सौरमंडल किसे कहते हैं परिभाषा क्या है ? सौरमंडल से आप क्या समझते हैं उत्पत्ति solar system in hindi

By   July 5, 2021

solar system in hindi सौरमंडल किसे कहते हैं परिभाषा क्या है ? सौरमंडल से आप क्या समझते हैं उत्पत्ति ?

ग्रहों एव उपग्रहों से युक्त मंडल जिसका सूत्रधार सूर्य है-सौर मंडल कहलाता है। यह अनेक रहस्यों एवं समस्याओं से युक्त है, जिनके निराकरण में अतीत से वर्तमान तक, अनेक अन्वेषक, विचारक, वैज्ञानिक तथा खगोलशास्त्री संलग्न हैं। ग्रहों का निश्चित पथ, सूर्य तथा ग्रहों का कोणीय आवेग, ग्रहों की संख्या में भिन्नता ग्रहों पर वायुमंडल एवं इनके उपग्रहों की संख्या में भिन्नता आदि अनेक तथ्य वर्तमान में समस्या बने हैं। इस मंडल के ग्रहों में जैविक, जलवायुविक एवं अन्य दृष्टियों से महत्वपूर्ण, जिस पर मानव जैसा प्राणी आवासित है-वह ग्रह पृथ्वी है। उद्भव प्रक्रिया के काल का निश्चित ज्ञान न होने से अन्य तथ्य रहस्यों में तिरोहित हैं- जिनका विश्लेषण आवश्यक है। प्रथमतः इसकी उत्पत्ति प्रक्रिया का ज्ञान, जो जिज्ञासा का विषय है-भूगोलविदों, खगोलशास्त्रियों एवं वैज्ञानिकों को अर्जित करना है, तत्पश्चात् अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर इसकी आयु की सीमा ज्ञात करना आवश्यक है। यद्यपि, वैज्ञानिक एवं तज्जनित उपकरणों से समस्या के निराकरण हेतु अनेक प्रयास द्रष्टव्य हैं, तथापि समस्या की जटिलता के आगोश में अवगुंठित हैं।
सौरमण्डल
सौर मण्डल के विषय में अध्ययन एवं अनुसंधान अतीत से होता चला आ रहा है। अतीत में, इसके विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं हो पायी। वर्तमान में, अनेक वैज्ञानिक उपकरणों से मानव सुसज्जित हो गया है, तो ग्रहों, उपग्रहों के विषय में तिरोहित अनेक रहस्य स्पष्ट हो रहे हैं। ग्रहों के बीच की दूरी, भ्रमण पथ, इनके भ्रमण के नियम के विषय में अधिकाधिक ज्ञानार्जन किया जा रहा है। पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आयु का विश्लेषण करने के पूर्व मैं सौरमण्डल के विषय में संक्षिप्त परिचय करा देना उपयुक्त समझता हूँ।
सूर्य सम्पूर्ण ग्रहों का केन्द्र है। इसके अतिरिक्त सौर मण्डल में कोई अन्य तारा नहीं है। इसलिए कभी-कभी सौर मण्डल को सूर्य का परिवार भी कहा जाता है। सूर्य अन्य ग्रहों की अपेक्षा बहुत बड़ा है। इसका अर्द्ध व्यास लगभग 8,86.000 मील है। इस प्रकार यदि सभी ग्रहों को एकत्रित पिण्ड के रूप में माना जाय तो सूर्य इससे कई गुना बड़ा होगा। पृथ्वी की अपेक्षा इसका घनफल 13,00,00,000 गुने से भी अधिक है। सूर्य की सतह का तापमान 12,000° फॉरेनहाइट से कम नहीं आंका जाता है। यही कारण है कि सूर्य अन्य ग्रहों को ताप प्रदान करता है। सूर्य में बहुत बड़ी गुरुत्वाकर्षण शक्ति विद्यमान है। विद्वानों के अनुसार गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रभाव अन्य ग्रहों पर 12 मील प्रति सेकेन्ड होता है। इसमें पर समय समय पर ज्वालामुखी का उद्गार होता है, जिससे ताप और अधिक बढ़ जाता है। इसके उद्गार के कारण काले धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सूर्य अपनी धुरी पर अवश्य घूमता है, परन्तु अन्य तारों और ग्रहों का भ्रमण नहीं करता है। विद्वानों का मत है कि सम्पूर्ण सौर मण्डल जिसमें सूर्य भी है, ‘बेगा तारे‘ की ओर अग्रसर हो रहा है।
सूर्य के सबसे निकटवर्ती ग्रह बुध (Mercury) है। यह ग्रह अपने अक्ष पर सूर्य के चारों ओर 88 दिनों में चक्कर पूरा कर लेता है। तात्पर्य यह है कि सूर्य के अक्ष पर घूमने तथा बुध के अक्ष पर घूमने का समय एक है। ऐसी देशा में, बुध का एक पथ सूर्य के सामने तथा दूसरा विपक्ष में रहता है। बुध का वह भाग जो सूर्य के सामने रहता है, वह गर्म रहता है तथा जो इसके विपरीत रहता है, काफी ठंडा रहता है। बुध में कुछ अन्य विशेषतायें भी हैं, जो अन्य ग्रहों में नहीं हैं। इसके एक भाग में सदैव प्रकाश रहता है तथा एक भाग में सदैव अन्धकार रहता है। पृथ्वी में भी यह विशेषता पायी जाती है। पृथ्वी अपना चक्कर 24 घण्टे में तथा सूर्य का चक्कर 365 में पूरा करती है। इस प्रकार पृथ्वी का एक भाग सूर्य के सामने आता है तथा दूसरा भाग सूर्य के विपरीत रहता है। बुध 38 दिन में एक बार अपना भ्रमण पूरा करता है तथा प्रकाश एक ओर सदैव बना रहता है। बुध सूर्य के सबसे निकट है, जिस कारण सर्वाधिक ताप अर्जित करता है तथा सबसे तेज गतिशील भी है। इसका पथ बहुत ही अण्डाकार है। जब पथ सूर्य से काफी दूर रहता है तो इसकी गति मन्द तथा जब पथ सूर्य के निकट रहता है तो गति तीव्र रहती है। यह ग्रह प्रकाशमान धातु का बना है तथा 400° सेल्सियस तापमान प्रस्तुत करता है। प्रकाशहीन भाग में-215° सेल्सियस तापमान रहता है। जब यह सूर्य के निकट आता है तो इसकी दूरी 2,85,00,000 मील रहती है, परन्तु जब दूर रहता है तो इसकी दूरी 4,35,00,000 मील हो जाती है।
बुध के बाद दूसरा ग्रह शुक्र (Venus) आता है। यह ग्रह अधिक चमकीला है, जिससे आकाश में आसानी से दिखाई पड़ता है। इसकी सतह ताप को प्रतिवर्तित करती रहती है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि 59 प्रतिशत ताप प्रतिवर्तित हो जाता है। यह ग्रह 295 दिन में सूर्य की परिक्रमा कर लेता है। यह ग्रह कई अर्थों में पृथ्वी से साम्य प्रस्तुत करता है। इसके ऊपर एक पतला वायु मण्डल है, जबकि बुध ग्रह के ऊपर वायुमण्डल नहीं है। शुक्र ग्रह का ऊपरी भाग अर्थात् वायुमण्डलीय भाग कभी-कभी वायु से ढका रहता है।
तीसरा ग्रह पृथ्वी (The Earth) है। इसका भ्रमण-पथ अण्डाकार है। जब पृथ्वी सूर्य से सबसे अधिक दूरी पर भ्रमणशील रहती है, तब इसकी दूरी सूर्य से 9,50,00,000 मील रहती है तथा जब सूर्य के निकट आती है, तब यह दूरी बहुत कम हो जाती है। यह सूर्य की परिक्रमा अण्डाकार पथ पर 19 मील प्रति सेकेन्ड की गति से करती है। इसका विषुवत् रेखीय व्यास लगभग 7927 मील है, परन्तु ध्रुवीय व्यास इससे 27 मील छोटा है।
चैथा ग्रह मंगल ग्रह (Mars) है। यह धीमा लाल रंग का प्रकाश प्रस्तुत करता है। मंगल ग्रह लगभग 687 दिन में सूर्य की परिक्रमा करता है। सूर्य से इसकी औसत दूरी लगभग 14,15,60,000 मील है। यह ग्रह भी कभी सूर्य के निकट कभी सूर्य से दूर चला जाता है। यह दोनों ओर चपटा है। इस ग्रह पर भी जलवायु सम्बन्धी तथ्य दिखाई पड़ते हैं। इस ग्रह पर जीवित पदार्थ होने का अनुमान लगाया जाता है, किन्तु अभी तक पता लगाया नहीं जा सका है। मंगल ग्रह के बाद तथा वृहस्पति ग्रह के पहले एक और ग्रह था, जो छोटे-छोटे टुकड़ों में बट गया तथा इस ग्रह के हजारों टुकड़े मंगल तथा वृहस्पति ग्रहों के मध्य चक्कर लगाते हैं। इन ग्रहों को प्लेनीट्वायड अथवा बौने ग्रह कहते हैं।
पृथ्वी के बाद वृहस्पति ग्रह (Jupiter) आता है। सबसे बड़ा ग्रह है। इसका व्यास पृथ्वी के व्यास से 11 गुना बड़ा है। अन्य ग्रहों के संयुक्त पिण्ड से भी यह ग्रह बड़ा है। इसकी गति भी अन्य की अपेक्षा तीव्र है। अपने विषुवतीय भाग पर भी 30,000 मील प्रति मिनट की गति से भ्रमण करता है। इसकी सतह पर अनुमानतः 3 पेटियाँ पायी जाती हैं, जो 70,000-1,00,000 मील की चैड़ाई में फैली है। इस ग्रह पर तापमान अल्प है। यहाँ का तापमान -140° सेल्सियस है। अतः यह एक ठंडा ग्रह है। इसलिए इसके ऊपर जीव का होना सम्भव नहीं है। वृहस्पति ग्रह की पेटियों में कभी-कभी बर्फ एवं बादलों के जमाव का भी आभास होता है। बृहस्पति ग्रह कई अर्थों में अन्य ग्रहों से भिन्न है। यह बड़ा होते हुए भी सबसे ठंडा ग्रह है। इस पर वायुमण्डल पाया जाता है, जिसमें बादलों जैसा जमाव दिखाई पड़ता है।
इसके बाद शनि ग्रह (Saturn) आता है, जो पीले रंग का है। इसके चारों ओर घेरा बना दिखाई पड़ता है, जो प्रधान ग्रह से दूर है। यह ग्रह भी ठंडा ग्रह है, क्योंकि इसका तापमान 100° सेल्सियस है। सबसे पहले गैलेलियो ने शनि ग्रह के घेरे को देखा था। इसमें 3 घेरा है। इन तीनों घेरों को पहले विद्वानों ने दो ग्रहों का मिला हुआ रूप समझा था। ऐसा प्रतीत होता है कि ये घेरे किसी लाल पदार्थ के जमाव से बने हैं। बीच का घेरा अधिक चमकीला है। यह वृहस्पति से छोटा है, परन्तु इसकी दशायें वृहस्पति से मिलती हैं। इस पर भी वायुमण्डल पाया जाता है। इस ग्रह के 16 उपग्रह हैं, जो इसके घेरे से बाहर विद्यमान हैं। एक उपग्रह विपरीत दिशा में घूमता है। इस पर तापमान कम होने के कारण जीव की कल्पना नहीं की जा सकती है।
शनि ग्रह के उपरान्त अरुण ग्रह (Uranus) का क्रम आता है। इसका ज्ञान सन् 1781 ई० में हुआ था, क्योंकि इसे बिना दुर्बीन की सहायता से नहीं देख सकते हैं। यह पृथ्वी से 4 गुना बड़ा है। इस पर भी वायुमण्डल है। इसके 15 उपग्रह हैं। अरुण ग्रह के बाद बरुण ग्रह (Naptune) आता है। इसका ज्ञान सन् 1846 ई० में हुआ था। इसका भी एक उपग्रह विपरीत दिशा में भ्रमणशील है। इसका आकार पृथ्वी के आकार से कुछ बड़ा है। सबसे अन्त में कुबेर ग्रह (Pluto) आता है। इसकी खोज सन् 1930 ई० में की गयी है। यह छोटा ग्रह है, परन्तु बुध से थोड़ा बड़ा है। इसके उपग्रह नहीं हैं। यह अन्य ग्रहों से काफी भिन्न है।