बसन्त काष्ठ और शरद काष्ठ में अन्तर (difference between spring wood and autumn wood in hindi)

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(difference between spring wood and autumn wood in hindi) बसन्त काष्ठ और शरद काष्ठ में अन्तर क्या है ? बंसत और शरद काष्ट लकड़ी की परिभाषा किसे कहते है , प्रकार ?

वार्षिक वलय (annual rings) : बहुवर्षीय काष्ठीय वृक्षों के तनों में कैम्बियम की सक्रियता पूरे वर्ष एक समान नहीं रहती। बंसत ऋतु में संवहन कैम्बियम अधिक सक्रीय होता है। परिणामस्वरूप द्वितीयक जाइलम अथवा काष्ठ का निर्माण भी अधिक मात्रा में होता है लेकिन शरद ऋतू में निम्न तापक्रम और अन्य विपरीत परिस्थितियों के कारण कैम्बियम की सक्रियता भी कम हो जाती है। परिणामस्वरूप इस समय द्वितीयक जाइलम या काष्ठ का निर्माण भी कम मात्रा में होता है। यही नहीं , बसंत ऋतु में बनने वाली द्वितीयक जाइलम कोशिकाएँ शरद ऋतू की जाइलम कोशिकाओं की तुलना में साइज में बड़ी और संरचनात्मक रूप से अलग होती है। बसंत ऋतु में बनने वाले द्वितीयक जाइलम ऊतकों को बसंत काष्ठ (spring wood ) कहते है। 

इसके विपरीत शरद ऋतु में बनने वाली काष्ठ की कोशिकाएं छोटी आकृति की और मोटी भित्ति की होती है। इनको शरद काष्ठ (autumn wood) कहते है। कोशिकाओं की असमानता के कारण बसंत काष्ठ और शरद काष्ठ दोनों अलग अलग वलयों के रूप में व्यवस्थित होती है , ऐसे समय तने का अनुप्रस्थ काट देखने पर इसमें एकान्तरित क्रम में बनी हुई विभिन्न मोटाईयों की संकेंद्रित परतें दिखाई देती है।

इन वलयों अथवा परतों को वार्षिक वलय कहते है। वार्षिक वलयों की गिनती करके वृक्ष की आयु का पता लगाया जा सकता है। इस विधा को अर्थात इसके अध्ययन की प्रक्रिया को वृक्षकालानुक्रमण कहते है।

जैसा कि हम जानते है कि वर्षपर्यन्त एधा की सक्रियता एक समान नहीं रहती और वातावरण में अनियमित परिवर्तन के कारण वार्षिक वलय कभी कभी सुस्पष्ट नहीं बन पाते अथवा कुछ उदाहरणों में ऐसा भी देखा गया है कि एक से अधिक वार्षिक वलय के समान संरचनाएं बन जाती है। इन संरचनाओं को आभासी वार्षिक वलय कहते है।

वातावरण में अनियमित परिवर्तन कुछ विशेष परिस्थितियों में होते है। जैसे एधा के सक्रीय विभाजन के समय अर्थात पौधे की वृद्धि के समय अचानक सुखा पड़ जाना , जिसमें वसंत ऋतु में बनने वाली द्वितीयक जाइलम कोशिकाओं की आकृति शरद काष्ठ के समान हो जाती है अथवा भूमि में जल की मात्रा अधिक हो जाना। इन सब कारणों की वजह से आभासी वार्षिक वलय बनते है , जैसे गेरुगा पिन्नेटा नामक वृक्ष में। इन आभासी वार्षिक वलयों को वृद्धि चिन्ह कहते है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार उष्णकटिबंधीय वनों में वर्ष पर्यन्त मौसम लगभग एक समान रहता है। अत: यहाँ उगने वाले वृक्षों में भी वार्षिक वलयों का निर्माण सुस्पष्ट नहीं होता। इस प्रकार की वलय जैसी संरचनाओं को वृद्धि वलय कहते है , जैसे टरमिनेलिया नामक वृक्ष में। इस प्रकार वार्षिक वलय केवल शीतोष्ण अथवा उपशीतोष्ण क्षेत्रों में उगने वाले वृक्षों में ही सुस्पष्ट देखे जा सकते है , जैसे – पाइनस सीड्रस और अन्य शंकुधारी वृक्ष। अमेरिकन रेडवुड सिकोइयोडेन्ड्रोन की आयु की गणना वृक्षकालानुक्रमण का उपयोग करके की गयी जिसके आधार पर अनुमानत: उसकी उम्र 3500 वर्ष आँकी गयी है। क्योंकि इस वृक्ष में वार्षिक वलय सुस्पष्ट होती है इसलिए वृक्ष के आधारीय भाग के अनुप्रस्थ काट द्वारा वार्षिक वलयों की गिनती करना संभव हो पाया होगा।

वसंत काष्ठ और शरद काष्ठ की कोशिकाओं का अथवा इनके वलयों का अध्ययन करने पर इनमें निम्न असमानताएँ दृष्टिगोचर होती है –

बसन्त काष्ठ और शरद काष्ठ में अन्तर (difference between spring wood and autumn wood)

 बसंत काष्ठ (spring wood)  शरद काष्ठ (autumn wood)
 1. इसका निर्माण वृक्ष की सक्रीय वृद्धि के समय होता है।  जब वृक्ष की वृद्धि अपेक्षाकृत कम मात्रा में होती है तब इसका निर्माण होता है।
 2. इसका निर्माण बंसत ऋतु में संवहन एधा की सक्रियता के परिणामस्वरूप होता है।  जब अपेक्षाकृत कम हो जाती है तो शरद काष्ठ का निर्माण होता है।
 3. बंसत काष्ठ में जाइलम का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होता है।  यहाँ जाइलम का अनुपात बंसत काष्ठ की तुलना में कम होता है।
 4. जाइलम में वाहिकाओं की मात्रा अधिक होती है।  वाहिकाओं की मात्रा बंसत काष्ठ की तुलना में कम होती है।
 5. वाहिकाओं की गुहा बंसत काष्ठ में चौड़ी होती है।  वाहिकाओं की गुहा अपेक्षाकृत संकड़ी होती है।
 6. बसन्त काष्ठ का रंग हल्का भूरा होता है।  शरद काष्ठ ऊतक का रंग गहरा भूरा होता है।

रस काष्ठ और अन्त: काष्ठ (sapwood and heartwood in hindi)

अधिक आयु वाले अथवा प्रोढ़ वृक्षों में जब पर्याप्त मात्रा में द्वितीयक वृद्धि हो जाती है तो इनके तने में , पहले बना हुआ द्वितीयक जाइलम ऊतक निष्क्रिय हो जाता है और यह तने के केन्द्रीय भाग में स्थित रहता है।

लगभग निष्क्रिय द्वितीयक जाइलम की कोशिकाओं में रेजिन , टेनिन और तेल आदि पदार्थ संचित हो जाते है। यह रासायनिक पदार्थ जाइलम की वाहिकाओं के पास स्थित निकटतम मृदुतक कोशिकाओं में बनते है और वहां से जाइलम की वाहिकाओं और वहिनिकाओं में स्थानान्तरित हो जाते है। द्वितीयक जाइलम ऊतक में इन रासायनिक पदार्थो के संचित हो जाने से यह जाइलम या काष्ठ काले अथवा गहरे भूरे रंग की दिखाई देती है और यह अधिक कठोर और मजबूत हो जाती है। इसकी वाहिकाओं में सामान्यतया फूली हुई गुब्बारे जैसी संरचनाएं टाइलोसस बहुत अधिक मात्रा में पायी जाती है। इस प्रकार की कठोर चिरस्थायी और गहरे रंग की काष्ठ के क्षेत्र को अन्त: काष्ठ अथवा कठोर दारू कहते है। अंत:काष्ठ वृक्षों को विशेषकर तनों को यांत्रिक बल और कठोरता प्रदान करती है क्योंकि इनकी कोशिकाओं में टेनिन और रेजिन के संचय के कारण इन पर सामान्यतया जीवाणु और कवक का संक्रमण भी नहीं होता। अत: यह फर्नीचर और लकड़ी की उच्चस्तरीय कलाकृतियों और सजावटी सामान बनाने के लिए अधिक उपयोगी होती है।

द्वितीयक जाइलम अथवा काष्ठ का परिधीय भाग जो अपेक्षाकृत सक्रीय नवीन और तरुण जाइलम ऊतक की कोशिकाओं का बना होता है उसे रस काष्ठ (sapwood) अथवा कोमल काष्ठ (alburnum) कहते है। यह कोशिकाएं हल्के भूरे अथवा धूसर रंग की होती है और इनके द्वारा वृक्ष में जल और घुलनशील खनिज पदार्थों का सक्रीय संवहन होता है। रस काष्ठ की कोशिकाओं में सक्रियता इसलिए भी रहती है कि इनमें विभिन्न पदार्थों जैसे रेजिन , टेनिन आदि का संचय नहीं होता और यह अवरुद्ध नहीं हो पाती।

तने में द्वितीयक वृद्धि के कारण रस काष्ठ के एक के बाद संकेन्द्रित वलय बनते जाते है और समय बीतने के साथ साथ पुरानी रस काष्ठ कोशिकाएं धीरे धीरे अन्त: काष्ठ में परिवर्तित होती जाती है। जैसे जैसे यह परिवर्तन होते है तो इसके साथ साथ रस काष्ठ की कोशिकाएं भी धीरे धीरे मृत होती जाती है और उनमें रेजिन , टेनिन और तेल आदि रासायनिक पदार्थ जमा होते जाते है। इसके अतिरिक्त अनेक जाइलम कोशिकाओं में टाइलोसस भी विकसित हो जाता है।