारों की रूपरेखा के बारे में अपने सुझावों को योजना
आयोग ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया। एक बार जब सुधारों की शुरुआत हो गई तब उस समय के चिंतन समूह (ज्ीपदा जंदा) ने आगे की योजनाओं की दिशा क्या होगी इसका निरूपण शुरू कर दिया। भारत में नियोजन का इतिहास अपने आप में एक शैक्षिक भ्रमण की तरह है क्योंकि यद्यपि योजना आयोग एक राजनीतिक निकाय है। इसने बार-बार अच्छे अर्थशास्त्र की ओर इंगित करने में कभी संकोच नहीं किया। इस प्रकार भारत में नियोजन प्रक्रिया पर हम निम्न प्रकार से दृष्टिपात कर सकते हैंः
पृष्ठभूमि (Background)
1930 के दशक तक नियोजन का विचार भारत में बौद्धिक तथा राजनीतिक चर्चाओं में स्थान बना चुका था। भारत में नियोजन की अनिवार्यता दर्शाते अनेक प्रस्ताव सामने लाए गए लेकिन ब्रिटिश सरकार पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन इन प्रस्तावों की उपयोगिता स्वतंत्र भारत में तब सार्थक हुई जब कि भारत में नियोजित अर्थव्यवस्था का रास्ता अपनाया गया। इन प्रस्तावों में से निम्नलिखित उल्लेखनीय हैंः
विश्वेश्वरैया योजना ;(Vishvesvaraya Plan)
भारतीय नियोजन की पहली रूपरेखा को प्रस्तुत करने का श्रेय लोकप्रिय अभियंता तथा मैसूर राज के पूर्व दीवान एम. विश्वेश्वरैया को जाता है जो उनकी पुस्तक ‘दि प्लांड इकॅनोमी आॅफ इंडिया, (1934 में प्रकाशित) में उल्लिखित है। राज्य नियोजन का उनका विचार वास्तव में लोकतांत्रिक पूँजीवाद (अमेरिका की तरह का) में व्यवहारिक व उपयोगी थे जिसमें औद्योगीकीकरण पर बल था-कृषि क्षेत्र से श्रम का उद्योगों की ओर संक्रमण, जिसके माध्यम से एक दशक में राष्ट्रीय आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया था। हालाँकि इस योजना पर ब्रिटिश सरकार द्वारा कोई अनुवर्ती
कार्यवाही नहीं की गई, इससे देश के शिक्षित वर्ग में राष्ट्रीय नियोजन के प्रति आकर्षण बढ़ा।
पिक्की का प्रस्ताव ;(The FICCi~ Proposal)
1934 में पिक्की (Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry, FICCI) द्वारा भारत में राष्ट्रीय नियोजन की गंभीर जरूरत बताई गई। पिक्की भारतीय उद्योगपतियों का सर्वप्रमुख संगठन था। इसके अध्यक्ष एन.आर. सरकार ने अहस्तक्षेप को बीते युग का सिद्धांत घोषित कर दिया और कहा कि भारत जैसे पिछड़े देश में आर्थिक विकास के लिए एक व्यापक योजना बनाई जानी चाहिए जिसमें समस्त आर्थिक गतिविधियों का समावेश हो। पूँजीपति वर्ग की राय जाहिर करते हुए उन्होंने एक उच्च शक्ति प्रवाह राष्ट्रीय योजना आयोग ;छंजपवदंस च्संददपदह ब्वउउपेेपवदद्ध की जरूरत बताई जो नियोजन की संपूर्ण प्रक्रिया का समन्वय करे जिससे कि देश का अतीत के साथ संरचनात्मक विच्छेद हो और वह अपनी उन्नति की संपूर्ण क्षमता का उपयोग कर सके।
19वीं सदी के अंत तक, राष्ट्रवादियों (जैसे एम.जीरानाडे तथा दादाभाई नौरोजी) का आर्थिक चिंतन अर्थव्यवस्था में राज्य की प्रभावी भूमिका के पक्ष में था और ‘बाजार की प्रक्रियाओं’ ;उंतामज उमबींदपेउद्ध की सफलता को लेकर संदेह व्यक्त किया जा रहा था। इस दृष्टि को एक ओर कीन्स के अर्थशास्त्रीय सिद्धांत से बल मिला जो कि अमेरिका में महामंदी के दौरान सामने आया-‘दि न्यू डील’ के रूप में, जबकि दूसरी ओर राष्ट्रीय नियोजन में सोवियत प्रयोगों से। इस प्रकार भारत का पूँजीपति वर्ग भी इन घटनाओं से गहरे प्रभावित हो रहा था और पिक्की के नियोजन संबंधी विचारों में इसकी अभिव्यक्ति भी हुई।
काँग्रेस योजना (The Congress Plan)
हालाँकि महात्मा गाँधी सहित अनेक गाँधीवादी तथा कुछ व्यवसायी एवं सम्पत्तिवान काँग्रेसी केन्द्रीकृत राज्य नियोजन के प्रति पार्टी की किसी प्रतिबद्धता के पक्ष में नहीं थे, काँग्रेस अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस की पहल पर 1938 में राष्ट्रीय योजना समिति ;National Planning Committee,
छच्ब्द्ध का गठन किया गया और जवाहरलाल नेहरू इस समिति के अध्यक्ष बनाए गए। इस समिति को जिम्मेवारी दी गई कि अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों के विकास की ठोस नीति एवं कार्यक्रम तैयार किए जाएँ। मूलतः
एन.पी.सी. का गठन काँग्रेसशासित प्रांतों के उद्योग मंत्रियों के सम्मेलन के दौरान हुआ था। इसमें अन्य प्रांतों को भी आमंत्रित किया गया था। इस सम्मेलन में एम. विश्ववेश्वरैया, जे.आर.डी., जी.डी. बिड़ला तथा लाला श्रीराम सहित अनेक अकादमिक एवं तकनीक क्षेत्र के विशेषज्ञों सहित प्रांतीय नौकरशाह, श्रमसंघ नेता, समाजवादी तथा साम्यवादी आदि भी आमंत्रित थे। 15 सदस्यीय एनपीसी के 29 उप-समितियाँ तथा कुल 350 सदस्य थे, इन सबने मिलकर 29 खंडों में अपनी अनुशंसाएँ प्रस्तुत कीं। समिति के कार्य में उस समय व्यवधान हुआ जबकि द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया, साथ ही भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इसके अध्यक्ष सहित कई सदस्य गिरफ्रतार हो गए। इस कारण 1940 से 1945 के दौरान नाममात्र को यह समिति अस्तित्व में रह गई। हालाँकि 1949 में समिति की अंतिम रिपोर्ट प्रकाशित हुई, नियोजन संबंधी प्रगति 1946 तक अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई।
‘‘अनेक मूल्यवान रिपोर्टों की एक कड़ी प्रकाश में आई जिससे एनपीसी तथा इसकी उप-समितियों के रचनात्मक चिंतन की झलक मिलती है, साथ ही इस विषय पर कार्य करने के दौरान उनके द्वारा संगृहीत दस्तावेज एवं सामग्री भी सामने आई। समिति का महत्व इन रिपोर्टों में उतना नहीं है जितना कि इस बात में कि इसने देश भर में इस विषय में रुचि जागृत कर दी कि समन्वित नियोजन ही लोगों के जीवन स्तर में सुधार का एकमात्र माध्यम है, और इसी के जरिए सामाजिक तथा आर्थिक ढाँचे में मौलिक परिवर्तन लाया जा सकता है।’’
एनपीसी के गठन के बाद कुछ महत्वपूर्ण प्रगति इस दिशा में हुई जिसने स्वतंत्र भारत में समन्वित नियोजन की नींव रखी। इसे इस प्रकार देखा जा सकता हैः
i. युद्धोत्तर पुनर्निर्माण समिति (;Post War Reconstraction Committee): जून, 1941 में भारत सरकार ने लोगों की माँग पर एक ‘युद्धोत्तर पुनर्निर्माण समिति’ का गठन किया जिसे अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन की विभिन्न योजनाओं पर विचार करना था।
ii. अर्थशास्त्रियों की परामर्शदात्री समिति (;Consultative Committee of Economists): रामास्वामी मुदालियार की अध्यक्षता में 1941 में अर्थशास्त्रियों की एक परामर्शदात्री समिति का गठन हुआ जिससे कि अपेक्षा की गई कि वह चार युद्धोत्तर पुनर्निर्माण समितियों को देश के लिए राष्ट्रीय योजना को कार्यान्वित करने के लिए अपने सुझाव देगी।
हालाँकि समिति ने अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अनेक योजनाएँ सुझाई लेकिन उनका व्यावहारिक महत्व नगण्य था और उनमें अकादमिक पूर्वाग्रह भरे पड़े थे।
iii. योजना एवं विकास विभाग (;Planning and Development Department): सभी संभावित विलंब के पश्चात् 1944 में सरकार ने योजना एवं विकास विभाग का गठन वायसराय कार्यकारिणी परिषद के एक सदस्य की अगुआई में किया जिससे कि देश में योजना कार्यों का संगठन एवं समन्वयन किया जा सके। आर्देशिर दलाल (बाॅम्बे प्लान के नियंत्रक) इसके कार्यकारी सदस्य नियुक्त किए गए। विशेषज्ञों के 20 पैनल गठित किए गए। केन्द्रीय विभागों तथा प्रांतों एवं भारतीय राजशास्त्रियों को औद्योगिकीकरण के लिए विस्तृत योजनाएँ
iv. सलाहकार योजना बोर्ड ;Advisory Planning Board) : अक्टूबर, 1946 में भारत सरकार ने एक कमिटी की नियुक्ति की-सलाहकार योजना बोर्ड जिसे ब्रिटिश सरकार द्वारा अब तक बनाई गई योजनाओं, राष्ट्रीय योजना समिति के कार्यों तथा अन्यान्य योजना प्रस्तावों की समीक्षा का दायित्व सौंपा गया। इसके साथ ही बोर्ड को नियोजन के भावी तंत्र तथा उद्देश्यों एवं प्राथमिकताओं के संबंध में अपनी अनुशंसाएँ भी देनी थीं। बोर्ड ने एक एकल चुस्त अधिकार सम्पन्न संगठन ….. जो कि सीधे मंत्रिमंडल के प्रति उत्तरदायी हो जो लगतार ‘‘नियोजन के सभी पहलुओं एवं प्रक्रियाओं पर नजर रखे’’ यह वास्तव में एक राष्ट्रीय योजना आयोग के गठन की स्पष्ट सलाह थी जैसी कि फिक्की ने 1934 में की थी, जिसे विकास नियोजन के क्षेत्र में स्वायत्तता तथा सर्वाधिकार हासिल होगा, जो कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल के साथ मिलकर कार्य करेगा तथा प्रांतों के विकासात्मक निर्णयों को भी प्रभावित कर सकेगा। यह आखिरकार होकर रहा जबकि 1950 में योजना आयोग का गठन किया गया।
बोर्ड ने 1947 की अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से विचार व्यक्त किया कि ‘‘बड़े उद्योगों का समुचित विकास तभी संभव है जबकि राजनीतिक इकाइयाँ चाहे वह केन्द्र हो या राज्य, एक साझे योजना के अनुरूप कार्य करने पर सहमत हो।’’ इस सुझाव का स्वतंत्र भारत में नियोजन प्रक्रिया पर व्यापक प्रभाव हुआ, जैसा कि बोर्ड विकास नियोजन की एक एकब(ता की प्रकृति प्रदान करने की हमेशा कोशिश करता रहा। लेकिन इस प्रक्रिया के अंतर्गत भारतीय नियोजन के केन्द्रीकृत होने की प्रवृत्ति भी विद्यमान थी, जिसके विरोध में अनेक राज्य आपत्तियाँ उठा सकते थे और इसका परिणाम केन्द्र-राज्य संबंधों में गिरावट के रूप में सामने आता। हालाँकि 1920 से ही राजनीतिक नेतृत्व देश में विकेन्द्रित नियोजन की जरूरत के प्रति सचेत रहा था।
बाॅम्बे प्लान (The Bombay Plan)
‘भारत के आर्थिक विकास की योजना’ ;(A Plan of Economic Development of India) का ही लोकप्रिय नामकरण बाॅम्बे प्लान हो गया, जिसे भारत के प्रमुख पूँजीपतियों के एक वर्ग ने तैयार किया था। इसमें आठ पूँजीपति शामिल थे-पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास, जे.आर.डी. टाटा, जी.डी. बिड़ला, लाला श्रीराम, कस्तूर भाई लालभाई, ए.डी. श्रौफ, अवरेशिर दलाल तथा जाॅन मथाई। यह योजना 1944-45 में प्रकाशित हुई। उपरोक्त आठ पूँजीपतियों में पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास, राष्ट्रीय योजना समिति ;National Planning Committee–NPC, 1938) के 15 सदस्यों में एक थे। शेष तीन- जे. आर.डी. टाटा, जी.डी. बिड़ला तथा लाला श्रीराम राष्ट्रीय योजना समिति की उप-समितियों के सदस्य (कुल 29) थे। योजना की जरूरत तथा एनपीसी तथा बाॅम्बे प्लान के सदस्यों की साझी सदस्यता से इन दोनों बड़ी योजनाओं के बीच स्पष्ट सहमति बन सकी जिसका प्रतिफल स्वतंत्रत के पश्चात देश की आर्थिक व्यवस्था का एक स्वरूप प्रदान करने में सामने आया। इन सहमतियों में से कुछ प्रमुख की चर्चा यहाँ आवश्यक हैः
;पद्ध कृषि पुनर्रचना के मामले में मूलभूत सहमति सभी प्रकार के बिचैलियों (जमींदारी उन्मूलन) का उन्मूलन, न्यूनतम मजदूरी, कृषक उत्पादकों को न्यूनतम अथवा उचित मूल्य की गारंटी, सहकारी संस्थाएँ, ऋण एवं विपणन सहायता।
;पपद्ध औद्योगीकरण पर सहमति जिसके तहत दोनों योजनाओं ने भारी पूँजीगत वस्तुओं तथा मूलभूत उद्योगों (बाॅम्बे प्लान ने अपने कुल योजना आकार का 35 प्रतिशत इनको आवंटित किया था) पर जोर दिया।
;पपपद्ध सोवियत योजना से सीख लेकर एनपीसी तथा बाॅम्बे प्लान दोनों अनिवार्य उपभोक्ता वस्तु उद्योगों का भी विकास साथ ही साथ चाहते थे लेकिन थोड़ी धीमी गति से।
;पअद्ध दोनों योजनाएँ मध्यम उद्योगों, लघु उद्योगों एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने को महत्वपूर्ण मानती थीं क्योंकि इनमें अधिक रोजगार पैदा किया जा सकता था और बदले में इन्हें कम पूँजी तथा कमतर स्तर के संयंत्रों एवं मशीनरी की आवश्यकता थी।
;अद्ध दोनों योजनाएँ मानती थीं कि राज्य की अर्थव्यवस्था में नियोजन, नियंत्रण तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे-व्यापार, उद्योग तथा बैंकिंग को राज्य के स्वामित्व (सार्वजनिक कोष) अथवा प्रत्यक्ष एवं अत्यधिक नियंत्रण के माध्यम से एक सक्रिय भूमिका निभानी थी।
;अपद्ध दोनों ही योजनाओं ने समाज कल्याण के व्यापक उपायों का पक्ष लिया जिसमें कि काम अधिकार एवं पूर्ण रोजगार, न्यूनतम मजदूरी की गारंटी, जल एवं स्वच्छता, निःशुल्क शिक्षा, बेरोजगारी एवं बीमारी के लिए सामाजिक बीमा पर अधिक सरकारी खर्च, तथा उपयोगी सेवाओं, जैसे-बिजली और परिवहन, को राज्य सब्सिडी के माध्यम से कम कीमत पर उपलब्ध कराना आदि शामिल थीं।
;अपपद्ध दोनों ही योजनाएँ एक ऐसी योजना बनाए जाने पर एकमत थीं जिसके माध्यम से असमानताओं को दूर किया जा सके-प्रगतिशील करारोपण तथा धन के संकेन्द्रण पर रोक लगाकर। बराबरी, अर्थात असमानता को अवांछनीय माना गया क्योंकि इससे घरेलू बाजार पर बंदिश लगती है।