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sikh code of conduct in hindi सिक्ख आचार संहिता किसे कहते है ? सिक्ख धर्म में आचार संहिता क्या है परिभाषा ?

सिक्खों की पूजा-पद्धति व अन्य धार्मिक संस्कार (Sikh Worship and Rituals)
सिक्ख, पूजा की एक विशिष्ट पद्धति का अनुकरण करते हैं। सिक्ख समुदाय अनेक धार्मिक संस्कारों से बंधा है। इस अनुभाग में हम उनकी विशिष्ट पूजा-पद्धति व जीवनचक्र से संबंधित धार्मिक संस्कारों की चर्चा करेंगे।

 पूजा-पद्धति (The Worship Pattern)
हिन्दुओं द्वारा मूर्ति-पूजा की प्रचलित पद्धति के विपरीत सिक्ख गुरू ने ‘‘अकाल‘‘ (शाश्वत परंपरागत) की आराधना का उपदेश दिया। सिक्खों का धार्मिक-स्थल ‘‘गुरूद्वारा‘‘ केवल पूजा-अर्चना का ही स्थान नहीं है वरन बेघरों के लिए घर, निराश्रयों के लिए लौह-बुर्ग तथा शरणार्थियों के लिए शरणगाह है। जहां सभी श्रद्धालुओं को उनकी धार्मिक प्रतिबद्धताओं की ओर ध्यान दिये बिना निशुल्क खाना, रहने का स्थान तथा सुरक्षा प्रदान की जाती है। गुरूद्वारे के केन्द्र में, पवित्र ग्रंथ, गुरू ग्रंथसाहिब को एक ऊंचे स्थान पर रखा जाता है। इसके पीछे यह विचार है कि धार्मिक ग्रंथ का स्थान शिष्यों से ऊंचा है जो सामान्यतः फर्श पर बैठते हैं। पूर्ण समानता के सिद्धांत का पालन करते हुए गुरुद्वारे में किसी तरह का कोई अलग स्थान विशिष्ट व्यक्तियों के लिए नहीं होता।

भारत के विभिन्न भागों में गुरूद्वारे हैं जो गुरुओं से संबंधित होने के कारण ऐतिहासिक महत्व रखते हैं। इसके अतिरिक्त विश्व में सभी स्थानों पर जहां भी सिक्ख हैं, गुरूद्वारे हैं। वे ऐतिहासिक महत्व के नहीं हैं। पर उनका निर्माण, सिक्ख धर्म के मानने वालों के द्वारा सामूहिक रूप से अपनी धार्मिक पूजा वंदना के लिए किया गया है। श्री निशान साहिब, पीले रंग का बड़ा त्रिभुजाकार झंडा जिस पर ‘‘खंडे‘‘ का सिक्ख निशान अंकित होता है, सिक्ख धर्म स्थान की पहचान है।

समाज के सभी वर्गों के लोग अपने जूते उतार कर, पैर साफ कर तथा सिर ढक कर गुरूद्वारे में जा सकते हैं। गुरुद्वारे के द्वार सभी वर्गों व जातियों के लोगों के लिए खुले हैं। यह बात यहाँ महत्वपूर्ण है कि अमृतसर में प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर के चार द्वार हैं जो यह संकेत करते हैं कि गुरूद्वारा चारों दिशाओं से आने वालों के लिए खुला है तथा यह भी कि इसकी नींव का पहला पत्थर एक मुस्लिम फकीर मियां मीेर द्वारा रखा गया था।

 जीवन चक्र संबंधी धार्मिक संस्कार (Life cycle Rituals)
सिक्ख सामाजिक जीवन में कई धार्मिक संस्कार हैं। उनमें से कुछ की यहाँ चर्चा की गई है।

प) बच्चे का जन्म (Child Birth)
बच्चे के जन्म के तुरंत बाद आदि ग्रंथ से पांच श्लोकों का उच्चारण किया जाता है। हिन्दू समाज की रीति के विपरीत जहां कि स्त्री को जचगी के बाद छह सप्ताह तक यह मानकर कि वह अपवित्र हो गई है, रसोई में प्रवेश नहीं करने दिया जाता, सिक्ख समाज में एक स्त्री जचगी के बाद जैसे ही शारीरिक रूप से वह समर्थ महसूस करती है, रसोई में जा सकती है। महत्वपूर्ण बात है कि सिक्ख धर्म में इस अपवित्रता की रूढ़िवादी धारणा को नकार दिया गया है। यह माना गया है कि एक मां को यह मानना कि वह जचगी के कारण दूषित हो गई है, अवांछनीय है। सिक्ख व्यवस्था में जचगी से पहले व बाद के संस्कारों को नकार दिया गया है।

पपप) बच्चे का नामकरण संस्कार (Ceremony of Child Naming)
परिवार में बच्चे के जन्म के उपरांत उसके नामकरण की रस्म सामान्यतः बैसाख के पहले दिन की जाती है (यह दिन भारतीय नव वर्ष का आरंभ तथा खालसा पंथ के जन्म का दिन है) यह धर्मग्रंथ तथा जन समूह की उपस्थिति में घर पर अथवा गुरूद्वारे में किया जाता है। पुजारी (सेवादार) धर्मग्रंथ को एकदम से खोलता है और सामने आये पृष्ठ का पहला अक्षर बच्चे का नाम रखने के लिए चुना जाता है। सभी पुरुषों के नाम के साथ सिंह (शेर) तथा सभी स्त्रियों के नाम के साथ कौर (राजकुमारी) लगाया जाता है। यहां जाति के नाम के प्रयोग को नकारा गया है, जो कि हिन्दू व्यवस्था में वर्ग भेद को परिलक्षित करता है।

पपप) विवाह संबंधी संस्कार (Marriage Rituals)
सिक्ख समाज में सामान्यतः विवाह संबंध माता-पिता द्वारा ही तय किये जाते हैं। कभी-कभी लड़का व लड़की स्वयं भी अपना जीवन साथी पसंद कर लेते हैं। पर सभी शादियां सिक्ख धर्म में बताये गये मानदंडों तथा संस्कारों का पालन करते हुए ही पूरी की जाती हैं। इस रस्म में दूल्हा तथा उसके साथी जिन्हें बारात कहते हैं दुल्हन के घर जाते हैं। रस्म का आरंभ मिलनी से आरंभ होता है जिसमें दोनों पक्षों के माता-पिता तथा सगे-संबंधी पहचान व मिलाप करते हैं और उपहार देते हैं। बाद में सभी मित्रों व रिश्तेदारों को खाना खिलाया जाता है। जब सभी विशेष रूप से बनाये गये पंडाल अथवा गुरूद्वारे में प्रवेश करते हैं जहां आनंद कारज (विवाह संस्कार) गुरूद्वारे के ग्रंथी जी द्वारा संपन्न किया जाता है। सिक्ख रागी गुरूग्रंथ साहिब से संबंधित श्लोकों का गायन करते हैं तथा जोड़ा धार्मिक ग्रंथ की चार बार परिक्रमा करता है। लावां (स्ंअंद) विवाह संबंधी श्लोक हैं जिनमें जोड़े को ऊंचे नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों के पालन का उपदेश दिया जाता है। रस्म पूरी होने के बाद सभी दोपहर के प्रीतिभोज में शामिल होते हैं। तत्पश्चात दूल्हा तथा बारात दुल्हन को साथ लेकर घर वापस लौटते हैं। जहां दुल्हन के स्वागत में कुछ रस्में पूरी की जाती हैं। सिक्खों के विवाह-संस्कार में सादगी पर विशेष बल दिया गया है तथा दहेज को जरूरी नहीं माना गया है। विवाहेतर प्रेम व यौन संबंधों की सिक्ख धर्म में बिल्कुल अनुमति नहीं है। गुरू नानक ने कहा है, दूसरे की पत्नी की सुंदरता पर कभी कुदृष्टि न डालो तथा अन्य स्त्रियों को अपनी मां, बहन व बेटी समान समझो ।‘‘

 सिक्खों में बपतिस्मा (अमृत छकना/दीक्षा संस्कार) (Baptism Among the Sikhs)
गुरू नानक से लेकर नौंवे गुरू तेग बहादुर तक शिष्यों को दीक्षा देने के लिए चरण-अमृत (गुरू के पैर के अंगूठे से छुआ जल) पिलाने की प्रथा थी। दसवें व अंतिम गुरू, गुरू गोबिंद सिंह साहिब ने इसके स्थान पर खंडे-पाहुल (दुधारी तलवार द्वारा हिलाया गया जल) का आरंभ किया जब उन्होंने 1699 में बैशाखी को आनंदपुर साहिब में पंज पियारों को दीक्षा दी। जब लड़के व लड़कियां तरूणावस्था को प्राप्त होते हैं तथा अपने धार्मिक कर्तव्यों को समझने योग्य होते हैं तब उनका दीक्षा संस्कार होता है। इस समय पर की जाने वाली रस्म बिल्कुल वैसी ही होती है जैसी गुरू गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना के समय की थी वैसे तो दीक्षा-संस्कार की यह रस्म वर्ष के किसी भी समय की जा सकती है पर खालसा के जन्म का दिन बैशाखी इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। यह रस्म उपस्थित जन-समूह के सामने पूरी की जाती है। पांच दीक्षा प्राप्त सिक्ख नए बालक-बालिकाओं को दीक्षा देने के लिए चुने जाते हैं। पानी में बताशे को घोल कर अमृत तैयार किया जाता है तथा इसे खंडे (दुधारी-तलवार) से हिलाया जाता है। इसके साथ ही धार्मिक ग्रंथ में निहित वाणी के चुने हुए अंश, जिनमें गुरू गोबिंद सिंह जी की रचना भी सम्मिलित है, गाये जाते हैं। इस तरह दीक्षा प्राप्त युवक-युवतियां खालसा पंथ की शपथ लेते हैं । प्रत्येक शपथ ऊंचे स्वर में गुरू ग्रंथ साहिब के सामने बोली जाती है। चुल्लुओं में भरे अमृत को छोटे/नये दीक्षा प्राप्त खालसाओं के मुख पर छिड़का जाता है तथा साथ ही सिक्खों के नारों का उद्घोष होता है-बोले सो निहाल, और श्री वाहे गुरू जी का खालसा श्री वाहे गुरू जी की फतह । दीक्षा प्राप्त अथवा अमृत छके सिक्खों, पुरुष व स्त्री दोनों, को निम्नलिखित पाँच कक्कों का कड़ाई से पालन करना होता है।

क) केश (अनकतरे बाल): सिक्खों को शरीर के किसी भी भाग के बाल बनवाने, कतरवाने अथवा कटवाने की अनुमति नहीं है।
ख) कड़ा (लोहे का चूड़ी नुमा): सभी दीक्षा प्राप्त सिक्खों के लिए कड़े को हाथ में पहनना आवश्यक है। दांयी कलाई में धारण किया कड़ा इस बात की लगातार याद दिलाता है कि एक सिक्ख को सिक्खों की आचार-संहिता का पालन करना है तथा पवित्र कार्य करने हैं।
ग) कृपाण (तलवार): इसके धारण करने का अर्थ है: ‘‘आप अपनी तलवार से मेरी रक्षा करना‘‘। इसका उपयोग स्वरक्षा तथा निर्बल तथा निराश्रितों की रक्षा के लिए किया गया था।
घ) कंघा: बालों को साफ व व्यवस्थित रखने के लिए सिक्खों को अपनी पगडी में सदैव एक कंघा रखने का आदेश है।
च) कच्छा: इसका उपयोग इस बात को ध्यान में रखते हुए किया गया था कि खालसा को युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना है तथा यह पवित्रता तथा कड़े नैतिक मूल्यों का भी चिहन है।

कार्यकलाप 1
आप अनेक सिक्ख दोस्तों व पड़ोसियों के संपर्क में आते होंगे। अपने अनुभव व दृष्टिगत घटनाओं के आधार पर आपके क्षेत्र में सिक्खों के धार्मिक संस्कारों पर एक पृष्ठ का संक्षिप्त विवरण लिखें । यदि संभव हो, तो अपना लिखा विवरण अध्ययन केन्द्र में अन्य विद्यार्थियों के साथ आदान-प्रदान करें।

सिक्ख आचार संहिता व सधार आन्दोलन (Sikh Code of Conduct and Reform Movements)

सिक्खों के लिए कई महत्वपूर्ण आचार संहिता हैं। सिक्ख समाज कई सुधार आंदोलनों का भी साक्षी है। इस अनुभाग में हम इन पहलुओं पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

आचार-संहिता (Code of Conduct)
किसी भी समाज के क्रिया-कलापों की दिशा मोटे तौर पर उस समाज के अनुयायियों के लिए बनी आचार संहिता द्वारा तय होती है। सिक्खों द्वारा अनुकरण करने के लिए आचार संहिता है-रैहत (मर्यादा), जिसका विकास कई वर्षों में जाकर हुआ है। कुछ वर्जित कार्यों में है-मुस्लिम प्रथा के अनुसार बना हलाल मीट न खाना, शरीर के किसी भी भाग से बालों को न काटना, धूम्रपान न करना, शराब का सेवन न करना तथा बदचलनी अथवा विवाहेतर संबंध न रखना।

जैसा कि पहले बताया गया है, सिक्ख गुरुओं ने पारंपारिक जाति प्रथा का विरोध किया तथा समानतापूर्ण समाज की नींव रखी। संगत और पंगत की प्रथाओं द्वारा उन्होंने तथाकथित ऊंच-नीच व अमीर-गरीब के भेदभाव को मिटाने का प्रयास किया । तथाकथित निम्न जाति के संत कबीर की वाणी को तथाकथित उच्च जाति के ब्राह्मण रामानंद के समकक्ष स्थान देकर सिक्ख गुरुओं ने समानता का अद्वितीय आदर्श दर्शाया तथा विश्व बंधुत्व की सच्ची भावना को अपनाया। फिर भी भारतीय मानसिकता में गहरी जड़ें जमाये जाति-भेद के विचार को सिक्ख समाज से पूरी तरह मिटाया नहीं जा सका है। यह सच है कि संगत में बैठने पर अथवा सामूहिक रसोई (गुरू का लंगर) से खाना लेते समय जाति संबंध विचार आड़े नहीं आते पर जाति फिर भी, विवाह तथा अन्य सामाजिक बंधनों के संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मोटे जाति-भेद जैसे जाट, खत्री, अरोड़ा तथा रामगढ़िया के अतिरिक्त निम्न जातियों से आये सिक्ख धर्म ग्रहण करने वालों को, किसी वर्ग व्यवस्था को न मानने वाले सिक्ख मत में पूरी तरह आत्मसात नहीं किया गया है। निम्न जाति वाले निम्न जाति वाले ही माने जाते हैं तथा उन्हें ‘‘मजहबी सिक्ख‘‘ के पृथक रूप में जाना जाता है। जब स्वर्ण मंदिर तथा अन्य सिक्ख धार्मिक स्थलों का प्रबंध उदासी मंहतों के हाथ में आया तो उन्होंने मजहबी सिक्खों द्वारा पवित्र स्थलों पर उनके द्वारा पूजा करने के लिए पृथक समय निर्धारित कर दिया। उन्हें अपने साथ उच्च जाति के साथी/अर्दली को ले जाना पड़ा जो उनके द्वारा चढ़ाया जाने वाला प्रसाद लेकर चल सके। गुरूद्वारों के सुधार के लिए चलाये गये अकाली आंदोलन के दौरान ही इस तरह के प्रतिबंधों को हटाया जा सका तथा गुरूद्वारों का प्रबंध लोकतांत्रिक तरीके से चुनी समितियों को सौंपा गया। सिक्ख समाज के आधुनिकीकरण के बाद भी अंतरजातीय विवाह बहुत कम होते हैं और उससे भी कम हैं तथाकथित उच्च जाति-खत्री से जुड़े लोगों द्वारा तथाकथित मजहबी सिक्ख कहलाने वाले लोगों के यहां विवाह की घटनाएं। इसी प्रकार धार्मिक तथा वैचारिक धरातल पर भी मतभेद हैं। धार्मिक सुधारों के लिए चलाये गये आंदोलन जैसे निरंकारी व नामधारी, जिनका उद्देश्य सिक्ख धर्म को गैर-सिक्ख परंपराओं से मुक्त करना था, अपने आप में पृथक व