सूफीवाद की मुख्य शिक्षाएं क्या थी | सूफी मत की मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं teachings of sufism in hindi

By   January 31, 2021

teachings of sufism in hindi सूफीवाद की मुख्य शिक्षाएं क्या थी | सूफी मत की मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं ?

बोध प्रश्न 2
1) सूफीवाद की मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं? 5-7 पंक्तियों में व्याख्या कीजिये।
2) भक्ति तथा सूफी परंपराओं के बीच की कुछ ऐसी समानताओं का उल्लेख कीजिए, जो कि इस बात को उजागर करें कि दोनों के बीच अन्योन्यक्रिया हुई थी। अपना उत्तर 10 पंक्तियों में दीजिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 2
1) सूफीवाद एक रहस्यवादी आन्दोलन है। सूफी रहस्यवादी शिक्षक हैं तथा सदियों से शिष्यों को रखते आये हैं। सूफी करान का अनुसरण करते हैं तथा एक निस्वार्थ एवं सांसारिक चीजों का त्याग करने वाली जिन्दगी में विश्वास रखते हैं। वे धैर्य, विनम्रता तथा परोपकार के रुख में भी विश्वास करते हैं। उनकी बुनियादी शिक्षाओं में ईश्वर अथवा अल्लाह के अस्तित्व पर ध्यान केन्द्रित करके उसके नाम का जाप करने के माध्यम से उसकी आराधना करना शामिल है। इसे धिक्र कहा जाता है। यह धार्मिक भावनाएँ पैदा करने के लिये संगीत तथा गीतों को सुनने को प्रोत्साहित करता है।

2) यदि हम भक्ति व सूफी परंपराओं पर बारीकी से गौर करें, तो हमें उनके बीच बहुत सारी समानताएँ देखने को मिलती है। दोनों परंपराओं में एक ही दैवीय शक्ति की उपासना पर ध्यान देने पर बल दिया गया है। सूफीवाद में इसे धिक्र तथा इश्क कहा जाता है और भक्ति में यह इष्ट-देवता संबंधी धारणा है। इसी तरह भक्ति में विरह की धारणा की तुलना सूफियों के दर्द की धारणा से की जा सकती है। जिस तरह विरह से अग्नि (आत्मा में आग) पैदा होती है, ठीक उसी तरह दर्द से आतिश पैदा होती है। जैसा कि हम देखते हैं दोनों ही परंपराएँ भक्त तथा दैवीय प्रेम की बात करती हैं तों दोनों ही मामलों में दैवीय शक्ति से, यह प्रेम, उस प्रेम से मिलता-जुलता है जो कि कोई व्यक्ति अपने प्रेमी से करता है तथा दोनों ही परंपराओं में दैवीय शक्ति से भक्त के रिश्तों के संदर्भ में दर्द तथा दुख की प्रकृति भी पाई जाती है। इस तरह, हम यह कह सकते हैं कि ये समानताएँ इस बात का इशारा करती हैं कि दोनों परंपराओं के बीच परस्पर अन्योन्यक्रिया हुई थी।

 भक्ति-सूफी शिक्षाएँ (Bhakti-Sufi Teachings)
यह याद रखना जरूरी है कि सूफी तथा भक्ति संतों के बीच अनुपूरक संबंध थे और सूफी भी भक्ति परंपरा से प्रभावित हुए थे। इस तरह, समर्पण की विधि तथा उसकी अभिव्यक्ति की दृष्टि से इस प्रमुख समानता के बावजूद, हम यह पाते हैं कि सूफी परंपरा ने भी शाह करीम तथा शाह इनायत बपने संतों को 17वीं शताब्दी के बाद से पैदा किया जिनकी शिक्षाओं में अल्लाह अथवा राम अथवा हरि के रूप में देवताओं के बीच बहुत कम भेद किया गया, जो कि कबीर ने जो कुछ कहा उसी से मिलता-जुलता है तथा भक्ति परंपरा के प्रभाव का ही द्योतक है।

उपर्युक्त भाग में हमने यह दर्शाने का प्रयास किया कि किस तरह से मध्यकालीन रहस्यवाद ने भक्ति तथा सूफीवाद की हिन्दू व मुस्लिम परंपराओं के बीच कुछ समन्वयवाद को रेखांकित किया था। ये दोनों समर्पण भाव तथा समाज के सभी तबकों के लिये खुलेपन की प्रकृति में काफी कुछ समानता दिखाती है, जिसकी वजह से दोनों अपेक्षाकृत अधिक समतावादी बने। कबीर तथा नानक के जीवन पर सूफी विचारधारा का प्रभाव बहुत साफ तौर पर दिखाई देता है। गुरु नानक ने अपनी अनेक यात्राओं के दौरान सूफियों की पोशाक पहनी थी, ऐसा माना जाता है। दरअसल, गुरुवाणी की भक्ति तथा सूफी शिक्षाओं को आपस में मिलाने का उनका प्रयत्न इतना उल्लेखनीय था कि जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनका अन्तिम संस्कार दोनों आन्दोलनों, अर्थात भक्ति व सूफी के रिवाजों के अनुसार किया गया और उनकी समाधि पर दो भिन्न धर्मों की इमारतें कायम हुईं। कबीर का जीवन भी अमरत्व, भक्ति तथा ईश्वर के प्रति समर्पण भाव के चलते व्यक्ति के सच्चे प्रेम तथा दुखों के प्रति समर्पित था। हमने यह भी देखा कि विरह तथा अग्नि की भक्ति परंपरा की धारणाओं तथा इश्क, दर्द तथा आतिश के सूफी विचारों के बीच किस तरह से प्रमुख समानताएँ मौजूद थीं। हालाँकि कबीर व नानक, दोनों की रचनाएं रहस्यवादी थीं, किन्तु वे जाति-प्रथा द्वारा पैदा की गई असमानताओं तथा आमतौर पर हिन्दू रूढ़िवादिता के प्रति चिन्तित थे, तथा उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई।