तालाबंदी किसे कहते हैं | तालाबंदी की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब lockout in hindi meaning definition

By   March 9, 2021

lockout in hindi meaning definition तालाबंदी किसे कहते हैं | तालाबंदी की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब ?

शब्दावली

तालाबंदी ः श्रमिकों की कुछ माँगों को पहले ही हथिया लेने अथवा अपनी सौदाकारी की स्थिति में सुधार करने अथवा घाटा कम करने के लिए नियोजकों द्वारा अस्थायी रूप से बंद किया जाना।
पैरेटो अनुकूलतमता ः सामूहिक अनुकूलतमता की अवधारणा जो कोई भी अपव्यय नहीं और कुशलता पर आधारित है।
श्रम दिवस ः नष्ट श्रम-दिवस हड़ताल (अथवा तालाबंदी) की लागत एक माप हैं। यदि एक फैक्टरी प्रति शिफ्ट 100 श्रमिकों को नियोजित करता है और प्रतिदिन दो शिफ्टों में कार्य संचालन करता है तो एक दिन के हड़ताल से 200 श्रम दिवसों की हानि होगी।

उद्देश्य
इस इकाई में औद्योगिक विवादों के अर्थशास्त्र की जाँच-पड़ताल और इस पर चर्चा की गई है। यह विवादों के विभिन्न पहलुओं संबंधी आँकड़ों की भी जाँच करती है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आपः

ऽ हड़ताल और विवाद के अन्य रूपों की आर्थिक व्याख्या के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे;
ऽ भारत में औद्योगिक विवादों की प्रवृत्ति के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे;
ऽ विवादों के कारणों और अवधि को समझ सकेंगे; और
ऽ यह समझ सकेंगे कि सत्तर और अस्सी के दशकों की अपेक्षा अब कम विवाद क्यों होते हैं?

प्रस्तावना
औद्योगिक संबंधों का अभिप्राय मुख्य रूप से हड़तालों, तालाबंदियों एवं औद्योगिक विवादों के अन्य रूपों और उनके कारणों तथा समाधानों से है। इस इकाई में हम इस समस्या के कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर दृष्टि डालने का प्रयास करेंगे। हम इस प्रश्न से शुरू कर सकते हैं कि औद्योगिक संबंध सौहार्दपूर्ण क्यों नहीं हैं? हड़ताल और तालाबंदी क्यों होते हैं? एक साधारण व्यक्ति के लिए यह प्रश्न अत्यन्त ही सरल प्रतीत होता है क्योंकि यदि सर्वत्र संघर्ष जीवन का हिस्सा है तो फैक्टरियों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। वह व्यक्ति ऐसी दलील दे सकता है। किंतु यही सरल उत्तर अर्थशास्त्री को विकट समस्या में डाल देता है।

सारांश
भारत में औद्योगिक विवाद, ऐसा प्रतीत होता है कि 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में साधारण स्तर से शुरू होकर सत्तर के दशक के मध्य और अस्सी के दशक के आरम्भ तक अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया और फिर धीरे-धीरे पूर्व स्तर तक गिर कर, एक चक्र पूरा कर चुका है। पचास वर्षों के इस चक्र में दो विशेष व्यवधान बिंदु हैं , 1976 में अचानक गिरावट आई और 1982 में चरम वर्ष (नष्ट श्रम-दिवसों के असामान्य रूप से अधिक होने की दृष्टि से) । तथापि विवादों के परिदृश्य में सुधार पूरी तरह से हड़ताल में गिरावट की प्रवृत्ति के कारण से है जिसने तालाबंदियों में वृद्धिशील प्रवृत्ति को प्रभावी रूप से प्रभावहीन कर दिया है। अस्सी के दशक के आरम्भ में हड़तालों और तालाबंदियों की प्रवृत्ति में परिवर्तन आया। हड़तालों और तालाबंदियों दोनों में एक नकारात्मक विशेषता यह रही कि औसत रूप से दोनों प्रकार के विवादों में श्रम दिवसों की दृष्टि से अत्यधिक हानि हुई।

विवादों के कतिपय अन्य आयाम भी उल्लेखनीय हैं। यद्यपि कि अधिकांश विवाद निजी क्षेत्र में होते हैं, विवादों में सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा सत्त् रूप से बढ़ रहा है। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि विवादों में सम्मिलित अधिकांश श्रमिक सार्वजनिक क्षेत्र से आते हैं और उनका हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। सामान्यतया श्रमिकों के सामने अधिकतर विवादों के प्रतिकूल निर्णय आ रहे हैं जो शायद उनकी सौदाकारी की शक्ति में कमी का प्रमाण है। यद्यपि कि विवादों की संख्या घटी है, लम्बे समय तक चलने वाले विवादों का अनुपात काफी बढ़ा है जो सरकार के विवाद समाधान तंत्र के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए।

टिप्पणी
इस इकाई में, हमने मुख्य रूप से भारत में औद्योगिक विवाद की स्थिति की समीक्षा की है, और इस प्रश्न से बचने का प्रयास किया है रू कौन से समष्टि आर्थिक कारकों ने विवादों की प्रवृत्ति को एक आकृति देने में मुख्य भूमिका निभाई है। यह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, किंतु यह शोध संतोषप्रद उत्तर प्रदान करने के लिए अपर्याप्त है।

यहाँ, हम नई नीति व्यवस्था के प्रादुर्भाव के साथ हड़तालों में गिरावट के संयोग, जो दुर्घटनावश नहीं हो सकता, यद्यपि कि स्वीकार्य रूप से इसकी भी पूरी-पूरी व्याख्या नहीं की जा सकती है, को रेखांकित कर सकते हैं। बॉम्बे टैक्सटाइल मिलों के विनाशकारी अनुभव के बाद, श्रमिक संघों ने सामूहिक सौदाकारी के अपने दृष्टिकोण में कुछ संशोधन किया और 1976 तथा 1982 में औद्योगिक विवाद अधिनियम में स्पष्ट रूप से किए गए नौकरी सुरक्षा उपबंधों के बावजूद भी नौकरी छूटने का भय अधिक वास्तविक हो गया। यह बोध कि कोई भी सरकारी उपाय दिवालियापन को नहीं रोक सकता और न ही सरकार रुग्ण इकाई को अपने हाथ में लेगी, ने श्रमिकों को हड़ताल के प्रति सावधान कर दिया। इसके साथ ही, अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ था और चूँकि कतिपय उद्योग इससे काफी प्रभावित हुए थे, इसका कुल प्रभाव यह हुआ कि विकास को बल मिला जिससे आय के अधिक से अधिक अवसर पैदा हुए (हालाँकि रोजगार में मामूली वृद्धि हुई)। इसने संभवतः श्रमिकों के सहयोगी व्यवहार का मार्ग प्रशस्त किया।

यही सकारात्मक प्रभाव नियोजकों पर भी दिखाई पड़ना चाहिए था। किंतु हम जानते हैं कि नियोजक तालाबंदी के लिए अधिक से अधिक मजबूर कर रहे हैं। यह एक पहेली है। इसकी कुछ व्याख्या है। एक व्याख्या यह है कि तालाबंदी छद्म रूप से बंद किया जाना है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, (1982 से), द्वारा अधिदिष्ट बंद किए जाने पर प्रतिबंध के कारण नियोजक जब वे दिवालियापन के कगार पर होते हैं तालाबंदी का मार्ग चुनते हैं। उदारीकरण के पश्चात् अनेक अकुशल उद्योग रुग्ण हो गए किंतु बहिर्गमन बाधाओं की सुविदित समस्या के कारण (एक इकाई को बंद करने और परिसमापन में कठिनाई) वे सीधे तालाबंदी कर देते हैं। तथापि, यह मात्र एक व्याख्या है और संभवतया तालाबंदियों की बढ़ती हुई घटना का विवरण नहीं है। इसका उत्तर भावी शोधों से मिल सकता है।

 कुछ उपयोगी ग्रंथ और संदर्भ
केनन, जे. (1986). “दि इकनॉमिक्स ऑफ स्ट्राइक्स‘‘, हैण्डबुक ऑफ लेबर इकनॉमिक्स, वॉल्यूम प्प्, ओ. अशेनफैल्टर और आर. लेयर्ड द्वारा संपादित, एलसेवियर साइंस पब्लिशर्स में।
साहा, बी. और आइ. पैन (1994). “इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स इन इंडिया: एन इम्पेरिकल एनालिसिस‘‘ इकनॉमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली, अप्रैल 30।
विण्डमूलर, जे. इत्यादि (1987). कलेक्टिव बार्गेनिंग इण्डस्ट्रियलाइज्ड मार्केट इकोनोमीज: ए रिएप्रेजल, इंटरनेशल लेबर ऑफिस, जेनेवा ।
स्टैटिस्टिकल पब्लिकेशन्स
इंडियन लेबर ईयर बुक, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार।
भारतीय श्रम सांख्यिकी, दि लेबर ब्यूरो ।