ईसाई धर्म की प्रमुख शिक्षाएं क्या है ? Teachings of Christianity in hindi इसाई धर्म की शिक्षा किसे कहते है

By   January 8, 2021

इसाई धर्म की शिक्षा किसे कहते है ईसाई धर्म की प्रमुख शिक्षाएं क्या है ? Teachings of Christianity in hindi ?

ईसाई धर्म की शिक्षाएँ (Teachings of Christianity)
ईसा मसीह ने यहूदी परंपरा का त्याग तो नहीं किया, लेकिन उन्होंने यहूदियों की कुछ रूढ़ियों को अस्वीकार किया, पुराने सिद्धांतों को बिल्कुल नया रूप दिया और आदर्श सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों को सामने रखा।

 व्यक्ति की शुद्धता और नैतिक कार्य (Purity of a Person and the Moral Deeds)
ईसा मसीह ने यहूदियों की जिन प्राचीन प्रथाओं को अस्वीकार किया, उनमें से अशुद्धि को दूर करने के संस्कारों का उल्लेख किया जा सकता है। जब यहूदियों ने इस बात पर जोर दिया कि ईसा मसीह के चेले खाने से पहले हाथ धोने के अपने संस्कार का पालन नहीं करते तो ईसा मसीह ने लोगों को अपने पास बुलाकर उनसे कहा, ‘‘तुम सब मेरी सुनो, और समझो। ऐसी तो कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य को बाहर से समाकर अशुद्ध करे‘‘ (मार्क 7ः14,17)। इस तरह, ईसा मसीह सच्चाई की यह महत्वपूर्ण शिक्षा देते हैं कि दिखावे के संस्कारों या अनुष्ठानों से या विशेष किस्म के भोजन खाने से कोई मनुष्य परमेश्वर के सामने शुद्ध नहीं ठहरता। मनुष्य अपने हृदय और मन की शुद्धता से ही परमेश्वर की दृष्टि में शुद्ध ठहरता है।

ईसा मसीह की शिक्षा यह है कि उचित/अनुचित व्यवहार का निर्धारण इस दुनिया की नैतिकता के आधार पर नहीं हो सकता बल्कि मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा पूरी करनी और उसे प्रसन्न करना है। इसलिए, ईसाई व्यक्ति को अपने अच्छे कामों का बदला मिलने या उससे प्रसिद्धि प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, उसके कामों का बदला तो परमेश्वर प्रसन्न होकर इस संसार में और स्वर्ग में भी देगा। नैतिक रूप से सही कार्य करने या दान देने की क्रिया व्यक्ति को दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए नहीं करनी चाहिए कि वे उसका आदर करें, परमेश्वर दूसरों को दिखाये बिना इस तरह के कार्य करने वालों को उनका फल देता है (मैथ्यू 6: 1-4)

 पापों और बुराइयों की क्षमा (Forgiving Sins and Evils)
ईसा मसीह का अपने अनुयायियों से यह कहना है कि हत्या की तो बात छोड़ें, ‘दूसरों पर गुस्सा दिखाना भी पाप है, और जब तक हम एक-दूसरे से मेल नहीं करते परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं और भेंटों को स्वीकार नहीं करता है (मैथ्यू 5: 21-23)। इस तरह, परमेश्वर उन लोगों के पाप क्षमा कर देता है जो अपने प्रति किये गये अपराधों को क्षमा कर देते हैं (मैथ्यू 6: 14,15)।

जैसे को तैसा देना दुनिया की रीति है। लेकिन, ईसा मसीह अपने अनुयायियों से कहते हैं, ‘‘बुरे का सामना न करना, परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे‘‘ (मैथ्यू 5: 38,39)। इसी तरह, अपने मित्रों से प्रेम करना और शत्रुओं से घृणा करना अगर बिल्कुल स्वाभाविक लगता है तो ईसा मसीह के इन शब्दों पर ध्यान दीजिएः ‘‘परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं किं अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करो। जिससे तुम अपने स्वर्गीय पिता की संतान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेघ बरसाता है‘‘ (मैथ्यू 5: 43-45)। ईसा मसीह के ये विचार कितने अनुचित और अव्यावहारिक लगते हैं। लेकिन जीवन के सबसे कठिन दिनों में स्वयं ईसा मसीह का व्यवहार उनकी शिक्षा का एक अच्छा उदाहरण है। जब ईसा मसीह पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें मौत की सजा सुना दी गई तो उन्होंने न तो अपने पकड़ने वालों का विरोध किया और न ही न्यायालय में अपना बचाव किया। यही नहीं, जब उन्हें अपराधियों के साथ सलीब पर लटका दिया गया तो प्राण छोड़ते समय उन्होंने सलीब पर से अपने शत्रुओं से दया के ये मार्मिक शब्द कहे ‘‘हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि ये क्या कर रहे हैं‘‘ (ल्यूक 23: 34)। इस तरह, ईसा मसीह ने अपने अनुयायियों को न केवल जीने का एक नया तरीका सिखाया, बल्कि अपने उदाहरणीय जीवन में इसे करके भी दिखाया।

 सुसमाचार का प्रचार और बपतिस्मा (Evangelisation and Baptism)
ईसा मसीह ने अपने प्रेम और क्षमा के संदेश को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए अपने शिष्यों को आदेश दिया था। इसलिए सभी ईसाई ऐसा करने को अपना कर्तव्य मानते हैं। ईसा मसीह के सुसमाचार को फैलाने के कार्य को सुसमाचार प्रचार (मअंदहमसपेंजपवद) कहते हैं। लेकिन संदेश या सुसमाचार सुनने वाला व्यक्ति उसे सुनता है या नहीं और ईसाई धर्म ग्रहण करता है या नहीं, यह निर्णय सुनने वाले पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। इसे पवित्र आत्मा का काम माना जाता है। जिन लोगों ने ईसाई धर्म ग्रहण किया उनके लिए अपने पुराने धार्मिक विश्वासों को त्यागने का अर्थ यह हुआ कि उनका उनके पुराने समुदायों से भी विच्छेद हो गया। इसलिए नये ईसाइयों ने अपने अलग समुदाय या चर्च बना लिए। इन चर्चों ने विभिन्न धार्मिक और जातीय समूहों के लोगों को अपनी शरण में लेकर उन्हें एक नयी ईसाई पहचान दी। इस विश्वास को अपनाने वाले को बपतिस्मा नाम की एक साधारण सी रस्म के साथ ईसाई धर्म में दीक्षित कर लिया गया।

बोध प्रश्न 2
1) ईसाई चिंतन के अनुसार उचित-अनुचित व्यवहार का निर्धारण कैसे होता है?
क) इस दुनिया की नैतिकता के आधार पर
ख) परमेश्वर की इच्छा को पूरी किये बिना उस दुनिया के मानदंडों के आधार पर
ग) परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने और उसे प्रसन्न करने के आधार पर
घ) स्वार्थ के आधार पर।
2) ईसा मसीह के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान पर प्रकाश डालने वाली (नया नियम) की चार पुस्तकों को कहते हैं,
क) सर्वीकरण (Universalisation)
ख) ईसाइयत (Christianisation)
ग) सुसमाचार (Evangelisation)
3) ईसाई धर्म में प्रभु भोज का क्या महत्व है? लगभग पाँच पंक्तियों में स्पष्ट कीजिए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
I) ग
II) ग
III) रोटी तोड़ने या “प्रभु भोज‘‘ का ईसाई उपासना पद्वति में विशेष महत्व है। प्रार्थना सभा में ‘‘प्रभु भोज‘‘ के दोहराये जाने से एक बार फिर ईसा मसीह के साथ मिलन होता है। ऐसा ईसाई लोग विश्वास करते हैं। प्रार्थना सभा की इस रस्म को प्रभु भोज या परम प्रसाद कहते हैं।