एकात्मकता का अर्थ क्या है | सामाजिक एकात्मकता को परिभाषित करो किसे कहते है social unity in hindi

By   November 17, 2020

social unity in hindi एकात्मकता का अर्थ क्या है | सामाजिक एकात्मकता को परिभाषित करो किसे कहते है ?

सामाजिक एकात्मकता
इस इकाई में आर्थिक एवम् सामाजिक एकात्मकता अथवा एकात्मकता से सम्बन्धित दर्खाइम के विचारों की चर्चा की गयी है। दर्खाइम ने इनका अध्ययन अपनी पुस्तक, द डिविजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी, में किया है। दर्खाइम की रुचि सामाजिक जीवन के नियंत्रण और संचालन की शक्तियों को जानने में थी। अपने विचारों को धारणात्मक रूप देने हेतु उसने खण्डात्मक व जटिल समाजों के बीच विभेद किया। इन समाजों के क्या लक्षण हैं तथा उनमें किस प्रकार से एकात्मकता आती है? इन प्रश्नों का उत्तर उसने एकात्मकता के दो प्रकारों में वर्गीकरण द्वारा दिया है। इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक रूप से देते हुए उसने कहा है कि एकात्मकता दो प्रकार की (प) यांत्रिक व (पप) सावयवी होती है। उसने इनमें भेद निहित कानूनों द्वारा किया है।

दर्खाइम के समाजशास्त्रीय चिंतन में सामाजिक एकात्मकता (ेवसपकंतपजल) का विशेष महत्त्व है। इस इकाई में हमने दर्खाइम के एकात्मकता पर विचारों को विस्तार में समझाते हुए यांत्रिक तथा सावयवी एकात्मकता पर विशिष्ट चर्चा की है। आइए, पहले यांत्रिक एकात्मकता को समझें।

 यांत्रिक एकात्मकता
यांत्रिक एकात्मकता की प्रकृति को दर्खाइम ने सूइ जेनरिस (ेनप हमदमतपे) माना है अर्थात् जिसका जन्म स्वतः सहजता से हुआ हो। यह व्यक्ति को समाज से प्रत्यक्ष रूप से जोड़ती है। इस एकात्मकता का उदय समूह के सदस्यों के समान जीवन क्रम व एक से ही अनुभवों से होता है। एक यंत्र या मशीन से बनी वस्तुएं सभी समान आकार व गुण की होती हैं, इसी प्रकार आदिम समाज में ऐसा लगता है कि हर व्यक्ति (लिंग व आयु समान होते हुए) दूसरे व्यक्ति जैसा ही है। उनमें ऐसी समरूपता हैं कि वह यंत्रवत् हों या एक ही मशीन की उत्पत्ति हों। ऐसी समरूपता के आधार पर जो समाज में एकात्मकता बनती है, उसे यांत्रिक एकात्मकता कहा गया है।

दर्खाइम ने इस बात का समर्थन किया है कि एक विशिष्ट प्रकार की सामाजिक संरचना समरूपता प्रदान करती है। इनके लक्षणों का वर्णन एक समरूपी खण्डों की व्यवस्था की तरह किया जा सकता है, जिसमें प्रत्येक खण्ड एक दूसरे के समान है। समरूपी तत्व खण्डों में स्वयंमेव निहित होते हैं, अतः समाज अत्यंत ही छोटे-छोटे भागों में विभक्त हो जाता है जो व्यक्ति को पूर्णलः ढ़क लेता है। मूल रूप से, खण्डात्मक समाज कुल (बसंद) पर आधारित थे तथा ये लक्षण अविकसित समाजों में व्यापक रूप से पाये जाते थे। किन्तु विकास की प्रक्रिया में खण्डात्मक लक्षण समाज में अधिक समय तक लोकप्रिय नहीं रह सके। इनका विस्तार क्षेत्रीय आधारों पर होने लगा और जनसंख्या का बहु भाग धीरे-धीरे रक्त संबंधों (वास्तविक अथवा कल्पित) द्वारा विभाजित न होकर क्षेत्रीय होने लगा। खण्डात्मक सामाजिक संरचना में अन्तर-आश्रिता कम से कम पाई जाती है। इस संरचना के एक खण्ड में जो घटित होता है उससे अन्य खण्डों पर नाममात्र का प्रभाव भी नहीं पड़ता। अन्ततः यह कहा जा सकता है कि खण्डात्मक सामाजिक संरचनाओं में सापेक्षित रूप से पारस्परिक सम्बन्धों का भौतिक व नैतिक घनत्व कम होता है। इसका अर्थ है कि केवल कम संख्या वाले लोगों में (कम विस्तार) आपसी अतःक्रिया होती है तथा लोग कम बार (घनत्त्व) अंतःक्रिया करते हैं। इसका कारण यह है कि जो काम एक व्यक्ति कर सकता है, वह काम अन्य भी कर सकते हैं अतः लोगों को एक दूसरे पर निर्भर नहीं होना पड़ता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि प्रथा के कौन से ढंग यांत्रिक एकात्मकता की परिस्थितियों को व्यावहारिक रूप से नियंत्रित करते हैं? इस प्रश्न की व्याख्या दर्खाइम ने सामूहिक चेतना से की है। उसकी धारणा यह है कि चेतना की समरूपता ऐसे नियमों को जन्म देती हैं जो समान विश्वासों व रीतियों पर आधारित हैं। सामाजिक जीवन में धार्मिक तथा आर्थिक संस्थाएं एक दूसरे से घुली-मिली होती हैं और इस तरह के समाज में विभेदीकरण कम होते हैं व एक तरह का आदिम साम्यवाद पाया जाता है। सम्पत्ति पर समानाधिकार होता है, एक से अनुभव होते हैं और नियम, कायदे-कानून सामान्य जीवन से जुड़े होते हैं। रीतिरिवाजों तथा कानूनों से समूह की रक्षा होती है तथा उन्हीं से समूह की सम्पत्ति व भावनाओं का संरक्षण किया जाता है। इस तरह कानून की प्रकृति सामूहिक होती है और सामूहिक रूप से ही गलत काम करने वाले को दण्ड मिलता है। दंड व्यवस्था से निकली कानूनी अनुज्ञाएं (ेंदबजपवदे) सामाजिक सम्बन्धों की संख्या के अनुरूप होती हैं । सामूहिक चेतना इन अनुज्ञाओं का नियमन तथा नियंत्रण करती है। इस प्रकार दंड व्यवस्था तथा अनुज्ञाओं के सापेक्षिक महत्त्व को समझा जा सकता है। समूह के प्रति किये गये गलत काम को दंड दिया जाता है। जहाँ एक ओर व्यक्ति विशेष को दंड मिलता है, दूसरी ओर दंड से समाज के विश्वास तथा मूल्य मजबूत होते हैं। हर अपराध समूह की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है और हर दंड समूह की सत्ता को पुनरू स्थापित करता है।

प्रश्न है कि यदि व्यक्तियों का समूह एक दूसरे पर कम निर्भर है व और स्वयं में सक्षम है, और ऐसे समाज में यदि संचार की सघनता भी कम है, तो ऐसे समूह में सामूहिक चेतना का विकास कैसे हो सकता है? ऐसे समाज के सारे समूहों में सामाजिक नियंत्रण तथा अनुज्ञाएं कैसे संभव हैं?

 सामूहिक चेतना
सांस्कृतिक अथवा आदर्शात्मक स्तर पर सामूहिक चेतना के तहत् यांत्रिक एकात्मकता कैसे हो सकती है? दर्खाइम ने सामूहिक चेतना को निम्न प्रकार से परिभाषित किया हैः सामूहिक चेतना विश्वासों तथा भावनाओं की वह श्रेणी है जो किसी भी समाज में औसतन प्रकट हो तथा निश्चित प्रकार की व्यवस्था बनाती हो एवम् इसकी अपनी निश्चित प्रकार की जीवनशैली हो। कोई भी सदस्य इनके प्ररूप तथा गुण से सम्बन्धित लक्षणों के आधार पर इनकी पहचान कर सकता है।

सामूहिक चेतनाः प्ररूप के आधार पर
सामूहिक चेतना के प्ररूप के सन्दर्भ में दर्खाइम का कहना है कि सामाजिक बंधनों की शक्ति यांत्रिक एकात्मकता का लक्षण है तथा यांत्रिक एकात्मकता के तीन रूप में सामने आते हैं।
प) सामूहिक चेतना तथा व्यक्तिगत चेतना के आयतन के बीच का सम्बन्ध
पप) सामूहिक चेतना की दशाओं की औसत तीव्रता
पपप) उन सभी दशाओं की अधिक व कम दृढ़ता। दूसरे शब्दों में, जितने ही दृढ़ विश्वास व अनुज्ञााएं समाज में विद्यमान होते हैं उतनी ही कम व्यक्ति की स्वतंत्रता की संभावनाएँ होती हैं। अतः जहाँ यांत्रिक एकात्मकता प्रभावशाली होती है वहाँ सामूहिक चेतना विस्तृत व मजबूत होती है। यह मनुष्यों की गतिविधियों में व्यापक रूप से तारतम्यता लाती है। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्तिगत चेतना कठिनाई से सामूहिक चेतना से अलग करने योग्य होती है। यहाँ सामूहिक सत्ता ही पूर्णता की द्योतक है, चाहे यह पूरे समुदाय में विलीन हो अथवा समुदाय के मुखिया में यह सत्ता अवतरित हो।

सामूहिक चेतनाः तत्वों के आधार पर
सामूहिक चेतना के गुण के सन्दर्भ में विभेद करने वाले अनेक तत्व होते हैं। मुख्य रूप से इनकी प्रकृति धार्मिक होती है तथा धर्म का फैलाव मुख्यतः पूरे समाज में होता है। यह इसलिए होता है क्योंकि सामाजिक जीवन मुख्यतः उभयनिष्ट विश्वासों व अनुज्ञाओं द्वारा नियंत्रित होता है जो सर्वसम्मति से स्वीकार किये जाते हैं।

वास्तविकता यह है कि पुराने समय के अविकसित समाजों में हर वस्तु में धर्म का फैलाव हो गया था। सामाजिक वही था जो धार्मिक था, दोनों शब्द आदिम समाजों में पर्यायवाची थे। अपनी बनावट में सामूहिक व सामाजिक लीन कर चेतना मनुष्यों को उसकी इच्छाओं से भी उच्च जगत में पहुँचाती थी। साकार रूप में सामूहिक चेतना की दशाएँ क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़कर भी प्रजातीय व वातावरण की विशिष्टता के कारण व्यक्ति को उसके उद्देश्यों जैसे जानवर, पेड़, पौधे व अनेकों प्राकृतिक शक्तियों से जोड़ती थीं, बस तभी से लोग इन प्रघटनाओं द्वारा जुड़े हुए हैं। ये प्रघटनाएँ सभी चेतनाओं को समान रूप से प्रभावित करती हैं। सभी व्यक्तियों की चेतना के परिणामस्वरूप समूह-चेतना बनी और ये ही उसके प्ररूप व उद्देश्यों को निश्चित करती हैं। इस प्रकार निर्मित चेतना के निश्चित लक्षण होते हैं।

यांत्रिक एकात्मकता पर चर्चा के बाद सावयवी एकात्मकता पर चर्चा उपभाग 13.4 में होगी। परंतु इसके पहले बोध प्रश्न द्य पूरा करें।

बोध प्रश्न 1
प) निम्नलिखित में से जो सही हो उस पर (अ) का निशान लगाइये।
मूल रूप से खण्डात्मक समाज आधारित होते थे।
(अ) जाति पर
(ब) वर्ण पर
(स) प्रजाति पर
(द) कुल पर
पप) निम्नलिखित में से जो सही हो उस पर
(अ) का निशान लगाइये।
दण्डात्मक कानूनों का उद्देश्य
(अ) व्यक्तियों को अधिक स्वतंत्रता देना था।
(ब) समाज को विभाजित करने का था।
(स) अविकसित समाजों में सामूहिक इच्छा अथवा सामूहिक चेतना के विरुद्ध कार्यों को रोक कर एकात्मकता प्रदान करना था ।
(द) समाज में श्रम विभाजन करने का था।
पपप) सामूहिक चेतना की परिभाषा तीन पंक्तियों में लिखिए।
पअ) यांत्रिक एकात्मकता के अर्थ को तीन पंक्तियों में लिखिए।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
प) (द)
पप) (स)
पपप) सामूहिक चेतना विश्वासों तथा भावनाओं की वह श्रृंखला है जो अविकसित समाजों में मूलतः प्रकट होती है तथा निश्चित प्रकार की व्यवस्था के आधार पर जीवन की एक विशिष्ट शैली रखती है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करके उन समाजों के स्वरूप को धार्मिक बना देती है।
पअ) अविकसित समाजों में, सरल सामाजिक संरचना के नाते समरूपता की विशेषता, जिसमें व्यक्ति की इच्छाएँ सामूहिकता में मिल जाती हैं तथा वह धार्मिक प्रथाओं व नियंत्रण के कारण यंत्रवत कार्य करते हुए समाज को एकीकृत करती है, यांत्रिक एकात्मकता कहलाती है।

एकात्मकता के प्रकार इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
सामाजिक एकात्मकता
यांत्रिक एकात्मकता
सामूहिक चेतना
सामूहिक चेतनाः प्ररूप के आधार पर
सामूहिक चेतनाः तत्वों के आधार पर
सावयवी एकात्मकता
सावयवी एकात्मकता में सामूहिक चेतना के नए रूप
प्ररूप के आधार पर
विषय-वस्तु के आधार पर
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आप के द्वारा सम्भव होगा
ऽ यान्त्रिक एकात्मकता व इसके विशेष प्रकार का सामाजिक संरचना (आदिम समाज जैसी) से सम्बन्ध
ऽ खण्डात्मक सामाजिक संरचना (आदिम समाज) में दण्डात्मक कानून द्वारा एकात्मकता मजबूत करने में योग-दान
ऽ अविकसित समाजों में सामूहिक चेतना का महत्व
ऽ जटिल सामाजिक संरचना में सावयवी एकात्मकता श्रम के विभाजन पर आधारित
ऽ जटिलं सामाजिक संरचना में एकात्मकता के सन्दर्भ में क्षति-पूरक कानून की भूमिका इनमें सामूहिक चेतना का परिवर्तित रूप आदि की व्याख्या तथा विवेचना करना।

प्रस्तावना
प्रस्तुत इकाई के भाग 13.2 में सामाजिक एकात्मकता के विचार को संक्षेप में दिया गया है तथा एकात्मकता के पहले प्रकार का वर्णन 13.3 भाग में यांत्रिक एकात्मकता के सन्दर्भ में किया गया है। दण्ड समाज द्वारा उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसने सामाजिक मान्यताओं की अवहेलना की है। दण्ड देने से समाज की प्रभुता व एकात्मकता पुनरू निर्धारित होती है। इस भाग के उपभागों में सामाजिक संरचना में सामूहिक चेतना के महत्व व परिभाषा को तथा इसकी प्रकृति को समझा गया है। सावयवी एकात्मकता पर भाग 13.4 में चर्चा की गई है। इस भाग में जटिल समाजों की संरचना के सन्दर्भ में कानून के क्षति-पूर्ति वाले पक्ष को प्रस्तुत किया गया है तथा सामाजिक संरचना में श्रम विभाजन सदस्यों को पारस्परिक निर्भर बनाता है व समाज में एकात्मकता बनाए रखता है, इसकी चर्चा की गई है। इस भाग के उपभागों में सामूहिक चेतना के प्ररूप व गुणों (बवदजमदज) में किस प्रकार बदलती हुई परिस्थितियों से परिवर्तन आ गया है उसको भी दर्शाया गया है। इकाई के अन्त में (भाग 13.5) सारांश प्रस्तुत किया गया है।