तंजावुर शैली क्या है | तंजावुर चित्रकला upsc के बारे में जानकारी इतिहास thanjavur painting in hindi

By   March 14, 2021

thanjavur painting in hindi तंजावुर शैली क्या है | तंजावुर चित्रकला upsc के बारे में जानकारी इतिहास ?

प्रश्न: लघु चित्रकला की तंजावुर शैली पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: अठारहवीं शताब्दी के अन्त और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, चित्रकला की एक शैली की विशेषताएं सुदृढ़ आरेखण, छायाकरण की तकनीकें और अभिवृद्धि तथा चटकीले वर्णों का प्रयोग करना थीं, जिसने दक्षिण भारत के तंजावुर में उन्नति की। राष्ट्रीय संग्रहालय के संग्रह मे तंजावुर चित्रकला का एक प्रतीकात्मक उदाहरण उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ का एक सचित्र काष्ठ फलक है जिस पर राम के राज्याभिषेक को दर्शाया गया है। इस दृश्य को व्यापक रूप से सुसज्जित मेहराबो के नीचे मूर्त रूप दिया गया है। राजसिंहासन पर मध्य में राम और सीता बैठे हुए हैं, राम के अनुज और एक महिला उनकी देखभाल कर रहे हैं। बाएं और दाहिने पैनलों पर ऋषि, राजदरबारी और राजकुमार दिखाई दे रहे हैं। अग्रभाग में हनुमान, सुग्रीव हैं जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है तथा दो अन्य वानर एक बक्से को खोल रहे हैं जिसमें संभवतः उपहार हैं। इसकी शैली सजावटी है और चटकीलें रंगों का प्रयोग तथा अलंकरी साजो सामान इसकी विशेषताएं हैं। लघु चित्रकला में जो शंकुरूप मुकुट दिखाई दे रहा है, वह तंजौर चित्रकला की एक प्रतीकात्मक विशेषता है।

प्रश्न: प्रारंभिक दक्षिण चित्रकला की शैली के विभिन्न स्कूलों के बारे में बताइए। दक्षिण शैली के चित्रों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: दक्कन से मुगल-पूर्व चित्रकला के किसी भी विद्यमान उदाहरण की कोई जानकारी नहीं है, फिर भी निश्चित रूप से यह माना जा सकता है कि यहां चित्रकला की परिष्कृत शैली ने उन्नति की और उत्तर भारत में मुगल शैली के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों के दौरान दक्कन में चित्रकला के प्रारम्भिक केन्द्र अहमदनगर, बीजापर ओर गोलकुण्डा में थे। दक्कन में प्रारम्भ में चित्रकला का विकास मुगल शैली से स्वतंत्र रूप में होता रहा। बाद में सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में इस पर मुगल शैली का अधिकाधिक प्रभाव पड़ा था।
1. अहमदनगर शैली: अहमदनगर चित्रकला के प्रारम्भिक उदाहरण अहमदनगर के हसन निजाम शाह प्रथम (1553-1565) और उनकी रानी की प्रशंसा में लिखी गई कविताओं के एक खण्ड में निहित हैं। यह पाण्डुलिपि तारीफ-इन-हुसैन शाही के नाम से जानी जाती है और इसका संबंध 1565-69 की अवधि से है तथा इसे भारत इतिहास समाशोधक मण्डल, पूना में सुरक्षित रखा गया है। एक सचित्र उदाहरण में राजा को राजसिंहासन पर बैठे हए दिखाया गया है और अनेक महिलाएं उनका ध्यान रख रही हैं। चित्र में दृष्टिगोचर महिला-आकृति का संबंध मालवा की उत्तरी परम्परा से है। चोली और बंधी हुई और एक फुदने के रूप में समाप्त होती हुई लम्बी-चोटी उत्तरी परिधान हैं लेकिन शरीर से होता हुआ एक लम्बा रूमाल दक्षिण का एक फैशन है, चित्रकला में प्रयोग किए वर्ण भड़कीले तथा चटकीले हैं और ये उत्तरी चित्रकला में प्रयुक्त वर्णों से भिन्न हैं। उच्च क्षितिज, सुनहरे आकाश और भूदृश्यांकन में फारसी प्रभाव को देखा जा सकता है। अहमदनगर चित्रकला के कुछ अन्य अच्छे उदाहरण हैं- लगभग 1590 ईसवीं की ‘‘हिंडोला राग’’ और अहमदनगर के बुरहान निजाम शाह द्वितीय के प्रतिरूप (1591-96 ईसवी ) और मलिक अम्बेर के लगभग 1605 ईसवी के प्रतिरूप जो राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और अन्य संग्रहालयों में उपलब्ध हैं।
2. बीजापर शैली: बीजापुर में अली आदिल शाह प्रथम (1558-80 ईसवी) और उनके उत्तराधिकारी इब्राहिम द्वितीय (1580-1627) ईसवी ने चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया। चेस्टनर बिट्टी पुस्तकालय डबलिन में संरक्षित नजूम अलं-उलूम (विज्ञान के सितारे) के नाम से ज्ञात एक विश्वकोश को अली आदिल शाह प्रथम के शासनकाल 1570 ईसवी में चित्रित किया गया था। इस पाण्डुलिपि में 876 लघु चित्रकलाएं हैं। इन सचित्र उदाहरणों में दिखाई देने वाली महिलाएं लम्बी और छरहरी हैं तथा उन्होंने दक्षिण भारतीय वस्त्र पहने हुए हैं। यहां प्रस्तुत सचित्र उदाहरणों की लधु चित्रकलाओं में से एक ’समृद्धि का राजसिंहासन’ को दर्शाती है। महिला आकृतियों पर लेपाक्षी भित्ति चित्रकला का प्रभाव है। भड़कीले रंगों की योजना, ताड़ के वृक्ष, पशु और पुरुष तथा महिलाएं सभी का संबंध दक्कनी परम्परा से है। राजसिंहासन में सबसे ऊपर सुनहरे रंग के प्रचुर मात्रा में प्रयोग, फूलों के कुछ पौधे का अरबकोश को फारसी परम्परा से लिया गया है।
इब्राहीम द्वितीय (1580-1627 ईसवी) एक संगीतकार थे और इसी विषय पर नवरसनामा नामक एक पुस्तक भी लिखी थी। यह विश्वास किया जाता है कि रागमाला चित्रकलाओं की अनेक चित्रकलाएं विभिन्न संग्रहालयों और निजी संग्रहों में रखी गई थीं। इब्राहीम द्वितीय के कुछ समकालिक प्रतिरूप भी अनेक संग्रहालयों में उपलब्ध हैं।
3. गोलकुण्डा शैली: गोलकुण्डा कलाकृतियों के रूप में चिह्नित सबसे प्रारम्भिक चित्रकलाएं ब्रिटिश संग्रहालय, लन्दन में 1590 ईसवी की पांच आकर्षक चित्रकलाओं का एक समूह हैं जिन्हें मोहम्मद कुली कूता शाह (1580-1611 गोलकुण्डा के समय में चित्रांकित किया गया था। ये कंपनी का मनोरंजन करने वाली नृत्य करती हुई नर्तकियों को दर्शाती हैं, लघु चित्रकलाओं में से एक राजा को उसके राजदरबार में दिखाती है जहां राजा नृत्य को देख रहे है राजा ने श्वेत मुस्लिम लबादा पहना हुआ है जिस पर लम्बवत पट्टी पर कशीदाकारी की गई है जो कि गोलकण्डा के राजदरबार से सहयोजित एक प्ररूपी परिधान है। भवन, परिधान, आभूषण और पोत आदि को चित्रित करते समय सुनहरे रंग का व्यापक रूप से प्रयोग किया गया है।
गोलकुण्डा चित्रकला के अन्य उत्कृष्ट उदाहरण हैं- चेस्टनर बिट्टी पुस्तकालय, डबलिन में लगभग 1605 ईसवी की ‘‘मैना पक्षी के साथ महिला’’, ब्रिटिश संग्रहालय, लंदन में एक सूफी कवि की एक सचित्र पाण्डुलिपि और दो प्रतिकृतियां जिनमें एक कवि को एक उद्यान में दिखाया गया है और एक सुरुचिपूर्ण पोशाक पहने हुए एक युवक सुनहरी चैकी पर बैठा हुआ है तथा पुस्तक पढ़ रहा है। इन दोनों पर ललित कला संग्रहालय, बोस्टन में एक कलाकार मोहम्मद अली ने हस्ताक्षर किए हैं।
प्रारम्भिक दक्षिण चित्रकला ने, जैसा कि महिला की आकृतियों और परिधानों की अभिक्रिया से स्पष्ट है, मालवा में फल-फूल रही मुगल-पूर्व चित्रकला की उत्तरी परम्परा के, और विजयनगर की भित्ति की दक्षिणी परम्परा के प्रभावों को आत्मसात कर लिया था। क्षितिज, सुनहरा आकाश और भूदृश्यांकन की अभिक्रिया के दौरान फारसी चित्रकला के प्रभाव को देखा गया है, ये रंग भड़कीले और चमकीले हैं तथा उत्तरी चित्रकला के रंगों से भिन्न हैं। प्रारम्भिक दक्षिणी चित्रकला की परम्परा अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा के दक्कनी सल्तनतों के लुप्त होने के पश्चात् भी लम्बे समय तक जारी रही।
4. हैदराबाद शैली: 1724 ईसवी में मीर कुमारुद्दीन खान (चिन कुलिक खान) निजाम-उल-मुल्क द्वारा असफ-जुही राजवंश की नींव रखने के साथ ही हैदराबाद में चित्रकला प्रारम्भ हुई थी। औरंगजेब के समय में दक्कन में जाकर वहीं बसने वालों और वहीं संरक्षण की मांग करने वाले उनके मुगल चित्रकार, दक्कन चित्रकला की मुगल शैली के प्रमुख केन्द्र हैदराबाद और अन्य केन्द्रों पर विभिन्न शैलियों के प्रभाव व विकास के मुख्य कारक थे। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दियों की दक्कनी चित्रकलाओं की सुस्पष्ट विशेषताएं जातीय किस्मों, परिधानों, आभूषण, वनस्पति, जीव-जन्तु , भूदृश्यांकन और वर्णों की अभिक्रिया में देखी जाती हैं।
एक राजकुमारी को उसकी दासियों के साथ दिखाने वाली एक लघु चित्रकला, हैदराबाद चित्रकला विद्यालय का एक प्रतीकात्मक उदाहरण है। यह राजकुमारी छतरी से ढके हुए पूर्णतया सुसज्जित छज्जे पर लेटी हुई है। इस चित्रकला की शैली सजावटी है। हैदराबाद की चित्रकला की भड़कीले रंग, दक्षिणी मुखाकृति किस्में और परिधान जैसी प्ररूपी विशेषताओं को लघु चित्रकला में देखा जा सकता है। इसका संबंध अठारहवीं शताब्दी के तृतीय चतुर्थाश से हैं।
दक्षिण शैली के चित्रों की विशेषताएं
ऽ आकृतियां प्रायः हल्की नीली या पीली पृष्ठभूमि पर चित्रित की गई हैं। मानवाकृतियों की शारीरिक रचना लम्बी है, स्त्रियों के माथे छोटे, पीछे की ओर ढलवा हैं। वेशभूषा में लम्बी चोली, दुपट्टा, पेशवाज और सूथन है।
ऽ पुरुष आकृतियों की वेशभूषा में घेरदार जामे, कमरबंद, सरपेच हैं व आभूषणों में माला, हार, बाजूबंद पहने दर्शाया गया है।
ऽ भवनों को श्वेत मीनारनुमा दर्शाया है, जिन पर महीन पच्चीकारी का चित्रण है। भवनों को विलासितापूर्ण सामग्रीयुक्त दर्शाया गया है।
ऽ पृष्ठभूमि में दक्षिण शैली, जैसे-भवन या मुगल शैली जैसी पृष्ठभूमि अंकित है।
ऽ पक्षियों में मयूर का अधिक चित्रण है।
ऽ हाशिये सुनहरे रंग या सिंगरफ रंग से नक्काशीयुक्त बनाये गए हैं।
ऽ समस्त चित्रों में संयोजन परम्परागत एवं एक समान ही है।
ऽ आकाश में रंग-बिरंगे बादल, अग्रभूम में पुष्पित क्यारियां चित्रित हैं।
ऽ पेड़ों में प्रायः नारियल, ताड़, पुष्पित चम्पा आदि के वृक्ष पृष्ठभूमि में अंकित हैं।

प्रश्न: मध्य भारत और राजस्थानी शैली (सत्रह से उन्नीसवीं शताब्दियां) पर विस्तृत लेख लिखिए (इसमें विभिन्न क्षेत्र की शैलियों से संबंधित 15 व 50 शब्दों के प्रश्न पूछे जाते हैं)
उत्तर: प्राथमिक रूप से पंथ-निरपेक्ष मुगल चित्रकला से भिन्न, मध्य भारत, राजस्थानी और पहाड़ी क्षेत्र आदि की चित्रकला की जड़ें भारतीय परम्पराओं में गहरी जमी हुई हैं तथा इसे भारतीय महाकाव्यों, पुराणों जैसे धार्मिक ग्रंथों, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रेम भरी कविताओं, भारतीय लोक-विद्या एवं संगीत से जुड़े विषयों के बारे में कृतियों से प्रेरणा मिली है। वैष्णव, शैव और शक्ति के सम्प्रदायों ने इन स्थानों की चित्रकला पर अत्यधिक प्रभाव डाला है। इन सम्प्रदायों में से कृष्ण सम्प्रदाय सर्वाधिक लोकप्रिय था जिसने संरक्षकों और कलाकारों को प्रेरित किया। रामायण, महाभारत, भागवत, शिव पुराण, उषा अनिरुद्ध, जयदेव का गीत गोविन्द, भानुदत्ता की रसमंजरी, अमरू शतक, केशवदास की रसिकप्रिया, बिहारी सतसई और रागमाला आदि के विषयों ने चित्रकार को एक अति समृद्ध क्षेत्र उपलब्ध कराया।
सोलहवीं शताब्दी में मध्य भारत और राजस्थान में पश्चिमी भारत और चैरपंचाशिका शैलियों के रूप में आदिम कला की परम्पराएं पहले से ही विद्यमान थीं, जिन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के दौरान चित्रकला की विभिन्न शैलियों के उद्गम तथा संवृद्धि के लिए एक आधार के रूप में कार्य किया है। सोलहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान राजस्थान में शान्तिपूर्ण स्थिति थी। राजपूत शासकों ने धीरे-धीरे मुगलों के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया था और उनमें से कुछ ने मुगल राजदरबार में महत्त्वपूर्ण पदों पर कब्जा कर लिया था। कुछ शासकों ने मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध भी बना लिए थे। मुगल सम्राटों द्वारा स्थापित उदाहरण का अनुकरण करते हुए कुछ राजपूत शासकों ने कलाकारों को अपने राजदरबारों में नियोजित भी कर दिया था। कम योग्यता वाले ऐसे कुछ मुगल कलाकार जिनकी अब मुगल सम्राटों को कोई आवश्यकता नहीं थी, राजस्थान और अन्य स्थानों पर चले गए थे तथा उन्हें स्थानीय राजदरबारों में रोजगार मिल गया था। मुगल शैली के लोकप्रिय रूपान्तर, जिसे ये चित्रकार विभिन्न स्थानों पर ले गए थे, ने वहां चित्रकला की पहले से विद्यमान शैलियों को प्रभावित किया जिसके परिणामस्वरूप सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में राजस्थान तथा मध्य भारत में चित्रकला की अनेक नई शैलियों का उद्भव हुआ था। इनमें से चित्रकला के महत्त्वपूर्ण विद्यालय मालवा, मेवाड़, बूंदी-कोटा, आमेर जयपुर, बीकानेर, मारवाड़ और किशनगढ़ में थे।
मालवा सहित चित्रकला की राजस्थानी शैली की विशेषताएं मजबूत एवं प्रभावशाली आरेखण और विषम वर्ण हैं। परिप्रेक्ष्य को एक प्राकृतिक दृष्टि से दिखाने के लिए कोई प्रयास किए बिना ही आकृतियों की अभिक्रिया चैरस है। कभी-कभी चित्रकला की सतह को अलग-अलग वर्गों के अनेक उप-खण्डों में विभाजित कर दिया जाता है ताकि एक दृश्य को अन्य दृश्य से पृथक किया जा सके। आरेखण के परिष्करण में मुगल प्रभाव दिखाई देता है और आकृतियों तथा वृक्षों में प्रकृतिवाद के कुछ तत्वों को डाला गया है। चित्रकला के प्रत्येक विद्यालय की अपनी विशिष्ट किस्म, परिधान, भूदृश्यांकन और वर्ण योजना होती है।
मालवा
मालवा शैली में निष्पादित की गई कुछ महत्त्वपूर्ण चित्रकलाएं हैं- 1634 ईसवी की रसिकप्रिया की एक श्रृंखला, 1652 ईसवी में नसरतगढ़ नायक एक स्थान पर चित्रित की गई अमरू शतक की एक श्रृंखला और 1680 ईसवी में माधो दास नामक एक कलाकार द्वारा नरसिंह शाह में चित्रित की गई रागमाला की एक श्रृंखला। इनमें से कुछ राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में उपलब्ध हैं। इसी समय की एक अन्य अमरू-शतक प्रिंस आफ वेल्स संग्रहालय, मुम्बई में और 1650 ईसवी की एक रागमाला श्रृंखला भारत कला भवन, बनारस में उपलब्ध है। मालवा में चित्रकला सत्रहवीं शताब्दी ईसवी के अन्त तक जारी रही।
1680 ईसवी की रागमाला की एक श्रृंखला का उदाहरण मेघ राग का निरूपण करता है। इस लघु चित्रकला में नीले वर्ण वाले राग को तीन महिला संगीतकारों द्वारा बजाए जा रहे संगीत की थाप पर एक महिला को नृत्य करते हुए दिखाया गया है। इस दृश्य की पृष्ठभूमि श्याम है, आकाश काले बादलों से घिरा हुआ है और बिजली चमक रही है तथा वर्षा को श्वेत बिन्दु रेखाओं द्वारा दिखाया गया है। बादलों की श्याम पृष्ठभूमि में चार हंस पंक्तिबद्ध होकर उड़ रहे हैं, जिससे लघु चित्रकला के चित्रीय प्रभाव में वृद्धि होती है। आलेख सबसे ऊपर नागरी में लिखा गया है। इस चित्रकला की प्रतीकात्मक विशेषताएं हैं- विषम वर्णो का प्रयोग, मुगल चित्रकला के प्रभाव के कारण आरेखण का परिष्करण और काले फुंदनों तथा धारीदार लहंगों सहित आभूषण एवं परिधान।