सीमा शुल्क क्या है | सीमाशुल्क की परिभाषा किसे कहते है | प्रकार , महत्व विशेषता दूसरा नाम sima shulk kya hai

By   October 2, 2020

sima shulk kya hai सीमा शुल्क क्या है | सीमाशुल्क की परिभाषा किसे कहते है | प्रकार , महत्व विशेषता दूसरा नाम ?

सीमाशुल्क एवं व्यापार आम सहमति (गैट)
पृष्ठभूमि
व्यापार एवं व्यावसायिक नीति की देखभाल करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने के प्रयास 1947 में ही शुरू हो गये थे। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन के घोषणापत्र की रूपरेखा हवाना सम्मेलन के दौरान ही बन गयी थी, लेकिन कभी भी इसका अनुमोदन नहीं हो सका क्योंकि इसके समर्थकों और विरोधियों के बीच मतभेद उभर आये थे। समर्थक बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था की वकालत कर रहे थे तो विरोधी राष्ट्रीय आधारपूर्ण रोजगार नीतियों की। फिर भी अमरीका का गैट प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया जिस पर अनेक देशों ने हस्ताक्षर भी कर दिए। इस तरह गैट का जन्म बिना किसी औपचारिक संगठन और सचिवालय के हो गया। यह विश्व व्यापार के क्षेत्र में बढ़ते उदारीकरण और गैट समझौतों का ही नतीजा था कि 1995 में विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आ सका।

सदस्य राज्यों के बीच उचित और मुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना गैट का मुख्य उद्देश्य था और इसके लिए गैट के तहत दो मुख्य सिद्धांतों-अभेदमूलकता तथा पारस्परिकता- को अंगीकार किया गया था। भेदभाव न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए गैट सदस्यों ने तय किया था कि तमाम आयात निर्यात में वे अनुकूलतम राष्ट्र (एम एफ एन मोस्ट फेवर्ड नेशन) के सिद्धान्त का अनुपालन करेंगे। इसका मतलब था कि प्रत्येक राष्ट्र के साथ “अनुकूलतम राष्ट्र” जैसा व्यवहार किया जाएगा। फिर भी गैट आर्थिक गोलबंदी को नहीं रोक सका । उदाहरण के लिए मुक्त व्यापार क्षेत्रों अथवा सीमाशुल्क यूनियनों के गठन को मंजूरी दी गई, बशर्ते ऐसी लामबंदी घटक क्षेत्रों में व्यापार को सुगम बनाती हो तथा इससे दूसरे पक्षों के व्यापार पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता हो।

तटकर और व्यापार से तटकर बाधा को दूर करने के उद्देश्य गैट वार्ता के कई-कई दौर चले। यह इसीका नतीजा था व्यापार ड्यूटी में कमी आई। आज गैट में दुनिया के दो तिहाई राज्य शामिल हैं।

उरुग्वे चक्र एवं विश्व व्यापार संगठन
बहुपक्षीय व्यापार समझौतों का अंतिम और आठवाँ चक्र जिसकी बैठक उरुग्वे के पुन्ते देल एस्टेट में हुई थी, जो मुख्य रूप से तीन मसलों पर केन्द्रित था –
1) व्यापार विषयक बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स),
2) व्यापार विषयक निवेश युक्ति (ट्रिप्स) तथा,
3) कृषि वस्तुओं का व्यापार।
तीसरी दुनिया के देश गैट समझौतों से कमोवेश असंतुष्ट ही रहे हैं। व्यापार से संबंधित बौद्धिक संपदा के उदारीकरण का मतलब यह होगा कि अल्पविकसित देशों को उन्नत देशों अथवा अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के साथ प्रतियोगिता में खड़ा होना होगा। बौद्धिक संपदा के तहत कॉपीराइट्स पेटेन्ट तथा ट्रेडमार्क के मसले आते हैं। संभव है कि इससे अल्पविकसित देशों की घरेलू प्रौद्योगिकी एवं उनके नवजात उद्योगों खासकर चिकित्सा एवं दवा उद्योगों, को नुकसान उठाना पड़े। गैट के ट्रिप्स प्रावधानों के अंतर्गत सेवा क्षेत्र भी शामिल हैं। इससे विकासशील देशों में रोजगार की स्थिति पर बुरा असर होने की संभावना है। क्योंकि तब यहाँ के सेवा क्षेत्र में उन्नत देशों के पेशेवरों की बाढ़ की संभावना है। क्योंकि तब यहाँ के सेवा क्षेत्र में उन्नत देशों के पेशेवरों की बाढ़ आ जाएगी। गैट के तहत कृषि का सवाल भी एक विवादास्पद सवाल है। जहाँ अमरीका कृषि क्षेत्र उन्मुक्त व्यापार और सब्सिडी वापस लेने का पक्षधर था, वहीं यूरोपीय आर्थिक संघ के देश, खासकर फ्रांस जो अपने कृषि क्षेत्र को भारी सब्सिडी देता है, इसका विरोध कर रहे थे। तब अमरीका ने धमकी दी कि वह उन देशों के खिलाफ सुपर 01 के जरिये दंडात्मक कानूनी कार्रवाई करेगा जो मुक्त व्यापार का अनुसरण नहीं करेंगे।

भूमंडलीकरण और तीसरी दुनिया
8 वें दशक की एक विशेषता यह भी है कि इस काल में औद्योगिक पूँजीवाद का फैलाव अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की परिधि में हुआ है। उदाहरण के लिए दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर तथा पड़ोस के नये ओद्योगिक देशों जिन्हें दक्षिणपूर्व एशियाई बाघ के नाम से जाना जाता है, के नाम गिनाये जा सकते हैं। लेकिन इन देशों में तीसरी दुनिया की मात्र 2 प्रतिशत आबादी निवास करती है। 8वें दशक में दुनिया में गरीबों और अमीरों के बीच खायी बढ़ी जो आज भी बढ़ रही है। उत्तर दक्षिण वार्ता के जरिये नयी अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था कायम करने का सपना दक्षिण के लोगों के जीवन में कोई बेहतरी नहीं ला सका। यह विश्वास, जैसा कि नवशास्त्रीय अर्थशास्त्र का कहना था, कि अप्रतिबंधित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से गरीब देशों को धनी देशों के स्तर तक पहुंचने में मदद मिलेगी, ऐतिहासिक अनुभव को झुठलाता है। उल्टे, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की ऋणदाय नीतियों तथा तीसरी दुनिया खासकर अफ्रीका पर थोपे गये शतों एवं ढाँचागत समायोजन कार्यक्रमों की वजह इन देशों में बेरोजगारी व बढ़ती गरीबी की समस्याएँ पैदा हो गई। हालत यहाँ तक पहुँच गयी है कि भोजन की छीनाझपटी के लिए दंगे तक हो जाते हैं। यहाँ यह बात भी काबिलेगौर है कि मुक्त व्यापार के अंतर्राष्ट्रीय तरीकों से मुद्रास्फीति बढ़ी है, अर्थव्यवस्था में मंदी आई है, व्यापार के लिहाज से अनेक यूरोपीय देशों का हास हुआ है।

अर्थव्यवस्था का भूमंडलीकरण, आई.बी.आर.डी.
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व व्यापार संगठन
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
भूमंडलीकरण-अर्थ एवं संरचना
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब्रिटेन वुड्स तथा व्यवस्था
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष-उद्देश्य व कार्य
संरचना
आई बी आर डी उद्देश्य
कार्य
गैट
उरुग्वे चक्र एवं विश्व व्यापार संगठन
विश्व व्यापार संगठन
उत्तर ब्रिटेन वुड्स विकास
भूमंडलीकरण और तीसरी दुनिया
भूमंडलीकरण का प्रभाव
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस खंड के अंतर्गत विश्व अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के धर्म की व्याख्या की गयी है तथा उन संस्थाओं का वर्णन किया गया है जो भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में अस्तित्व में आये हैं। इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आपः
ऽ भूमंडलीकरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया की छानबीन करने में समर्थ हो सकेंगे,
ऽ वैश्विक अर्थव्यवस्था का संचालन करने वाली संस्थाओं के कार्य और उनकी संरचना का वर्णन कर सकेंगे, और
ऽ भूमंडलीकरण के प्रभाव की आलोचनात्मक आंकलन करने में सफल हो सकेंगे।

प्रस्तावना
हम सभी आज भूमंडलीकरण शब्द से वाकिफ हैं। भूमंडलीकरण निहितार्थ यही है कि दुनिया तेजी से अंतर्राष्ट्रीय अंतनिर्भरता की प्रक्रिया में शामिल होती जा रही है। नतीजन आज वैसी अर्थव्यवस्थाएँ अप्रासंगिक हो गयी हैं जिनकी कोई खास राष्ट्रीय पहचान हो तथा जो क्षेत्र विशेष के सर्वोपरि विधानी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत संचालित हों। इसका यह मतलब नहीं है कि आम समानता पर आधारित विश्व समुदाय का उदय हो गया है । ऐतिहासिक रूप से, अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था राष्ट्र-राज्य के आधार पर विकसित हुई है । यातायात और संचार के क्षेत्र में होने वाली क्रांति तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वाले काल में परिष्कृत औद्योगिक उत्पादन की प्रौद्योगिकी की वजह से आज पूँजीवादी विश्व बाजार स्थापित हो चुका है। युद्धोत्तर काल में स्थापित ब्रिटेन वुड व्यवस्था जिसके तहत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं व्यवसाय के नियम तय किए थे, सांतवें दशक के आते आते गहराकर गिर गये। नवें दशक में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई है। विश्व व्यापार संगठन के रूप में नई संस्थाएँ एवं नये नियमों का जन्म हुआ। आज इन्हीं संस्थाओं एवं नियमों के जरिये विश्व व्यापार का संचालन होता है।