SICA full form in hindi | sick industrial companies (special provisions) act of 1985 in hindi

By   March 10, 2021

sick industrial companies (special provisions) act of 1985 in hindi SICA full form in hindi ?

उत्तर : SICA का पूरा नाम “कानून रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम” जिसे अंग्रेजी में “sick industrial companies (special provisions) act of 1985” कहते है |

प्रस्तावना
1980 के दशक के आरम्भ में, यह देखा गया था कि बड़ी संख्या में फर्में या तो पूरी तरह से दिवालिया हो गईं थी अथवा दिवालिया होने ही वाली थी और अत्यन्त ही विस्मय जनक है कि इन फर्मों में से कई उद्योगों से निकल नहीं पा रहे थे। सामान्य निकास (बहिर्गमन) मार्ग में अनेक बाधाएँ थीं जो विरोधाभासी विधानों (मुख्यतः 1970 के दशक में पारित) और संरक्षणवाद के चरमोत्कर्ष के दौरान अपनाई गई नीतियों द्वारा असावधानीवश पैदा हो गई थी। पहली समस्या पर ध्यान देने के लिए सरकार ने एक नया कानून रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 (SICA) पारित किया जिसके अंतर्गत एक विनियामक निकाय द्वारा औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (BIFR) के माध्यम से ऐसे फर्मों की प्रत्यक्ष निगरानी अपेक्षित थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन फर्मों को मुख्य रूप से गैर-बाजार साधनों जैसे राजसहायता, बाजार संरक्षण और प्रौद्योगिकी में प्रशासित सुधार द्वारा फिर से स्वस्थ करना था।

दूसरी समस्या, जो हालाँकि पहली समस्या से ही संबंधित है, पर 1991 तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। इस समस्या में घरेलू और विदेशी निवेशकों द्वारा बहिर्गमन बाधाओं, जो न सिर्फ संकटग्रस्त फर्मों के लिए ही समस्या खड़ी कर रहे थे अपितु भावी निवेश को भी हतोत्साहित कर रहे थे, को दूर करने की व्यापक माँग की थी।

प्रतिक्रियास्वरूप, वित्त मंत्रालय ने पुनर्गठन और परिसमापन के संपूर्ण ढाँचे की फिर से जाँच करने के लिए 1993 में औद्योगिक रुग्णता और कारपोरेट पुनर्गठन संबंधी समिति (CISCR) गठित की थी। समिति ने अपने प्रतिवेदन में बी आई एफ आर की अक्षमता से लेकर कानूनी बाधाओं तक अनेक कारकों का उल्लेख किया और महत्त्वपूर्ण सुधार की सिफारिश की। इस प्रतिवेदन ने त्तकाल बौद्धिक वाद-विवाद और नई नीतिगत पहलों का आधार प्रस्तुत किया किंतु दुर्भाग्यवश इसे कार्यरूप नहीं दिया जा सका और बहिर्गमन नीति की रचना अथवा पुनर्रचना का कार्य आज तक अपूर्ण है।

इस पृष्ठभूमि में हम दो सरल प्रश्नों से शुरू कर सकते हैं: बहिर्गमन इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है? बहिर्गमन नीति यथार्थतः क्या है? पहला प्रश्न सैद्धान्तिक है, और दूसरा मुख्यतः कार्य संबंधी।

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बहिर्गमन का महत्त्व पता लगाने के लिए हमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन तथा वितरण में खुले बाजार की भूमिका को समझना होगा जिसे ऐडम स्मिथ ने श्अदृश्य हाथश् कहा है। ‘अदृश्य हाथ‘ फर्मों के बीच अत्यन्त ही भद्दी लड़ाई जिसे प्रतियोगिता कहा जाता है का संचालन करता है और जीतने वाले को पुरस्कृत तथा हारने वाले को खाली हाथ लौटा देता है। अतएव, खुले बाजार के खेल में यह आवश्यक है कि हारने वाला (अथार्त दिवालिया फर्म) हट जाए। अर्थशास्त्रियों की भाषा में. फर्मों का बाजार में प्रवेश और इससे बहिर्गमन स्वतंत्र होना चाहिए। इसी सैद्धान्तिक कारण से बहिर्गमन महत्त्वपूर्ण है।

सुधार के एक दशक में सरकार ने प्रायः सभी उद्योगों से क्षमता प्रतिबंध और प्रशासनिक प्रवेश (म्दजतल) बाधाओं को समाप्त कर दिया है। यहाँ तक कि अधिकांश क्षेत्रों में विदेशी निवेश का भी स्वागत है। किंतु ये सभी उपाय सिर्फ प्रवेश और बाजार पहुँच की दिशा में किए गए हैं और बहिर्गमन के संबंध में बहुत ही कम किया गया है। इसलिए बहिर्गमन नीति की बहुत ही लम्बे समय से आवश्यकता थी।

किंतु बहिर्गमन नीति का यथार्थतरू अभिप्राय क्या है? आदर्श रूप में, यह अनेक मुद्दों मुख्यतः औद्योगिक रुग्णता, छंटनी, रुग्ण फर्मों के पुनर्गठन और बंद इकाइयों के परिसमापन से संबंधित परस्पर संगत नीतियों का समूह है। इस समय, पुरानी नीतियाँ और विधान जिन्होंने बहिर्गमन प्रक्रिया को जटिल बना दिया था, अभी भी मौजूद हैं और सम्यक् बहिर्गमन नीति की खोज अभी भी जारी है।

इस इकाई में हम बहिर्गमन समस्या और इसके कुछ मुख्य आयामों पर चर्चा करने जा रहे हैं और आशा है कि आप यह समझ सकेंगे कि सरकार के सामने कौन से विकल्प हैं तथा प्रभावी बहिर्गमन नीति तैयार करने में यह किन दुविधाओं से ग्रस्त है।

बोध प्रश्न 1
1) खुले बाजार में बहिर्गमन क्यों आवश्यक है, स्पष्ट कीजिए?
2) बहिर्गमन नीति की त्तकाल आवश्यकता क्यों है, स्पष्ट कीजिए?

सारांश
बहिर्गमन समस्या के मुख्य मुद्दों को जानने के बाद आपको यह स्पष्ट हो गया होगा कि बहिर्गमन नीति तैयार करने का अर्थ अनेक क्षेत्रों में सुधार करना है। इसका विधायी भाग का एवं श्रम और भूमि उपयोग कानूनों में परिवर्तन का ट्रेड यूनियनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अनेक राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किया जाता है। राष्ट्रीयकृत बैंकों, बी आई एफ आर और न्यायपालिका के कार्यकरण में तभी आमूल-चूल परिवर्तन किया जा सकता है जब सरकारी नौकरशाही में प्रशासनिक सुधार किए जाएँ।

ये विकल्प स्पष्ट हैं, किंतु जहाँ तक वास्तविक बाधाओं का संबंध है तथ्य यह है कि ये दूर नहीं किए जा सके हैं। ये बाधाएँ सिर्फ विभिन्न हित समूहों का विरोध नहीं है अपितु कुछ दुविधा भी है। यदि श्रम कानूनों को उदार बना दिया जाए, तो बड़े पैमाने पर छंटनी होगी और पृथक्करण वेतन उत्तरदायित्वों का भी खूब उल्लंघन होगा। तब श्रमिक किसके पास जाएँगे? न्यायालय की प्रक्रिया अत्यन्त मंद है। नौकरशाही भी, जब तक कि आमूल-चूल सुधार नहीं किए जाएँ कुछ बेहतर ढंग से कार्य नहीं कर सकेगा।

अतएव, जब तक स्वयं सरकार में सुधार नहीं किया जाए, यह अधिक उदारीकृत परिवेश में कानूनों और विनियमों को लागू करने में सक्षम नहीं होगा। जब तक यह ऐसा नहीं कर सके, सीधे छंटनी की अपेक्षा कठोर श्रम कानून होना श्रेयस्कर है। यह सिर्फ एक उदाहरण है जिसमें सरकार कर्तव्यबद्ध है। इसी तरह की समस्या भूमि और वित्तीय पुनर्गठन के मामले में भी पैदा होती है। संवर्धनकारी भूमिका ग्रहण करके (राज सहायता, सस्ती भूमि इत्यादि उपलब्ध कराकर) सरकार ने बहिर्गमन को विनियमित करने, यह देखने कि राजसहायता का दुरूपयोग नहीं हो, का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया है। किंतु तब विनियम स्वयं बहिर्गमन प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं।

आय और रोजगार अवसरों में सत्त् वृद्धि के साथ समय बीतने पर ही इसमें से कुछ समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। पहले ही श्रम संबंध बदल रहे हैं जिसमें व्यापक सामूहिक समझौतों की अपेक्षा द्विपक्षीय समझौते अधिक हो रहे हैं। ठेके पर श्रमिकों को रखना नियोजकों को कठोर श्रम कानूनों से बचने का रास्ता दे देता है और नई पीढ़ी के श्रमिक भी जब तक वेतन प्रतिस्पर्धी है इस प्रवृत्ति को स्वीकार कर रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अब लाभ कमाने तथा आत्मनिर्भर बनने के लिए कहा गया है। इसलिए फर्म और श्रमिकों के बीच संविदात्मक संबंधों का प्रादुर्भाव हुआ है तथा वित्तीय संस्थाएँ भविष्य में बहिर्गमन समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही हैं।