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social mobility and factors affecting it in hindi सामाजिक गतिशीलता की विशेषता को समझाइए | कारक क्या है प्रकार ?

प्रस्तावना
सामाजिक गतिशीलता, सामाजिक स्तरीकरण के उन क्षेत्रों में से एक है जिसमें सबसे अधिक अनुसंधान हुए हैं। अभी तक आप जान चुके हैं कि विभिन्न समाजों में गतिशीलता का क्या अर्थ है। इस इकाई में हम कुछ ऐसे घटकों के बारे में विचार करेंगे जो सामाजिक गतिशीलता पर प्रभाव डालते हैं। इसलिए चर्चा करने से पूर्व हमें कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहली बात यह है कि सामाजिक गतिशीलता स्तरीकरण के सिद्धांत से अलग नहीं है (क्योंकि जब हम सामाजिक गतिशीलता के घटकों की बात करते हैं तो अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क में कोई सिद्धांत होता है।) अथवा समाज की संरचना किस प्रकार होती है। दूसरे शब्दों में इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि सामाजिक गतिशीलता के अध्ययन को किसी एक समाज की स्थापना या उसकी उत्पत्ति से अलग नहीं किया जा सकता।

दूसरा पक्ष यह है कि जब हम सामाजिक गतिशीलता पर प्रभाव डालने वाले घटकों की चर्चा करेंगे तब इन्हें आप गतिहीन अथवा स्थिर बिल्कुल न मानें क्योंकि ये तत्व परिवर्तनीय होते हैं। सामाजिक गतिशीलता के अथवा उसकी रूढ़िवादिता के किसी समाज और किसी विशेष सामाजिक स्तरीकरण के लिए दूरगामी परिणाम होते हैं। चर्चा में क्रमशः विस्तृत विवरण दिया जाएगा। अंत में विभिन्न विद्वानों के मतांतरों को भी प्रस्तुत करेंगे। जो उन्होंने सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाले घटकों के संबंध में जाना है। इस भाग में हम गतिशीलता के प्रश्न पर विभिन्न तरीकों से किए गए विचारों पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे। यह सच है कि सामाजिक गतिशीलता सभी समाजों में मौजूद होती है। यहाँ तक कि भारत में जाति प्रथा के दायरे में आने वाले समाज जो खास कर ‘अवरुद्ध‘ या बंद होते हैं उनमें भी गतिशीलता को देखा जा सकता है और औद्योगीकरण जहाँ सामाजिक गतिशीलता की दर अत्यधिक होती। इसीलिए सबसे अधिक गतिशीलता के संबंध में अनुसंधान औद्योगिक समाजों में, सामाजिक गतिशीलता, तथा वहाँ पर गतिशीलता को प्रभावित करने वाले घटकों पर हुए हैं।

रूस के प्रसिद्ध समाजशास्त्री, सोरोकिन ने सामाजिक गतिशीलता का अध्ययन प्रमुख रूप से किया है। उनके अनुसार, कुछ प्राथमिक घटक होते हैं जो सभी समाजों में गतिशीलता को प्रभावित करते हैं। तथा दूसरी तरह के वे घटक होते हैं जो विशेष प्रकार के होते हैं। इसलिए वे खास समाजों में किसी खास समय पर ही अपना प्रभाव डालते हैं। उनका तर्क है कि कोई भी समाज पूरी तरह से अवरुद्ध या बंद नहीं होता है। साथ ही, ऐसे भी समाज नहीं होते हैं जो बिल्कुल या पूर्ण रूप से मुक्त हों क्योंकि खुले समाजों में भी कहीं न कहीं गतिशीलता के लिए बंधन होते हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि कोई भी समाज न तो पूर्ण रूप से अवरुद्ध होता है और न ही पूर्ण मुक्त होता है। उन्होंने प्राथमिक घटकों की सूची बनाई है जिनकी संख्या चार है। ये हैं-जनसांख्यिकीय (जनसंख्यात्मक) घटक, अभिभावकों तथा बच्चों की सामर्थ्य या योग्यता, सामाजिक वर्गों में व्यक्तियों के गलत निर्धारण, तथा सबसे महत्वपूर्ण हैकृपरिस्थितियों का परिवर्तन। आइए अब हम क्रमशः प्रत्येक घटक पर चर्चा करें।

जनसांख्यिकीय घटक
जनसांख्यिकीय घटक एक ऐसा घटक है जो सभी समाजों में गतिशीलता को प्रभावित करता है। प्रायः देखा गया है कि ऊँचे वर्गों में जन्म-दर निम्न वर्गों की जन्म-दर की अपेक्षा कम होती है। यद्यपि मृत्यु-दर भी निम्न वर्गों में अधिक होती है, कुल मिलाकर प्रजनन दर ऐसी होती है कि प्रायः उच्च स्थिति में निम्न वर्गों के सदस्यों के लिए कुछ स्थान रहते हैं। उदाहरण के लिए, पेरेने अपने अध्ययन में पाया है कि फ्रांस के कुछ क्षेत्रों में 12000 संख्या में 215 कुलीन वंशों में से एक शताब्दी बाद केवल 149 की संख्या रह गई। आम तौर पर उन्होंने देखा है कि इन वंशावलियों का जीवन-काल तीन से चार पीढ़ियों तक ही रहा। उसके बाद वे या तो उत्पन्न गैर-कुलीन वंशों द्वारा अथवा समानांतर वंशों द्वारा स्थापन्न कर दिए गए। इसी तरह से, एलेक्स इंकलेस ने अपने अध्ययन में जो सोवियत संघ के स्तरीकरण से संबंधित है दर्शाया है कि इस शताब्दी के मध्य में बहुत ही अधिक गतिशीलता रही है क्योंकि इस समय युद्ध में बहुत लोग अपनी जान गँवा चुके थे। इस प्रकार, यह समय की आवश्यकता थी। इसके साथ ही दूसरा कारण तीव्र औद्योगीकरण रहा।

यह तथ्य केवल ऊँचे तथा निम्न समूहों के संबंध में ही नहीं अपितु शहरी और ग्रामीण जनसंख्या के संबंध में भी कहा जा सकता है। ग्रामीणों में प्रायः प्रजनन दर ऊँची रहती है। इसके बावजूद, शहरी जनसंख्या ग्रामीण जनसंख्या की तुलना में अधिक तीव्रता से बढ़ी है। इसका मुख्य कारण जनसंख्या में वास्तविक वृद्धि नहीं है, अपितु इस जनसंख्या में वृद्धि के कारण बड़ी संख्या में शहरी प्रव्रजन का होना है।

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जनसांख्यिकीय तत्व सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करता है। आज आयुर्विज्ञान एवं चिकित्सा पद्धति में विकास और अन्य घटकों के कारण लोगों के जीवन-काल अर्थात् आयु में वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप सेवा निवृत्ति की आयु अधिक हो गई। परिणामस्वरूप नई भर्ती के लिए पदों की संख्या कम रह गई। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि कार्य के लिए समाज में मानव संसाधनों की भरमार है। क्योंकि काम करने की आयु में विस्तार हो गया है। दूसरी तरफ, वृद्धों की देखभाल करने की समस्या भी इसी कारण पैदा हुई है। इस तरह की समस्या पश्चिमी समाजों में कई दशकों से चली आ रही है जिसका वहाँ सामना किया जा रहा है।

इसके कारण, साथ ही अनेक वृद्ध लोगों के लिए सदन, अस्पताल आदि भी खोलने पड़े हैं जहाँ पर वद्धों को रखा जाता है और बीमार होने पर उनका इलाज तथा देखभाल की जाती है। गतिशीलता के दृष्टिकोण से इसे यूँ देखा जाना चाहिए कि इसके परिणामस्वरूप नए पदों का सृजन भी हुआ है जिन्हें अवश्य ही भरा जाना है।

अतः यह कहा जा सकता है कि जनसांख्यिकीय घटक निश्चित रूप से सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करता है, परंतु यह अपने आप में विशुद्ध रूप से जैविक परिघटना नहीं है क्योंकि इसमें सामान्यतः सामाजिक घटक भी हैं। उदाहरणार्थ, मैंडेलबाम तथा अन्य विद्वानों ने लिखा है कि किस प्रकार सांस्कृतिक घटक जैसे एक पुत्र की आकांक्षा जनसंख्या संरचना में किस तरह प्रभावित करते हैं।

प्रतिभा एवं योग्यता
सामाजिक गतिशीलता के लिए प्रतिभा एवं योग्यता को घटकों के रूप में देखने वाले अनेक लोगों ने विभिन्न तरीकों से चर्चा की है। सोरोकिन ने अपने अध्ययन में इंगित किया है कि प्रायः अभिभावकों और बच्चों की योग्यता समान नहीं होती है। आरोपित अथवा वंशगत समाजों में बच्चे सामान्यतः अपने माता-पिता की तरह अपनी वंशानुगत स्थिति के लिए हमेशा उपयुक्त नहीं होते। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि जो बच्चे अपने अभिभावकों से सम्पत्ति या पद प्राप्त करते हैं उसे वे संभाल नहीं पाते। इस समस्या से संबंधित अनेक मुद्दों के संबंध में सोरोकिन ने बहुत सारे सुझाव प्रस्तुत किए हैं। व्यक्तिगत रूप से विरासत में मिली स्थिति के अयोग्य होने पर उनपर अत्यधिक दबाव पड़ता है कि वे इस स्थिति को छोड़ दें। इसलिए पहले से ही अधिकार प्राप्त नव-आगंतुक रिक्त स्थिति को अपनाते जाते हैं। लिपसेट तथा बैन्डिक्स का कहना है कि हमेशा ही नए प्रतिभाशाली लोग आते रहते हैं या पैदा होते रहते हैं और कहीं न कहीं उनका समावेश हो जाता है। यहाँ तक कि पैतृक पद और स्थिति प्राप्त पैतृक समाजों में भी व्यक्तिगत रूप से प्रतिभाशाली व्यक्तियों के उर्ध्व स्तर की गतिशीलता के अवसर उपलब्ध होते हैं। ब्लॉच ने अपने अध्ययन में दिखाया है कि सामंतवाद की प्रथम स्थिति में भी अदम्य सास वाले लोग प्रगति कर सकते थे।

इसी प्रकार, बेरगल ने अपने सामाजिक स्तरीकरण के अध्ययन में इस तत्व को प्रदर्शित किया है। उनके अनुसार रुढ़िवादी पदानुक्रम सामंती व्यवस्था में भी निम्न जाति में जन्मे व्यक्ति को भी प्रतिभा के बल पर ऊँचे स्तर की गतिशीलता का अवसर मिलता था। सामंतवाद में जो बंधुआ मजदूर या बंधुआ नौकर होते थे, उनकी स्वामिभक्ति के कारण उन्हें ‘लिपिकीय वर्ग‘ में शामिल किया गया था। इसके साथ ही जो लोग घरों में काम करते थे, उन्हें भी सेवा के पुरस्कार के रूप में जागीरें तक भी दी जाती थी। टर्नर ने अपने अध्ययन में इस प्रकार की गतिशीलता को श्प्रायोजित गतिशीलता‘ कहा है (प्रतियोगी गतिशीलता के विपरीत)। फिर भी गतिशीलता के पूर्व-औद्योगीकरण रूप में इसका संदर्भ नहीं लिया जा सकता।

जब समाजों में यहाँ तक खुले समाजों में भी किसी नई प्रतिभा के समावेश को समस्यामूलक की दृष्टि से देखा जाता है तो इसे आसानी से स्वीकृत नहीं किया जाता है। कहने का आशय यह है कि प्रगतिशील समाज भी वास्तव में उतने खुले नहीं होते हैं, जैसा कि सामान्यतः माना जाता है। इस संदर्भ में डेविस और मूरे के कार्यात्मक सिद्धांत के बारे में संक्षेप में जानकारी देना समीचीन रहेगा। सारांश में यह सिद्धांत कहता है कि विभिन्न सामाजिक स्थितियों के कारण ही प्रतिभा और प्रशिक्षण के आधार पर व्यक्तिगत स्तर एवं प्रस्थिति को समाज में स्थापित किया जाता है। उस समय समाज में उसकी स्थिति भिन्न होती है। विभिन्न लाभ उनके साथ जुड़े होने के कारण अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थितियाँ अधिक योग्य व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इस प्रकार से समाज बहुत महत्वपूर्ण स्थितियों में सबसे अच्छे मानव संसाधनों का प्रयोग करने में सफल होता है। अतः स्तरीकरण एक साधन है जिससे सामाजिक प्रस्थापन तथा प्रेरणा का स्वरूप बनता है।

जहाँ इस सिद्धांत को परिष्कृत तथा कठोर माना गया इसकी बुनियादी आलोचना भी हुई तथा इसका अनेक प्रकार से खंडन भी किया गया। वर्तमान चर्चा के संदर्भ में अर्थात व्यक्तियों की योग्यता के संदर्भ में विद्वानों ने पाया कि तथाकथित खुले समाज कहीं न कहीं अधिक रूढ़िवादी होते हैं जो व्यक्तियों को उनकी योग्यता के आधार पर सामाजिक स्थिति प्रदान करते हैं। यद्यपि वर्ग की उत्पत्ति में जाति या नस्ल जैसी असमानता स्पष्ट नहीं है तो भी पीढ़ी दर पीढ़ी लगभग असमानता जैसी स्थिति का पुनर्जन्म होता रहता है। अवसरों की असमानता का अर्थ है-निम्न वर्ग का अधिक योग्य व्यक्ति भी उन्नति करने में असमर्थ रहता है अथवा उसे अवसर प्राप्त नहीं होते। हम यहाँ पर कह सकते हैं कि माइकल यंग द्वारा दिया गया व्यंग्यात्मक कथन कि ‘मेघाविता का उदय‘, ‘खुले‘ समाजों में होता है वास्तव में गलत है। वह इस मिथक का प्रभावी ढंग से खंडन करता है कि वास्तव में प्रतिभा और योग्यता का जन्म खुले समाजों में होता है। पश्चिमी औद्योगिक समाजों में गतिशीलता के वास्तविक अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि अधिकांश गतिशीलता ‘जन-गतिशीलता‘ है। और, यह गतिशीलता श्रमिक/गैर-श्रमिक, दोनों में है। वर्ग की उत्पत्ति सबसे ऊँची स्थितियों और सबसे निम्न स्थितियों में आज भी बनी हुई है तथा स्वयं ही स्थापित हो जाती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गतिशीलता को स्पष्ट करने के लिए प्रतिभा जैसे घटक की बहुत मामूली भूमिका होती है।

 पद और स्थिति
किसी व्यक्ति की स्थिति में बिना किसी परिवर्तन के भी गतिशीलता आ सकती है, यदि उसकी स्थिति के रैंक में परिवर्तन हो जाए तो। उदाहरण के लिए, अमेरिका में एक अध्ययन से पता चलता है कि पचास के दशक में बीसवें दशक की तुलना में सरकारी पदों की अधिक प्रतिष्ठा थी। इस तरह कहा जा सकता है कि सरकारी नौकरों ने अपने काम में परिवर्तन किए बिना उर्ध्व सामाजिक गतिशीलता का अनुभव किया। निस्संदेह इससे नीचे की ओर भी गतिशीलता देखी जा सकती है। कई बार कुछ कार्यों की प्रतिष्ठा कम हो जाने से वे पहले की अपेक्षा समाज तथा अर्थव्यवस्था में कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं और इन कार्यों को करने वालों की अवनति हो जाती है।

 समरूप परिकल्पना
औद्योगीकरण और स्तरीकरण के संबंधों के बारे में एक प्रसिद्ध और अत्यधिक बहस वाली परिकल्पना है-समरूप परिकल्पना। कैर तथा अन्य लोगों ने इस बारे में स्पष्ट वर्णन किया है। उनके अनुसार आज की दुनिया में औद्योगीकरण एक वास्तविक घटक रहा है जो सभी उद्योगीकृत समाजों को भविष्य के एक सामान्य समाज की ओर प्रेरित करता है जिसे वे बहुवादी वेतनभोगी औद्योगिक समाज के नाम से पुकारते हैं। इन समाजों में स्तरीकरण का समान ढाँचा साथ ही गतिशीलता का भी समान रूप होता है। इस प्रकार की स्थिति में गतिशीलता दर निश्चित रूप से ऊँची होगी क्योंकि औद्योगीकरण की माँग व्यक्तियों की एक स्थिति से दूसरी स्थिति में मुक्त एवं आसान गतिशीलता को उत्पन्न करेगी। एक अर्थ में यह तर्क एक कार्यवादी (व्यावसायिक) तर्क हो सकता है। उनका आशय यह भी है कि समय के अनुसार गतिशीलता में निरंतर वृद्धि होगी।

केर तथा अन्य विद्वानों के तर्कों को गोल्डथॉर्प ने व्यापक रूप से आलोचना की है। उन्होंने अपने तर्क को सबल बनाने के लिए मिलर के अध्ययनों के साक्ष्य दिए हैं जिनमें लिपसेट और बैन्डिक्स से अधिक आँकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। उसने दर्शाया है कि औद्योगिक समाजों की गतिशीलता की दरों में समानता की कमी है। अध्ययन बताता है कि शायद यह औद्योगीकरण ही नहीं है बल्कि इसके साथ अन्य घटक जैसे कि सांस्कृतिक घटक, शिक्षा इत्यादि भी हैं जो सामाजिक गतिशीलता प्रभावित करते हैं। गोल्डथॉर्प स्वयं अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ये राजनैतिक तथा सैद्धांतिक मतभेद हैं जो समाजवादी और पूँजीवादी समाजों के बीच महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं जिन्हें केर तथा उनके साथी विद्वानों ने श्औद्योगिक समाजश् की श्रेणी के अंतर्गत रखा है।

अभ्यास 1
समरूप परिकल्पना के बारे में अन्य विद्यार्थियों और अध्यापकों से चर्चा कीजिए। इसे किस सीमा तक स्वीकार किया जा सकता है। अपने निष्कर्ष लिखिए।

यह केर तथा लिपसेट एवं बैन्डिक्स के तर्कों के बीच सतही समानता है। परंतु वास्तव में लिपसेट तथा बैन्डिक्स के तर्कों पर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं, इनके अनुसार औद्योगीकरण के एक विशिष्ट स्तर के पश्चात गतिशीलता दरों में वृद्धि होती है लेकिन इनमें निरंतर तथा एक-समान वृद्धि की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। हमें यहाँ पर सोराकिन के कथन को ध्यान में रखना होगा जिसमें उन्होंने न तो विशेष समय के बाद गतिशीलता में लगातार वृद्धि की और न ही गिरावट की भविष्य की है। वास्तव में वे मानते हैं कि न तो औद्योगिक समाज पूर्ण रूप से मुक्त होते हैं और न ही पूर्व-औद्योगिक समाज पूरी तरह से बंद होते हैं। वास्तव में उनका कहना है कि यह गतिशीलता की दर का चक्रीय सिद्धांत है, जो समय-समय पर बढ़ेगा तथा घटेगा।

अधोमुखी गतिशीलता
अभी तक हम केवल इसपर चर्चा करते रहे हैं कि किस प्रकार परिवर्तन लोगों को ऊर्ध्व गतिशीलता की ओर ले जाते हैं। इसको परिभाषित भी किया गया है। इसी तरह के तर्क दूसरी ओर भी दिए जा सकते हैं। क्योंकि यह देखा गया है कि औद्योगीकरण के माध्यम से गतिशीलता ऊपर की ओर जाती है और उसमें वृद्धि भी करती है और इसी के कारण गतिशीलता पर्याप्त रूप से अधोमुखी भी होती है। अधोमुखी गतिशीलता इसलिए होती है कि कुछ व्यवसाय अपनी प्रतिष्ठा खो देते हैं जब उनकी स्थितियों का पुनःनिर्धारण कर दिया जाता है। इस प्रकार उन व्यवसायों को करने वाले स्वयं ही अधोमुखी गतिशीलता को प्राप्त कर लेते हैं। फिर भी, इस तरह के बहुत सारे मामले हो सकते हैं जिनमें केवल अधोमुखी गतिशीलता ही नहीं होती अपितु बहुत-सी स्थितियाँ समाप्त हो जाती हैं। यदि ऐसी स्थितियों का प्रयोग किया जा सके तो यह मामला संचरण (अधोमुखी) गतिशीलता की अपेक्षा संरचनात्मकता (अधोमुखी) गतिशीलता का मामला होगा।

उदाहरण के लिए जब से भारत में पॉलिस्टर और अन्य कृत्रिम वस्त्रों का प्रचलन हुआ, सूती वस्त्रों की माँग में अत्यधिक कमी आ गई। इसके साथ ही, भारतीय सूत एवं कच्चे माल की भूमण्डलीय माँग में कमी आ गई। इन कारणों से भारत में कपास की खेती करने वाले अनेक किसान उजड़ गए। कपास की खेती करने वाले किसानों में से कुछ ने अन्य फसलें उगानी शुरू कर दी, कुछ लोगों ने अन्य धंधे अपना लिए। यहाँ तक कि कुछ असहाय कपास पैदा करने वाले किसानों ने आत्महत्या तक कर ली है। उदाहरण के लिए, घरेलू सामान की या घरेलू काम-धंधे में आधुनिकता और नवीन परिवर्तनों के कारण परंपरागत व्यवसायों पर चिंतनजनक प्रभाव पड़ा है। अब वस्त्र धुलाई यानी कि धोबी के काम में अधिक लोग नहीं खपाए जा सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि धोबी के काम में मंदी इसलिए आई है कि अब घर-घर में धुलाई-मशीनें मौजूद हैं जिससे धोबी के काम में नितांत मंदी आई है। आज इस बात की चिंता नहीं है कि परंपरागत घरेलू कार्यों में कमी आई है बल्कि भारत में निम्न जातियों से संबंधित मानव प्रतिष्ठा में अत्यंत गिरावट आई है तथा उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य महत्वहीन समझे जाते हैं और वे जो कार्य करते हैं उनके माध्यम से अपना जीवन-यापन करने में असमर्थ हैं। यदि इन लोगों के जीवन-यापन के लिए अन्य धंधों का विकल्प उपलब्ध नहीं कराया गया तो ये लोग निश्चित रूप से गरीबी की अंधी खाई में डूब जाएंगे। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बेरोजगारी अधोमुखी गतिशीलता का प्रमुख परिणाम है।

 गतिशीलता के अवरोधक
औद्योगीकरण द्वारा उर्ध्व गतिशीलता के अवसर प्रदान होने के विचार प्रस्तुत करने वाले विद्वानों द्वारा प्रायः इसके एक अन्य पहलू कि औद्योगीकरण गतिशीलता में एक अवरोधक का कार्य भी करता है, इसकी अनदेखी की गई है। हम पहले ही बता चुके हैं कि प्रतिभा गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि औद्योगिक समाज उतने खुले अथवा मुक्त नहीं हैं, जितना कि बताया जाता है। कुछ लेखकों का सुझाव है कि आज की व्यवस्थित वर्ग असमानता ने अमानता के ‘विषय‘ (केस) का मार्ग प्रशस्त किया है। इसके साथ ही, यह विचार भी व्यक्त किया जाता है कि पूँजीवादी समाज भी अधिक दिनों तक असमानतावादी नहीं बना रह सकता। जैसा कि मार्क्स ने उसके होने की भविष्यवाणी की थी। इस प्रकार, असमानता में कमी आई है। इस विचार में अनेक शंकाएँ हैं। हो सकता है यह सिद्धांत पश्चिमी देशों में सत्य सिद्ध हो जाए किंतु भारत जैसे देश में ऐसा होना नितांत असंभव है। यहाँ बहुत ही व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण वस्तुओं पर विभिन्न समूहों के दावों को नकार दिया जाता है।

यह सच है कि आज अनेक व्यवसायों में शिक्षा पद्धति के माध्यम से प्राप्त की गई औपचारिक शिक्षा के आधार पर पदों को भरा जाता है या उनमें नियुक्तियाँ की जाती हैं परंतु यह कहना गलत होगा कि सभी को शिक्षा के समान अवसर मिल जाते हैं तथा सभी शिक्षाएँ समान गुणवत्ता वाली होती हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि गतिशीलता में आने वाली कानूनी अड़चनों को तो समाप्त किया जा चुका है। किंतु समाज में जो असमानताएँ व्याप्त हैं। वे अपने आप में ही गतिशीलता के अवरोधक सिद्ध होती हैं।

 मार्क्सवादी विचारधारा
इस समय मार्क्सवादी विचारधारा के संबंध में चर्चा कर लेना युक्तिसंगत रहेगा क्योंकि अनेक विवेचनात्मक विचार-बिंदु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसी से लिए गए हैं। स्तरीकरण तथा गतिशीलता की मार्क्सवादी विचारधारा का मूलाधार समाज की वर्ग प्रकृति पर आधारित है। इस प्रकार, इन मामलों में मार्क्सवादी विचारधारा है। मार्क्स ने माना है कि जैसे-जैसे पूँजीवाद का विकास होता है (उन्होंने औद्योगिक समाज जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया है) समाज में धुवीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती है। (इससे उनका अभिप्राय था कि स्तरीकरण व्यवस्था गुंबद जैसी होगी जिसमें अधिसंख्य आबादी निम्न स्तर पर होगी।) यहाँ तक कि मध्यवर्ती समूह जैसे कि छोटे सर्वहारा लोग, छोटे तथा इसी प्रकार के अन्य लोग समयांतर में स्वयं को अधोगति या निम्न स्तर की ओर पाएंगे। अतः यदि संपूर्ण गतिशीलता पूँजीवाद की विशेषता है तो इसका अर्थ अधोमुखी गतिशीलता थी न कि उर्ध्वगामी। इस प्रकार, धुवीकरण तथा अभावग्रस्तता के परिणामस्वरूप पूँजीवादी व्यवस्था नष्ट हो जाएगी और समाजवाद की स्थापना होगी।

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इसके बाद, मार्क्सवादी विचारधारा के लेखकों ने सर्वहारा वर्ग सिद्धांत को विकसित किया। उन्होंने सेवा क्षेत्र व्यवसाय में वृद्धि को दर्शाते हुए यह जानने का प्रयास किया कि क्या नीचे के स्तर के सफेदपोश वर्ग को वास्तव में सर्वहारा वर्ग में सम्मिलित किया जा सकता है और अपने निष्कर्ष में उन्होंने पाया कि इन्हें सर्वहारा वर्ग में शामिल किया जा सकता है। मुख्यतः ब्रेवरमैन तथा अन्य भी इस विचारधारा से सहमत थे, किंतु अन्य मार्क्सवादी लेखक इससे सहमत नहीं थे। मार्क्सवादी विचारधारा से भिन्न डेहंड्रोफ जैसे अन्य विद्वानों का तर्क था कि मार्क्सवादी विश्लेषण के समय से होने वाले परिवर्तनों के कारण अधिक समय तक आधुनिक समाजों को पूँजीवादी समाज नहीं कहा जाएगा। इसकी अपेक्षा इन्हें परिवर्तित पूँजीवादी समाज कहा जा सकता है।

इसलिए मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार गतिशीलता के लिए जिम्मेदार कारण मूलतः पूँजीवादी व्यवस्था में निहित हैं तथा उर्ध्वमुखी गतिशीलता के अवसरों की अपेक्षा इसमें अधोमुखी गतिशीलता ही मुख्य रूप से होती है।