spherosomes in hindi , स्फीरोसोम किसे कहते हैं , एल्यूरॉन कण (Aleurone grain or Protein bodies)

पढेंगे spherosomes in hindi , स्फीरोसोम किसे कहते हैं , एल्यूरॉन कण (Aleurone grain or Protein bodies) ?

स्फीरोसोम्स (Spherosomes )

यद्यपि पादप कोशिकाओं में जन्तु कोशिकाओं के समान लाइसोसोम्स तो नहीं पाये जाते हैं, किन्तु लाइसोसोम्स सदृश्य, एकल कला द्वारा घिरी हुई संरचनाएँ, जिनमें विभिन्न पाचक अथवा जल अपघटनकारी (hydrolytic enzymes) एन्जाइम्स पाये जाते हैं, स्फीरोसोम्स (Spherosomes) कहलाती हैं। इन संरचनाओं का वर्णन सर्वप्रथम पर्नर (Perner) ने सन् 1953 में किया तथा समादिनी (Samadini) ने सन् 1967 में इन्हें मक्का के नवोद्भिद् पादप कोशिकाओं से विलगित ( isolate) किया (चित्र 2.41)।

चित्र 2.41 : स्फीरोसोम

इनका व्यास 0.5 से 2.5u होता है। इनमें पाचक एन्जाइम्स के अलावा लिपिड्स व प्रोटीन्स बहुत अधिक मात्रा में पाये जाते हैं । इनकी उत्पत्ति अन्तः प्रद्रव्यी जालिका से मुकुलन द्वारा कटने वाली छोटी- छोटी पुटिकाओं से होती है, जिन्हें प्रोस्फीरोसोम्स (Prospherosomes ) कहते हैं। इन पुटिकाओं का व्यास 0.2mp से 0.8mp तक होता है। इन पुटिकाओं में वसा तथा तेल का संश्लेषण करने वाले एन्जाइम्स होते हैं। ये ही वृद्धि करके स्फीरोसोम्स कहलाते हैं । इनमें मुख्य रूप से फॉस्फेटेज (Phosphatase), ऐस्टरेज (esterase), राइबोन्यूक्लिएज (ribonuclease) तथा हाइड्रोलेज (hydrolase ) आदि पाये जाते हैं। इनका मुख्य कार्य-फेगोसाइटोसिस द्वारा कोशिका में आने वाले घटकों का पाचन करना है । इसके अतिरिक्त वसा को संगठित, स्थानान्तरित और संश्लेषित करना है । अतः ये कोशिकांग मुख्यत: लिपिड उपापचय से सम्बन्धित होते हैं । इन्हें तेल बूँदों (Oil droplets) का अग्रगामी (Precursor) भी माना गया है ।

  1. एल्यूरॉन कण (Aleurone grain or Protein bodies)

ऐल्यूरॉन कण भी गोलाकार, एकल कला आबद्ध संचयी कण होते हैं, जिन्हें प्रोटीन बॉडीज भी कहा जाता है। ये संरचनाएँ बीजों में बीजपत्र ( Cotyledons) एवम् भ्रूणपोष (Endosperm ) की कोशिकाओं में पायी जाती हैं । इनका निर्माण बीज परिपक्वन (ripening ) अवस्था में होता है, तथा ये कण बीज अंकुरण की शुरू की अवस्थाओं में समाप्त हो जाते हैं। इनमें प्रोटीन ग्लोब्यूलिन (Globulins) तथा फॉस्फेट फाइटिन (Phytin) के रूप में पाया जाता हैं ।

मेटाइल (Matile, 1968 ) ने बताया कि मटर के बीज से प्राप्त ऐल्यूरॉन कणों में कई प्रकार के जल अपघटनकारी एन्जाइम्स पाये जाते हैं, जिनमें प्रोटीएज ( Protease) एवम् फॉसफेटेज (Phosphatase) प्रमुख होते हैं। जिनका मुख्य कार्य प्रोटीन संचय व फास्फेट के गमन में मदद करना है । इनके अतिरिक्त पाये जाने वाले अन्य एन्जाइम्स जैसे – RNAase, B – एमाइलेज (p-amylase) कोशिकी घटकों के पाचन में मदद करते हैं । अतः अन्य कार्यों के साथ-साथ एल्यूरोन कणों का मुख्य एन्जाइम्स को नवोद्भिद की वृद्धि तथा परिवर्धन हेतु उपलब्ध करवाना है। इनकी उत्पत्ति भी अन्त: प्रद्रव्यी

कार्य-परिपक्व बीजों में प्रोटीन संचय एवम् बीज अंकुरण के समय आवश्यकतानुसार जालिका से होती है ।

  1. परॉक्सीसोम्स (Peroxisomes)

अथवा विभिन्न प्रकार के जीवों, जैसे-प्रोटोजोआ, कवक, पौधों तथा कशेरूकी प्राणियों की यकृत एवम् वृक्क कोशिकाओं में गोलाकार झिल्ली आबद्ध संरचनाएँ पायी जाती हैं, जिनका व्यास सामान्यतः 0.2. से 1.5 ml होता है। ये संरचनाएँ अन्त: प्रद्रव्यी जालिका, माइटोकॉन्ड्रीया तथा क्लोरोप्लास्ट के निकट पायी जाती हैं, सूक्ष्म पिंड (microbodies) कहलाती हैं । इनका केन्द्रीय भाग कणिकाम अथवा क्रिस्टलीय होता है तथा इसमें कुछ एन्जाइम भी पाये जाते हैं । परॉक्सीसोम्स (Peroxisomes ) को सर्वप्रथम टालवर्ट व उसके सहयोगियों (Tolbert & his co-workers 1968 ) ने क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) से विलगित ( isolate) किया ( चित्र 2.42 ) ।

चित्र 2.42 पराक्सीसोम

: एरॉक्सीसोम्स जन्तु कोशिकाओं तथा सभी प्रकाश संश्लेषण करने वाली काशिकाओं, जैसे- जन्तुओं की यकृत एवम् वृक्क कोशिकाओं में तथा पादपों में पत्तियों की कोशिकाओं, कोलिओप्टाइल (coleoptile), हाइपोकोटाइल्स (hypocotyles), पके हुए फलों (नाशपती) की कोशिकाओं, भूरे शैवालों, ब्रायोफाइट्स तथा फर्न आदि में पाये जाते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के एन्जाइम्स, जैसे- परॉक्सीडेज (Peroxidase), कैटालेज ( catalase) ], डी- अमीनो अम्ल ऑक्सीडेज (Damino acid oxidase) तथा यूरेट ऑक्सीडेज (Urate oxidase) आदि प्रचुरता से पाये जाते हैं। अत: परॉक्सीसोम्स विभिन्न पदार्थों के ऑक्सीकरण (oxidation) में भाग लेते हैं। ऑक्सीकरण की क्रिया दो चरणों में पूरी होती (steps) । प्रथम चरण में परॉक्सीसोम्स में उपस्थित ऑक्सीडेज (oxidase) एन्जाइम्स अमीनो अम्लों, यूरिक अम्ल, लेक्टिक अम्ल तथा दूसरे अन्य पदार्थों की, आणविक ऑक्सीजन का उपयोग करके ऑक्सीकरण कर देते हैं । जिसके फलस्वरूप हाइड्रोजन परॉक्साइड (H2O2) प्राप्त होती है। द्वितीय चरण में हाइड्रोजन = परॉक्साइड (H2O2) केटेलेज (Catalase) एन्जाइम के उत्प्रेरण से अन्य पदार्थों के समूह को ऑक्सीकृत करती है, तथा जल व ऑक्सीजन में टूट जाती है ।

पादप कोशिकाओं में परॉक्सीसोम्स अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, माइटोकॉन्ड्रीया तथा क्लोरोप्लास्ट से जुड़े रहते हैं तथा प्रकाशीय श्वसन (Photorespiration) में भाग लेते हैं।

परॉक्सीसोम्स की संरचना (Structure of peroxisomes ) – परॉक्सीसोम्स अण्डाकार, कणिकाएँ (ovoid granules) होती हैं। इनके चारों ओर एक इकहरी लाइपोप्रोटीन से बनी झिल्ली होती है। इनके केन्द्र में कणिकामय पदार्थ होता है जो एक सघन संरचना बनाता है। चूहे की यकृत कोशिकाओं में लगभग 70 से 100 तक की संख्या में परॉक्सीसोम्स पाये जाते हैं । इनका औसत व्यास लगभग 0.6mp से 0.7mp होता है।

परॉक्सीसोम्स में सम्पन्न होने वाली दो मुख्य जैव रासायनिक क्रियाएँ निम्न हैं-

(a) हाइड्रोजन परॉक्साइड उपापचय – (H2 O2 metabolism) – परॉक्सीसोम्स में केटेलेज तथा कुछ अन्य एन्जाइम पाये जाते हैं, जो कि हाइड्रोजन परॉक्साइड उत्पादित करते हैं। इस अभिक्रिया में इन एन्जाइम के लिए ग्लाइकोलेट ( glycolate), L- लेकटेट (L-lactate) तथा L-हाइड्रोक्सी अम्ल (L-hydroxy acid) प्राथमिक इलेक्ट्रॉन दाता होते हैं । इस प्रकार इस क्रिया में ऑक्सीजन का एक अणु प्राप्त करके, हाइड्रोजन पराक्साइड का एक अणु बनता है । तत्पश्चात् केटेलेज एन्जाइम की क्रियाशीलता से परॉक्सिइडेशन हो जाता है। जैसे इथेनॉल (Ethanol) का एसीटेल्डिहाइड (acetaldehyde) में, फॉर्मिक अम्ल (Formic acid) का कार्बन-डाइ-ऑक्साइड तथा जल में या फिर हाइड्रोजन परॉक्साइड अणु का ऑक्सीजन (oxygen) तथा जल (water) में । प्रत्येक पद में ऑक्सीजन ग्रहण की जाती है ।

 

(b) ग्लाइकोलेट चक्र (Glycolate Cycle ) — पादप पत्तियों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले परॉक्सीसोम्स में केटेलेज एन्जाइम के अतिरिक्त ग्लाइकोलेट चक्र के एन्जाइम, जैसे- ग्लाइकोलेट ऑक्सीडेज ( glycolate oxidase), ग्लूटामेट ग्लाइआक्सीलेट (glutamate glyoxylate) सीरीन ग्लाइआक्सीलेट ( Serine glyoxylate), एस्परेट – a- कीटोग्लूटरेट अमीनोट्राँसफरेजेज (asparate-a- ketoglutarate aminotransferases), हाइड्रोक्सी पाइरूवेट रिडक्टेज (hydroxy pyruvate reductase) तथा मैलिक डिहाइड्रोजिनेज (malic dehydrogenase) आदि भी पाये जाते हैं । इसके अलावा कुछ को एन्जाइम जैसे FAD, NAD तथा NADP भी पाये जाते हैं । ग्लाइआक्सीलेट चक्र के परिणामस्वरूप ग्लाइसीन (glycine) तथा सीरीन ( serine) अमीनो अम्लों का निर्माण होता है। इन अमीनो अम्लों के निर्माण के लिए प्रकाश संश्लेषण के दौरान होने वाले कार्बन अपचयन चक्र में उत्पन्न होने वाले मध्यवर्ती उत्पाद काम में आते हैं । ग्लाइआक्सीलेट चक्र में विभिन्न क्रमिक अभिक्रियाओं द्वारा ग्लीसरेट (glycerate) सीरीन (serine) में अथवा ग्लाइकोलेट (glycolate) जैसे – क्लोरोप्लास्ट, परॉक्सीसोम्स तथा माइटोकॉन्ड्रिया में सम्पन्न होती हैं। इस चक्र में ग्लाइसीन (glycine) तथा सीरीन (serine) में बदल जाता है। ये अभिक्रियाएं मुख्य कोशिकांगों ऑक्सीजन ग्रहण की जाती है तथा कार्बन डाइ आक्साइड निष्कासित की जाती है। यह चक्र प्रकाशीय श्वसन (Photorespiration) भी कहलाता है, क्योंकि इसकी क्रियाओं के लिए उद्दीपन (stimulus) प्रकाश से ही प्राप्त होता है । (चित्र 2.43 )

चित्र 2.43 : प्रकाशीय श्वसन (Photorespiration) में परॉक्सीसोम्स का कार्य

परॉक्सीसोम्स की उत्पत्ति ( Origin of peroxisomes ) – इनकी उत्पत्ति अन्तः प्रद्रव्यी जालिका की झिल्ली के जगह-जगह पर फूल जाने से फूले हुए भागों में कणिकामय पदार्थ तथा एन्जाइम के इकट्ठा होने से होती है। ये कोशिकांग उत्पन्न होने के 4-5 दिन बाद स्वत: योजिता (autolysis) द्वारा नष्ट हो जाते हैं। इनके एन्जाइमों का संश्लेषण राइबोसोम्स में होता है। एन्जाइम्स अतिवृद्धियों (outgrowths) में पहुँच जाते हैं । तत्पश्चात् अतिवृद्धियाँ अलग होकर परॉक्सीसोम्स कहलाती हैं।

कार्य (Functions)

पूर्व में वर्णित जैव रासायनिक क्रियाओं को सम्पन्न करने के अलावा परॉक्सीसोम्स अन्य कोशिकाओं अथवा सम्पूर्ण कोशिका को हाइड्रोजन परॉक्साइड के जहरीले प्रभाव से बचाये रखते हैं। इसके अतिरिक्त ग्लाइसीन व सीरीन के संश्लेषण के अलावा प्रकाश संश्लेषण के प्राथमिक उत्पाद से 1 दाता (doner) के संश्लेषण में भी भाग लेते हैं।

  1. रसधानियाँ (Vacuoles)

जन्तु कोशिकाओं में प्रायः रिक्तिकाएँ नहीं पाई जाती हैं। कुछ परिस्थितियों में छोटी-छोटी रिक्तिकाएँ पाई जाती हैं, उदाहरणार्थ – भक्षकाणु रिक्तिका (phagocytic vacuole ), भोज्य रिक्तिका (Food Vacuole) तथा संकुचनधानी (contractile vacuole) आदि। प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ नहीं पाई जातीं हैं ( चित्र 2.44A ) ।

पौधों की परिपक्व कोशिकाओं का अधिकतर भाग रसधानी से घिरा होता है। युवा कोशिकाओं में सम्पूर्ण रसधानी कोशिका रस (cell sap) से भरी होती है। पादप कोशिका में एक विशाल केन्द्रीय रिक्तिका होती है जिसके कारण जीवद्रव्य कोशिका में रिक्तिका के चारों ओर कोशिकादृति (primordial utricle) के रूप में उपस्थित रहता है ।

रिक्तिका के बाहर पायी जाने वाली कला अथवा झिल्ली को रसधानी झिल्ली अथवा टॉनोप्लास्ट (tonoplast) कहते हैं । यह झिल्ली वरणात्मक पारगम्यी ( differentially permeable) प्रकार की होती हैं रसधानी के कोशिका रस में 98% जल जिसमें O, CO, अनेक खनिज लवण, खाद्य पदार्थ, अम्ल इत्यादि घुले होते हैं । इस रस में ऐन्थोसाइनिन वर्णक भी घुला हुआ पाया जाता है जो फल, पुष्प, पत्तियों को रंग प्रदान करता है (चित्र 2.44B) |

चित्र 2.44 : पादप व प्राणी कोशिका में रिक्तिका –

  1. प्राणी कोशिका (अमीबा ) B. पादप कोशिका

रिक्तिका को कोशिका का सभागार (Store house) कहते हैं, क्योंकि इसमें उपापचयी क्रियाओं के अपशिष्ट उत्पाद (Waste products) भी पाये जाते हैं। कुछ नीलहरित शैवालों में गैस रिक्तिकाएँ पाई जाती हैं, ये कोशिका को उत्पलावक्ता ( buoyancy) प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त रिक्तिका रस में अधिकतर जल भरा होता है जिसके द्वारा विभिन्न प्रकार की कार्यकीय क्रियाएं सम्पन्न होती हैं।